पिंजरा और पंख-40
लघुकथा श्रृंखला : दिनेशराय द्विवेदी
बनस्थली विद्यापीठ में वार्षिक परीक्षाओं की आहट थी. देर रात तक होस्टलों की रोशन खिड़कियाँ बताती कि छात्राएँ परीक्षा की तैयारी में जुट गयी हैं. मार्च के मध्य में गर्म हवा भी दस्तक देने लगी थी. इस बीच कैंपस में 'नारी शक्ति' पर एक विशेष व्याख्यान सभा का आयोजन किया गया. सभा में आमंत्रित विदुषी जो एक प्रतिष्ठित समाजशास्त्री थी, बोलने खड़ी हुई. शगुन सभागार के एक कोने में बैठी वक्ताओं को सुन रही थी. समाजशास्त्री बड़े गर्व से कह रही थीं, "वनस्थली की बेटियाँ सशक्त हैं क्योंकि वे परंपरा और आधुनिकता का अद्भुत संगम हैं. वे कंप्यूटर भी चलाती हैं और मर्यादा की लक्ष्मण रेखा भी जानती हैं."
शगुन को व्याख्यान का 'लक्ष्मण रेखा' शब्द खटक गया. उसकी आँखों के सामने डॉ. शास्त्री का चेहरा आ खड़ा उन्होंने कहा था कि “शब्द अक्सर बेड़ियाँ बनकर आते हैं”. उस रात शगुन जब सोने के लिए बिस्तर पर गयी तब भी उसके दिमाग में ‘लक्ष्मण रेखा’ शब्द गूंज रहा था.
दो दिन बाद कॉलेज की पत्रिका के लिए एक परिचर्चा थी, विषय था—'शिक्षित नारी : समाज का आधार'. बेबाक विचारों वाली शगुन की सहेली, अनन्या ने अपना हाथ उठाया.
"मैम, मेरा एक सवाल है," अनन्या ने शांत स्वर में कहा. "यहाँ हमें सिखाया जाता है कि शिक्षा हमें आत्मनिर्भर बनाती है. लेकिन क्या यह आत्मनिर्भरता सिर्फ आर्थिक है? अगर मैं अपनी पसंद का जीवन साथी चुनना चाहूँ, या शादी के बाद अपना उपनाम न बदलना चाहूँ, या 'कन्यादान' जैसी प्रथा को अपनी गरिमा के विरुद्ध मानूँ—तो क्या हमारा यह सिस्टम मेरा साथ देगा? या तब मुझे 'अमर्यादित' और 'विद्रोही' कहकर चुप करा दिया जाएगा?"
सभागार में एक सन्नाटा पसर गया. मंच पर बैठी पत्रिका की संपादक और कुछ वरिष्ठ शिक्षिकाओं के माथे पर सिलवटें उभर आईं. संपादक ने माइक संभाला और मुस्कराते हुए कहा, "अनन्या, शिक्षा हमें विनम्र बनाती है, उद्दंड नहीं. हमारी संस्कृति हमें त्याग और सामंजस्य सिखाती है. सवाल पूछना अच्छा है, लेकिन परंपराओं की नींव खोदना प्रगति नहीं है. एक अच्छी शिक्षित स्त्री वह है जो घर को जोड़कर रखे."
शगुन सोच रही थी, वह बोले या न बोले? वह तनिक ठिठकी. लेकिन फिर उससे रहा नहीं गया. वह अपनी जगह पर खड़ी हुई. सबकी निगाहें उस पर टिक गईं.
"मैम, सामंजस्य और समर्पण सिर्फ स्त्रियों के लिए ही क्यों हैं?" शगुन की आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव था. "अगर शिक्षा हमें केवल 'बेहतर होम-मेकर' या 'संस्कारी बहू' बनने के लिए तैयार कर रही है, तो यह सशक्तिकरण कैसे है? यह तो कंडीशनिंग का एक और परिष्कृत रूप है. क्या यह अंतर्विरोध नहीं है कि एक तरफ हम लड़कियों को ऊँचे आसमान में उड़ने के सपने दिखाते हैं, और दूसरी तरफ उनके पंखों पर 'मर्यादा' का भारी वजन बाँध देते हैं? असली मुक्ति तो तब होगी जब सवाल पूछने वाली लड़की को 'उद्दंड' नहीं, बल्कि 'जागरूक' माना जाएगा."
संपादक का चेहरा सख्त हो गया. "शगुन, यह बहस का मंच नहीं है. हमें अपनी जड़ों को नहीं भूलना चाहिए."
"मैम, जड़ें हमें पोषण देने के लिए होती हैं, जकड़ने के लिए नहीं," शगुन ने शालीनता से जवाब दिया और बैठ गई.
उस शाम अनन्या शगुन के कमरे में आयी. अनन्या ने बताया कि उसे संपादक मेम ने ऑफिस बुलाकर 'अनुशासन' का पाठ पढ़ाते हुए कहा था कि विद्यापीठ में इस तरह किसी भी परिचर्चा में विषय से इतर प्रश्न करना अनुशासन के विपरीत है और यह दोहराया गया तो विद्यापीठ उसके अभिभावकों को लिख सकता है.
दोनों देर बात करती रहीं. फिर तय किया कि वे डॉ. शास्त्री से मिलेंगी. अनन्या के जाने के बाद शगुन की निगाह खिड़की से बाहर गयी. बाहर सड़क पर लड़कियाँ आ जा रही थीं. उसे लगा कि वनस्थली की यह विशाल चारदीवारी, जो कभी उसे सुरक्षा का अहसास देती थी, वही आज उसे फिर से एक ‘सोने का पिंजरा’ लग रही थी.
उसने अपनी डायरी निकाली और लिखा— "सिस्टम हमें पंख तो देता है, पर उड़ान की दिशा खुद तय करना चाहता है. लेकिन जिसे आज़ाद होना है, उसे अपनी उड़ान का नक्शा खुद बनाना होगा."
उसे रामगंजमंडी में पालने में सोई अपनी नन्ही बहन 'मुक्ति' का ख्याल आया. उसने मन ही मन संकल्प लिया कि वह कोशिश करेगी कि मुक्ति को ऐसी शिक्षा मिले जो उसे सिर्फ 'उत्तर' देना ही नहीं, बल्कि सबसे कठिन 'सवाल' पूछने का साहस भी दे.
लंच ब्रेक में शगुन और अनन्या डॉ. शास्त्री से मिलीं. वे उनकी गंभीर शक्लें देखकर मुस्कुराईं. शगुन ने संक्षेप में कल की घटना और संपादक मैम की चेतावनी के बारे में बताया.
डॉ. शास्त्री ने अपना चश्मा उतारकर मेज़ पर रखा और कुछ देर शांत रही. फिर धीमे स्वर में बोलीं, "तुम्हें दुखी नहीं बल्कि खुश होना चाहिए. तुम शिक्षा के असली उद्देश्य तक पहुँच गई हो. सिस्टम जब तुम्हें 'अनुशासन' और 'परंपरा' के नाम पर डराने लगे, तो समझ लेना कि तुम्हारे तर्क बहुत गहरे हैं."
अनन्या ने धीरे से पूछा, "पर सर, क्या सवाल पूछना सच में उद्दंडता है?"
डॉ. शास्त्री ने उसे गौर से देखा, "अनन्या, समाज हमेशा उन लड़कियों से डरता है जो सोचती हैं. 'लक्ष्मण रेखा' का उपयोग सुरक्षा के लिए कम और नियंत्रण के लिए ज़्यादा किया जाता है. वनस्थली जैसे संस्थान तुम्हें कौशल (Skills) तो दे देंगे, पर वे 'स्वतंत्र विचार' देने से कतराएंगे, क्योंकि स्वतंत्र विचार अक्सर स्थापित ढाँचों को हिला देते हैं. याद रखना, असली विद्रोह चिल्लाने में नहीं, बल्कि अपनी वैचारिक स्पष्टता पर टिके रहने में है. वे तुम्हारी बात मैगजीन में नहीं छापेंगे क्योंकि वे नहीं चाहते कि यह आग दूसरी लड़कियों के मन तक पहुँचे."
शगुन को लगा जैसे उसके मन का बोझ उतर गया हो. डॉ. शास्त्री ने आगे कहा, "मुक्ति का रास्ता हमेशा 'असुविधाजनक' होता है शगुन. तुम जो आज कर रही हो, वही तुम्हारी बहन 'मुक्ति' के लिए भविष्य का रास्ता साफ करेगा."
वहाँ से निकलते वक्त शगुन के कदमों में एक नई ऊर्जा थी. उसे अब मैगजीन में जगह न मिलने का मलाल नहीं था; उसे खुशी थी कि उसने सिस्टम की उस चुप्पी को तोड़ दिया था जिसे सब 'मर्यादा' समझ बैठे थे.
... क्रमशः
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