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मंगलवार, 16 दिसंबर 2025

पेंशन का सौदा

लघुकथा

दिनेशराय द्विवेदी
रामकिशोर  नगर परिषद का एक साधारण कर्मचारी था. मेहनती, ईमानदार, और अपने काम से संतुष्ट. उसे प्रमोशन मिला, लेकिन वेतन वही पुराना रहा. उसे नए पद का वेतनमान नहीं दिया गया. उसने सोचा, “न्याय अवश्य मिलेगा.” और अदालत का दरवाज़ा खटखटाया.

मुकदमा दाख़िल हुआ. अदालत में पहले से ही मुकदमों का पहाड़ था. तारीख़ पर तारीख़ मिलती रही. अफसरों ने भी अपनी चालें चलीं, कभी काग़ज़ अधूरा, कभी वकील अनुपस्थित. इस तरह 22 साल बीत गए.

आख़िरकार अदालत का फैसला आया, “रामकिशोर का वेतन फिक्स करो और सारा बकाया दो.”

नगर निगम के आयुक्त का का चेहरा उतर गया. लाखों रुपये देने पड़ेंगे. उसने तुरंत हाईकोर्ट में अपील पेश करवायी.

वकील ने आयुक्त को समझाया, “अपील खारिज होगी. लेकिन मैं इसे पाँच-दस साल खींच दूँगा.”

आयुक्त को राहत मिली, पर डर भी था कि कहीं उनके कार्यकाल में ही फैसला न आ जाए.

रामकिशोर की रिटायरमेंट में बस एक साल बचा था. आयुक्त ने नई चाल चली.
उसने अपने अधीनस्थ अफसर को कहा, “इसने अदालत को गुमराह किया है. फर्जी दस्तावेज़ दिए हैं. इसे चार्जशीट दो.”

रामकिशोर को चार्जशीट मिली, उसने दस्तावेज मांगे, कई दिन तक नहीं दिए गए. फिर उसने स्मरण पत्र दिया. लेकिन उसे जवाब मिला कि उसे दस्तावेज नहीं दिए जा सकते.

आयुक्त की योजना साफ़ थी—

• जांच चलते-चलते रामकिशोर रिटायर हो जाएगा.
• उसकी पेंशन रुक जाएगी.
• तब मजबूरी में वह खुद लिख देगा, “मैं प्रमोशन के मुकदमे के लाभ छोड़ता हूँ.”
• और तभी उसकी पेंशन चालू होगी.


फिर एक दिन उसे अचानक सूचना मिली कि वह जाँच में हाजिर हो.

रामकिशोर समझ गया कि यह लड़ाई अब सिर्फ़ वेतन की नहीं रही. यह उसकी गरिमा, उसकी ज़िंदगी, और उसके अधिकार की लड़ाई है.

वह सोचता रह गया, “क्या न्याय पाने की कोशिश ही मेरी सबसे बड़ी गलती थी?”

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