दिनेशराय द्विवेदी
शहर की सड़कों पर सफ़ाई का शोर अखबारों के जरीए देश ही नहीं समूची दुनिया तक पहुँच चुका था। स्वच्छता सर्वेक्षण में वह देश का सबसे स्वच्छ शहर घोषित किया गया था। शहर के हर चौक पर होर्डिंग चमक रहे थे -
“स्वच्छता में अव्वल! हमारा शहर, हमारा गर्व।”
होटल से कैफ़े की ओर पैदल जा रही दो विदेशी महिला क्रिकेटर भी उस चमक को देख मुस्कुरा रही थीं।
“देखो, कितना साफ़ है यहाँ,” पहली ने कहा।
दूसरी ने सिर हिलाया, “हाँ, जैसे किसी किताब का पन्ना।”
तभी अचानक एक बाइक सवार युवक पास से गुज़रा। उसकी हरकत ने उनकी मुस्कान को भय में बदल दिया। पहली खिलाड़ी का चेहरा पीला पड़ गया। उसे लग रहा था जैसे उसकी समूची देह उस स्पर्श और दबाव से गंदगी में सन चुकी थी, ऐसी गंदगी जो शरीर से तो चली जाएगी लेकिन उसके मन से कभी नहीं। वह मन की दीवार पर हमेशा के लिए छप गयी थी। उसने अपने भीतर उठते डर को दबाने की कोशिश की, पर उसकी आँखों में असुरक्षा साफ़ झलक रही थी।
दूसरी ने तुरंत मोबाइल से एसओएस दबाया। उसकी उंगलियाँ काँप रही थीं, मानो यह काँपना सिर्फ़ डर का नहीं, बल्कि अपमान का भी था।
कुछ ही मिनटों में पुलिस की गाड़ी सायरन बजाती पहुँची। युवक गिरफ्तार हुआ।
खिलाड़ियों के मन में जो दरार पड़ चुकी थी, उसे कोई गिरफ्तारी भर नहीं भर सकती थी। कैफ़े के बाहर खड़े लोग सन्न रह गए।
एक बुज़ुर्ग ने धीमे स्वर में कहा, “सड़कें चाहे जितनी चमकदार हों, शहर भले ही देश का सबसे स्वच्छ शहर बन गया हो, लेकिन अगर मन गंदा है तो तमगे का क्या मतलब?”
अगले दिन अख़बारों में सुर्ख़ी थी, “स्वच्छता में अव्वल शहर का कारनामा!”
क्रिकेट बोर्ड के सचिव ने इसे “दुर्भाग्यपूर्ण” बताया और सुरक्षा बढ़ाने का वादा किया।
लेकिन शहर के नागरिकों के मन में सवाल गूंजता रहा, “क्या असली स्वच्छता केवल कचरे के डिब्बे खाली करने से आती है, या फिर नागरिकता और आचरण की सफ़ाई से?”
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