पिंजरा और पंख-51
लघुकथा श्रृखंला : दिनेशराय द्विवेदी
एम.एससी. मनोविज्ञान बनस्थली विद्यापीठ से करने की अंडरटेकिंग देने पर शगुन की टीचिंग असिस्टेंट के पद पर नियुक्ति पुख्ता हो गयी. अब उसे 27 जून को पदभार ग्रहण करना था.
बी.एससी. फाइनल का अन्तिम पेपर समाप्त हुआ. 21 मई को बाद मम्मा-पापा उसे लेने आ रहे थे, उसी दिन वापस लौटना था. बी.एससी. फाइनल हो जाने से शगुन होस्टल रूम रिटेन नहीं कर सकती थी. अगले साल उसे नया होस्टल मिलना था. शगुन ने अपना सारा सामान पैक करना शुरू कर दिया. आयुष भी 20 मई को सुबह गुवाहाटी से कामाख्या एक्सप्रेस पकड़ कर 22 को दोपहर होने तक रामगंजमंडी पहुँच रहा था. उसके घर पहुँचने के 24 घंटों में आयुष का वहाँ पहुँचना उसके लिए अच्छा था.
कार घर के बाहर पहुँचते ही एक-दो बार हॉर्न बजाने पर चाची बाहर आई, उन्होंने गेट खोला, गुप्ताजी ने कार अंदर खड़ी की. एसी कार से बाहर निकलते ही शगुन को रामगंजमंडी की तेज गर्मी का अहसास हुआ. वह चाची से गले मिली लेकिन उसकी आँखें मुक्ति को तलाश रही थी. तभी उसे ड्राइंग रूम के दरवाजे के परदे के पीछे वह छुपती हुई दिखाई दी.
“दो दिन से रट रही है शगुन दी आएंगी आयुष भैया आएंगे. अब तुम आ गयी हो तो परदे के पीछे छुप रही है.” चाची ने बताया.
मुक्ति अब डेढ़ साल की थी. अब दौड़ने और बोलने भी लगी होगी. शगुन का मन उसे गोद में उठाने और बातें करने का हुआ. शगुन ड्राइंग रूम में गयी तो मुक्ति परदे के पीछे से हंसती हुई भाग कर अंदर जाने लगी, तभी फिसल कर फर्श पर कालीन पर गिर गयी. उसे चोट नहीं लगी थी पर बच्चे का रुआँसा होना स्वाभाविक था. शगुन ने उसे गोद में उठा कर पुचकार लिया. तू दीदी से भाग रही थी तो गिर गयी. दीदी से भागी क्यों? दीदी को प्यार नहीं करेगी? प्यार में भीगे शब्द सुन कर मुक्ति मुस्कुराने लगी.
इस बीच मम्मा, चाची और पापा सामान निकाल लाए. चाची उन्हें लेकर जीने से ऊपर जाने लगी. शगुन ने रोका तो कहने लगी, “एक बैग तुम्हारे लिए रख छोड़ा है, उसे लेकर आओ.”
चाची ने शगुन और आयुष का कमरा तैयार कर रखा था. सामान वे रख चुकी थीं. शगुन ने भी बैग रखा. फिर चाची से बतियाने लगी. उन्होंने बताया कि, “इन्दौर वाले मेहमान 27 मई की शाम को रामगंजमंडी पहुँच रहे हैं.
उस रात किसी ने शगुन से मेहमानों का कोई जिक्र नहीं किया. पापा के पूछने पर शगुन ने इतना जरूर बताया कि बी.एससी. में उसके विद्यापीठ में प्रथम स्थान पर रहने की पूरी संभावना है कि. ऐसा हुआ तो उसे स्वर्ण पदक मिलेगा. अगली सुबह ग्यारह बजे आयुष भी घर पहुँच गया. उसे देख शगुन की बाँछें खिल उठीं. अब घर में उसका एक मजबूत समर्थक मौजूद था, और वह अपनी बात मजबूती से कह सकती थी.
तीन दिन शान्ति से गुजर गए. नन्ही मुक्ति शगुन और आयुष से खूब हिल गयी थी. वे बाहर जाते तो उनके साथ जाने की जिद करती, वे साथ ले भी जाते. अभी तक उनके सामने मेहमानों के आने का कोई जिक्र नहीं हुआ था. पच्चीस जुलाई की शाम अनिल चाचा दफ्तर से लौट कर आयुष के साथ लिविंग रूम में चाय पी रहे थे. शगुन ऊपर अपने कमरे में थी. तभी चाचा ने बताया कि, "परसों शाम इन्दौर वाले मेहमान यहाँ होंगे. उनके ठहरने का इंतजाम होटल ऋतुराज में कर दिया है. रात को शगुन के सिवा हम सब उनके साथ होटल में ही डिनर कर लेंगे, हम परिवार और लड़के को देख लेंगे. अगली सुबह वे शगुन को देखने घर आएंगे. लंच यहीं करेंगे. उसके बाद वे होटल लोटेंगे और यदि उन्होंने हाँ कर दी तो हम होटल चल कर टीका करके दस्तूर कर देंगे. शगुन का ग्रेजुएशन हो चुका है, अब और क्या इंतज़ार करना?"
आयुष चाचा को सुन कर मुस्कुरा कर रह गया.
रात को छत पर, आयुष और शगुन एक साथ बैठे. चाची ने शाम को ही छत पर पानी छिड़क दिया था, वह ठंडी थी. हवा में भी कुछ ठंडक आ चुकी थी. यह वही जगह थी जहाँ कभी उन्होंने बचपन के सपने साझा किए थे.
"दीदी, अपना नियुक्ति पत्र लाई हो न?" आयुष ने धीमी आवाज़ में पूछा.
"हाँ आयुष, वह मेरे पास नीचे बैग में रखा है. मुझे ‘रोका’ हो जाने का कोई डर नहीं है, मुझे डर पापा की चुप्पी का है. मैं नहीं चाहती कि मेरा स्वावलंबन उन्हें समाज के सामने छोटा महसूस कराए."
आयुष ने दीदी का हाथ थाम लिया. "पापा को छोटा आप नहीं, बल्कि चाचा के थोपे हुए थोथे तर्क बना रहे हैं. जब आप यह पत्र दिखाएंगी, तो आप सिर्फ एक नौकरी की बात नहीं करेंगी, आप उस 'पिंजरे' की सलाखों को भी हटा देंगी जिसे पापा भी महसूस करते हैं पर कह नहीं पाते."
सीढ़ियों पर किसी के पैरों की आहट हुई. मम्मा ऊपर आ रही थीं. उन्होंने दोनों को साथ देखा और उनके पास आकर बैठ गईं. "परसों की तैयारी पूरी है. अनिल चाचा ने सब व्यवस्था कर दी है. पर शगुन, तेरे पापा कुछ बोल नहीं रहे हैं, वे अंदर ही अंदर बहुत बेचैन हैं."
शगुन ने मम्मा का हाथ पकड़ लिया. "मम्मा, क्या पापा को मुझ पर भरोसा नहीं है? क्या मेरी तीन साल की मेहनत इस एक दिन की रस्म से कमज़ोर पड़ जाएगी?"
मम्मा की आँखों में आँसू थे, पर वे मुस्कुराईं. "भरोसा तो बहुत है बेटा, बस वे उस दुनिया से डरे हुए हैं जहाँ उन्होंने जन्म लिया है, जिसमें हम सब रहते हैं."
उस रात शगुन को नींद नहीं आई. उसने अपनी नोटबुक निकाली. उसमें उसने आज कुछ नहीं लिखा. बस एक पुराने सूखे हुए गुलाब को देखा, वही गुलाब जो फातिमा ने उसे इंटरव्यू वाले दिन दिया था.
नीचे लिविंग रूम में अनिल चाचा पापा को रविवार को पुष्य नक्षत्र होने से श्रेष्ठ मुहूर्त के लाभ गिना रहे थे. उधर गुवाहाटी की ब्रह्मपुत्र की लहरों की याद और बनस्थली के संकल्प के बीच आयुष और शगुन खुद को मजबूत कर रहे थे. रविवार को उन्हें साबित करना था कि पंख अब उड़ान के लिए तैयार हैं.
... क्रमशः
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