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शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

वाक्-साहस

पिंजरा और पंख-43

लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी

मई का महीना आधा गुजर चुका था. मानसून दूर था, पर हवाओं पर सवार कुछ उतावले बादल तेजी से  आते और फिर उतनी ही तेजी से निकल जाते. गुप्ता परिवार में हर कोई बेचैनी से आईआईटी-जी के रिजल्ट का इन्तजार कर रहा था. इस बेचैनी के पीछे एक और खामोश तूफान आकार ले रहा था. शगुन ने पिछले कुछ दिनों में गौर किया था कि चाची की आँखों के नीचे काले घेरे गहरे होते जा रहे हैं और वे अक्सर गुमसुम रहती हैं.

एक दोपहर, जब चाचा ऑफिस में थे और मम्मा सो रही थीं, शगुन ने देखा कि चाची रसोई में गयी हैं. वह भी उनके पीछे रसोई में  पहुँच गयी. "चाची मुक्ति के लिए गैस पर दूध गर्म करने के लिए चढ़ा रही थीं". तभी शगुन के कानों में सिसकी जैसी आवाज आई. उसने गौर से देखा तो वह चाची थीं जो सिसक रही थीं. शगुन ठिठक गई. आखिर चाची सिसक क्यों रही हैं?

"क्या हुआ चाची? आप ठीक तो हैं?" शगुन ने उनके कंधे पर हाथ रखा. चाची पहले तो चुप रहीं.

“बताइए ना चाची, क्या बात आपको सता रही है?”

शगुन का स्पर्श पाकर उनका बांध टूट गया. वे शगुन के गले लगीं और फूट-फूट कर रोने लगीं. शगुन ने चाची को ढाढ़स बंधाया तब जा कर वे रुकीं और बताने लगीं कि अनिल चाचा पर फिर से 'वंश’ बढ़ाने का भूत सवार हो गया है. मुक्ति अभी पैरों पर खड़ी होना सीख रही थी, उसने अभी ठीक से चलना भी नहीं सीखा था कि वे अगले बच्चे के लिए दबाव बना रहे थे. "शगुन, डॉक्टर ने कहा था कि मेरी सेहत के लिए अभी कम से कम तीन-चार साल का अंतर होना ज़रूरी है, पर वे सुनते ही नहीं. कहते हैं—बेटा जल्दी ही होना चाहिए ताकि खानदान आगे बढ़े."

चाची की बात सुन कर शगुन का खून खौल उठा. उसे वनस्थली की वह 'लक्ष्मण रेखा' और डॉ. शास्त्री की बातें याद आईं. एक तरफ वह और आयुष विज्ञान और तर्क की दुनिया में ऊँची उड़ान भर रहे थे, और दूसरी तरफ उनके अपने ही घर में एक स्त्री को केवल 'वंश बढ़ाने की मशीन' समझा जा रहा था.

शगुन ऊपर अपने कमरे में पहुँची. आयुष अपने बिस्तर पर लेटा कोई पुस्तक पढ़ रहा था. उसने यह बात आयुष को बताई. सुन कर वह भी सन्न रह गया. "दीदी, जिस 'विराट' को मैंने विज्ञान की मदद से प्रकृति में देखा. अब चाचा उसे एक नन्ही जान और चाची की जान की कीमत पर पाना चाहते हैं? लगता है, चाचा बिलकुल पगला गए हैं."

“आयुष, इस बार हम दोनों को साथ बोलना पड़ेगा.” शगुन ने कहा तो आयुष ने सहमति दे दी, “जरूर दीदी, वरना वे रुकने वाले नहीं.

उस शाम, चाचा घर आए, माहौल भारी था. शगुन और आयुष ने मौका देखते ही वे बात करेंगे.

रात को पापा, चाचा, शगुन और आयुष डाइनिंग टेबल पर खाना खाने बैठे. चाची रोटियाँ बना रही थी और मम्मा मुक्ति को लेकर छत पर टहल रही थी.

“आयुष, कल तेरा आईआईटी-जी का रिजल्ट आने वाला है, कल पता लगेगा कि तू वाकई मर्द बनने जा रहा है या नहीं.” चाचा ने आयुष की ओर देख कर कहा. आयुष तो पहले ही अवसर की तलाश में था.

“क्या चाचा? आप पर हमेशा ही यह मर्द बनाने की बात क्यों सवार रहती है? परिवार में आप एक मर्द हैं, वही बहुत नहीं है क्या?”

“तुम नहीं समझते आयुष, वंश तो चलाने के लिए हर आदमी को ‘मर्द’ होना चाहिए, तभी वह परिवार चला सकता है वंश को बेहतर तरीके से आगे बढ़ा सकता है.”

चाचा ने फिर से वही 'वंश' वाली बात छेड़ी, तो शगुन ने सीधे उनकी आँखों में देखकर कहा, "चाचा, क्या मुक्ति हमारे वंश का हिस्सा नहीं है? क्या उसकी मुस्कान इस घर के लिए काफी नहीं है, जो आप अभी से चाची पर अगली सन्तान के लिए दबाव बना रहे हैं?"

चाचा चौंक गए. उन्हें विश्वास नहीं हुआ कि शगुन इस मसले पर इतना खुल कर बोलेगी. वे अपनी आवाज थोड़ी ऊँची करके बोले "शगुन, तू अभी बच्ची है, बड़ों के मामलों में मत बोल." देवर की तेज आवाज श्रीमती गुप्ता तक पहुँची तो वे भी मुक्ति को साथ ले छत से नीचे उतर आयीं.

"मैं बच्ची नहीं हूँ चाचा, मैं शिक्षित हूँ," शगुन की आवाज़ में वही ठहराव था जो उसने वनस्थली की परिचर्चा में दिखाया था. "और विज्ञान कहता है कि चाची की सेहत इस वक्त सबसे ज़रूरी है. अगर आप 'वंश' के नाम पर उनकी जान जोखिम में डाल रहे हैं, तो यह प्रेम नहीं, यह आपकी क्रूरता है."

आयुष ने भी हिम्मत जुटाई और कहा, "चाचा, अगर मुझे आईआईटी में रैंक मिल भी गई, तो उस सफलता का क्या मोल अगर मेरे अपने ही घर में 'मुक्ति' को कमतर और चाची को बेबस समझा जाए?"

कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया. पापा और मम्मा भी अवाक थे. चाचा का चेहरा गुस्से से लाल हुआ, लेकिन आयुष और शगुन की आँखों में जो वैचारिक दृढ़ता थी, उसने उन्हें निरुत्तर कर दिया. वे बिना कुछ कहे उठ कर अपने कमरे में चले गए.

चाची की आँखों में उस रात पहली बार डर की जगह एक कृतज्ञता थी. उन्हें समझ आया कि शिक्षा केवल डिग्री नहीं, बल्कि अपनों के हक के लिए खड़े होने का साहस भी है.

इसी भारी माहौल के बीच, अगली सुबह तीस मई की तारीख आई. जब आयुष ने अपना कंप्यूटर खोला तो आईआईटी-जी का रिजल्ट आ चुका था. उसका नाम 1176वीं रैंक पर था. उसने सबसे पहले शगुन को बताया और शगुन ने सबको. पूरे घर में खुशी की लहर दौड़ गई. लेकिन शगुन और आयुष, दोनों के लिए यह रैंक केवल एक नंबर नहीं था, यह उस 'पितृसत्तात्मक व्यवस्था' को एक करारा जवाब था जो केवल बेटों में भविष्य देखती थी.

... क्रमशः

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