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मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

अलग अलग दुर्ग

पिंजरा और पंख-26
लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
होस्टल नं. 7 शांता निकेतन का कमरा नं. 7. शगुन की आँखें खुलीं. आज दूसरे सेमेस्टर का पहला पेपर था, जैविक मनोविज्ञान (Biological Psychology). कमरे में एक अजीब सी शांति थी, जैसे तूफान से पहले की खामोशी. उसने देखा पंडिताइन

हमेशा की तरह अपने बिस्तर पर बैठी, आँखें बंद किए, मन ही मन मंत्र पढ़ रही थी. उसकी उँगलियाँ माला फेर रही थीं. अब प्रियंका को सभी रूममेट इसी नाम से पुकारने लगी थीं.

किरण शीशे के सामने खड़ी अपने वस्त्र ठीक कर रही थी. "तुम लोग इतनी गंभीर क्यों हो?" उसने मुस्कुराते हुए पूछा, "यह तो बस एक परीक्षा है" हो जाएगी.

सीमा चुपचाप अपनी किताब के अंतिम पन्ने गहरी एकाग्रता से दोहरा रही थी. उसके लिए हर परीक्षा एक मौका थी—खुद को साबित करने का, आगे बढ़ने का. वह दिखा देना चाहती थी कि दलितों में दम है.

शगुन ने रात को ही अपनी अंतिम तैयारी कर ली थी. परीक्षा के दिन वह तैयारी से मुक्त और सहज रहना चाहती थी. उसने देखा कि चारों रूममेट की तैयारियाँ भी चार तरह की थीं. परीक्षा एक ही थी, लेकिन सबके लिए अलग-अलग.

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आज ही आयुष का भी फिजिक्स पेपर था. वह जाग चुका था. उसने अपने डेस्क पर रखे पोस्ट-इट को देखा: "मेरा सपना क्या है?"

कल रात वह इसका जवाब ढूँढ चुका. उसका सपना था—ईमानदारी से सीखना. चाहे अंक कम ही क्यों न आएँ.

दरवाज़े की घंटी बजी. रोहित खड़ा था. "चलो, टाइम है."

रास्ते में रोहित बोला, "मैंने सभी फॉर्मूले याद कर लिए हैं. 90% तो पक्के हैं."

आयुष ने उसकी ओर देखा. आत्मविश्वास. वह आत्मविश्वास जो उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि से आता था.

परीक्षा केंद्र के बाहर, विशाल मिला. उसका चेहरा पीला था. "मैं... मैं तैयार नहीं हूँ," उसने फुसफुसाया.

आयुष ने उसके कंधे पर हाथ रखा. "बस ईमानदारी से देना. बाकी... बाद में देखेंगे."

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शगुन ने प्रश्न-पत्र उठाया. पहला प्रश्न: "फ्रायड के मनोलैंगिक विकास के सिद्धांत की व्याख्या करें."

उसने पेन उठाया, फिर रुक गई. क्या वह सिर्फ फ्रायड के सिद्धांत को रटकर लिख देगी? या फिर उसमें अपने अनुभव जोड़ेगी?

उसने देखा—पास बैठी प्रियंका माथे पर पसीना पोंछ रही थी. सामने बैठी सीमा शांतिपूर्वक लिख रही थी. दूर किरण आत्मविश्वास से भरी थी.

शगुन ने लिखना शुरू किया: "फ्रायड का सिद्धान्त मानव विकास की जटिलताओं को दर्शाता है, जैसे कि बनस्थली में हमारा अपना विकास..."

वह जानती थी—यह उत्तर शायद पूरे अंक नहीं दिलाएगा. पर यह सच्चा होगा. उसका अपना होगा.

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आयुष ने प्रश्न-पत्र देखा. प्रश्न 15: "न्यूटन के गति के तीसरे नियम की व्याख्या करते हुए, दैनिक जीवन के दो उदाहरण दें."

उसने सोचा—क्रिया-प्रतिक्रिया. जैसे उसके पिता का दबाव और उसका प्रतिरोध. जैसे शगुन का सवाल और उसकी खोज.

तभी उसने देखा—विशाल ने उसकी ओर देखा. एक मौन इशारा. नकल का आमंत्रण.

आयुष का दिल धड़का. पिता के शब्द कानों में गूँजे: "अंक के बिना कोई तुम्हारी समझ नहीं पूछेगा."

फिर अपने ही शब्द याद आए: "मेरा सपना—ईमानदारी से सीखना."

उसने विशाल की ओर देखा और सिर हिलाया—नहीं.

विशाल की आँखों में निराशा थी. पर आयुष जानता था—यही सही था.

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पेपर देकर चारों अपने कमरे में लौटीं.

"कैसा रहा पेपर” किरण ने पूछा.

प्रियंका ने गहरी साँस ली, "ठीक-ठाक. पर कुछ प्रश्न कठिन थे."

सीमा मुस्कुराई, "मैंने वही लिखा जो आता था."

शगुन ने कहा, "मैंने... अपने अनुभव लिखे."

प्रियंका ने हैरानी से देखा, "पर उसमें अंक कम मिलेंगे!"

"शायद," शगुन ने कहा, "पर वे मेरे होंगे."

तभी फातिमा कमरे में आई. "अलहमदुलिल्लाह, ठीक रहा," उसने कहा.

शगुन ने सोचा—चार तरह की प्रतिक्रियाएँ. पर क्या कोई पूछ रहा था: "तुमने क्या सीखा?" सब पूछ रहे थे: "तुमने कैसा किया?"

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स्कूल से बाहर निकलते ही रोहित मिला "मैंने सब कुछ लिख दिया!" वह उत्साहित था.

विशाल चुपचाप बाहर निकला और उनके साथ शामिल हो गया. आयुष ने पूछा, "कैसा रहा?"

"बुरा," विशाल ने कहा, "मैंने... नकल नहीं की."

आयुष ने मुस्कुराया, "तुमने सही किया."

"पर मैं फेल हो जाऊँगा!"

"शायद," आयुष ने कहा, "पर तुम ईमानदार रहे. यही मायने रखता है."

रोहित ने कहा, "अंक मायने रखते हैं, आयुष. दुनिया अंक ही देखती है."

आयुष ने सोचा—शायद रोहित सही था. शायद नहीं. पर एक बात तय थी—वह अब वह आयुष नहीं था जो सिर्फ अंकों के पीछे भागता था.

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शगुन ने अपनी नोटबुक खोली और लिखा.
मार्च 15, 2006 | पहले पेपर के बाद

आज समझा; परीक्षा एक ही नहीं होती.
एक परीक्षा काग़ज़ पर होती है—
जहाँ सवाल तय होते हैं
और उत्तर भी, वे भी निश्चित.

दूसरी परीक्षा होती है— मन के भीतर
जहाँ कोई सिलेबस नहीं,
और सवाल हम खुद से पूछते हैं.

प्रियंका ने वही लिखा, जो याद रहा.
मैंने लिखा, जो मैंने महसूस किया.
किरण ने आत्मविश्वास से लिखा,
सीमा ने संघर्ष और मेहनत लिखी.

पेपर सबका एक,
पर परीक्षा हरेक की अलग.
शायद शिक्षा यही है—
कि हर कोई अपनी जगह,
अपनी तरह से ढूँढता है.

जब यह समझ आती है,
तो परीक्षा डर नहीं रहती,
वह खुद को परखने का मौका बन जाती है.

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आयुष ने अपनी नोटबुक में लिखा.
फिजिक्स पेपर के बाद

आज मैंने फैसला किया.
परीक्षा पूरी ईमानदारी से

चाहे अंक आएँ.

मैं जानना चाहता हूँ
कि मैं खुद कितना जानता हूँ.”

रोहित ने कहा,
“दुनिया अंक देखती है.”
शायद वह सही है.
पर क्या हमें भी
खुद को सिर्फ अंकों से देखना चाहिए?

शगुन ने लिखा था—
“वस्त्रों के नीचे, भेद के रंग.”
आज लगा,
परीक्षा भी कुछ वैसी ही है.
ऊपर से सबके लिए एक जैसी,
पर भीतर हर किसी की अलग कहानी.

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दो शहर.
दो संस्थान.
एक ही रात.

दो युवा,
अपनी-अपनी नोटबुक में
लगभग एक ही सवाल लिखते हुए.

शायद शिक्षा का मतलब यही है—
कि हम अलग रास्तों पर चलते हुए भी
खुद को समझने की कोशिश करते हैं.

तब परीक्षा
सिर्फ एक पड़ाव रह जाती है.
ज़िंदगी की तरह—
जहाँ हम सब विद्यार्थी हैं,
अलग-अलग दुर्गों में,
एक ही आकाश के नीचे.
... क्रमशः

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