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गुरुवार, 29 जनवरी 2026

कार, लिफाफा और लड्डू

लघुकथा  :  दिनेशराय द्विवेदी
घर के अहाते में खड़ी शगुन की चमकदार साइकिल के साथ अब एक चमकदार कोरल-रेड मारुति 800 और आ चुकी थी. पूरा मोहल्ला उसे देख जा रहा था. पापा चाबियाँ हाथ में हिलाते, खुशी से चाचा को बता रहे थे, "कंपनी की योजना थी... सालाना सिर्फ चार प्रतिशत ब्याज पर लोन. वाहन भत्ता इतना कि किस्त आराम से निकल आएगी. बस पेट्रोल का खर्च अपना."

"शानदार है!" चाचा ने कार के बोनट पर हाथ फेरते हुए कहा, "अब आयुष को कोटा छोड़ने-लाने में आसानी हो जाएगी. और... हाँ, शगुन के लिए अच्छे रिश्ते मिलने में भी आसानी होगी. प्रतिष्ठानुकूल रिश्ता मिल सकेगा." उनकी नज़र में कार सामाजिक प्रतिष्ठा में उछाल पैदा करना वाली और पारिवारिक दायित्वों हेतु नया साधन थी.

चाचा के शब्दों ने शगुन पर एक भारी, अदृश्य छाया सी डाल दी. यह कार उपयोग के लिए नहीं, बल्कि परिवार की प्रतिष्ठा, भाई की सुविधा तथा उसके भविष्य के 'रिश्तों' की तलाश के लिए थी. उसे अपनी यात्रा अभी भी उस पुरानी साइकिल से जुड़ी लग रही थी, जिसके पहिए अब धीमे पड़ गए थे.

दो दिन बाद वह सुबह आई.

डाकिया आया और दरवाज़े की जाली में एक खाकी लिफाफा अटका गया. शगुन के हाथों ने उसे छुआ तो कागज़ की सख्ती ने उसकी नब्ज तेज़ कर दीं. ऊपर हरे अक्षरों में लिखा था; ‘बनस्थली विद्यापीठ’.

उसका दिल जोरों से धड़कने लगा. उसने डरते हुए लिफाफा खोला, कहीं नज़रों का धोखा न हो. पर वह उसके सीनियर सेकेंडरी के अंकों के आधार पर, बी.ए. (ऑनर्स) मनोविज्ञान में सीधे प्रवेश का प्रस्ताव था.

एक पल के लिए सब कुछ थम सा गया. फिर एक गर्म, मीठी लहर, जो उसके पैरों की उँगलियों से दौड़ गयी और उसके चेहरे पर एक चमकदार, अनियंत्रित मुस्कान के रूप में फूट पड़ी. उसने पत्र को छाती से लगा लिया और पलटकर रसोई की ओर दौड़ी, "मम्मा! एडमिशन मिल गया!"

माँ के हाथ गीले थे. उन्होंने उन्हें अपनी साड़ी के पल्लू से पोंछा, फिर पत्र लेकर उलटा-सीधा देखा. उनकी आँखों में चमक के साथ-साथ एक धुँधलापन भी तैर गया. "अरे वाह, बेटा! बहुत बढ़िया... अब तो तू पक्की ग्रेजुएट बन जाएगी." आवाज़ में गर्व था, पर उसकी गहराई में वही पुरानी चिंता कुलबुला रही थी, “बेटी का दूर जाना”.

तभी चाची रसोई से बाहर आईं. बात सुनकर नहीं, महसूस करके. उनके हाथ में एक छोटी थाली थी, जिस पर दो सुनहरे बेसन के लड्डू रखे थे. उन्होंने कुछ नहीं पूछा. शगुन की चमकती आँखें और माँ के भीगे पलकों के बीच की कहानी उन्होंने एक नज़र में पढ़ ली थी.

"खोल मुहँ," चाची ने आदत के अनुसार कहा, जैसे शगुन अभी भी पाँच साल की बच्ची हो. शगुन ने मुस्कुराकर मुहँ खोल दिया. चाची ने एक लड्डू उसके मुहँ में रख दिया. बेसन की मीठी महक और घी का गाढ़ा स्वाद उसकी जुबान पर फैल गया; “सफलता का पहला, निजी और बिना शोर का स्वाद.”

"शाम को पापा और चाचा को दिखाना," चाची ने कहा, दूसरा लड्डू माँ की ओर बढ़ाते हुए.

शाम को चाचा घर लौटे, पर उन्हें किसी ने कुछ न बताया, फिर दो घंटे बाद पापा ने घर में कदम रखा. लिविंग में शगुन उनके लिए चाय लेकर गयी तो साथ में खाकी लिफाफा भी उन्हें पकड़ा दिया. पापा ने लेटर लेकर ध्यान से पढ़ा. "ये तो बहुत अच्छी खबर है. अब बनस्थली जाने की तैयारी करो."

बड़े भाई के मुहँ से बनस्थली का नाम सुन कर चाचा चौंके. तुरन्त शगुन की और गुस्से से देखा. “तुमने मुझे नहीं बताया, शैतान¡

“आपने पूछा ही नहीं.” यह कह कर शगुन वापस किचन की ओर चली गयी.


रात को भोजन के समय जब सब साथ थे. माँ कहने लगीं. "नए कपड़े भी सिलवाने पड़ेंगे, तीन-चार सलवार-सूट तो बनाने ही होंगे."

"कपड़ों की फिक्र न करो," चाची की आवाज़ ने बातचीत में दखल दिया. वे गर्म चपातियाँ लिए वहाँ थीं. खड़ी थीं. "बनस्थली में तो खादी पहननी पड़ती है. कुर्ता-पायजामा या सलवार-कमीज, सब खादी का. मेरी भांजी बताया था. और किताबें भी वहीं से मिलेंगी. कॉलेज बताएगा कि क्या चाहिए, और कैम्पस में ही प्रकाशक से भी कम दाम में मिल जाएंगी. खादी का कपड़ा और दर्जी भी वहीं मिल जाएंगे. उनका अपना सिस्टम है."

यह नई जानकारी थी. माँ हैरान थीं, "सारे कपड़े नए खादी के? यह तो बहुत... सादगी है."

पापा ने, जिनकी नज़र पहले ही कार के खर्च के बाद के बजट पर थी, राहत की सांस ली. "अच्छी बात है. कार के खर्च के बाद यह तो बहुत छोटी बचत है. सिस्टम से ही सब ले लेंगे, आसान रहेगा."

शगुन सुनती रही. उसकी तैयारियों में "नयापन" का कोई स्थान नहीं था. न नए कपड़े, न नई किताबें. सब कुछ एक पहले से तय, सादे, एक समान व्यवस्था का हिस्सा था. एक पल को उसे अजीब लगा, फिर एहसास हुआ; शायद यही तो बनस्थली का सबक था: बाहरी चमक-दमक से परे, भीतरी विकास पर ध्यान.

उस रात, डायरी के सामने बैठकर, शगुन के मन में एक तीव्र इच्छा उठी, आयुष से मिलने की. बिना उसे बताए, बिना उसकी थकी आँखों में अपनी खुशी की चमक देखे, यह सफलता अधूरी लग रही थी. वह जानती थी कोटा में रविवार को अवकाश होता है.


अगले दिन उसने पापा से कहा, "पापा, मैं बनस्थली जाने से पहले आयुष से मिलना चाहती हूँ. हम रविवार को ही कोटा चले जाएंगे. उससे मिलेंगे, रात कंपनी के गेस्ट हाउस में रुक लेंगे. सोमवार सुबह सीधे वहीं से बनस्थली के लिए रवाना हो जाएंगे."

पापा ने इस प्रस्ताव पर सोचा. यह व्यावहारिक था. एक ही यात्रा में दो काम और भावनात्मक संतुष्टि भी. उन्होंने शगुन को आश्चर्य से देखा, फिर सोचकर खुश भी हुए कि वह प्लानिंग में भी माहिर होती जा रही है. उन्होंने शगुन की ओर प्यार भरी नजरों से मुस्कुराते हुए देखा.

“तुमने ठीक कहा बेटा, ऐसा ही करेंगे.”

शगुन ने खिड़की से बाहर कार की ओर देखा. अब वह सिर्फ चमकदार साधन नहीं लग रही थी. वह एक पुल लग रही थी; उसके वर्तमान और भविष्य के बीच, उसके और उसके भाई के अलग-अलग संघर्षों के बीच. कल का रविवार उस पुल की पहली यात्रा होगी.



2 टिप्‍पणियां:

  1. शगुन और उसके परिवार के व्यवहार और विचार से एक जुड़ाव महसूस होने लगा है सर।
    कितने सूक्ष्म मनोभाव गूंथ रही हैं आपकी लेखनी। अगली कड़ियों की प्रतीक्षा है।
    सादर।
    ------

    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार ३० जनवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  2. "वह एक पुल लग रही थी; उसके वर्तमान और भविष्य के बीच"
    सूक्ष्म अवलोकन की रचना

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