@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत

गुरुवार, 11 नवंबर 2010

गृहस्वामी, गृहस्वामिनी, शरलक होम्स औऱ रुस्तमे-हिन्द

कान बीस साल पहले बनना आरंभ हुआ था। पहले दो कमरे, रसोई, स्टोर, बरांडा और टॉयलट बनाया गया। दस साल बाद उन में कुछ परिवर्तन कर के एक बड़ा हॉल, एक शयनकक्ष और एक टॉयलट और जोड़ दिया गया और एक कमरे के आकार में वृद्धि कर दी गई। पाँच साल बीते होंगे कि यह भी छोटा पड़ने लगा। साथ ही मकान की डिजाइन असुविधाजनक लगने लगी। आज की जरूरतों के मुताबिक उसे दुरुस्त करने में बहुत पैसा लगना था। इस लिए एक नया भूखंड खरीदने की योजना बनाई गई। भूखंड की तलाश जारी थी, पर इस पर मकान तभी बन सकता था जब पहले मकान को बेच दिया जाए। गृहस्वामी ने मकान बाजार में खड़ा कर दिया। उस के खरीददार पहले आ गए। समस्या यह थी कि इसे बेचने का सौदा कर दिया तो रहेंगे कहाँ? तब एक मित्र काम आए। उन का मकान नया बना था और वे खुद उस में साल भर बाद रहने जा रहे थे। गृहस्वामी ने मौके का इस्तेमाल किया और उस मकान में रहने आ गए और अपना मकान बेच दिया। कुछ ही दिनों में भूखंड भी खरीद लिया गया। अगले सप्ताह से गृहस्वामी उस पर निर्माण आरंभ कराने वाले हैं।
मित्र के मकान में आए हुए कुछ ही समय हुआ था कि गृहस्वामी को जयपुर जाना पड़ा। जिन के साथ जाना हुआ वे जयपुर की फीणी के शौकीन हैं, वह भी सांभर वाले की फीणी लाजवाब के। उन्हों ने एक किलो खरीदी तो गृहस्वामी भी आधा किलो खरीद लाए। रात को जब घऱ पहुँचे तो खूबसूरत गोल डब्बे में पैक फीणी गृहस्वामी ने अपनी गृहस्वामिनी को सौंप दी। गृहस्वामिनी ने दो दिन बाद ही उस पर चीनी की चाशनी चढ़ा कर उसे मीठी कर दिया। अब इस फीणी चढ़े डब्बे ने भोजन कक्ष में खुलते रसोई के द्वार के बाहर रखे रेफ्रीजरेटर के ऊपर अपना अड्डा जमा लिया। जब जी चाहे डब्बे में से निकाल कर एक फीणी प्लेट में रखो और उस का स्वाद लो। इस बीच जितने भी बालक मेहमान आए सभी ने उस फीणी का स्वाद लिया। 
लेकिन फीणी के चक्कर में कोई और भी था। एक दिन सुबह गृहस्वामिनी उठी तो उस ने पाया कि डब्बे का ढक्कन उठा हुआ है। यानी फीणी किसी ने चुराई थी। अब घर में तो इस बीच गृहस्वामी और गृहस्वामिनी के अलावा कोई और तो आया नहीं था। गृहस्वामिनी ने तुरंत गृहस्वामी के थाने में रपट दर्ज कराई। गृहस्वामी को घरेलू मोर्चे पर एक तफ्तीश मिल गई। मौका-ए-वारदात और आस-पास का मुआयना किया गया। घर के सभी दरवाजे अंदर से बंद थे, चोर कहाँ से आया था इस का पता लगाना कठिन था, खिड़कियाँ आदि भी देख ली गईं। कोई सुराग लग ही नहीं रहा था। गृहस्वामी के अदालत जाने का वक्त हो चला था और वे अभी तक हजामत तक नहीं बना सके थे। 
गृहस्वामी ने तफ्तीश को शाम तक के लिए मुल्तवी किया और तुरंत अपना हजामत का डब्बा संभाला। वाश बेसिन पर पहुँचे तो उन की निगाह उस से निकल कर नीचे जा रहे पाइप पर पड़ी। उस की जाली कुछ हटी हुई थी। पाइप निकाल कर देखा तो वह जाली के अंदर-अंदर कटा हुआ था। गृहस्वामी के भीतर का शरलक होम्स तुरंत जागृत हुआ और मामूली दिमागी कसरत से पता लग गया कि चोर कौन हो सकता है। चोर ने घर में प्रवेश का जो मार्ग बनाया था उसे बंद किया गया उसे तुरंत बंद किया गया। इस बड़े ऑपरेशन से निबटने के बाद ही गृहस्वामी हजामत का अभियान आरंभ कर पाए। हजामत आरंभ होने के पहले तक देख लिया गया था कि और तो कोई स्थान ऐसा नहीं कि चोर घर में प्रवेश कर सके। अब गृहस्वामिनी और गृहस्वामी निश्चिंत थे कि चोर से घर सुरक्षित हो चुका है। लेकिन उन का यह भ्रम दूसरे दिन सुबह ही टूट गया। दूसरे दिन सुबह जब गृहस्वामिनी सो कर उठी तो पाया कि फीणी के गोल डब्बे का ढक्कन फिर से उठा हुआ है।
पिछले दिन बंद किए गए चोर-मार्ग की जाँच की गई, वह स्थान सुरक्षित पाया गया। फिर से पूरे घर का निरीक्षण किया गया। कोई स्थान नहीं था जहाँ से चोर घर में घुस सके। शरलक होम्स ने अपना विचार दिया कि चोर घर छोड़ कर गया ही नहीं कहीं घर में ही छुपा हुआ है। फिर से घर की तलाशी आरंभ हो गई। पूरी तलाशी के बाद भी पता नहीं लग सका कि चोर आखिर छुपा कहाँ है? अब तो एक ही मार्ग था कि चोर को पकड़ने के लिए जाल बिछाया जाए। गृहस्वामिनी ने सुझाया कि दो बरस पहले जब पुराने घर में ऐसे ही चोर घुस आए तब एक जाल खरीदा गया था, क्यों न उस का उपयोग कर लिया जाए? गृहस्वामी को इस में क्या आपत्ति हो सकती थी। तुरंत सुझाव पर अमल किया गया। जाल में कुछ रोटियाँ रख दी गईं। रात को जाल के पास से आवाजें आने लगीं, तो गृहस्वामी और गृहस्वामिनी दोनों प्रसन्न हुए कि तरकीब काम कर गई, चोर पकड़ा गया। 
सुबह उठ कर देखा तो जाल की दुर्दशा हो चुकी थी, रोटी गायब थी। लगता था चोर कुछ रुस्तमे हिन्द टाइप का था और जाल उस के लिए पर्याप्त नहीं था। रुस्तमे हिन्द इस सस्ती किस्म के हवालात में बंद होने को तैयार न थे इस लिए तय पाया कि उन के लिए नया, मजबूत और बड़े आकार का जाल लाया जाए। आखिर शाम को दोनों पति-पत्नी शॉपिंग के लिए निकले और पूरे सवा सौ रुपए खर्च कर नया जाल खरीद कर लाए। इस रात उस का उपयोग किया गया। पर सुबह फिर नतीजे के नाम सिफर था। जाल में रखी रोटियाँ बदस्तूर अपने स्थान पर मौजूद थीं। फीणी के डब्बे का ढक्कन रोज उठा हुआ मिलता था। अब गृहस्वामी पूरी तरह निराश हो चले थे। घर में आने जाने के सब मार्ग बंद हैं, आखिर चोर छुपा कहाँ है।
गली रात को जब गृहस्वामिनी सो चुकी थी और गृहस्वामी सोने जा रहे थे तब अचानक शरलक होम्स के दिमाग की बत्ती जल उठी। समझ आ रहा था कि जब फीणी का डब्बा आसानी से उपलब्ध है तो इस गच्च माल को छोड़ कर कौन उल्लू का पट्ठा रोटी की और झाँकने वाला था। हमारे रुस्तमें हिन्द से तो ऐसी अपेक्षा करना मूर्खता के सिवा कुछ नहीं। शरलक होम्स को अफसोस हो रहा था कि दिमाग की बत्ती इतनी देर से क्यूँ रोशन हुई? गृहस्वामी ने तुरंत सारी भोजन सामग्री भोजन कक्ष से हटा कर रसोई में बंद की और एक फीणी निकाल कर जाल में चारे की जगह लगा कर सोने चले गए। 
गली सुबह सफलता शरलक होम्स के कदम चूम रही थी। रुस्तमे हिंद जाल में चीख रहे थे। सांभर वाले की फीणी के शौक ने उन्हें हवालात में डाल ही दिया था। दिन भर उन्हें हवालात में बंद रखा गया। सजा तो उन्हें दी नहीं जा सकती थी। गृहस्वामिनी के संस्कार इस में बाधा उत्पन्न कर रहे थे। रुस्तमे हिन्द आखिर भगवान गणपति के वाहन का रिश्तेदार जो था। आखिर जिस तरह विपक्ष द्वारा पिकेटिंग करने पर गिरफ्तार कार्यकर्ताओं और नेताओं को कुछ देर किसी स्कूल आदि में बंद रख कर शाम को शहर से दूर छोड़ दिया जाता है गृहस्वामी रुस्तमे हिन्द को नहर के नजदीक छोड़ आए। जैसे ही उन्हें जाल से बाहर निकाला गया, उन्हों ने कुलांचे भरी और घास के मैदान में गायब हो गए। 
दिवाली के लिए सफाई अभियान चला तो पता लगा कि रद्दी अखबारों के ढेर के पीछे रुस्तमे हिन्द जी ने अपना विश्राम कक्ष बनाया हुआ था और एक फीणी वहाँ ले जा कर संकटकाल के लिए सुरक्षित रखी गई थी। वैसे जितने दिन वे रहे रोज गोल डब्बे में सैंध लगाते रहे। कुछ भी हो रुस्तमे हिन्द गायब हो चुके थे। लेकिन कल रात फिर उन के दर्शन हुए वे खिड़की के परदे को सीढ़ी बना कर रोशनदान से बाहर जा रहे थे। गृहस्वामी और गृहस्वामिनी का चैन फिर भंग हो चुका है। आज फिर से उन्हों ने जाल रखा है। इस बार फीणी नहीं है, दिवाली पर देसी घी में तले गए शकरपारों ने उस का स्थान ले लिया है। सुबह की प्रतीक्षा है इस बार रुस्तमे हिन्द हवालात में तशरीफ लाते हैं या नहीं?

बुधवार, 10 नवंबर 2010

शिवराम के नाटकों की एक आत्मीय प्रस्तुति

कोटा राजस्थान का रंगकर्मी एकता संघ (रास) पिछले चार वर्षों से अपने ही एक दिवंगत साथी नाट्यकर्मी गिरधर बागला की स्मृति में नाट्य संध्या आयोजित करता रहा है।  इस समारोह में प्रतिवर्ष रंगकमल अलंकरण प्रदान कर के किसी न किसी वरिष्ठ रंगकर्मी को सम्मान और आदर प्रदान किया जाता रहा है। कल साँझ पाँचवीं गिरधर बागला स्मृति नाट्य संध्या कोटा के ऐतिहासिक क्षार बाग में स्थित कला दीर्घा के खुले थियेटर में आयोजित की गई। यह मेरा दुर्भाग्य ही रहा कि इस के पहले की चार संध्याओं में मैं उपस्थित नहीं हो सका था बावजूद इस के कि मेरे अभिन्न मित्र और शिवराम जी मृत्युपर्यंत रास के अध्यक्ष थे। कल भी स्वास्थ्य कुछ नरम था लेकिन शिवराम रचित पहला नाटक 'जमीन' का हाड़ौती भाषा में मंचन और मुंशी प्रेमचंद की कहानी 'ठाकुर का कुआँ' का उन के द्वारा किए गए नाट्य रूपान्तरण को देख पाने तथा इस बहाने कृतित्व के माध्यम से दिवंगत मित्र से साक्षात्कार के लालच ने मुझे वहाँ जाने को बाध्य किया।
मंच स्तुति
दिवंगत गिरधर बागला से मेरा व्यक्तिगत परिचय नहीं था। लेकिन नाट्य संध्या में उन के पिता जी से भेंट हुई तो पता लगा वह मेरे ननिहाल के गाँव मनोहरथाना, जिला झालावाड़ (राज.) के रिश्ते से मेरा भतीजा था और गिरधर के चचेरे भाई नितिन बागला हिन्दी चिट्ठाजगत के जाने माने ब्लॉगर हैं। मैं वहाँ समय पर पहुँच गया था। लेकिन समारोह आरंभ होने में देरी थी, क्यों कि समारोह के मुख्य अतिथि पूर्व विधायक और भाजपा नेता ओम बिड़ला तथा एक बड़े उद्योग के महाप्रबंधक वी.के.जेटली वहाँ समय पर नहीं पहुँचे थे। वे वहाँ लगभग पौन घंटा की देरी से पहुँचे। हालाँकि इस के लिए उन्हें कतई कसूरवार नहीं ठहराया जा सकता। क्यों कि अक्सर ऐसे आयोजनों में दर्शक ही देरी से एकत्र होते हैं और बिना दर्शकों के आयोजन को आरंभ करने का कोई अर्थ नहीं होता। पर इस आयोजन में थियेटर समय पर भर चुका था और अतिथियों की कमी अखर रही थी। आयोजकों को इस रिक्तता को भरने के लिए अपने संगीतकारों से अतिरिक्त काम लेना पड़ा और दर्शकों को हर्षित का बांसुरी वादन बोनस के रूप में सुनने को मिल गया। 
'ठाकुर' का कुआँ एक दृश्य
हले पृथ्वीराज कपूर मेमोरियल ड्रामेटिक सोसायटी द्वारा वरिष्ठ नाट्य निर्देशक प्रभंजन दीक्षित  द्वारा निर्देशित  'ठाकुर का कुआँ' का मंचन किया। नाटक की अंतर्वस्तु, उस के कुशल रूपांतरण और कलाकारों द्वारा टूट कर किए गए अभिनय ने नाटक को दर्शकों के दिल में सीधा उतार दिया। हालांकि रोशनी का जिस तरह से उपयोग किया गया वह नाटक के संप्रेषण में बाधा उत्पन्न कर रही थी। लेकिन कभी-कभी किसी निर्देशक किसी टूल के प्रति आसक्ति इस अवस्था तक पहुँचा देती है। यह नाटक गाँव की में अछूत जातियों के शोषण की स्थितियों को अपने नंगे स्वरूप में सामने रखते हुए यह स्पष्ट कर रहा था कि जाति व्यवस्था किस तरह सामंती शोषण का सब से मजबूत और अमानवीय औजार है। नाटक ने बार-बार यह याद दिलाया कि दुआजादी के तिरेसठ वर्ष बाद भी हम इस औजार से देश को मुक्त नहीं करा पाए हैं और सामंती शोषण आज भी ग्रामीण जीवन में बरकरार है। 
'ठाकुर का कुआँ' के अभिनेता
दूसरा नाटक के.पी. सक्सेना का 'चोंचू नवाब' था। लेखक और नाटक के नाम से ही स्पष्ट था कि वह एक हास्य प्रस्तुति थी। इसे ग्यारह से तेरह वर्ष के बालक अभिनेताओं ने शरद गुप्ता के निर्देशन में प्रस्तुत किया था। कुशल निर्देशन का परिणाम था कि बालकों ने अपने त्रुटिहीन श्रेष्ठ अभिनय से दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया और सभी का स्नेहपूर्ण प्रशंसा प्राप्त की। अंत में शिवराम के नाटक 'जमीन' के ओम नागर 'अश्क' द्वारा किए गए हाड़ौती रूपांतरण को संवेदना शान्ति नारायण संस्थान द्वारा विजय मैथुल के निर्देशन में प्रस्तुत किया।  यह नाटक बहुत मजबूत है, यह केवल समाज में चल रही शोषण की स्थितियों को ही प्रस्तुत नहीं करता, अपितु उन के प्रतिकार के मार्ग को प्रदर्शित  करता है। यह भी बताता है कि एकल प्रतिकार हमेशा दमन लाता है, लेकिन जब प्रतिकार सामूहिक और संगठित हो तो वह शोषकों के लिए चुनौती बन जाता है और उन्हें पीछे हटने को मजबूर कर सकता है। इस तरह यह शोषितों में संगठन की चेतना का प्रसार का औजार बन जाता है। यही शिवराम के संपूर्ण व्यक्तित्व और कृतित्व की विशेषता भी थी।
शिवराम के पुत्र शशि अलंकरण ग्रहण करते हुए
नाट्य प्रस्तुति के उपरान्त रंगकमल अलंकरण-2010 दिवंगत शिवराम को प्रदान किया गया। इस अवसर पर रास के सभी नाट्यकारों ने घोषणा की कि इस अलंकरण के पहले हकदार शिवराम थे। लेकिन वे स्वयं रास के प्रमुख थे और उन्हें उस पद पर रहते हुए इसे प्रदान करना संभव नहीं था। वस्तुतः यह अलंकरण कोटा के नाट्य कर्मियों की और से उन्हें दिया गया आदर है, उन के प्रति श्रद्धांजलि है। सभी नाट्यकर्मियों की ओर से मुख्य अतिथि बिड़ला ने शिवराम के भाई शायर पुरुषोत्तम  'यक़ीन' और मंझले पुत्र शशि स्वर्णकार को यह अलंकरण सौंपा। ये दोनों भी नाटकों से जुड़े हुए हैं। 
बिड़ला के साथ शशि
मुख्य अतिथि बिड़ला ने अपने समापन भाषण में नाट्यकर्मियों की कला की बहुत प्रशंसा की और कहा कि उन्हें यहाँ से एक नाटक देख कर दूसरे कार्यक्रम में जाना था लेकिन नाटकों ने उन्हें ऐसा बांधा कि वे नहीं जा सके और उन्हें एक कार्यक्रम रद्द् करना पड़ा। अपने संबोधन में वे नाटकों की समाज परिवर्तन की जो भूमिका थी उस के सम्बन्ध में कुछ भी कहने से चूक गये, यह भी कहा जा सकता है कि वे इस विषय पर कहने से एक चतुर राजनीतिज्ञ की तरह कतरा गए, शायद इस लिए कि हो सकता है यह बात समाचार पत्रों में जाए तो  कहीं यथास्थितिवादियों की नाराजगी उन्हें न झेलनी पड़े। 

सोमवार, 8 नवंबर 2010

विजिटिंग कार्ड बनाम बर्डे का न्यौता

ह 1990 के साल के मार्च महिने की चौबीस तारीख थी। मैं अदालत से वापस लौटा ही था। अचानक पहले कॉलबेल बजी, फिर लोहे के मेनगेट के बजने की आवाज आई। मैं देखने बाहर की और लपका तो वहाँ पास ही सेना का एक ट्रक खड़ा था। वह उसी से उतरी लगती थी। एक 6-7 वर्ष की एक सुंदर सी लड़की सजी-धजी खड़ी थी। एक महिला ट्रक से नीचे झाँक रही थी। लड़की के हाथ में मेरा विजिटिंग कार्ड था। तभी ट्रक से एक फौजी अफसर उतरा।पूछने लगा वकील दिनेशराय द्विवेदी का मकान यही है? मैं ने हाँ में सिर हिलाया। लड़की पूछ रही थी -पूर्वा यहीँ रहती है? फौजी अफसर ने बताया कि वह लड़की उस की बेटी है, पूर्वा के साथ पढ़ती है, उसे छोड़ कर जा रहे हैं दो घंटे बाद लौटेंगे। तब तक पूर्वा भी बाहर आ कर अपनी सहपाठिन को ले कर घर में जा चुकी थी।
म अंदर लौटे। वह पूर्वा का जन्मदिन था। वह टॉफियाँ ले कर स्कूल गई थी और अपने सहपाठियों को वितरित की थीं। पर जन्मदिन मनाने के लिए इतना पर्याप्त कैसे हो सकता था। सभी सहपाठियों में से दोस्तों को तो किसी तरह अलग करना था। श्वेत आइवरी शीट पर छप कर आए मेरे नए विजिटिंग कार्ड्स में से कुछ वह अपने साथ स्कूल ले गई थी और अपने दोस्तों को दे कर उन्हें घर आने का न्यौता दे चुकी थी। एक दोस्त आ भी चुकी थी और हमें अब खबर हो रही थी। हम ने सोचा था शाम को बाजार जाएंगे पूर्वा के लिए उपहार खरीदेंगे और वहीं किसी रेस्तराँ में शाम का भोजन करेंगे। पर हमारी योजना तो ध्वस्त हो चुकी थी।तुरंत नयी योजना पर काम आरंभ करना था।
मुझे यह पता करने के लिए कि पूर्वा ने कितने मित्रों को आमंत्रित किया था, उस से जिरह करनी पड़ी। पता लगा कि वह करीब आठ-दस कार्ड दे कर आई है। हमारा अनुमान था कि आधे मित्र तो आ ही जाएंगे। पत्नी ने कहा यदि तीन-चार बच्चे ही हुए तो पार्टी का कोई आनंद नहीं रहेगा। मुहल्ले के कुछ बच्चों को और आमंत्रित किया गया। मैं नमकीन, मिठाइयाँ और केक लेने बाजार दौड़ा। वापस लौटा तो ड्राइंग रूम सजाने के लिए  गुब्बारे-शुब्बारे कर आया, एक-दो मददगारों को भी बोल कर आया कि वे जल्दी पहुँचें। उन दिनों आज के शायर पुरुषोत्तम 'यक़ीन' तब शायर नहीं हुए थे और फोटोग्राफी का स्टू़डियो चलाते थे, उनसे कहता आया कि उन्हें फोटो लेने आना है।  कुछ देर बाद एक और दंपति अपनी दो बेटियों के साथ नमूदार हुए। ये श्री बोहरा थे, इंजिनियरिंग कॉलेज में गणित के अध्यापक। वे भी अपनी बेटियों को छोड़ कर चले गए।
मरे को सजाया गया, केक काटा गया और पार्टी आरंभ हुई और चलती रही। पहला झटका तब लगा जब फौज की गाड़ी पहली लड़की को लेने आ पहुँची। धीरे-धीरे सब चले गए। बाद में बोहरा परिवार से दोस्ती हुई जो आज तक कायम है और पूरे जीवन रहेगी। इस दोस्ती की नींव तो बच्चों ने रखी थी लेकिन उसे परवान चढ़ाया गृहणियों ने। गृहणियाँ सदैव परिवार की धुरी रही हैं। ऐसी ही दो धुरियों पर परिवारों की दोस्ती कायम हो जाए तो स्थायी बन जाती है।
बोहरा और द्विवेदी दंपति

रविवार, 7 नवंबर 2010

पुराने मोहल्ले में दीवाली की राम-राम

ज बहुत थोड़े समय के लिए पुराने मोहल्ले में जाना हुआ। मैं ने पिछली 19 सितम्बर को अपना पुराना घर खाली कर दिया था और अस्थाई रुप से अपने एक मित्र के नवनिर्मित मकान में आ गया था। नए घर में सामान जमाने अपने कार्यालय को काम के लायक बनाने के साथ रोज-मर्रा के कामों और इस बीच तेजी से घटे घटनाक्रम ने बीच में साँस लेने तक की फुरसत नहीं लेने दी। बीच में सिर्फ एक बार डाक देखने गया था कि कोई महत्वपूर्ण डाक तो नहीं है, और केवल निकटतम पड़ौसी से पाँच मिनट बात कर के लौट आया था। तभी से सोचता रहा था कि वहाँ जाऊँ। लेकिन पूरे मुहल्ले के कम से कम पाँच-सात पड़ौसियों से तो मिलना ही होता। जिस से नहीं मिलता, वही शिकायत करता, इस में समय लगता इसी कारण से नहीं जा सका। पहले से नियत था कि आज दिन में कम से कम तीन-चार घंटों के लिए वहाँ जाया जाय। लेकिन परिस्थितियों ने कार्यक्रम को बदल दिया। 
शोभा ने तो जाने से साफ मना कर दिया कि कल-परसों बच्चे वापस जाएँगे और अभी उन के लिए नाश्ता तैयार करना है। वे शोभा-मठरी (शोभा ने मठरी की नयी किस्म ईजाद की है जिसे मैं शोभा-मठरी कहता हूँ, इस का किस्सा फिर कभी) बनाने में जुट गईं। वैभव अपने मित्रों से मिलने चल दिया। शेष बचा मैं और पूर्वा। उसे आई-ब्रॉ बनवानी थी। हमें हिदायत मिली कि हम पूर्वा को लेकर जाएँ और जब तक उस का काम हो तब तक हम बोहरा जी के यहाँ बैठें। बोहरा जी हमारे पुत्री मित्र हैं, यानी हमारी पुत्री की मित्र के पिता (इस का किस्सा भी फिर कभी)। हमने ऐसा ही किया। हाँ वहाँ जाने के पहले हम ने दशहरा  मैदान रुक कर गूजर के यहाँ दूध के लिए बाल्टी रख दी। ताकि वापसी पर लिया जा सके। वहाँ श्रीमती बोहरा कुछ दिन पहले ही चिकनगुनिया से उठी थीं और अभी छोड़े गए जोड़ों के दर्द से जूझ रही थीं। हमने उन का हाल जाना, दीवाली की मिठाई चखी और दिवाली का राम-राम कर के वहाँ से चले। वे होमियोपैथिक उपचार कराना चाहती थीं। हमने उन के लिए डाक्टर तय किया और वहाँ से चले।
गे दीदी का घर, वहाँ हमने भाई-दूज का टीका निकलवाया, जीजाजी से मिले। वहाँ से निकले तो साँझ  हो चुकी थी। दूध लेने का समय हो चुका था। हम पहले दशहरा मैदान गए, वहाँ से दूध लिया। मन किया कि वापस लौट चलें पुराने मुहल्ले में फिर कभी फुरसत से मिलने चलेंगे। लेकिन पूर्वा को महेन्द्र नेह के घर आंटी और भाभियों से मिलना था, हमेवापस अपने पुराने मुहल्ले को निकल पड़े। पूर्वा को महेन्द्र जी के घर छोड़ा और मैं महेन्द्र जी के चार वर्षीय पौत्र आदू को साथ ले कर मिलने निकल पड़ा। मीणा जी, सोनी जी, धैर्यरत्न, निकटतम पड़ौसी जैन साहब मिले। जयकुमार जी घूमने निकले थे उन से मिलना नहीं हो सका। सब के यहाँ मिठाइयाँ चखनी पड़ीं। सब ने मुझ से बेमुरव्वत होने की शिकायत की कि मैं डेढ़ माह तक मिलने तक नहीं आया। सब को फिर से अपने नए मकान का पता बताया और वहाँ आने का न्यौता दिया। अंत में वापस महेन्द्र जी के घर हो कर लौटा। 
दीवाली की राम-राम के लिए हुई इस संक्षिप्त यात्रा में पता लगा कि इस वर्ष किसी के घर मावा/खोया की मिठाई नहीं बनी। जिस के यहाँ थी उस का कहना था कि वह उन की सब से विश्वसनीय दुकान से लाया गया था। यह सब दीवाली से चार माह पहले से काफी मिलावटी और कृत्रिम मावा/खोया पकड़े जाने के कारण था। मैं सोच रहा था कि लोग मावा/खोया बिलकुल बंद कर दें तो अच्छा, इस से कम से कम दूध की प्राप्यता बढ़ जाएगी। सब ने एक बात पूछी कि मेरे नये मकान का निर्माण आरंभ हुआ या नहीं, और कब तक पूरा हो लेगा? मेरे साथ गया आदू पक्का चतुर्वेदी निकला, जहाँ गया वहीं सब से अच्छी मिठाई पर हाथ मारा। हालाँ कि वापसी में उसे जब बताया कि वह मेरे साथ घूम कर लौटा है तो अब चौबे से दुबे हो गया है। उस ने सहर्ष स्वीकार कर लिया कि वह वाकई दुबे हो गया है। हालांकि उन के घर के गेट से बाहर हमारे कदम पड़ते ही उस ने घोषणा कर दी कि वह दुबे नहीं बना है और चौबे ही है।

शनिवार, 6 नवंबर 2010

अवसाद के बीच एक दीपावली

सभी पाठकों और ब्लॉगर मित्रों 
को 
दीपावली पर हार्दिक शुभकामनाएँ !

गभग सब के बाद, बहुत देरी से शुभकामनाएँ व्यक्त करने के लिए क्षमा चाहता हूँ। अनवरत और तीसरा खंबा पर पिछली पोस्टें  3 नवम्बर को गई थीं, उसी में शुभकामना संदेश भी होना चाहिए था। लेकिन तब इरादा यह था कि 4 और 5 नवम्बर को नियमित पोस्टें जाएंगी और तभी शुभकामना संदेश भी उचित रहेगा। लेकिन अपना  सोचा कहाँ होता है? परिस्थितियाँ निश्चित करती हैं कि क्या होना है, और हम कहते हैं "होहिही वही जो राम रचि राखा"। ये राम भी अनेक हैं। एक तो अपने राम हैं जो चाहते हैं कि दोनों ब्लाग पर कम से कम एक पोस्ट तो प्रतिदिन नियमित होना चाहिए, शायद पाठकों के राम भी यही चाहते हों। लेकिन परिस्थितियों के राम इन पर भारी पड़ते हैं।  पर ऐसा भी नहीं कि मेरे राम की उस में कोई भूमिका न हो। परिस्थितियाँ इतनी भी हावी नहीं थीं कि कोई पोस्ट हो ही नहीं सकती थी। मेरे राम ने तीन दिनों में चाहा होता तो यह हो सकता था। कुल मिला कर लब्बोलुआब यह रहा कि परिस्थितियाँ निर्णायक अवश्य होती हैं, लेकिन परिस्थितियाँ अनुकूल होने पर व्यक्तिगत प्रयास न हो तो इच्छित परिणाम  प्राप्त नहीं किया जा सकता। हम यूँ कह सकते हैं कि किसी इष्ट के लिए पहले परिस्थितियाँ अनुकूल होनी चाहिए और फिर इष्ट को प्राप्त करने का वैयक्तिक प्रयास भी होना चाहिए।  
पिछले दो माह बहुत अजीब निकले हैं। एक तो मकान का बदलना रहा, जिस ने दिनचर्या को मथनी की तरह मथ डाला। दूसरे दो माह पहले एक निकटतम मित्र परिवार में ऐसा हादसा हुआ जिस के होने की संभावना थी हम रोकना चाहते थे, लेकिन चीजें प्रयास के बावजूद भी काबू में नहीं आ सकीं और घटना घट गई। कहानी लंबी है, लेकिन विस्तार के लिए अनुकूल समय नहीं। मित्र के पुत्र और पु्त्रवधु के बीच विवाद था, पुत्रवधु मित्र को लपेटने की कोशिश में थी। मित्र बचना चाहते थे। इस के लिए वे पुलिस के परिवार परामर्श केन्द्र भी गए। लेकिन एक रात पु्त्र के कमरे से आवाजें आई, मित्र वहाँ पहुँचे तो वह मृत्यु से जूझ रहा था। पुत्रवधु ने बताया कि उन के पुत्र ने फाँसी लगा कर आत्महत्या का प्रयास किया है, उस ने फाँसी काट दी इस लिए बच गया।  अनेक प्रश्न थे, कि पुत्र-वधु ने अपने पति को फाँसी लगाने से क्यों न रोका? वह चिल्लाई क्यों नहीं? एक ही दीवार बीच में होने के बावजूद भी वह सहायता के लिए अपने सास ससुर के पास क्यों नहीं गई? फाँसी काट देने के बाद भी अपने अचेत पति को ले कर कमरे के दरवाजे की कुंड़ी खोल अकेले स्यापा क्यों करती रही? प्रश्नों का उत्तर तलाशने का समय नहीं था। मित्र अपने पुत्र को ले कर अस्पताल पहुँचे, दो दिनों में उस की चेतना टूटी। पुत्र बता रहा था कि उसे पहले कुछ खाने में दे कर अचेत किया गया और फिर पत्नी ने ही उसे गला घोंट कर मारने की कोशिश की। जब सब अस्पताल में थे तो अगली सुबह पुत्रवधु का पिता आया और पुत्रवधु को उस के सारे सामान सहित अपने साथ ले गया। घर पर पुत्रवधु अकेली थी तो मकान के ताला और लगा गया।
मेरे और मित्र के कुछ समझ नहीं आ रहा था। हमने अपने स्तर पर अन्वेषण किया तो जाना कि मित्र के पुत्र का बयान सही है। पुलिस को रिपोर्ट दी गई, लेकिन पूरे माह कोई कार्यवाही नहीं हुई। अदालत को शिकायत की गई, अदालत ने शिकायत पर मुकदमा दर्ज कर अन्वेषण आरंभ कर दिया। इस बीच पता लगा कि पुत्र-वधु ने भी उत्पीडन और अमानत में खयानत के लिए धारा 498-ए और 406 भा.दं.सं. का मुकदमा पुलिस में दर्ज करा दिया है। मित्र अपने सारे परिवार के साथ तीन बार अन्वेषण में सहयोग के लिए थाने उपस्थित हो गये। लेकिन पुलिस अन्वेषण अधिकारी टालता रहा। अचानक उस ने पिछले रविवार को उन्हें थाने बुलाया। दोनों पक्षों में समझौते का नाटक किया। दबाव यह था कि दोनों अपनी-अपनी रिपोर्टें वापस ले लें और साथ रहें। लेकिन पति इस के लिए तैयार नहीं था। उस का कहना था कि जिस पत्नी ने उस की जान लेने की कोशिश की उस के साथ वह किस भरोसे से रह सकता है? थाने में किसी सिपाही ने कान में कहा कि अन्वेषण अधिकारी ने पैसा लिया है वह आज गिरफ्तारी करेगा। पुलिस ने पति को गिरफ्तार कर लिया, बावजूद इस के कि स्वयं अन्वेषण अधिकारी यह मान रहा था कि उस पर आरोप मिथ्या हैं। लेकिन 498-ए का आरोप है तो गिरफ्तार तो करना ही पड़ेगा। मेरा उस से कहना था कि सब पिछले पन्द्रह दिनों से थाने आ रहे थे तो यह कार्यवाही एक सप्ताह पहले और दिवाली के एक सप्ताह बाद भी की जा सकती थी। लेकिन अभी ही क्यों की जा रही है? स्पष्ट था कि सिपाही द्वारा दी गई सूचना सही थी।
मित्र हमेशा मेरी मुसीबत में साथ खड़े रहे। मुझे साथ खड़े रहना ही था। मैं ने अपनी पूरी ताकत लगा दी। लेकिन दीपावली का अवकाश आरंभ होने के पहले मित्र के पुत्र को जमानत पर बाहर नहीं ला सका। उस के अलावा परिवार के छह और सदस्यों का नाम प्रथम सूचना रिपोर्ट में था। अन्वेषण अधिकारी ने उन्हें गिरफ्तार नहीं किया था और कह रहा था कि उन के विरुद्ध मामला नहीं बन रहा है। लेकिन फिर किसी सिपाही ने सलाह दी की उन्हें घर छोड़ देना चाहिए। गिरफ्तारी कभी भी हो सकती है। नतीजे में मित्र को घर छोड़ कर बाहर जाना उचित लगा और वे चले गए। घर दीवाली पर सूना हो गया। मेरा मन भी अवसाद से घिर गया। पिछले पूरे सप्ताह जिस भाग-दौड़ से पाला पड़ा उस ने थका भी दिया था। 
धर अवकाश आरंभ होते ही दोनों बच्चे घर आए। मेरा मन अवसाद से इतना भरा था कि कुछ करने का मन ही नहीं कर रहा था। दीवाली की रीत निभाने को श्रीमती शोभा रसोई में पिली पड़ी थीं। बच्चों ने घर को सजाया, और दीपावली मन गई। अभी भी अवसाद दूर नहीं हो पा रहा है, शायद इस से तब निजात मिले जब मित्र का पुत्र जमानत पर छूट जाए और शेष परिवार को अग्रिम जमानत का लाभ मिल जाए।

बुधवार, 3 नवंबर 2010

कहीं आप धनतेरस के चक्कर में गैरजरूरी खरीददारी तो नहीं करने जा रहे?


ल सुबह अखबार सामने थे, एक स्थानीय अखबार में यह खबर थी ........
  

 हो सकता है आप ने भी मेरी तरह यह बात नोट की हो कि हर माह कम से कम दो बार ऐसी खबरें अखबारों के मुखपृष्ठ पर अपना स्थान बनाती हैं। मैं भी इसे खबर कह रहा हूँ, पर क्या वाकई यह एक खबर है। वस्तुतः इस में खबर जैसी कोई चीज नहीं है। केवल एक तथ्य है कि इस बार धनतेरस बुधवार को पड़ रही है और बुधवार को पड़ने वाली अगली धनतेरस चौदह वर्ष बाद 30 अक्टूबर 2024 आएगी। इस तथ्य का किसी के लिए कोई महत्व नहीं है। लेकिन हमारी बाजार व्यवस्था ने इस तथ्य को एक खबर बना कर अखबार और अन्य समाचार माध्यमों में प्रस्तुत किया है। इस का उद्देश्य पाठकों को खरीददारी के लिए प्रेरित करना है। यदि खरीददार बाजार में नहीं आएगा तो बाजार कैसे चलेगा। ये खबरें हर एक-दो सप्ताह के बाद आप समाचार पत्रों और अन्तर्जाल के समाचार परोसने वाले वेब पृष्टों पर देख सकते हैं।

 
 मैं ने कल सुबह की खबर को पढ़ने के बाद ' खरीददारी के शुभ मुहूर्त' वाक्य को गूगल में खोजा और 0.13 सैकंड में 987 परिणाम प्राप्त किए। हालांकि गूगल खोज के लिए यह संख्या अधिक नहीं है। लेकिन यह इस बात को भी करता है कि इस तरह के समाचारों का चलन खास तौर पर एक-दो वर्ष में ही सामने आया और तेजी से बढ़ता चला गया। इसे बड़े कॉरपोरेट समाचार पत्रों ने आरंभ किया और उस की नकल स्थानीय समाचार पत्र भी करने लगे। यह मौजूदा मंदी से निपटने के लिए ईजाद किए गए तरीकों में से एक है। जो पाठकों को गैर जरूरी खरीददारी करने के लिए प्रेरित करता है। जिस चीज की उपभोक्ता को आवश्यकता होती है वह तो खरीदता ही है। इस तरह की खबरें गैर जरूरी खरीददारी को प्रेरित करती हैं। यह विक्रय के अमरीका द्वारा ईजाद किए गए उस तरीके का एक अंग है जो यह सिखाता है कि माल इस लिए नहीं बिकता कि उपभोक्ता को उस की आवश्यकता है। बल्कि उत्पादकों को चाहिए कि वे अपने विक्रय अभियानों के माध्यम से लोगों को महसूस कराएँ कि उन्हें उन के उत्पाद की आवश्यकता है। 
मैं तो दीवाली के त्यौहार के पहले दिन आप से यही पूछना चाहता हूँ कि आप भी तो आज धनतेरस के शुभ मुहूर्त में कोई गैर जरूरी वस्तु खरीदने तो नहीं जा रहे हैं। मेरी मैं बता दूँ कि मैं तो जरूरी वस्तु की खरीद भी आज के दिन टालना चाहूँगा। बाजार में भीड़ बहुत है, दुकानदार को आप की सुनने की फुरसत नहीं और वह भीड़ का लाभ उठा कर आप को अधिक कीमत ले कर भी घटिया से घटिया माल टिकाने को बेताब है।

सोमवार, 1 नवंबर 2010

क्या है ब्लागीरी ?

पिछली पोस्ट में मैं ने अपनी व्यस्तता  और अपनी अनुपस्थिति का जिक्र किया था। जिस से बेकार में मित्रों और पाठको के मन में संदेह जन्म न लें। सोचा था फिर से नियमित हो लूंगा। लेकिन प्रयत्न कभी भी परिणामों को अंतिम रूप से प्रभावित नहीं करते, असल निर्णायक परिस्थितियाँ होती हैं। कल सुबह से ही जिस मसले में उलझा, अभी तक नहीं सुलझ पाया। कल सुबह से व्यस्त हुआ तो रात एक बज गया। सुबह थकान पूरी तरह दूर न हो पाने के बावजूद समय पर उठ कर आज के मुकदमों की तैयारी की और नये कार्यभारों को पूरा करता हुआ अदालत पहुँचा। अभी शाम को घर पहुँचा हूँ जबरन पाँच मिनट आँखें मूंद कर लेटा। सोचता था कम से कम पन्द्रह मिनट ऐसे ही लेटा रहूँ। लेकिन तब तक शोभा ने कॉफी पकड़ा दी। मैं उठ बैठा। बेटे को तीन माह बाद बंगलूरू से घर लौटे दो दिन हो गये हैं लेकिन उस से बैठ कर फुरसत से बात नहीं हो सकी है। बेटी घंटे भर बाद कोटा पहुँच रही है उसे लेने स्टेशन जाना है। कॉफी के बाद बचे समय में यह टिपियाना पकड़ लिया है।
म सोचते हैं कि हमें ब्लागीरी के लिए फुर्सत होनी चाहिए, मन को भी तैयार होना चाहिए और शायद मूड भी। पर यदि इतना सब तामझाम जरूरी हो तो मुझे लगता है कि वह ब्लागीरी नहीं रह जाएगी। ब्लागीरी तो ऐसी होना चाहिए कि जब कुंजी-पट मिल जाए तभी टिपिया लो, जो मन में आए। बनावटी नहीं, खालिस मन की  बात हो, तो वह ब्लागीरी है। 
प का क्या सोचना है?