पिंजरा और पंख-34
लघुकथा श्रृंखला : दिनेशराय द्विवेदी
बनस्थली विद्यापीठ में सत्र 2005-06 आरंभ हुआ. तीन जुलाई को द्वितीय वर्ष बीएससी (मनोविज्ञान) की पहली क्लास लगी. हॉल में करीब तीस-पैंतीस लड़कियां खादी के परिधान में अनुशासित बैठीं. खादी के इन लिबासों के नीचे छिपे उनके संस्कार और पूर्वाग्रह उतने ही विविध थे जितनी उनकी पृष्ठभूमि.
प्रोफेसर डॉ. नीलम शास्त्री ने क्लास में प्रवेश किया. उनकी आँखों में वह चमक थी जो केवल किताबी ज्ञान से नहीं, बल्कि इंसानी व्यवहार की गहरी समझ से आती है. उन्होंने ब्लैकबोर्ड पर बड़े अक्षरों में लिखा— 'पूर्वाग्रह' (Prejudice) और 'रूढ़िवादिता' (Stereotypes).
"पूर्वाग्रह क्या है?" उन्होंने क्लास की ओर देखते हुए पूछा.
शगुन ने हाथ उठाया, "मैम, बिना किसी ठोस आधार या अनुभव के किसी व्यक्ति या समूह के बारे में पहले से ही कोई धारणा बना लेना ही पूर्वाग्रह है."
"बिल्कुल," डॉ. शास्त्री ने आगे बढ़ते हुए कहा, "पर पूर्वाग्रह से पहले जन्म लेता है— 'Stereotypes' अर्थात रूढ़िवादिता. रूढ़िवादिता वह 'मानसिक साँचा' है जिसमें हम पूरी की पूरी कम्युनिटी को फिट कर देते हैं. जैसे ही हम कहते हैं कि 'सारे बनिए कंजूस होते हैं' या 'सारे क्षत्रिय गुस्सैल होते हैं' या 'मुस्लिम कट्टर होते हैं', हम पूरे एक समुदाय की स्टीरियोटाइपिंग कर रहे होते हैं. हम उस समूह के हर व्यक्ति की मौलिकता छीनकर उस पर एक जनरल 'लेबल' लगा देते हैं."
क्लास में सन्नाटा गहरा गया. किरण ने टोका, "पर मैम, बहादुर होना तो अच्छी बात है न? अगर हम कहें कि 'राजपूत वीर होते हैं', तो इसमें गलत क्या है?"
प्रोफेसर शास्त्री मुस्कुराईं, "इसमें गलत यह है किरण, कि यह स्टीरियोटाइपिंग उस राजपूत लड़के पर 'वीर' दिखने का इतना दबाव डाल देता है कि वह अपनी कमजोरी या डर ज़ाहिर नहीं कर पाता. वह खुद को चोट पहुँचाता है ताकि समाज की उस छवि में फिट हो सके. स्टीरियोटाइपिंग चाहे सकारात्मक दिखे, वह अंततः पूरे समुदाय के लिए 'मानसिक जेल' बन जाती है."
तभी अपनी 'पंडिताई' के लिए प्रसिद्ध प्रियंका बोल पड़ी, "पर मैम, कुछ बातें तो हमारे पूर्वजों के अनुभवों पर आधारित होती हैं न? जैसे शुद्धता और खान-पान के नियम. क्या उन्हें भी आप पूर्वाग्रह कहेंगी?"
डॉ. शास्त्री प्रियंका की मेज के पास जाकर रुक गईं. "प्रियंका, जब तुम्हारा 'शुद्धता का नियम' तुम्हें किसी दूसरे इंसान से हाथ मिलाने या उसके साथ बैठने से रोकता है, तो वह संस्कार नहीं, बल्कि 'डिस्क्रिमिनेशन' यानी भेदभाव है. पूर्वाग्रह (मानसिक धारणा), स्टीरियोटाइपिंग (दिमाग में छवि) और डिस्क्रिमिनेशन (व्यवहार में भेदभाव)—ये तीनों एक ही सिक्के के पहलू हैं."
कोने में बैठी सीमा की आँखों में एक अजीब सी चमक थी. वह दलित समुदाय से थी और उसने जब से पैदा हुई तब से इन 'लेबल्स' को झेला था.
डॉ. शास्त्री ने आगे कहा, "एक और स्टीरियोटाइप लीजिए—लड़कों पर लदा 'सफलता' का बोझ. समाज ने सांचा बना दिया है कि 'लड़के रोते नहीं' और 'सफल वही है जो आईआईटी जाए' इंजीनियर या डाक्टर बने. क्या यह स्टीरियोटाइप उस लड़के की जान नहीं ले लेता जो शायद संगीतज्ञ बनना चाहता था?"
शगुन को तुरंत कल रात की आयुष से हुई बात याद आ गई. उसने खड़े होकर कहा, "मैम, क्या ये स्टीरियोटाइप्स इतने गहरे होते हैं कि इंसान अपनी संवेदना भी खो देता है? मेरा भाई कल बता रहा था कि कोटा में आईआईटी जी और इंजीनियरिंग की तैयारी कर रहे लड़कों के होस्टलों में उनके कमरों से रातों को रोने की सिसकियां आती हैं, पर दिन में उनमें से हर कोई 'मजबूत' होने का नाटक करता है."
"हाँ शगुन," शास्त्री मैम ने गंभीर होकर कहा, "क्योंकि स्टीरियोटाइपिंग हमें सोचने की मेहनत से बचा लेती हैं. हमें लगता है कि हमने किसी को 'लेबल' दे दिया, तो हम उसे जान गए. लेबल लगा देना सबसे आसान है, इंसान को समझना सबसे मुश्किल. याद रखिए, जब आप किसी को उसकी जाति, धर्म या जेंडर के चश्मे से देखते हैं, तो आप उसे नहीं, बल्कि अपनी खुद की 'कंडीशनिंग' को देख रहे होते हैं."
क्लास खत्म होने के बाद जब वे सब मेस की ओर बढ़ रही थीं, तो प्रियंका का तमतमाया हुआ उसकी नाराजगी को उजागर कर रहा था. "मैम तो हमारे संस्कारों को ही बीमारी बता रही हैं," वह बुदबुदाई.
शगुन ने रुककर उसे देखा, "संस्कार बीमार नहीं होते प्रियंका, पर जब वे किसी को इंसान समझने से रोकें, तो वे ज़हर ज़रूर बन जाते हैं. कल मेस में हम सबने फातिमा के लाए खाने से परहेज किया था, आज क्लास में उसे 'प्रेजुडिस' और 'स्टीरियोटाइप' का नाम मिल गया है. अब तय हमें करना है कि हम यहाँ कुछ सीख रहे हैं या सिर्फ किताबों के पन्ने पलट रहे हैं."
रात के खाने के लिए चारों अपने रूम से साथ निकलीं. लेकिन मेस पहुँचते ही अचानक प्रियंका यह कह कर वापस चल दी कि, “मैं अपना फोन भूल आई हूँ, लेकर आती हूँ. हो सकता है इस बीच माँ का फोन आ जाए.” फिर वह तब तक नहीं लौटी जब तक कि वे तीनों भोजन करके मैस से बाहर नहीं आ गयीं. जब वे अपने रूम की ओर लौट रही थीं, तब प्रियंका उन्हें रास्ते में मैस की ओर तेजी से जाती मिली. किरण के पूछने पर कहने लगी, माँ का फोन आ ही गया था, बात करने में लेट हो गयी.”
प्रियंका का इस तरह मैस के ठीक बाहर से फोन के बहाने लौट जाना और उनके भोजन के बाद बाहर आने तक न लौटना सबको अजीब लगा था. सब समझ रहे थे कि वह जानबूझकर उनके साथ खाने पर साथ नहीं थी. शायद इसलिए कि कहीं उसकी रूम मेट ही उसके अपने पूर्वाग्रहों पर कोई मजाक न बनाने लगें.
शाम को डायरी में शगुन ने लिखा— "आज डॉ. शास्त्री ने हमारे दिमागों की सालों से बंद खिड़कियों पर दस्तक दी. किरण की असहजता, सीमा की आँखों की वह चमक और प्रियंका की चिढ़ और शाम को सबके साथ भोजन करने से बचने की उसकी कोशिश बता रही है कि द्वंद्व शुरू हो चुका है—किताबों के बीच नहीं, बल्कि हमारी अपनी पुरानी आदतों और नई चेतना के बीच."
... क्रमशः
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