पिंजरा और पंख-46
लघुकथा श्रृखंला : दिनेशराय द्विवेदी
जुलाई में अच्छी बारिश हो गयी थी. सदियों से न जाने कितनी प्यास इस धरती के पास जमा है कि चाहे कितनी ही बरसात हो, सारा पानी घंटों में पी जाती है. बनस्थली और आसपास के इलाके में हरियाली अपनी पूरी रंगत में थी. रेतीली जमीन पर हरियाली की चादर बिछ गई थी. शगुन की व्यस्तता बढ़ गयी थी. ऑनर्स मनोविज्ञान में उसका आखिरी साल था. समय निकाल पाना बहुत कठिन था. लेकिन उसका मन रह-रहकर आयुष के ईमेल के इर्द-गिर्द घूमता रहता.
उस दोपहर, डिपार्टमेंट की लाइब्रेरी में बैठी शगुन को फिर से आयुष के ईमेल की याद आई. उसने कंप्यूटर पर जाकर फिर से अपना ई-मेल अकाउंट खोला और इस बार आयुष का ई-मेल को प्रिंट कमांड दिया. थोड़ी देर में प्रिंट उसके हाथ में था. वह उसे फिर से पढ़ने लगी.— "दीदी, यहाँ सब कुछ शून्य (0) और एक (1) के बीच है. लेकिन लगभग कुछ समय लैब में गुजारना पड़ता है. ड्राइंग्स ही ड्राइंग्स, रेखाएँ खींचने के बीच यहाँ की उमस पसीना बहाने लगती है. ऐसा लगने लगता है कि इंजीनियर बनने से पहले मजदूर होना जरूरी है. अब समझ आ रहा है कि बहुत सारे आविष्कार अनपढ़ और अल्पपढ़ मजदूरों ने कैसे कर दिखाए?"
शगुन के चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान आ गई. उसने तुरंत रिप्लाई (Reply) बटन दबाया और लिखा:
"प्रिय आयुष, तुमने जो महसूस किया है, वही शिक्षा का असली 'क्यूआर कोड' है. जब हाथ श्रम से काले होते हैं, तभी मस्तिष्क में विचारों की उजली लकीरें उभरती हैं. यह घिसना बंद मत करना, हीरा रगड़ खाकर ही अपनी चमक पाता है."
ईमेल भेजकर शगुन ने अपनी 'ऑनर्स प्रोजेक्ट' की फाइल खोली. विषय था, "पितृसत्ता में स्त्री शिक्षा का वैचारिक संघर्ष". डॉ. शास्त्री ने उसे आगाह किया था कि यह विषय अकादमिक से ज़्यादा व्यक्तिगत हो सकता है, लेकिन शगुन अड़ी रही. उसे लगा कि जो लड़ाई वह घर के भीतर लड़ रही है, उसे शब्दों में ढालना ही उसका असली 'संबल' होगा. जब वह प्रोजेक्ट करने लगी तो उसे महसूस हुआ कि केवल उसके परिवार के तथ्य पर्याप्त नहीं होंगे. शेष तथ्य कहाँ से लाए जाएँ? फिर उसे होस्टल मेस में काम करने वाली नाथी का ध्यान आया. वह विद्यापीठ परिसर से बाहर बसे बनस्थली गाँव से आती थी. उसने उससे बात की तो उसने महसूस किया कि उसे उसके गाँव जाकर कुछ स्त्रियों से बात करनी चाहिए. नाथी उसे गाँव की स्त्रियों से बात कराने को तैयार हो गयी. एक मंगलवार साप्ताहिक अवकाश के दिन जब नाथी का भी अवकाश था, शगुन बनस्थली गाँव गई. उसने चार घंटे वहाँ बिताए और बहुत सारी स्त्रियों से बात करने के बाद बहुत से तथ्य एकत्र किए. उसने महसूस किया कि यह संघर्ष जितना उसने सोचा था उससे कहीं बहुत अधिक कठोर है. लेकिन अब प्रोजेक्ट लगभग तैयार था, बस एक बार डॉ. शास्त्री को दिखाने भर की देर थी.
शाम को फोन पर मम्मा से बात हुई. उनकी आवाज़ में एक अजीब सी खामोश बेचैनी थी. "शगुन, तू ठीक तो है न? पढ़ाई पर ध्यान देना, और... और अनिल चाचा ने आज फिर पापा से तेरे बारे में कुछ बात की थी." मम्मा की आधी-अधूरी बात ने शगुन के कान खड़े कर दिए. "क्या बात मम्मा? क्या फिर से कोई रिश्ता आया है?"
मम्मा ने लंबी साँस ली, "उनका कोई जानकार है, अच्छे लोग हैं, लड़का बैंक में है. चाचा कह रहे थे कि शगुन की पढ़ाई अब पूरी होने को है, तो क्यों न सगाई कर दी जाए? शादी का बीएससी का रिजल्ट आने के बाद देख लेंगे."
शगुन का गला सूख गया. वह जानती थी कि आयुष की सफलता ने चाचा के अहंकार को शांत जरूर किया था, लेकिन बदला नहीं था. अब वे शगुन की 'आज़ादी' को 'विवाह' की लक्ष्मण रेखा में बाँधकर अपना खोया हुआ वर्चस्व वापस पाना चाहते थे.
"मम्मा, आप पापा से कहिएगा कि मेरी उड़ान अभी बाकी है. अभी तो मुझे एमएससी (M.Sc) करनी है," शगुन ने दृढ़ता से कहा. "बेटा, मैं तो तेरे साथ हूँ, पर चाचा की बात टालना पापा के लिए मुश्किल होता जा रहा है. वे कहते हैं कि आयुष पर इतना खर्च हो रहा है, तो बेटी की ज़िम्मेदारी से जल्दी मुक्त होना ठीक है."
फोन रखने के बाद शगुन बहुत देर तक हॉस्टल की बालकनी में खड़ी रही. दूर क्षितिज पर चमकती बिजलियाँ उसे संकेत दे रही थीं कि रामगंजमंडी में एक बार फिर 'विचारों का युद्ध' छिड़ने वाला है. लेकिन वह सब सवालों का उत्तर जरूर देगी, चाचा को भी और जरूरत पड़ी तो पापा को भी. उसने सुना था कि बनस्थली में पोस्ट ग्रेजुएट छात्राओं को रिसर्च असिस्टेंट, टीचिंग असिस्टेंट आदि का काम मिल जाता है जो एक छात्रा के लिए पर्याप्त होता है. वह इसके लिए बात करेगी और अपने लिए काम प्राप्त करने की बात पुख्ता करके रखेगी. उसे विश्वास था कि पापा चाचा की बात को दरकिनार करके उसी की बात को तरजीह देंगे और चाची भी जरूर उसका साथ देंगी. वह इन छोटी चीजों के लिए अपने सामाजिक लक्ष्यों को नहीं छोड़ सकती. वह हार नहीं मानेगी.
अपने निश्चय को दृढ़ करके उसने आयुष को फोन किया.
“कैसी हो दीदी?” उधर से आयुष की आवाज आई.”
“मैं ठीक हूँ, तू तेरा बता. कैसा चल रहा है.”
“सब बढ़िया चल रहा है. थोड़ा मुश्किल तो लगता है. भागदौड़ और मेहनत खूब है. पर मजा भी खूब आ रहा है. नयी चीजें सीखने को मिल रही हैं. पढ़ने को खूब किताबें हैं, खेलने को खेल के मैदान हैं. वातावरण और मौसम तो जबर्दस्त है.”
“थोड़ी बहुत मौज-मस्ती ठीक है, तू भी करता है कि नहीं?”
“अभी नहीं दीदी, अभी तो मैं समझ रहा हूँ, एक बार अपना स्थान बना लूँ. फिर सब देखेंगे.”
“तू बहुत समझदार हो गया है.”
“अपनी दीदी का भाई जो हूँ.”
“अब रखती हूँ, आयुष. मैस जाने का वक्त हो गया. लड़कियाँ बुला रही हैं. फिर फोन करूंगी.”
मैस से आने के बाद उसने आयुष का 'संबल' रजिस्टर याद आया जो अब गुवाहाटी में था. उसे लगा कि अब उसे भी अपने लिए भी एक नया “संबल रजिस्टर” खुद तैयार करना होगा.
... क्रमशः
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