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गुरुवार, 2 जुलाई 2026

पिघलती बर्फ

देहरी के पार, कड़ी - 72
प्रिया चाय बनाने रसोई में चली गई, मयंक ने अपने मोबाइल से पापा को कॉल लगाई. पाँच लंबी रिंग के बाद माँ की आवाज़ गूंजी, “हेलो.”

"नमस्ते मम्मी, आप कैसी हैं? और पापा कैसे हैं?" मयंक ने बहुत आत्मीयता से पूछा.

"हम ठीक हैं बेटा, पापा बाथरूम में नहा रहे हैं, तू बता. मुंबई कैसी लगी? प्रिया कैसी है? तू तो मुंबई की चमक में प्रिया की तरह हमें भी भूल गया, वहाँ पहुँचा तब फोन किया था, उसके बाद आज कर रहा है.” उधर से माँ का ममता भरा उलाहना मिला, लेकिन माँ की आवाज़ में हमेशा जैसी खनक नहीं थी, एक थकान सी घुली हुई थी.

"मैं ठीक हूँ, मम्मी. दीदी मेरा बहुत ख्याल रख रही हैं."

माँ ने एक हल्की सी सांस ली, "पापा अभी आधा घंटा पहले मंडी से लौटे हैं. चाय पी और अब बाथरूम में नहाने गए हैं. मंडी में गर्मी के मारे दिन में हालत खराब हो जाती है. तुझे तो पता है उनका स्वास्थ्य अब पहले जैसा नहीं रहता, दिनभर की भागदौड़ में जल्दी थक जाते हैं. पॉलिश फैक्ट्री में भी बस एक ही मशीन चल रही है, बाकी बंद कर दी हैं. खान से ही अच्छा पत्थर कम आ रहा है. बाजार में तरह-तरह की टाइलें आ गई हैं, कोटा स्टोन का क्रेज़ यहाँ कोटा में ही नहीं रहा. कई पॉलिश फैक्टरियाँ बंद हो गईं. तेरे पापा कहते हैं कि कोई अच्छा ग्राहक मिलते ही पॉलिश फैक्ट्री बेच देना चाहिए, वरना बाद में मशीनें कबाड़ में बिकेंगी."

माँ की बातें सुनकर मयंक का चेहरा गंभीर हो गया. माँ जो कह रही थी, वह कोई ताजा स्थिति नहीं थी. दो सप्ताह पहले जब वह कोटा में था, तब भी यही हाल था. लेकिन ये बातें माँ ने पहले कभी नहीं कही थीं. इन बातों से उसे चिंता होने लगी. उसकी आँखों के सामने पिता का वह थका हुआ चेहरा तैर गया जो उम्र के इस पड़ाव पर भी अकेले परिवार का आर्थिक मोर्चा थामे हुए थे. मयंक ने महसूस किया कि उसका एमबीए अब पूरा हो चुका है, रिजल्ट भी हफ्ते भर में आने वाला है. उसे तुरंत कोटा लौटना चाहिए. “हाँ मम्मी-पापा की बात तो सही है. पॉलिश फैक्ट्री का तो कोई मतलब नहीं रहा.”


“तेरे पापा कह रहे थे कि बेहतर है कि फैक्ट्री बेचकर उसकी जगह टाइलों के स्टॉकिस्ट बन जाएँ. पूरा हाड़ौती का एरिया रहेगा. सब जगह माल सप्लाई करेंगे तो कई गुना कमाया जा सकता है.”

“हाँ माँ, उनकी बात सही है. पर मैं वहाँ आऊंगा, तब ये बातें करेंगे.”

“अच्छा प्रिया कहाँ है? उससे बात करा.”

“वह रसोई में चाय बना रही है.”

“चल ठीक है, तेरे पापा नहाकर आते ही बात कराती हूँ.”

मयंक ने फोन रखा ही था कि प्रिया ट्रे में चाय के कप लिए रसोई से बाहर आई. उसने मयंक के गंभीर चेहरे को देखा और पूछा, "क्या हुआ मयंक? पापा से बात हो गई?"

चाय का कप थामते हुए मयंक ने गहरी आवाज़ में कहा, "हाँ दीदी. पापा नहा रहे थे, मम्मी से बात हुई. अब वे थकने लगे हैं. उनका स्वास्थ्य अब उतना अच्छा नहीं रहता. पॉलिश फैक्ट्री में केवल एक मशीन चल रही है. उसका कोई भविष्य नहीं रहा. आढ़त में कॉम्पिटीशन बहुत हो गया है, वो तो किसानों से पुराने रिश्ते हैं, इसलिए सब ठीक चल रहा है. कोटा में बिज़नेस की स्थिति भी ठीक नहीं है. लगता है कि मुझे अब तुरंत वापस कोटा जाना चाहिए. वहाँ पापा को मेरी ज़रूरत है. मुंबई खूब घूम लिया हूँ. बाकी कुछ रहा होगा तो फिर कभी घूम लूंगा.

प्रिया ने अपने छोटे भाई को देखा. कद में तो उसने ऊँचाई प्राप्त कर ही ली थी. लेकिन आज उसकी बातों में जिस वैचारिक समझ और ज़िम्मेदारी का भाव था, उससे प्रिया का दिल भर आया. उसका छोटा भाई अब सचमुच समझदार हो चला था. हालांकि भाई के जाने की बात से उसके मन में उदासी की हल्की सी लहर उठी. पर उसका अहसास उसने मयंक को नहीं होने दिया. तभी मयंक के फोन की घंटी बज उठी. पापा थे.

मयंक ने लपक कर उसे लिया और कहा, ‘हेलो पापा, प्रणाम.”

“हाँ, मयंक कैसा है? मुंबई घूम लिया.”

“हाँ पापा, पहली बार में जितना घूमा जा सकता है उससे कुछ अधिक ही घूम लिया.”

“फिर कब आ रहा है?”

“बस अभी रिजर्वेशन देखता हूँ, जिस दिन का टिकट मिलेगा रवाना हो जाऊंगा.”

“अच्छा ठीक है. प्रिया कहाँ है? वह हो तो उसे फोन दे.”

“देता हूँ पापा.”

मयंक ने तुरन्त फोन प्रिया की ओर बढ़ाया. “दीदी, पापा, आपसे बात करेंगे.” प्रिया ने फोन ले लिया.”

“हाँ पापा, प्रणाम¡ आप कैसे हैं?

“मैंने फोन किया तो पूछ रही है, पापा कैसे हैं? तू इतनी नाराज है मुझसे? कि कभी सोचती भी नहीं कि पापा के हाल ही पूछ लें?”

“नहीं पापा ऐसी बात नहीं है. बस हिम्मत नहीं पड़ती.”

“बड़ी अजीब है तू, शादी को बीच में छोड़कर घर से निकलने में डर नहीं लगा, पर पापा से बात करने में लगता है?”

“नहीं पापा वो बात नहीं है.”

“तो फिर क्या है? क्या तू ये सोचती है कि पापा क्या बात करेंगे? ... अब मैं जानता हूँ, विक्रांत को समझने में मैंने बहुत बड़ी गलती की थी. मैं समझता था वह संस्कारी लड़का है. पर उसने बहुत बड़ा धोखा दिया. हमें तो दिया ही, कोटा के सारे व्यापार जगत को भी धोखा दिया. आज उसकी हालत ये है कि वह कोटा में किसी तरह का धंधा नहीं कर सकता. यहाँ की प्रोपर्टी बेचने की फिराक में है. यहाँ कभी-कभी चुपके से आता है, उसका पता भी तब लगता है जब वह चला जाता है. सुना है स्थायी रूप से मुंबई ही शिफ्ट हो जाएगा. तूने अच्छा किया जो शादी से भाग गई. तेरी शादी हो जाती, और तो मैं तो जीते जी मर जाता. तूने मुझे भी बचा लिया. मैं तेरा गुनहगार हूँ.” इतना बोलते-बोलते पापा की आवाज रुंध गई थी. प्रिया सन्न होकर सुन रही थी.

“पापा ये आप क्या कह रहे हैं? मैं जानती थी कि आप जल्दी ही समझ जाएंगे. उसकी बहुत सी बातें तो मुझे भी पता नहीं थीं. आप शान्ति रखें. ऐसी बातें न सोचें. मैं भी छुट्टी लेकर कोटा आऊंगी, तब सब नॉर्मल हो जाएगा. बस आप अपना ध्यान रखें.”

“हाँ बेटा, मैं क्या कहूँ? मैं तो तुमसे कुछ भी कहने का नहीं रहा. यह घर पहले तेरा है, हमारा और मयंक का बाद में. तू आ तो सही.”

“पापा, अब आप ये फिजूल की बातें छोड़ें. मयंक अभी जल्दी लौटने की कह रहा था. मैं उसका टिकट बुक करवा देती हूँ. वह जल्दी कोटा पहुँच जाएगा. एक बात और पापा. मयंक वहाँ पहुँच जाए. कुछ दिन वहाँ का काम ये देख लेगा. आप और मम्मी दोनों मुंबई आ जाइए, कम से कम एक सप्ताह के लिए. मैं भी छुट्टी ले लूंगी. साथ रहेंगे.”

“नहीं प्रिया अभी मुश्किल है. एकदम सब कुछ मयंक कैसे संभालेगा?”

“जैसे आपके बीमार होने पर संभालता था, वैसे ही संभाल लेगा. मैं मयंक को कहती हूँ. वहाँ जाकर यह आपको फ्री करेगा और आप और मम्मी मुंबई आ रहे हैं.”

“ठीक है, पहले मयंक को यहाँ आने दे, फिर सोचेंगे. तू ठीक से रहना और अपना ध्यान रखना.”

“हाँ, पापा.” उसने कहा. तभी उधर से फोन कट गया. प्रिया ने फोन मयंक को लौटा दिया.

“दीदी, अब मुझे जल्दी कोटा लौटना पड़ेगा.” मयंक ने फोन लेते हुए कहा.

"मैं समझ सकती हूँ मयंक," प्रिया ने मुस्कुराते हुए उसके कंधे पर हाथ रखा. "तू बिल्कुल सही सोच रहा है. चल, मैं अभी तेरा रिजर्वेशन देखती हूँ."

प्रिया ने तुरंत अपना लैपटॉप खोला और आईआरसीटीसी (IRCTC) की वेबसाइट पर जाकर अगले शनिवार, 29 जून 2019 की रात की ट्रेन में मयंक का टिकट बुक कर दिया.

"ले मयंक, अगले शनिवार का रिजर्वेशन पक्का हो गया. इस तरह तेरे पास मुंबई में अभी चार-पाँच दिन और हैं. मेरा प्रोजेक्ट पूरा हो चुका है. मैं भी छुट्टी ले लूंगी, साथ घूमेंगे." प्रिया ने लैपटॉप बंद करते हुए कहा.

“हाँ दीदी, आप साथ रहेंगी तो घूमने का आनंद कुछ और ही होगा,” मयंक ने कह दिया, लेकिन अचानक उसे अहसास हुआ कि पापा से बात और उसके कोटा लौटने की बात से प्रिया उदास हो चली है. उसने तुरन्त बात बदली. “दीदी, हमने चाय तो पी ली. पर अब तेज भूख लगी है.”

“चल तू बैठकर टीवी देख. मैं खाना बनाने की तैयारी करती हूँ.”

“नहीं दीदी, आप रहने दो. क्यों न हम ‘चपाती’ रेस्टोरेंट चलें.”

“तू यही चाहता है तो चल तू अपने कपड़े बदल मैं भी तैयार होकर आती हूँ.” यह कहते हुए प्रिया अपने बेडरूम की ओर चल दी.
... क्रमशः