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गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

नयी लड़ाई

पिंजरा और पंख-21
लघुकथा  श्रृंखला :   दिनेशराय द्विवेदी
आयुष की आँखें खुलीं. सुबह के पाँच बजे थे. बोर्डिंग स्कूल की पीटी की घंटी अभी भी उसकी स्मृति में गूँजती थी. उसका शरीर उसी लय में साँस ले रहा था. उठो, सीधे खड़े हो जाओ. दौड़ने जाना है... नहीं दौड़ना नहीं, रिविजन के लिए बैठना है.

उसकी नजर अलमारी के फोटो फ्रेम पर पड़ी. बारहवीं क्लास का समूह चित्र. यूनिफॉर्म में, सिर ऊँचा—"उत्कृष्ट कैडेट". फिर नजर किताबों पर गई. हरेक पर छपा था: "IIT ASPIRANT - The Ultimate Guide to Excellence."

दो "उत्कृष्टताएँ". एक अतीत, दूसरा वर्तमान.

आयुष को प्रैक्टिकल रिकॉर्ड जमा करने आज स्कूल जाना था. "आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय" में नामांकन के पहले दिन ही स्पष्ट कर दिया गया था कि, “उसे प्रैक्टिकल के सिवा स्कूल नहीं आना है, उसकी उपस्थिति दर्ज कर ली जाएगी.”

स्कूल का प्रवेश द्वार कोचिंग की चकाचौंध से दूर था. बस एक फीका बोर्ड: "शिक्षा ही उन्नति है." पर अन्दर का दृश्य इस सिद्धान्त का मखौल उड़ा रहा था.

प्रिंसिपल के कार्यालय के बाहर भीड़ थी. एक शिक्षक चिल्ला रहा था: "जिसका प्रैक्टिकल नहीं हुआ, लैब में जाओ! दस बैच और हैं!"

लैब में बीस सीटें थीं, पर पचास बच्चे ठूँसे हुए थे. दो माइक्रोस्कोप पूरे विज्ञान विभाग के लिए. एक शिक्षक बिना देखे सिग्नेचर कर रहा था.

एक लड़का आयुष के पास आया; "पहली बार आ रहे हो? यहाँ कुछ नहीं सीखना. सिर्फ सिग्नेचर लो और भागो. असली पढ़ाई कोचिंग में होगी."

"फिर यह स्कूल क्यों है?"

लड़का हँसा: "बोर्ड का नियम है. यह हमारा 'लीगल एड्रेस' है. असली 'एजुकेशनल एड्रेस' तुम्हारा कोचिंग है."

लीगल एड्रेस. एजुकेशनल एड्रेस.

आयुष सोचने लगा: "यहाँ हमें 'विद्यार्थी' कहते हैं, पर यहाँ कोई विद्या नहीं. यहाँ बस बोर्ड परीक्षा में बैठने का लाइसेंस है."

प्रैक्टिकल रिकॉर्ड जमा हुआ. बिना देखे सिग्नेचर. पूरी प्रक्रिया में पाँच मिनट.

जाते-जाते उसने बोर्ड को फिर देखा: "शिक्षा ही उन्नति है." आज यह वाक्य झूठा लगा.

‘संबल कोचिंग’ के गेट पर लौटते ही वातावरण बदल गया. सब कुछ संगठित, उद्देश्यपूर्ण. स्क्रीन पर टिकर; "अगला टेस्ट: 48 घंटे बाद. तैयारी: 65% पूर्ण."

आयुष सोच रहा था: "यहाँ मेरा भविष्य बन रहा है. पर क्या सिर्फ एक और सर्टिफिकेट के लिए?"

फिजिक्स की कक्षा में डॉ. शर्मा ने प्रवेश किया. "आज का टॉपिक: रोटेशनल मोशन. पिछले पाँच वर्षों में 42 सवाल आए. हर सवाल 2.7 मिनट का. तुम्हें 1.5 मिनट में हल करना है."

थोड़ी देर बाद वह रुके. "तुमने अब तक स्कूलों में शिक्षा प्राप्त की होगी. आज भी स्कूल गए होंगे. एक एस्पायरेंट को शिक्षा नहीं, उससे आगे की चीज ‘स्किल’ चाहिए. तुम्हारे लिए स्कूल सिर्फ बोर्ड परीक्षा में बैठने का लाइसेंस है. वहाँ तुमने 'शिक्षा' देखी होगी." उनकी आँखों में तीखी चमक थी. "यहाँ मैं तुम्हें 'स्किल' दे रहा हूँ; परीक्षा पास करने का स्किल. वहाँ तुम 'छात्र' हो. यहाँ 'योद्धा'. युद्ध में सिर्फ विजय या पराजय."

आयुष ने उनकी आँखों में देखा. कोई छल नहीं. स्पष्टवादिता. यह स्कूल के पाखंड से बेहतर थी.

लंच पर आयुष ने अपनी नोटबुक देखी. कवर पर लिखा था:

लक्ष्य: IIT

हथियार: टेस्ट -शगुन

आज यह मंत्र अधूरा लगा. उसने पेन निकाला. नीचे लिखा:

मैदान: आईआईटी एंट्रेंस

प्रवेश द्वार: स्कूल

प्रशिक्षण: कोचिंग

अभ्यास: हर टेस्ट

विजय: स्वयं पर

शाम को लाइब्रेरी में विशाल मिला. वह पिछले दो टेस्टों में फेल हो चुका था.

"स्कूल गया था? मजा आया?"

"मजा नहीं, सबक मिला. हम दो जिंदगियाँ जी रहे हैं. एक में 'छात्र', दूसरी में 'योद्धा'."

विशाल ने सिर हिलाया. "मैं तो हार मान चुका. पापा ने कहा, इस बार आईआईटी, या घर वापसी."

"और फिर?"

"शायद प्राइवेट कॉलेज... पर पापा को क्या बताऊँगा..."

आयुष ने उसकी आँखों में भय देखा. पिता के कोप का. समाज के तिरस्कार का.

"हम दोनों एक ही लड़ाई लड़ रहे हैं, विशाल. दुश्मन आईआईटी नहीं, यह ‘पूरी व्यवस्था’ है जो हमें दो हिस्सों में बाँट देती है."

रात को डेस्क पर आयुष ने एक नई कॉपी निकाली. पहले पन्ने पर लिखा:

युद्ध-योजना

1. शत्रु: शिक्षा का पाखंड

2. युद्ध-मैदान: यह कोचिंग

3. शस्त्र: ज्ञान (रटना नहीं, समझना)

4. सहयोगी: वह उत्कृष्ट कैडेट

5. लक्ष्य: एक ऐसी शिक्षा जो पाखंड न हो

नीचे लिखा; आज का सबक: स्कूल सर्टिफिकेट देगा. कोचिंग रैंक देगी. शिक्षा? मुझे खुद तलाशनी होगी.

बिस्तर पर लेटा आयुष अचानक उठ बैठा. उसने अपनी डायरी खोली. लिखने लगा:

तारीख: सितम्बर, 5

स्थान: कोटा

आज समझा शिक्षा दो हिस्सों में बंट गई है. एक औपचारिक, दूसरी वास्तविक. मेरी लड़ाई इस विभाजन के पाखंड से है, जो कहता है: "तुम्हें दो अलग व्यक्ति बनना होगा."

नहीं. मैं एक ही रहूँगा. वही उत्कृष्ट कैडेट जो अनुशासन जानता है. वही आईआईटी एस्पायरेंट जो ज्ञान चाहता है.

और अगर इस व्यवस्था में यह संभव नहीं... तो पहले खुद को बदलूँगा. ताकि कल को शायद व्यवस्था बदल सके.

शगुन,
तुम्हारा मंत्र अभी भी काम करता है. पर अब मैंने अपना मंत्र बना लिया है. तुम सोने के पिंजरे से लड़ रही हो. मैं इस शिक्षा के पाखंड से. शायद हमारी लड़ाइयाँ अलग हैं. पर दुश्मन एक ही है, वह व्यवस्था जो हमें "पूर्ण" होने से रोकती है.

कल से नया युद्ध शुरू.

आयुष ने डायरी बंद की. वह सोने के लिए अपने बिस्तर पर जा कर लेट गया. चेहरे पर थकान थी, पर एक नई दृढ़ता भी. वह दृढ़ता जो दुश्मन को पहचान लेने पर आती है.

सर्टिफिकेट नहीं... पाखंड.

रैंक नहीं... विभाजन.

जीत नहीं... समझ.

यही उसकी नई लड़ाई थी.
... क्रमशः

6 टिप्‍पणियां:

  1. पात्रों के मनोभावों का बेहद सूक्ष्म विश्लेषण चकित करती है सर।
    बहुत रोचक है कहानी आगे की कड़ियों की प्रतीक्षा रहेगी।
    सादर।
    ------
    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार ६ फरवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  2. आभार श्वेता सिन्हा जी. मेरी तो बस एक कोशिश है.

    जवाब देंहटाएं
  3. Anita जी, आभार, ब्लॉग तक आने और टिप्पणी से नवाजने के लिए. मैंने आपके ब्लॉग देखे, सभी बेहतर हैं. मैं ने बहुत समय, लगभग 15 वर्षो के बाद पुनः सक्रियता बढ़ाई है. आप चाहें तो "'अनवरत' को फॉलो कर सकती हैं. आप निराश नहीं होंगी.

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