पिंजरा और पंख-20
लघुकथा श्रृंखला : दिनेशराय द्विवेदी
सुबह की धूप से कमरा 106 नहाया
हुआ था. शगुन की आँखें खुलीं. किरण अभी सो रही थी, भरतपुर की सीमा और कोटद्वार से आई प्रियंका तैयार हो चुकी थीं.
अंडर ग्रेजुएट और ऊपर के कोर्स के विद्यार्थियों के लिए यूनिफोर्म निर्धारित नहीं थी, किन्तु वस्त्र खादी के होना अनिवार्य था. फिर भी कपड़े की बुनावट व रंगों ने वस्त्रों में कुछ विविधता घोल दी थी. खादी उसे देश के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास से जुड़ रही थी.
उन्हें पहले दिन एक घंटा पहले 'मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान भवन' बुलाया गया था. वहाँ विभाग के ग्रेजुएशन के सभी नए छात्र-छात्राएँ एकत्र थे. मंच पर वरिष्ठ प्रोफेसर और विभाग प्रमुख मौजूद थीं.
एक प्रोफेसर ने संस्था और विभाग के इतिहास और नियमों का परिचय दिया. फिर विभाग प्रमुख का संबोधन शुरू हुआ. उनकी आवाज़ गंभीर, आदेशात्मक और स्नेह से भरी थी.
"बेटियों, यह विद्यापीठ तुम्हें एक उत्कृष्ट शिक्षा देगा, और एक सुसंस्कृत, सहनशील और ‘संपूर्ण नारी’ बनने का मार्ग भी दिखाएगा. शिक्षा का अंतिम लक्ष्य है, ‘एक ऐसी नारी का निर्माण जो अपने ज्ञान से परिवार को रोशन करे, अपने संस्कारों से समाज को सँवारे.’"
"संपूर्ण नारी". शब्द शगुन के कानों में अटक गया. उसकी भौंहें माथे पर थोड़ी सी चढ़ गईं. क्या शिक्षा का लक्ष्य "संपूर्ण मनुष्य" नहीं होना चाहिए था? "नारी" विशेषण क्यों जरूरी था? पर उसने विचार को दबा दिया. शायद वह गलत समझ रही थी. शायद यहाँ के संदर्भ में यही सही था.
नौ बजे पहली कक्षा आरम्भ हुई "व्यवहार का जैविक आधार". यह बी.एससी. मनोविज्ञान का मुख्य विषय था. कक्षा में प्रवेश करते ही शगुन ने एक अलग ही ऊर्जा महसूस की. यह वह विज्ञान था जिसे पढ़ने का उसने चुनाव किया था.
प्रोफेसर डॉ. श्रीवास्तव वरिष्ठ और गंभीर थे. उन्होंने तंत्रिका तंत्र की मूल इकाई, न्यूरॉन, के बारे में समझाना शुरू किया. शगुन उत्सुकता से सुन रही थी, नोट्स ले रही थी.
फिर डॉ. श्रीवास्तव मस्तिष्क के विभिन्न भागों और उनके कार्यों पर आए. एक चार्ट दिखाते हुए उन्होंने कहा, " एक दिलचस्प शोध बिंदु. कुछ अध्ययनों से पता चला है कि महिला मस्तिष्क में कॉर्पस कैलोसम, यानी दोनों गोलार्द्धों को जोड़ने वाला तंतुमय पुल, पुरुषों की तुलना में अपेक्षाकृत बड़ा होता है."
कक्षा में सन्नाटा छा गया. लड़कियाँ ध्यान से सुन रही थीं.
"इस बड़े आकार का मतलब है, दोनों गोलार्द्धों के बीच बेहतर संपर्क. इसीलिए महिलाएँ मल्टी-टास्किंग में अधिक सक्षम होती हैं. यही उनमें भावनाओं के बेहतर संप्रेषण, सहज ममता और सामूहिक कल्याण की भावना का संभावित जैविक आधार है."
शगुन की कलम रुक गई. उसने दोबारा सुना, ‘जैविक आधार...’ ‘सहज ममता और त्याग’.
एक वैज्ञानिक तथ्य सीधे-सीधे एक सामाजिक रूढ़ि से जुड़ रहा था. जैसे कोई कह रहा हो, “तुम्हारे दिमाग का यह हिस्सा बड़ा है, इसलिए तुम्हें ममत्वपूर्ण और त्यागी होना ही है. प्रकृति ने तुम्हें इसी लिए बनाया है.”
उसकी उँगलियाँ बेचैन हो उठीं. उसने हाथ उठाया.
"सर, एक सवाल है."
डॉ. श्रीवास्तव ने उसकी ओर देखा. "हाँ, बताओ."
"सर, क्या यह शोध यह साबित करता है कि ममता और त्याग जैविक हैं? या फिर ये सामाजिक रूप से सिखाए गए गुण हैं, और मस्तिष्क की यह संरचना उन्हें ग्रहण करने में सिर्फ सहायक होती है? कारण और परिणाम में अंतर है न?"
कक्षा में पूर्ण सन्नाटा छा गया. कुछ लड़कियों ने शगुन की ओर देखा. डॉ. श्रीवास्तव ने अपना चश्मा सहेजा. उनके चेहरे पर एक सूखी, असहज मुस्कान थी.
"अच्छा सवाल है," उन्होंने कहा, "पर हम अभी जैविक आधार पढ़ रहे हैं. सामाजिक निर्माण, सीखने और संस्कृति के प्रभाव की बात सामाजिक मनोविज्ञान के कोर्स में आएगी. अभी बुनियादी जैविक संरचनाओं पर ध्यान दो."
उन्होंने सवाल को टाल दिया था. पर शगुन ने उनकी आँखों में एक फिसलन-सी देखी, एक असहजता जो तब होती है जब कोई आरामदायक स्थापना पर सवाल उठा दे.
दोपहर बाद, वह हॉस्टल वार्डन, श्रीमती चंद्रा 'कक्की' के पास एक फॉर्म जमा करने गयी. फॉर्म लेते हुए कक्की ने कहा, "नियम याद हैं न? रात आठ बजे तक हॉस्टल लौटना. शहर जाने के लिए अभिभावक से लिखित अनुमति. मोबाइल शाम सात बजे तक."
"हाँ, कक्की," शगुन ने कहा. फिर, एक सहज प्रश्न पूछ बैठी, "ये सब नियम... हमारी सुरक्षा के लिए हैं न?"
कक्की ने उसे देखा. उनकी आँखों में एक मिश्रित भाव था, स्नेह और दृढ़ता.
"बेटी, सुरक्षा तो एक कारण है," उन्होंने कहा, आवाज़ नरम पर अटल, "पर इससे तुम्हारी साख बनती है. पढ़ाई के बाद दुनिया तुम्हें 'बनस्थली की लड़की' के नाम से जानेगी. यह नाम हमारी सबसे बड़ी पूंजी है. और यह नाम... शुद्ध आचरण से ही चमकता है."
शगुन ने शब्दों को पचाया. ‘साख’. ‘शुद्ध आचरण’. यह नियम सिर्फ उनके शरीर की सुरक्षा के लिए नहीं थे. यह किसी सामूहिक प्रतिष्ठा की सुरक्षा थी. उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता, उसके निर्णय... सब कुछ इस 'साख' के आगे गौण थे. यह पिंजरा सोने का था, पर पिंजरा तो था ही.
कमरे में लौटकर उसने किरण से अपनी उलझन साझा की. "लगता नहीं कि ये नियम... हमें बच्चा समझते हैं? हम वयस्क हैं न?"
किरण, जो अपने बिस्तर को व्यवस्थित कर रही थी, मुस्कुराई. "अरे, यहाँ सब कुछ तो बहुत सही है, शगुन! हमें पाला जा रहा है. बाहर की दुनिया कितनी खतरनाक है! और साख की बात... कक्की सही कहती हैं. हम लड़कियों की साख ही तो सब कुछ है. इसे बचाना ही चाहिए."
किरण के चेहरे पर सहमति और गर्व था. वह इन नियमों को नहीं, बल्कि उनके पीछे के संरक्षण और सम्मान को देख रही थी. शगुन ने महसूस किया, उसकी लड़ाई सिर्फ संस्था से नहीं, बल्कि उन साथियों से भी है, जिन्होंने इन बंधनों को अपनी पहचान और सुरक्षा का हिस्सा बना लिया था.
रात को, जब सब सो चुके थे, शगुन ने टॉर्च जलाई और डायरी लिखने बैठी.
"आज बनस्थली का दूसरा चेहरा देखा.
यह कोटा कोचिंग सा कठोर नहीं है. पर मुलायम हाथों से थपथपाता है, मीठी आवाज़ में 'बेटी' कहता है.
यह 'तुम्हारे भले' के लिए कहता है. इसने तीन चीजें सिखाईं:
1. विज्ञान पुराने विचारों का वाहक बन सकता है. यह सच नहीं, सुविधाजनक सच बता सकता है.
2. सुरक्षा और कैद के बीच रेखा बहुत पतली है. वही हाथ जो सहारा देते हैं, बेड़ियाँ भी बन सकते हैं. और उन्हें 'साख' और 'सम्मान' का नाम दे दिया जाता है.
3. सबसे बड़ा दुश्मन वह नहीं जो तुम्हें रोके, बल्कि वह है जो तुम्हें यह मनवा दे कि रुकना, बंधना ही तुम्हारी खुशी, तुम्हारी पहचान और तुम्हारी शक्ति है.
किरण ने यह मान लिया है. कि मैं नहीं मान सकती.
पर लड़ना होगा... बुद्धिमानी से. विज्ञान से. सवालों से. हर उस 'तथ्य' से जो मुझे 'तुम्हारे जैसा होने' का पाठ पढ़ाए.
कल से, मैं और बेहतर सवाल पूछने होंगे."
... क्रमशः
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