@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत

मंगलवार, 18 मई 2010

अठारह मई का वह दिन !!!

ठारह मई का वह दिन कैसे भूला जा सकता है? दो बरस पहले से जिसे देखने और मिलने की आस लगी थी वह इस दिन पूरी होने वाली थी।

हुआ यूँ था ............ गर्मी की छुट्टियां थीं और मौसी की लड़की की शादी। सारा परिवार उस में आया था। सरदार, बाबूजी. माँ, बहनें और छोटे भाई भी। शादी सम्पन्न हुई तो सरदार ने अम्माँ से पूछा मैं मामाजी के यहाँ हो आऊँ? अम्माँ मुस्कुराई और कहा -बाबूजी से पूछो? वह जानती थी कि सरदार बाबूजी से पूछने में कतराता है। लेकिन उस दिन पूछ ही लिया। वह लगभग हर साल गर्मी में कुछ दिन मामाजी के यहाँ गुजारता था। पर अब की वहाँ गए दो बरस हो गए थे और उसे ननिहाल की याद जोरों से सता रही थी। वहाँ गर्मियों में बिताए दो हफ्ते पूरे साल के लिए उसे तरोताजा कर देते थे। रोज सुबह नदी स्नान और तैरना, दिन में पढ़ने को खूब किताबें, शाम फिर नदी पर गुजरती। रात होते ही मंदिर में जमती संगीत की महफिल, मामाजी पक्की शास्त्रीय बंदिशें गाते। बाबूजी से पूछने पर उन्हों ने सख्ती से मना कर दिया –नहीं, इस बार हम सब वहाँ जा रहे हैं। तुम बाराँ जाओगे। वहाँ दाज्जी अकेले हैं और परसों गंगा दशमी है। मन्दिर कौन सजाएगा?

मामा जी के यहाँ जाने की सरदार की योजना असफल हो गई थी, मन में बहुत हताशा थी और गुस्सा भी। अब उसे दूसरे दिन सुबह वापस अपने शहर लौटना था। पर अब मौसी के यहाँ रुकने का मन नहीं रहा। सरदार का मित्र ओम भी शादी में साथ था, उसे उसी समय साथ लौटने को तैयार किया और दोनों चल दिए। पच्चीस किलोमीटर की दूरी बस से तय की, रेलवे स्टेशन तक की। वहाँ पहुँचने पर पता लगा ट्रेन दो घंटे लेट थी। अब क्या करें? स्टेशन से कस्बा डेढ़ किलोमीटर था जहाँ एक अन्य मित्र पोस्टेड था। स्टेशन के बाहर की एक मात्र चाय-नाश्ते की दुकान पर अपनी अटैचियां जमा कीं और पैदल चल दिये कस्बा।

वहाँ मित्र मिला, चाय-पानी हुआ, बातों में मशगूल रहे। ट्रेन का वक्त होने को आया तो वापस चल दिये, स्टेशन के लिए। कस्बे से बाहर आते ही ट्रेन दिख गई। उसे भी स्टेशन तक पहुँचने में एक किलोमीटर की दूरी थी और इन दोनों को भी। ट्रेन छूट जाने का खतरा सामने था। फिर वापस मौसी के यहाँ जाना पड़ता रात बिताने। सुबह के पहले दूसरी ट्रेन नहीं थी। जिस तरह सरदार वहाँ से गुस्से में रवाना हुआ था, उस का वापस वहीं लौटने का मन न था। तय किया कि ट्रेन पकड़ने के लिये दौड़ा जाए। दोनों कुछ दूर ही दौड़े थे कि ओम के पैरों ने जवाब देना शुरु कर दिया। सरदार ने उस के हाथ में अपना हाथ डाल जबरन दौड़ाया। चाय-नाश्ते वाली दुकान के नौकर ने दोनों को दौड़ता देख उन की अटैचियां सड़क पर ला रखी। सरदार ने दोनों अटैचियाँ उठाईं और प्लेटफॉर्म की तरफ दौड़ा। ट्रेन चल दी। डिब्बे के एक दरवाजे में ओम को चढ़ाया, दूसरे व तीसरे में अटैचियाँ और चौथे में सरदार चढ़ा। अन्दर पहुँच कर सब एक जगह हुए। दोनों की साँसें फूल गई थीं, दो स्टेशन निकल जाने तक मुकाम पर नहीं आयीं। आज सरदार उस वाकय़े को स्मरण करता है तो काँप उठता है, अपनी ही मूर्खता पर। उस ने ओम को जबरन दौड़ाया था। उस की क्षमता से बहुत अधिक। अगर उसे कुछ हो गया होता तो?

सी साल सरदार ने बी.एससी. के दूसरो वर्ष में दाखिला लिया। कॉलेज का वार्षिकोत्सव का अंतिम दिन था। कॉलेज से लौटा तो साथ कुछ इनाम थे, छोटे-छोटे, कुछ प्रतियोगिताओं में स्थान बना लेने के स्मृति चिन्ह। उन्हीं में था एक मैडल। कॉलेज के इंटर्नल टूर्नामेण्ट की चैम्पियन टीम के कप्तान के लिये। माँ और तो सभी चीजें जान गयी, लेकिन मैडल देख पूछा -ये क्या है?

“घर की शोभा”, सरदार का जवाब था।

जवाब पर छोटी बहन हँस पड़ी। ऐसी कि उस से रोके नहीं रुक रही थी। माँ ने उसे डाँटा। वह दूसरे कमरे में भाग गई। 

सरदार समझ नहीं पाया उस हँसी को। वह हँसी उस के लिये एक पहेली छोड़ गयी। उसे सुलझाने में सरदार को कई दिन लग गए। सुलझी तो पता लगा जिस दिन उस ने खुद के साथ ओम को दौड़ाया था। उस के दूसरे दिन मामाजी के यहाँ जाने के रास्ते के एक कस्बे में बाबूजी. माँ, बहनें और छोटे भाई किसी के मेहमान बने थे और सरदार की दुल्हिन बनाने के लिए उस परिवार की सबसे बड़ी बेटी देख आए थे। जब सरदार को पता लगा तो वह उस के बारे में लोगों से जानकारियाँ लेता रहा। कल्पना में उस के चित्र गढ़ता रहा, अब उसे देखने और मिलने का दिन आ गया था.....


निकासी निपटी तो आधी रात हो गई थी। तारीख सत्रह से अठारह हो चुकी थी। बारात के लिए बस आ चुकी थी। सरदार चाहता था कि कुछ खास दोस्त बारात में जरूर चलें। सब से कह भी चुका था। पर वे नहीं आए। जो दोस्त साथ गए उन में दो-चार हम उम्र थे तो इतने ही बुजुर्ग भी। बाराती बस में अपनी-अपनी जगह बैठ चुके थे।
बस में सरदार के लिए ही सीट न बची थी। एक दो बुजुर्गों ने उसे अपना स्थान देना चाहा पर वह अशिष्टता होती। एक पीपे में सामान का था। उसे ही सीटों के बीच रख कर बैठने की जगह बनाई ससुराल तक का पहला सफर किया। ऐसे में सोने का तो प्रश्न ही न था। पास की सीट पर मामा जी और एक बुजुर्ग मित्र वर्मा जी बैठे थे। बस रूट की पुरानी बस थी, जिस के ठीक बीच में एक दो इंच की दरार थी ऐसा लगता था दो डिब्बों को जोड़ दिया हो और बीच में माल भरना छूट गया हो। जब भी वर्मा जी सोने लगते, मामाजी उन्हें जगा देते, कहते वर्मा जी आप पीछे के हिस्से में हैं, देखते रहो, अलग हो गया तो बरात छूट जाएगी। भोर होने तक बस चलती रही। सड़क के किनारे के मील के पत्थर बता रहे थे कि नगर केवल चार किलोमीटर रह गया है। तभी धड़ाम......! आवाज हुई और कोई तीन सौ मीटर दूर जा कर बस रुक गई। शायद बस से कुछ गिरा था। जाँचने पर पता लगा कि बस के नीचे एक लंबी घूमने वाली मोटी छड़ (ट्रांसमिशन रॉ़ड) होती है जो इंजन से पिछले पहियों को घुमाती है वह गिर गई थी। बस का ड्राइवर और खल्लासी उसे लेने पैदल पीछे की ओर चल दिए। उजाला हो चुका था, शीतल पवन बह रही थी। यह सुबह के टहलने का समय था। सरदार और उस के कुछ हम उम्र दोस्त पैदल नगर की ओर चल दिए। एक किलोमीटर चले होंगे कि बस दुरुस्त हो कर पीछे से आ गई। उस में बैठ गए।

सुबह से दोपहर बाद तक बारातियों का चाय-नाश्ता, नहाना, सजना, भोजन और विश्राम चलता रहा। शाम चार बजे अगवानी हुई और उस के बाद बारात का नगर भ्रमण। पाँच बजे सरदार की घुड़चढी हुई। नगर घूमते आठ बज गए। बारात का अनेक स्थानों पर स्वागत हुआ। कहीं फल, कहीं ठण्डा पेय कहीं कुल्फी। मालाएँ तो हर जगह पहनाई गई। हर मोड़ पर दूल्हे के लिए कोई न कोई पान ले आता। घोड़ी पर बैठे बैठे थूकना तो असभ्यता होती, सब सीधे पेट में निगले जा रहे थे। सरदार सोच रहा था, आज पेट, आँतों और उस से आगे क्या हाल होगा? साढे तीन घंटे हो चुके थे, अब तो लघुशंका हो रही थी और उसे रोकना अब दुष्कर हो रहा था। एक स्थान पर स्वागत कुछ तगड़ा था, आखिर वहाँ घोड़ी से नीचे उतरने की जुगत लग ही गई। वहाँ एक सजे हुए तख्त पर दूल्हे को मसनद के सहारे बैठाने की व्यवस्था थी। पर सरदार ने अपने एक मित्र से कहा -बाथरूम? उस ने किसी और को कहा, तब बाथरूम मिला। वहाँ खड़े-खड़े दस मिनट गुजर गए। लघुशंका पेशियों के जंगल में कहीं फँस गयी थी और निकलने का नाम ही नहीं ले रही थी। तीन घंटे से रोकते-रोकते रोकने वाली पेशियाँ जहाँ अड़ाई गई थीं जाम हो चुकी थीं और वापस अपनी पूर्वावस्था में लौटने को तैयार न थी। अब बाथरूम में अधिक रुकना तो मुनासिब न था। सरदार ने पैंट फ्लाई के बटन बंद किए और जैसे गया था वैसे ही बाहर लौट आया।

नगर भ्रमण दुल्हन के मकान के सामने भी पहुँचा। वहाँ महिलाओं ने खूब स्वागत किया। हर महिला टीका करती, नारियल पर कुछ रुपये देती। सरदार वहाँ तलाश करता रहा शायद कहीं से उसे उस की होने वाली जीवन साथी देख रही हो और उसे दिख जाए। वह दिखाई नहीं ही दी, दिखी भी हो तो चीन्हने का संकट भी था, न उसे पहले देखा था और न उस का चित्र। साढ़े दस बजे वापस जनवासे में लौटे तो बाराती सीधे भोजन पर चले गए। सरदार ने यहाँ भी आते ही कोशिश की लेकिन शंका सरकी तक नहीं, फँसी रही। उस से भोजन के लिए कहा जा रहा था। पर मन और शरीर दोनों शंका में उलझे थे। पता लगा कच्चे आम का शरबत (कैरी का आँच) बना है। बस वही दो-तीन गिलास पिया तो पेशियाँ नरम पड़ीं और शंका को जाने का अवसर मिला। कुछ देर विश्राम किया। कलेंडर में तारीख बदल कर उन्नीस मई हो चुकी थी। साईस जनवासे के बाहर मैदान में दूल्हे को तोरण और भाँवर पर ले जाने के लिए फिर से घोड़ी को तैयार कर रहा था............ (आगे पढ़ें)

सोमवार, 17 मई 2010

'अग्नि देवता' -यादवचंद्र के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" का चतुर्थ सर्ग

नवरत के पिछले अंकों में आप यादवचंद्र जी के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" के तीन सर्ग पढ़ चुके हैं। इन कड़ियों को ऊपर दिए गए लिंक पर क्लिक कर के पढ़ा जा सकता है। इस काव्य का प्रत्येक सर्ग एक पृथक युग का प्रतिनिधित्व करता है। युग परिवर्तन के साथ ही यादवचंद्र जी के काव्य का रूप भी परिवर्तित होता जाता है।  इसे  आप इस नए सर्ग को पढ़ते हुए स्वयं अनुभव करेंगे। आज इस काव्य का चतुर्थ सर्ग "अग्नि देवता" प्रस्तुत है ......... 


परंपरा और विद्रोह  
* यादवचंद्र *

चतुर्थ सर्ग

'अग्नि देवता'


पत्थरों के खींच ढोके
कन्दरा के द्वार भिड़ दो


हो गया सुनसान 
जंगल सो गया
बिलकुल अंधेरा हो गया ........


हिम का निठुर आघात
हिंसक पशु बिचरते, देख --


भीषण रात
कितनी क्रूर
सुन्दर प्रात
मुझ से दूर ....


पंजे खोल कर
मृग शावकों पर
टूटते हैं शेर
नन्हें गीदड़ों को, देख --
बैठे भेड़िये हैं घेर .....
मानव देखता है
झाँक प्रस्तर द्वार 
(जिव्हा चटचटाता)
माँस, निज आहार


पर अफसोस 
निष्फल रो....ष
भीषण रा.....त
फिर आघा....त !

संघर्षण विचारों का 
चली आँधी
चले तूफाँ
अमंगल स्वर हुए
हू..........ऊआँ
गहन वन में
भरा धुआँ
कड़क कर 
टूटती हैं बिजलियाँ
आकाश फटता है
ध का ध क्
गहन जंगल - पहाड़ों पर
च टा च ट
क्या चटकता है ?


करोड़ों सूर्य उतरे हैं
जमीं की क्या नमी हरने ?
रहे हैं भेड़िए सब भाग !
हिंसक पशु लगे मरने !
....    ......    ......  ........


धधकती जा रही ज्वाला
धधकता जा रहा जंगल
अहर्निश.... !  है कभी मंगल
अमंगल से कभी हो त्रस्त
भागा जा रहा प्रतिपल
यहाँ से प्रान्त, प्रान्तर में


दिशाओं, देश देशों में
अनेकों रुप - वेशों में
प्रगतिमय मनुज का विस्ता......र
युग पर युग रहे हैं तिर.....
न अब अवरुद्ध उन के द्वा.....र
करता यज्ञ.....
स्वर में बांध अपनी भावनाएँ
गा रहा है प्रज्ञ
वेदों की ऋचाएँ


हे अनंग
अग्नि देव
पाहि माम् !.......


सु--अग्नि देवता बरो
मुझे प्रसन्न तुम करो
प्रदीप्त अंतरिक्ष में
हुए महानता कढ़ो


विभिन्न रूप राशि में
प्रकट इला - प्रदेश में
हरो तिमिर विभीषिका
समक्ष,  रुद्र वेष में


अरी अरणि अरण्य की 
हताश मत मुझे करो 
प्रसन्न हो कृपा करो
दया करो, जलो' जलो


प्रकाश दायिनी ऊषा
हरो अमा, हरो निशा
प्रदान दिव्य नेत्र कर
दिखा पड़ाव, पुर, दिशा


बनो अनार्य के लिए 
विनाश, मृत्यु - दान हे !
अ - जीत आर्य के लिए 
करो अभय प्रदान हे !


रुचिर सुअन्न, सोम लो
प्रभूत तेजवान हे !
ऋचा गिरा सुना रही
उठो, मरूत - वितान हे !


प्रजापति ! तुझे प्रजा
पुकारती समिद्ध हो
पवित्र मथ रहे तुझे
मुझे प्रसिद्धि, सिद्धि दो


मृणाल - डाल - सी धरा-
गगन, मिला रही लपट
धुआँ उठा रही घटा
वे, बिजलियाँ रही चमक


अवाध्य अग्नि देव की 
विमा वहाँ रही दमक
कि, इन्द्रदेव अग्नि से
मिले समोद उठ लपक


धरा कृतार्थ हो गई
कि स्वर्ग अग्नि देव ने
मिला दिया, दिखा दिया
अहा, प्रकाश देव ने


न त्रस्त अब मनुष्य के 
विकासमय सबल चरण
खुले कि युग युगान्त से 
उलझ रहे चपल चरण

^^^^^^^^^^^^^^^^^^


मनोजवा    सुलोहिता
सुनील धूम की शिखा
गिरा कराल काल सी
अनार्य पर बढ़ा, दिखा


अहं नमामि हव्यवाह,
लो पवित्र अश्व - मांस
दो वरद प्रसस्त हस्त
आर्य छत्र पर दिवांशु


दिशा - दिशा
चमत्कृता
सविता की आरती !
शून्य बीच 
रत्न दीप
कौन चली बारती !


हे अनंग अग्नि देव
औषधिः में विद्यमान
चकमक के घर्षण में 
ज्योति, तेज, दिव्यज्ञान


अर्ध, दीप, पुष्प, मन्त्र
लो महान स्वर्गयान
हे कृशानु जाति वेद
पाहिमाम् ! पाहिमाम् !

प्रबंध काव्य 'परम्परा और विद्रोह' का
'अग्नि देवता' नाम का चतुर्थ सर्ग समाप्त

रविवार, 16 मई 2010

वानर से नर और लुटेरी अर्थव्यवस्था से पशुपालन तक

पेड़ों पर चढ़ने वाले एक वानर-दल से मानव-समाज के उदित होने से निश्चय ही लाखों वर्ष - जिन का पृथ्वी के इतिहास में मनुष्य-जीवन के एक क्षण से अधिक महत्व नहीं है, गुजर गए होंगे। परन्तु उस का उदय हो कर रहा। और यहाँ फिर वानर-दल एवं मानव-समाज मं हम क्या विशेष अंतर पाते हैं? अन्तर है, श्रम । वानर-दल अपने लिए भौगोलिक अवस्थाओं द्वारा अथवा पास-पड़ौस के अन्य वानर-दलों के प्रतिरोध द्वारा निर्णीत आहार-क्षेत्र में ही आहार प्राप्त कर के ही संतुष्ट था। वह नए आहार-क्षेत्र प्राप्त करने के लिए नयी जगहों में जाता था और संघर्ष करता था। परन्तु ये आहार क्षेत्र प्रकृत अवस्था में उसे जो कुछ प्रदान करते थे, उस से अधिक इन से कुछ प्राप्त करने की उस में क्षमता न थी। हाँ, उस ने अचेतन रूप से अपने मल-मूल द्वारा ही मिट्टी को उर्वर अवश्य बनाया। सभी संभव आहार क्षेत्रों पर वानर-दलों द्वारा कब्जा होते ही वानरों की संख्या अधिक से अधिक यथावत रह सकती थी। परंतु सभी पशु बहुत-सा आहार बरबाद करते हैं, इस के अतिरिक्त वे खाद्य पूर्ति की आगामी पौध को अंकुर रूप में ही नष्ट कर देते हैं। शिकारी अगले वर्ष मृग-शावक देने वाली हिरणी को नहीं  मारता, परन्तु भेड़िया उसे मार डालता है। तरु-गुल्मों के बढ़ने से पहले ही उन्हें चर जाने वाली यूनान की बकरियों ने देश की सभी पहाड़ियों की नंगा बना दिया है। पशुओं की यह लुटेरू अर्थव्यवस्था उन्हें सामान्य खाद्यों के अतिरिक्त अन्य खाद्यों को अपनाने को मजबूर कर के पशु-जातियों के क्रमिक रूपांतरण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है, क्यों कि उस की बदौलत उन का रक्त भिन्न रासायनिक संरचना प्राप्त करता है और समूचा शारीरिक गठन क्रमशः बदल जाता है। दूसरी ओर पहले कायम हो चुकने वाली जातियाँ धीरे-धीरे विनष्ट हो जाती हैं। इस में कोई संदेह नहीं है कि इस लुटेरू अर्थ व्यवस्था ने वानर से मनुष्य में हमारे पूर्वजों के संक्रमण में प्रबल भूमिका अदा की है। 
बुद्धि और अनुकूलन-क्षमता में औरों से कहीं आगे बढ़ी हुई वानर-जाति में इस लुटेरू अर्थव्यवस्था का परिणाम इस के सिवा और कुछ न हो सकता था कि भोजन के लिए इस्तेमाल की जाने वाली वनस्पतियों की संख्या लगातार बढ़ती जाए और पौष्टिक वनस्पतियों के अधिकाधिक भक्ष्य भागों का भक्षण किया जाए। सारांश यह कि इस से भोजन अधिकाधिक विविधतायुक्त होता गया और इस के परिणामस्वरूप शरीर में ऐसे पदार्थ प्रविष्ट हुए, जिन्हों ने वानरों के मनुष्य में संक्रमण के लिए रासायनिक आधार का काम किया। परंतु अभी यह सब इस शब्द के अर्थ में श्रम नहीं था। श्रम औजार बनाने के साथ आरंभ होता है हमें जो प्राचीनतम औजार- वे औजार जिन्हें प्रागैतिहासिक मानव की दाय वस्तुओं के आधार पर तथा इतिहास में ज्ञात प्राचीनतम जनगण एवं आज की जांगल से जांगल जातियों की जीवन पद्धति के आधार पर हम प्राचीनतम कह सकते हैं -मिले हैं, वे क्या हैं? वे शिकार और मझली मारने के औजार हैं जिन में से शिकार के औजार आयुधों का भी काम देते थे। परंतु शिकार और मझली मारने की वृत्ति के लिए यह पूर्वमान्य है कि शुद्ध शाकाहार से उस के साथ-साथ संक्रमण की प्रक्रिया में यह एक और महत्वपूर्ण कदम है। माँसाहार में शरीर के उपापचयन के लिए दरकार सभी सब से अधिक आवश्यक तत्व प्रायः पूर्णतः तैयार मिलते हैं इस से पाचन के लिए दरकार समय की ही बचत नहीं हुई, अपितु वनस्पति-जीवन के अनुरूप अन्य शारीरिक विकास की प्रक्रियाओं के लिए दरकार समय भी घट गया और इस प्रकार पशु-जीवन की, इस शब्द के ठीक अर्थों में, सक्रिया अभिव्यंजना के लिए अधिक समय, सामग्री तथा शक्ति का लाभ हुआ।
विकसित होता मानव जितना ही वनस्पति जगत से दूर रहता गया, उतना ही वह पशु से ऊँचा उठता गया। जिस तरह मांसाहार के संग शाकाहार के अभ्यस्त होने के साथ जंगली बिल्लियाँ और कुत्ते मानव के सेवक बन गए, ठीक उसी तरह शाकाहार के साथ-साथ मांसाहार को अपनाने से विकसित होते मानव को शारीरिक शक्ति एवं आत्मनिर्भरता प्राप्त करने में भारी मदद मिली। परन्तु मांसाहार का सब से अधिक प्रभाव मस्तिष्क पर पड़ा। मस्तिष्क को अपने पोषण और विकास के लिए आवश्यक सामग्री अब पहले से कहीं अधिक प्रचुरता से प्राप्त होने लगी, अतः अब वह पीढ़ी दर पीढ़ी अधिक तेजी और पूर्णता के साथ विकास कर सकता था। हम शाकाहारियों का बहुत आदर करते हैं, परन्तु हमें यह मानना ही पड़ेगा कि मांसाहार के बिना मनुष्य का आविर्भाव असंभव होता। हाँ, मांसाहार के कारण ही सभी ज्ञात जनगण यदि किसी काल में नरभक्षी बन गए थे (अभी दसवीं शताब्दी तक बर्लिनवासियों के पूर्वज, वेलेतोबियन या बिल्जियन लोग अपने माँ-बाप को मार कर खा जाया करते थे) तो आज इस का महत्व नहीं रह गया है।  
मांसाहार के फलस्वरूप निर्णायक महत्व रखने वाले दो नए कदम उठाए गए- मनुष्य ने अग्नि को वशीभूत किया। दूसरे पशुपालन आरंभ हुआ। पहले के फलस्वरूप पाचन प्रक्रिया और संकुचित बन गयी क्यों कि इस की बदौलत मानव-मुख को मानो पहले से ही आधा पचा हुआ  भोजन मिलने लगा। दूसरे ने मांस की पूर्ति का शिकार के अलावा एक नया, अधिक नियमित स्रोत प्रदान कर के मांस की सप्लाई को अधिक प्रचुर बना दिया। इस के अतिरिक्त दूध और दूध से बनी वस्तुओं के रूप में उस ने आहार की एक नयी सामग्री प्रदान की, जो अपने अवयवों की दृष्टि से उतनी ही मूल्यवान थी जितना कि मांस। अतः ये दोनों ही नयी प्रगतियाँ सीधे-सीधे मानव की मुक्ति का नया साधन बन गयीं। उन के अप्रत्यक्ष परिणामों को यहाँ विशद विवेचना करने से हम विषय से बहुत दूर चले जाएँगे, हालाँकि मानव और समाज के विकास के लिए उन का भारी महत्व है।

फ्रेडरिक एंगेल्स की पुस्तक 'वानर से नर बनने में श्रम की भूमिका' का तृतीयांश 

शनिवार, 15 मई 2010

शायर और गीतकार जावेद अख़्तर को मिली धमकी की निंदा और धमकी देने वाले के विरुद्ध त्वरित सख्त कार्रवाई की मांग करें।

भारत देश का शासन संविधान से चलता है और वह इस देश की सर्वोच्च विधि है। इस विधि के अंतर्गत सभी को अपने विचार अभिव्यक्त करने की आजादी है। किसी भी मुद्दे पर इस देश का कोई भी नागरिक स्वतंत्रता पूर्वक अपने विचार अभिव्यक्त कर सकता है। कुछ दिनों पहले देवबंद के मुफ्तियों ने एक फतवा (कानूनी राय/Legal Opinion) जारी की गई थी कि मुस्लिम महिलाओं को मर्दों के साथ काम नहीं करना चाहिए, यह शरीयत के विरुद्ध है। इस फतवे से पूरे देश में एक बहस छिड़ी कि देश में हजारों महिलाएँ जो विभिन्न ऐसे कामों में नियोजित हैं जहाँ वे पराए मर्दों के संपर्क में रहती हैं, क्या उन्हें अपने काम छोड़ देना चाहिए?
सी प्रश्न पर एक टीवी चैनल ने एक परिचर्चा आयोजित की थी जिस में एक मुफ्ती, एक मुस्लिम महिला, एक अन्य मुस्लिम विद्वान और प्रसिद्ध शायर और गीतकार जावेद अख़्तर  शामिल थे। इस परिचर्चा में जावेद अख़्तर की राय थी कि फतवा शरीयत के अनुसार दी गई एक सलाह मात्र है। उसे मानना या न मानना लोगों की इच्छा पर निर्भर करता है। उन का यह भी कहना है कि फतवे जारी होते रहते हैं, लेकिन बहुत कम लोग उन का अनुसरण करते हैं। दुनिया बदल गई है और अब लोगों को बदले हुए जमाने के साथ रहना सीख रहे हैं। बहुत सी पुरानी बातें हैं जो आज आम नहीं हो सकती। 
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित समाचार
जावेद अख़्तर साहब ने अपनी स्वतंत्र राय परिचर्चा में रखी। इस में ऐसा कुछ भी नहीं था जिस से किसी का अपमान होता हो अथवा किसी को ठेस पहुँचती हो। उन्हों ने केवल एक सचाई बयान की थी और अपनी राय प्रकट की थी जो इस देश का नागरिक होने के नाते उन का मूल अधिकार है। लेकिन  इस देश में बहुत लोग हैं जो नहीं चाहते कि इस देश में लोग अपनी निर्भयता से अपनी स्वतंत्र राय रख सकें। वे नहीं चाहते कि भारत के लोग अभिव्यक्ति की आजादी का उपभोग कर सकें। उन्हे आज किसी ने ई-मेल के जरिए  जान से मारने की धमकी दी गई है। यह धमकी जनतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है और एक आतंकवादी हरकत है। मेरा मानना है कि देश के प्रत्येक नागरिक को इस धमकी की कठोर निंदा करनी चाहिए और महाराष्ट्र व  केन्द्र की सरकारों से अपील करनी चाहिए कि वे इस तरह का धमकी भरा मेल भेजने वाले शख्स का जल्द से जल्द पता लगाएँ और सख्त से सख्त सजा दिलाने के लिए त्वरित कार्यवाही करें।

शुक्रवार, 14 मई 2010

आलोचना, चाटुकारिता और निन्दा - अपराध और परिवीक्षा

मारे पास माध्यम के रूप में सब से पहले काव्य कृतियाँ सामने आईं जो लिखित न होते हुए भी श्रुति से हमारे बीच थीं। इन कृतियों में सब कुछ था। जीवन था, जीवन का दर्शन था, जगत की व्युत्पत्ति की व्याख्या थी, सौन्दर्य था, अभिव्यक्ति थी और भी बहुत कुछ था। श्रुति के रूप में काव्य  का विस्तार सीमित था। लेकिन जैसे ही लिपि और लेखन सामग्री अस्तित्व में आई लोगों तक इस के विस्तार में वृद्धि हुई। लेकिन जब छापाखाने का आविष्कार हो गया और लेखन की एक से अधिक प्रतियाँ बनाना संभव हुआ तो इस के विस्तार में उछाल आ गया। तब अपने अपने दृष्टिकोण से उपलब्ध रचनाओं का मूल्यांकन आरंभ हो गया। फिर समाचार पत्र  और पत्रिकाएँ अस्तित्व में आए तो दायरा औऱ बढ़ा, पाठक संख्या बढ़ने लगी। पुस्तकें, समाचार पत्र और पत्रिकाएँ एक ऐसे माध्यम के रूप में सामने आए जिस से अपने विचार, सूचनाएँ और रचनाएँ औरों तक पहुँचाना अत्यंत सुगम हो गया। विचार, रचनाएँ और सूचनाओं को पहुँचाने के लिए अनेक रूप सामने आए। कविता, कहानी, लेख, निबंध आदि सामान्य रूप थे लेकिन इन के अलावा और भी रूप दुनिया में मौजूद थे जिसमें मूर्ति शिल्प और चित्रकारी प्रमुख हैं, नाटक, नृत्य और संगीत भी सदियों  से अभिव्यक्ति का साधन बने रहे हैं। फिर चलचित्र एक नया माध्यम सामने आया। आज हमारे सामने टेलीविजन और अंतर्जाल ऐसे साधन हैं जिन के माध्यम से हम सूचनाएँ, विचार और रचनाओं को लोगों तक पहुँचा सकते हैं।
रंभिक काव्य कृतियों के जमाने से ही उन का मूल्यांकन और विश्लेषण होता रहा है। वे मनुष्य समाज के लिए कितनी उपयोगी हैं या नहीं? अथवा उन में गेयता कितनी है? या फिर उन की कला कैसी है? वे आकर्षक हैं या नहीं? क्या वे ऐसी हैं जिन्हें लोग ग्रहण करना पसंद करेंगे अथवा नहीं। ऐसे बहुत से आधार रहे हैं जिन पर किसी भी कृति का मूल्यांकन होता रहा है। समाचार पत्रों, या टेलीविजन चैनलों या पत्रिकाओं का भी मूल्यांकन और समीक्षा किया जाता रहा है। अब अंतर्जाल ने वह सब अपने अंदर समेट लिया है। यहाँ सब कुछ है। साहित्य, समाचार, विचार, दर्शन, चित्र, छायाचित्र, वीडियो, ओडियो आदि आदि। विकृत और विभत्स से ले कर सुंदरतम और आकर्षक तक यहाँ उपलब्ध है और कराया जा सकता है। इसी ने हमें यह अवसर दिया है कि हम अपने अपने ब्लाग बनाएँ और उन पर जो कुछ भी, जैसे भी अभिव्यक्त कर सकते हैं, करें। इन्ही अवसरों में ब्लाग भी एक अवसर है जिस का उपयोग  हम सभी लोग जो ब्लागीरी के माध्यम से कर रहे हैं। ब्लागीरी में भाषाई समूह भी हैं और हिन्दी ब्लागीरी ब्लागों का एक भाषाई समूह है जो तेजी से विकसित हो रहा है। अब तक इतने ब्लाग और उन पर इतनी सामग्री आ चुकी है कि ब्लागों और ब्लागीरों का मूल्यांकन किया जा सकता है। बल्कि यह होना चाहिए। जब हम मूल्यांकन करने लगेंगे तो उस में किसी भी ब्लाग पर प्रकाशित अथवा ब्लागीर द्वारा प्रस्तुत की गई सामग्री के संबंध में अपने विचार प्रकट करेंगे। उस में उस की खूबियों का भी उल्लेख होगा और कमियों का भी। हो सकता है किसी मूल्यांकनकर्ता ने ब्लाग या ब्लागर की जिन खूबियों का वर्णन किया है वह दूसरों की निगाह में खूबियाँ न हों या उल्लेखनीय न हों। यह भी हो सकता है कि जिन कमियों का वह वर्णन कर रहा है वे कमियाँ ही नहीं हों। यह भी हो सकता है कि ऐसा मूल्यांकन किसी को पसंद आए और किसी को न आए। फिर इस मूल्यांकन का भी मूल्यांकन किया जा सकता है। 
बात कुछ भी हो अब वह वक्त आ पहुँचा है जब हिन्दी ब्लाग और ब्लागीरों का मूल्यांकन होना चाहिए। साहित्य में इसी मूल्यांकन को आलोचना या समालोचना कहा जाता है। साहित्य में आलोचना या समालोचना का अपना महत्व है इसी कारण से अच्छे अच्छे साहित्यकार आलोचना और समालोचना के लिए तरसते दिखाई पड़ते हैं। वहाँ उस आलोचना और समालोचना की भी आलोचना और समालोचना होती रहती है। साहित्य के क्षेत्र के लिए वह आम बात है। 
ब यदि मूल्यांकन या समालोचना हो तो उस का आधार और रूप क्या होना चाहिए? हम पहले रूप की बात करें तो निश्चित रूप से जब हम किसी ब्लाग या ब्लागीर की समालोचना करने लगेंगे और अपने निष्कर्ष रखेंगे तो हमें यह तो करना ही होगा कि समालोचना में जो बात हम कहें उस के समर्थन में पर्याप्त तथ्य और साक्ष्य भी उसी रचना में अवश्य ही हों। मसलन यदि हम यह कहते हैं कि दिनेशराय द्विवेदी के ब्लाग इस कमी से या इस खूबी से युक्त हैं तो हमें उन कमियों और खूबिय़ों के उदाहरण भी सामने रखने चाहिए। यदि हम बिना किसी उदाहरण, तथ्य और साक्ष्य के अपनी बात कहते हैं तो प्रशंसा करने की स्थिति में यह चाटुकारिता और कमियों का उल्लेख करने पर यह निंदा का रूप ले लेगी। 
ज्ञानदत्त जी पाण्डेय की मानसिक हलचल पर समीरलाल जी और अनूप शुक्ल जी के बारे में जो तीन-तीन पंक्तियाँ कही गईं और जिन्होंने तीन दिनों से हिन्दी ब्लाग जगत में बवाल मचा रखा है उन की सबसे बड़ी कमी यही है कि उन्हों ने इन दोनों ब्लागीरों के बारे में जो कुछ भी कहा वह बिना किसी साक्ष्य, तथ्य और उदाहरण के कह दिया। इस दृष्टिकोण से उसे समालोचना, समीक्षा या मूल्यांकन की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। उस के वर्गीकरण के लिए दो ही श्रेणियाँ बचती हैं, चाटुकारिता या निंदा। लेकिन मैं नहीं समझता कि ज्ञानदत्त जी की मंशा किसी की निंदा करना या चाटुकारिता करना हो सकती है। मेरा विनम्र मत है कि इसे हम आलोचना, मूल्यांकन या समीक्षा का आरंभ करने का एक प्रयत्न माना जाना चाहिए, लोगों का सोचना है कि इस में उन से एक अपराधिक गलती हो गई है।  लेकिन पहले अपराध के लिए तो कानून में भी सजा न दे कर परीवीक्षा (probation) पर छोड़े जाने का कायदा है।

बुधवार, 12 मई 2010

"पौरुष और कला" - यादवचंद्र के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" का तृतीय सर्ग

2. परंपरा और विद्रोह: प्रथम सर्ग "धऱती माता" (उत्तरार्ध)

3. "परंपरा और विद्रोह" : द्वितीय सर्ग "मनुष्य का विकास"

नवरत के पिछले अंकों में आप यादवचंद्र जी के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" के दो सर्ग पढ़ चुके हैं। इन कड़ियों को ऊपर दिए गए लिंक पर क्लिक कर के पढ़ा जा सकता है। इस काव्य का प्रत्येक सर्ग एक पृथक युग का प्रतिनिधित्व करता है। युग बदलने के साथ ही यादवचंद्र जी काव्य का रूप भी बदल देते हैं। यह इस के हर नए सर्ग को पढ़ते हुए आप स्वयं अनुभव करेंगे। आज इस काव्य का तृतीय सर्ग "पौरुष और कला" प्रस्तुत है ......... 

परंपरा और विद्रोह  
* यादवचंद्र *

तृतीय सर्ग

'पौरुष और कला'


ऊपर रोग-ग्रस्त पीला रवि
नीचे धवल धरा है
दृष्टि-पंथ पर दूर-दूर तक
हिम का जाल पड़ा है

हिम का निर्जन प्रान्त, शान्ति की
गति-विधि-हीन गिरा है
मौन दिशाएँ, कुहेलिका से
धूमिल क्षितिज घिरा है
 


 किन्तु जागता भी है कोई हिम गव्हर के नीचे
भीमकाय मानवाकृति प्रत्यंचा-सी भौंहें खींचे

यह अभाव का पुतला, लिपटा
ऋण-चर्म में क्षुब्ध, विभुक्षित
पवि-वत् गौर भुजाओं को वह
(जीवन-यौवन की ममता ले)
देख रहा है हो कर चिंतित-

'भेड़ियों का होता आघात
दृगों में कटती भीषण रात
उफ, श्रम का भीषण मध्यान्ह
सुनहला सुखद् शान्ति का प्रात'
 


 मगर यह
अनहोनी-सी बात
जागा पौरुष क्रुद्ध
पुरुष का सोया-सा अभिमान

 और तब-
धनुष ने खींची कस कर डोर
डोर पर चढ़े नुकीले बाण
(बाण या प्राण रक्षिणी ढाल !
कला-जीने की उस की चाल)
अलौकिक युग का अनुसन्धान !

लौटते कहीं शिकार कराह
भेड़िए, भालू, ऋक्ष, वराह
 


 कर अट्टहास
युग पुरुष बढ़ा
निर्माण--नाश
युग-चरण कढ़े
युग का विकास
युग पुरुष बढ़ा ........
 * * * * * * * * * * * *
 हिम सेवित गव्हर में घायल
संकुचित मानव समाज का व्यक्ति एक
शिला पर शान्ति विहग की देख
बनाता अपने नख से रेख
 


व्यक्ति के जीवन का हो गान
चाहता है वह निज सम्मान
परिस्थिति के हो कर अनुकूल
इसी से करता नव निर्माण
खींचता है पत्थर पर लीक
रंग दे भरता उस में प्राण
सुनहला, सुन्दर, सरस भविष्य
ढालने को करता मजबूर
चित्र के मिस उस का सम्मान
मगर यह मीठी मादक छाँव, किसे देगी न ललक कर ठाँव
अरे यह नवयुग का निर्माण ..........
 


* * * * * * * * * * * *
सबल ग्रीवा पर ले कर भक्ष्य
शिकारी, निज बाणों का लक्ष्य
पिनाकी का जलता आकार
कन्दरा का जब खोला द्वार
विहँसती-सी कल्पना अजान
लुटाती थी मदिरा की धार
चूमती थी पौरुष के भाल
वियोगिन-सी पाने को प्यार
जलाये मन-मन्दिर के दीप
खड़ी थी खोल नयन के द्वार
(अरे यह पौरुष का सम्मान ?)

* * * * * * * * * * * *
जीत कर पुरुष गया तब हार
हार में देखी अपनी जीत
प्रीत का मदमाता संसार
कला औ पौरुष की यह नाव
चली करने युग-धारा पार .............

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मंगलवार, 11 मई 2010

तथ्यों की पर्याप्तता और सत्यता


पाठकों और मित्रों !

नवरत की यह 500वीं प्रस्तुति है।  जब मैं ने अपना पहला ब्लाग 'तीसरा खंबा' आरंभ किया था तो मैं ने  सोचा भी न था कि मैं कोई दूसरा ब्लाग जल्दी ही आरंभ कर दूंगा। लेकिन यहाँ बातचीत का जो माहौल था,  उस ने मुझे प्रेरित किया कि मैं कानूनी विषयों के अतिरिक्त भी कुछ लिखूँ। तीसरा खंबा में उसे लिखा जाना उपयुक्त नहीं लगा। और अनवरत का जन्म हुआ।
जैसा कि प्रत्येक व्यक्ति के साथ होता है। वह पैदा होते ही कुछ सीखना आरंभ करता है और जीवन भर कुछ न कुछ सीखता रहता है। बोलना आरंभ करने के साथ ही वह कहना सीखता है। जो कुछ वह देखता है, अनुभव करता है, पढ़ता है उसे विद्यमान परिस्थितियों पर लागू करता है। तब उस के पास कुछ कहने को होता है, वही सब कुछ वह किसी न किसी माध्यम से अभिव्यक्त करता है। मैं ने भी अनवरत पर जो कुछ लिखा है वह सब यह अभिव्यक्ति है। अपनी स्वयं की अभिव्यक्ति के अतिरिक्त मैं ने जो  कुछ मुझे पसंद था वह भी प्रस्तुत किया। इस में कुछ मित्रों की रचनाएँ थीं। लेकिन बहुत कुछ ऐसा भी है जो मैं ने पढ़ा है और जिस ने मुझे प्रभावित किया है, जिस से मैं ने कुछ सीखा है।  मैं चाहता था कि वह सब भी हिन्दी अंतर्जाल के पाठकों को उपलब्ध हो। मैं ने इस के लिए भी प्रयत्न किया और लगातार करता रहूँगा। मुझे जिन चीजों ने प्रभावित किया है उन में से एक कार्ल मार्क्स का दर्शन भी है। जिसे आजकल मार्क्सवाद, या मार्क्सवाद-लेनिनवाद, या फिर माओवाद के माध्यम से जाना-पहचाना जाता है वह मार्क्स के दर्शन का विस्तार है। उसे जाँचने , परखने और उस पर बहस की पर्याप्त गुंजाइश है।  
मेरी नजर में मार्क्स का दर्शन, जिसे द्वंदात्मक भौतिकवाद भी कहा जाता है, जैसा कि मैं ने उसे जाना है और समझा है, वस्तुतः वह पद्यति है जिस से दुनिया चल रही है। मुझे वह इस भौतिक जगत के तमाम व्यवहारों को समझने का आज तक का सब से  बेहतर तरीका प्रतीत होता है। इस पद्यति का निर्माण स्वयं मार्क्स ने नहीं किया। यह तो वह पद्यति है जिस से दुनिया चल रही है, मार्क्स ने तो उसे सिर्फ खोज निकाला है। मार्क्स की खोज निकाली हुई इस पद्यति को किसी भी रुप में आज तक कोई चुनौती मिली हो ऐसा मेरी जानकारी में नहीं है। सारे विवाद उस पद्यति का प्रयोग करते हुए दुनिया के बदलने के उपायों के संबंध में है। जो भी  व्यक्ति या व्यक्ति समूह इस पद्यति को समझ लेता है वह अपने अनुसार दुनिया के व्यवहारों का मूल्यांकन करता है और दुनिया की परिवर्तन में अपने तरीके से योगदान करना चाहता है। यहीं वे त्रुटियाँ होती हैं जो आलोचना का कारण बनती हैं। दुनिया के व्यवहारों का मूल्यांकन करते समय  उन के बारे में जुटाए गए तथ्यों की पर्याप्तता और सत्यता सदैव ही निष्कर्षों को प्रभावित करती है। यदि तथ्य पर्याप्त और सही नहीं हैं तो निष्कर्ष कभी भी सही नहीं हो सकते। आम तौर पर जो गलती होती है वह यहीं होती है। भारत में तो इस से आगे एक और बात है कि जो इस दर्शन को समझ कर यह सोच लेता है कि केवल दर्शन से दुनिया को बदला जा सकता है, वह तथ्यों को जुटाने पर कम से कम श्रम करता है और दर्शन की मदद से उन की कल्पना करने लगता है। फिर इन कल्पित तथ्यों के आधार पर निष्कर्ष निकालता है। अब आप अनुमान कर सकते हैं कि कल्पित तथ्यों के आधार पर काम करने वाला क्या कर सकता है?
सलन किसी वैज्ञानिक प्रयोग में आप को किसी खास तापमान पर कोई अभिक्रिया आरंभ करनी है, उस से कम या अधिक तापमान पर नहीं। आप तापमान का अनुमान कर अभिक्रिया आरंभ कर देते हैं और तापमान कम  या अधिक हुआ तो दोनों ही स्थितियों में इच्छित परिणाम प्राप्त नहीं किए जा सकते। आप अपने सारे प्रयोग और उस के लिए जुटाई गई सामग्री को नष्ट कर देते हैं और साथ ही समय भी नष्ट करते हैं। 
खैर! वह सब विवाद का विषय है। आप समाज या दुनिया को बदलने न भी जाएँ तब भी मार्क्स का यह दर्शन किसी भी व्यक्ति के जीवन में रोजमर्रा के व्यवहारों को समझने और निर्णय लेने में सर्वाधिक उपयोगी सिद्ध होता है। क्यों कि इस के कारण आप सही सही तरह से यह जान पाते हैं कि आप के आस पास जो घटनाएँ और परिघटनाएँ घट रही हैं वे क्यों घट रही हैं और वे आगे क्या रूप ले सकती हैं। आप को अपने निर्णय लेने में बहुत सुविधा होती है। हालांकि यहाँ भी परिणाम इसी बात पर निर्भर करते हैं कि आप ने मूल्यांकन के लिए पर्याप्त और सही तथ्यों को जुटाया है अथवा नहीं। 

स समय अनवरत पर मैं एंगेल्स की पुस्तिका "वानर से नर बनने में श्रम की भूमिका" प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसे समाप्त होने में दो सप्ताह लग सकते हैं। इस के साथ ही यहाँ यादवचंद्र जी के प्रबंध काव्य " परंपरा और विद्रोह" का एक एक सर्ग भी प्रस्तुत किया जा रहा है। दोनों ही बहुमूल्य निधियाँ हैं। पूरा हो जाने के उपरांत इन्हें ई-बुक के रूप में अंतर्जाल पर सहेजने की योजना है। जिस से हिन्दी के इच्छुक पाठकों को इस का लाभ मिल सके। इस से निश्चय ही अंतर्जाल पर स्थाई रूप से उपलब्ध हिन्दी सामग्री की वृद्धि में मेरा भी कुछ योगदान हो सकेगा।
मुझे विश्वास है कि आप इस ब्लाग पर आते रहेंगे।