@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत

सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

दिनकर जी के परिवार के साथ न्याय कैसे हो?

दो दिनों से व्यस्तता रही। शनिवार को मकान की छत का कंक्रीट डलता रहा, वहाँ दो बार देखने जाना पड़ा। रविवार सुबह एक वैवाहिक समारोह में और दोपहर बाद एक साहित्यिक स्मृति और सम्मान समारोह में बीता। रात नौ बजे ही घर पहुँच सका। घर पहुँच कर खबरें देखीं तो एक खबर यह भी मिली कि पटना में दिनकर जी की  वृद्ध पुत्र-वधु हेमन्त देवी का किराएदार लीज अवधि समाप्त हो जाने के बाद भी दुकान खाली नहीं कर रहा है और उपमुख्यमंत्री का रिश्तेदार होने के कारण वह उन्हें धमकियाँ दे रहा है। 
ह समाचार भारतवर्ष की कानून और व्यवस्था की दुर्दशा की कहानी कहता है। हेमन्त देवी का कहना है कि वे मुख्यमंत्री तक से मिल चुकी हैं लेकिन उन्हें न्याय नहीं मिला। मुख्यमंत्री क्या करें? वे एक व्यक्ति, जो कानूनी रूप से किसी संपत्ति के कब्जे में आया था, जिस का कब्जा अब लीज अवधि समाप्त होने के बाद  अवैध हो गया है और जो अतिक्रमी हो गया है, से मकान कैसे खाली करवा सकते हैं? यह मामला तो अदालत का है। महेश मोदी यदि दुकान खाली नहीं करता है और अगर यह मामला किराएदारी अधिनियम की जद में आता है तो उस के अंतर्गत मकान खाली करने का दावा करना पड़ेगा, और अगर लीज से संबंधित कानून के अंतर्गत यह मामला आता है तो कब्जे के लिए दावा करना पड़ेगा। हमारे अधीनस्थ न्यायालयों की स्थापना करने का काम राज्य सरकारों का है। राज्य सरकारें इस काम में बरसों से लापरवाही कर रही हैं। पूरे देश में जरूरत की केवल 20 प्रतिशत अदालतें हैं जिस के कारण एक मुकदमा एक-दो वर्ष के स्थान पर 20-20 वर्ष तक भी निर्णीत नहीं होता। जो कानून और अदालतें सब के लिए हैं, वे ही दिनकर जी के परिजनों के लिए भी हैं। इस कारण उन्हें भी इतना ही समय लगेगा। सरकार या कोई और ऐजेंसी इस मामले में कोई दखलंदाजी करती है या ऐसा करने का अंदेशा हो तो महेश मोदी खुद न्यायालय के समक्ष जा कर यह व्यादेश ला सकता है कि दुकान पर उस का कब्जा सामान्य कानूनी प्रक्रिया के अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार से न हटाए।
क मार्ग यह दिखाई देता है कि इस मामले में राज्य सरकार कोई अध्यादेश जारी करे, या फिर कानून बनाए जो संभव नहीं। एक मार्ग यह भी दिखाई देता है कि यदि राज्य में वरिष्ठ नागरिकों को उन के मकान का कब्जा दिलाने मामले में कोई विशिष्ठ कानून हो तो उस के अंतर्गत तीव्रता से अदालती कार्यवाही हो, अथवा अदालत हेमंत देवी को वरिष्ठ नागरिक मान कर त्वरित गति से मामले में फैसला सुनाए और यही त्वरण अपीलीय अदालतों में भी बना रहे। तब यह प्रश्न भी उठेगा कि हेमंत देवी के लिए जो कुछ किया जा रहा है वह देश के सभी नागरिकों के लिए क्यों न किया जाए? वस्तुतः पिछले तीस वर्षों में जो भी केंद्र और राज्य सरकारें शासन में रहीं, उन्हों ने न्याय व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने की जिम्मेदारी नहीं निभाई। उन्हों ने उसे अपना कर्तव्य ही नहीं समझा।
पिछले तीस वर्षों में स्थितियाँ बहुत बदली हैं। इस अतिविलंबित न्याय व्यवस्था ने समाज के ढाँचे को बदला है। अब हर अवैध काम करने वाला व्यक्ति धमकी भरे स्वरों में कहता है तु्म्हें जो करना हो कर लो। वह जानता है कि अदालत में जूतियाँ घिस जाती हैं बीसियों साल तक अंजाम नहीं मिलता। जिस के पास लाठी है वही भैंस हाँक ले जा रहा है, भैंस का मालिक अदालत में जूतियाँ तोड़ रहा है। ये पाँच-पाँच बरसों के शासक, इन की दृष्टि संभवतः इस अवधि से परे नहीं देख पाती। यह निकटदृष्टि राजनीति लगातार लोगों में शासन सत्ता के प्रति नित नए आक्रोश को जन्म देती है और परवान चढ़ाती है। पाँच बरस के राजा नहीं जानते कि  यह आक्रोश विद्रोह का जन्मदाता है ऐसे विद्रोहों का जिन्हें दबाया नहीं जा सकता।

शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

प्रायश्चित

वैभव का फोन मिला -मैं कल आ रहा हूँ। वह साढ़े तीन माह में घर लौट रहा था। मैं ने शोभा को बताया तो प्रसन्न हो गई। आखिर बेटे के घर लौटने से बड़ी खुशी इस वक्त और क्या हो सकती थी। वह एक दिन पहले ही 5-6 अचार बना कर निपटी है। निश्चित रूप से अब सोच रही होगी कि बेटा वापस जाते समय कौन कौन सा अचार ले जा सकता है। आगे वह यह भी सोच रही होगी कि वह अचार ले जाने के लिए कैसे पैक करेगी। यदि उसे कुछ भी न सूझे तो शायद कल सुबह ही मुझे यह भी कहे कि दो एक एयरटाइट बरनियाँ ले आते हैं, बच्चों को अचार वगैरह पैक करने में ठीक रहेंगे। अगले दिन सुबह वैभव ने बताया कि वह कौन सी ट्रेन से आ रहा है। मैं ने उसे कहा कि हम उसे लेने स्टेशन पहुँच जाएंगे। उस की ट्रेन लेट थी। हम ठीक आधे घंटे पहले स्टेशन के लिए रवाना हुए,  जि स से रास्ते में कहीं रुकना पड़े तब भी समय से पहुँच सकें। शोभा रास्ते में बोर्ड देखती जा रही थी। स्टेशन के ठीक नजदीक पहुँचने पर उस ने पूछा -ये एस. एस डेयरी यहाँ भी है क्या? मुझे पता नहीं था इस लिए जवाब दिया -शायद होगी। स्टेशन पहुँच कर हमने कार को अपने स्थान पर पार्क किया।
बीस मिनट की प्रतीक्षा के बाद वैभव आ गया, हम घर की ओर चले। शोभा कहने लगी डेयरी से रसगुल्ले लेंगे। मैं ने कहा वह आने वाली सड़क पर होगा तो नहीं ले पाएंगे। फिर भी मैं सड़क पर बोर्ड देखते हुए धीरे-धीरे  तेज ट्रेफिक के लिए दायीं ओर रास्ता छोड़ कर कार चलाता रहा। अचानक बाईं और डेयरी का बोर्ड दिखा। मैं ने कार पार्क करने के लिए उसे बाईं और मोडा। एक दम धड़ाम से आवाज हुई और एक बाइक कार को हलका सा छूते हुए कार से दस कदम आगे जा कर रुक गई। मैं कार रोक चुका था। बाइक वाला लड़का अपनी बाइक को खड़ी कर मेरे पास आया, लड़की बाइक के पास ही खड़ी रही। युवक ने पास आ कर कहा - कार में इंडिकेटर भी होते हैं। मुझे याद नहीं आ रहा था कि मैं ने मुड़ते हुए इंडिकेटर का उपयोग किया था या नहीं। मैं ने उसे सॉरी कहा। उस का गुस्सा कुछ कम हुआ तो कहने लगा- मैं आप को स्टेशन फॉलो कर रहा हूँ और धीरे गाड़ी चला रहा हूँ। मैं ने कहा फिर तो टक्कर नहीं होनी चाहिए थी।  वह बोला -एक तो आप गाड़ी बहुत धीरे चला रहे हैं, ऊपर  आप ने एक दम मोड़ दी। मैं समझ गया कि वह बाईं तरफ से कार को ओवरटेक करने की कोशिश कर रहा था।  मैं ने उसे फिर सॉरी करते हुए कहा- भाई, अब क्या करना है? उस ने ने अपनी बाइक की ओर देखा। लड़की अपनी कोहनी सहला रही थी, शायद वह कार से छुई होगी। लड़का बाइक तक गया,  हैंडल चैक किया, फिर लड़की की ओर देखा। शायद लड़की ने उस से यह कहा कि उसे चोट नहीं लगी है। लड़का संतुष्ट हुआ तो अपनी बाइक ले कर चल दिया। मैं ने कार को ठीक से पार्क किया, शोभा को रसगुल्ले लाने को कहा। वह लौटती उस से पहले कार को चैक किया तो अंधेरे में कोई निशान तक न दिखा। मेरी समझ नहीँ आ रहा था कि बाइक कार से कहाँ टकराई थी। 
सुबह कार देखी तो उस पर बाईँ तरफ रबर घिसने का निशान पड़ा हुआ था जो गीले कपड़े से साफ हो गया। मैं सोच रहा था कि गलती तो मेरी थी, कुछ कुछ शायद उस की भी। यह (Contributory negligence) अंशदायी लापरवाही का मामला था। चाहे मैं कार को धीरे ही चला रहा था लेकिन मैं ने उसे मोड़ा तो अचानक ही था और शायद इंडिकेटर का उपयोग किए बिना भी। लड़का भी बाईं ओर कुछ स्थान देख कर कार को ओवरटेक करने का मन बना रहा था। कार को मुड़ती देख अचकचाकर टकरा गया। वह लड़का यूँ चला न जा कर, उलझ गया होता तो, लोग तो देखने ही लगे थे। शायद मुझे कार वाला होने का नतीजे में कुछ न कुछ भुगतना पड़ता। मैं ने मन ही मन उस लड़के को एक बार फिर सॉरी कहते हुए धन्यवाद दिया और तय किया कि भविष्य में आज जैसी गलती न हो इस के लिए प्रयत्न करूंगा। 

बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

अचार की बहार

पुराना मकान छोड़े चार माह से ऊपर हो गया। अभी जहाँ रह रहा हूँ, अपना मकान बनते ही तीन चार माह बाद उस में जाना है। जहाँ मैं अभी रह रहा हूँ वहाँ मेरी गैसे एजेंसी गैस सप्लाई नहीं करती। मैं ने गैस ऐजेंसी नहीं बदली। इसलिए कि फिर कुछ माह बाद न बदलना पड़े। पर गैस कैसे मिले? उस का जुगाड़ जरूरी था। मैं गैस एजेंसी के मालिक से सीधा कह सकता था, वह मेरा पड़ौसी भी था।  लेकिन मैं ने सोचा वह बनिया आदमी है, जैसे ही मैं उसे जुगाड़ की कहूँगा वह मेरे बारे में यह सोचने लगेगा कि इस आदमी से कभी लाभ उठाया जा सकता है या नहीं। गैस एजेंसी वाला ऐसा सोचे भी मुझे बिलकुल पसंद नहीं इसलिए सीधे गैस एजेंसी में काम करने वाले एक क्लर्क को कहा। एजेंसी स्टाफ मेरा मान करता है। यदा-कदा कानूनी बातें पूछते रहते हैं, मैं अपनी आदत के मुताबिक तुरंत बता देता हूँ। वे खुश हो जाते हैं। उस ने कहा - पिछला गैस सिलेंडर लेने के इक्कीस दिन बाद कभी भी गैस ले सकते हैं। बस एक दिन पहले बता दें, दूसरे दिन सिलेंडर ले जाएँ। मैं उस दिन सिलेंडर बदलाने ही गया था। मैं ने शोभा से पूछा कि तुम चल रही हो? तो वह आशा के विपरीत तुरंत तैयार हो गई। मैं ने पूछा तो बताया कि सब्जीमंडी हो कर आएंगे। 

सब्जी मंडी में ...
... और इधर अचार हैं तैयार
कुछ दिन पहले शोभा ने बताया था कि अब कैरी (कच्चे आम) का अचार खत्म होने को है, तो मैं ने वैसे ही कहा था -अब जाती फरवरी में कैरी आने लगेगी। तब तक हल्दी, नीबू, मिर्च, आँवला, धनिया इतनी चीजें हैं, किसी का भी अचार बना लो। मैं ने सोचा,  ..... तो अचार की तैयारी है! गैस सिलेंडर बदलवा कर सब्जीमंडी पहुँचे। वहाँ एक स्थान देख कर एक शो-रूम के सामने कार पार्क की तो शो-रूम का गार्ड कार को हटाने को कहने लगा। मैं ने उस से कुछ हुज्जत की तो अंदर से मालिक ने आ कर कहा -खड़ी रहने दो। शोभा तब तक सब्जीमंडी के अंदर थी, पीछे से मैं पहुँचा। खरीददारी शुरू हुई। नीबू, धनिया, आँवला, हल्दी, इमली, हरी मिर्च और खडा नमक (मोटे डलों वाला) खरीदा। दूसरे दिन सुबह हिदायत मिली की अदालत से आते वक्त सरसों का तेल लेते आना। 
जी मैं हल्दी का अचार
और मैं, पहचानिए,  मैं आँवले से बना हूँ
 शाम को घर लौटा तो धनिया साफ कर के पीस लिया गया था। अब उस का अचार बनना शेष था। आँवले का अचार बन चुका था। कुछ की तैयारी कर ली थी। आज शाम जब अदालत से वापस घर पहुँचा तो अचार-निर्माण का आखिरी चरण चल रहा था। मैं इधर-उधर का काम करता रहा, आखिर अचार निर्माण समाप्त होने के बाद ही भोजन बनना था।
अब आप ही पहचान लीजिए, मैं धनिया ही हूँ, या फिर हरी मिर्च?
आप मुझे तो आप खूब जानते हैं, नीबू जो हूँ, जहाँ चाहा निचोड़ लिया
फिर जब भोजन करने बैठे तो शोभा गिनाने लगी छह-सात अचार हो गए हैं। मैं ने पूछा -कैसे? तो गिनाने लगी ... हल्दी, आँवला, धनिया तीन तो ये हो गए। एक नीबू का मीठा अचार, एक नीबू हरी मिर्च का अचार और एक हरी मिर्च का अचार, तीन ये हो गए। छह तो हो गए न? अब मैं ने आँवले को कद्दू कस कर के सुखा रखा है, यह वैसे ही खाने के काम में आएगा चाहेंगे तो इस पर सैंधा नमक लगा लेंगे, तो सातवीं चीज सूखा आँवला हो गया। अभी एक-दो दिन में लाल मिर्च आ जाएँगी। तब एक अचार वह हो जाएगा। ..... लो टेस्ट करो! यह कह कर उस ने एक-एक चम्मच हल्दी, धनिया और आँवले के अचार रख दिए। नीबू और हरी मिर्च तो अभी गलने बाकी हैं। मैं उन्हें टेस्ट करने के चक्कर में एक चपाती अधिक खा गया। इस के बाद भी मैं की-बोर्ड बजा रहा हूँ, य़ह भी एक कमाल की बात है। मैं देख रहा हूँ ... श्रीमती शोभाराय द्विवेदी बहुत खुश हैं। 

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

हर घर में झरबेरी

ल अपने पुराने मुहल्ले में जाना हुआ, महेन्द्र 'नेह' के घर। वहाँ पुराने पडौ़सियों से भेंट हुई, और मोहल्ले की बातें भी। वहीं मिले बड़े भाई अखिलेश 'अंजुम'। 
खिलेश जी को मैं 1980 से देखता आ रहा हूँ। काव्य गोष्ठियों और मुशायरों में जब वे अपने मधुर स्वर से तरन्नुम में अपनी ग़ज़लें प्रस्तुत करते हैं तो हर शैर पर वाह! निकले बिना नहीं रहती। मैं उन का कोई शैर कोई कविता ऐसी नहीं जानता जिस पर मेरे दिल से वाह! न निकली हो। उन्हों नें ग़जलों के अतिरिक्त गीत और कविताएँ भी लिखी जिन्हों ने धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, नवभारत टाइम्स, दैनिक हिन्दुस्तान, कादम्बिनी, नवनीत जैसी देश की महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में स्थान पाया। वे सदैव साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े रहे। वे आज भी विकल्प जनसांस्कृतिक मंच के सक्रिय पदाधिकारी हैं। 

यहाँ उन का एक नवगीत प्रस्तुत है -

हर घर में झरबेरी
अखिलेश 'अंजुम'
  • अखिलेश 'अंजुम'

रड़के पनचक्की आँतों में
मुँह मिट्टी से भर जाए

भैया पाहुन!
क्यों ऐसे दिन 
             तुम मेरे घर आए!


बँटे न हाथों चना-चबैना
बिछती आँख न देहरी।
घर-घर मिट्टी के चूल्हे हैं
हर घर में झरबेरी।
 टूटा तवा, कठौती फूटी
पीतल चमक दिखाए।

भैया पाहुन!
क्यों ऐसे दिन 
             तुम मेरे घर आए!

तन है एक गाँठ हल्दी की 
पैरों फटी बिवाई। 
जग हँसाई के डर से, उघड़ी 
छुपी फिरे भौजाई। 
इस से आगे भाग न अपना 
हम से बाँचा जाए। 

भैया पाहुन!
क्यों ऐसे दिन 
             तुम मेरे घर आए!

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रविवार, 30 जनवरी 2011

गालियाँ रचें तो ऐसी ...

न दिनों हम लोग जो ब्लागीरी में हैं, गालियों से तंग हैं। एक तो जो नहीं होनी चाहिए वे गालियाँ ब्लागों में दिखाई पड़ती हैं, और जो होनी चाहिए, वे नदारद हैं। हिन्दी बोलियों के लोक साहित्य में गालियों का एक विशेष महत्व है। जब भी समधी मेहमान बन कर आता है, तो रात के भोजन के उपरांत घर की महिलाएँ अपने पड़ौस की महिलाओं को भी बुला लेती हैं और मधुर स्वर में गालियाँ गाना आरंभ कर देती हैं। इन में तरह तरह के प्रश्न होते हैं। धीरे-धीरे गालियाँ समधी बोलने पर बाध्य हो जाता है। जैसे ही वह बोलता है। महिलाएँ जोर से गाना आरंभ कर देती हैं -बोल पड्यो रे बोल पड्यो ...  फिर आगे पुनः गालियाँ आरंभ हो जाती हैं। लोक साहित्य की इन गालियों को हमें संग्रह करना चाहिए। लोकभाषाओं और बोलियों के कवि और साहित्यकार इन का पुनर्सृजन भी कर सकते हैं। कुछ ब्लागर और ब्लागपाठक सड़क छाप गालियों का प्रयोग कर रहे हैं। उन में क्या रचनात्मकता है? सड़क से उठाई और दे मारी। गाली देना ही हो तो मेरे मित्र पुरुषोत्तम 'यक़ीन' की हाडौती भाषा में रची इस ग़ज़ल से सीखें जिस में गालियों का परंपरागत स्वरूप दिखाई पड़ता है। यह भी देखिए 'यक़ीन' किसे गालियाँ दे रहे हैं ...


'गाली ग़ज़ल'
  • पुरुषोत्तम 'यक़ीन'

सात खसम कर मेल्या पण इतरा री छै
या सरकार छंद्याळ घणी छणगारी छै
(सात पति रख कर इतराती है, ये सरकार बहुत श्रंगार किए हुए छिनाल नारी है)
पोथी कानूनाँ की, रखैल डकैताँ की 
अर चोराँ-दल्लालाँ की महतारी छै
( कानून की किताब रखने वाली यह डकैतों की रखैल और चोरो व दलालों की माँ है)

पीढ़्याँ सात तईं तू साता न्हँ पावे
थारा बाप कै माथे अतनी उधारी छै
(सात पीढ़ी तक भी इसे शांति नहीं मिल सकती इस के पिता पर इतनी उधारी है)

बारै पाड़ोस्याँ पे तू भुज फड़कावै काँईं
भीतर झाँक कै जामण तंगा खारी छै
(बाहर के पडौसियों पर बाहें तानती है भीतर इस की माँ धक्के खा रही है) 

लत्ता फाट्या, स्याग का पीसा बी न्हैं बचे
नळ-बिजळी का बिलाँ में तनखा जारी छै
(तन के कपड़े फट गए हैं, सब्जी के लिए भी पैसे नहीं बचते, वेतन नल-बिजली के बिलों में ही समाप्त हो जाता है)

च्हारूँ मेर जुलम को बंध्र्यो छे धोरो
ज्हैर बुछी सत्ता की तेग दुधारी छै
 (चारों ओर जुल्म की नहरें बह रही हैं इस सत्ता की तलवार ज़हर बुझी और दो धार वाली है)

मूंडौ देखै र भाया वै काढ़े छै तलक
ईं जुग में पण या ई तो हुस्यारी छै
(वे मुहँ देख देख कर तिलक लगातै हैं, यही तो इस युग की होशियारी है)

दळदारी की बात 'यक़ीन' करै काँईं
थारी ग़ज़ल बी अठी फोड़ा पा री छै
(यक़ीन तुम अपने दारिद्र्य की बात क्या करोगे यहाँ तो तेरी ग़ज़ल ही दुखः पा रही है )

शनिवार, 29 जनवरी 2011

खुद अपने आसपास तलाश कीजिए, कि आप कैसे आरंभ कर सकते हैं?

चमुच परिस्थितियाँ बहुत विकट हैं। परसों इसी ब्लाग पर मैं ने लिखा था सोनवणे की शहादत अपना मोल वसूल कर सकती है। लेकिन इस पोस्ट पर आई टिप्पणियों में निराशा अधिक दिखाई देती थी। भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने  कहा -  ईमानदारी! भ्रष्टाचार! बिल्ली के गले में घण्टी बांधेगा कौन? ऊपर से प्रारम्भ होता है किसी भी चीज का, ऊपर ठीक तो नीचे खुद-ब-खुद ठीक..Blogger satyendra...ने कहा -अब हजार-दो हजार रुपये महीने में मिलावटखोरों के लिए काम करने वाले कर्मचारी पकड़े जाएंगे और कर्तव्य की इतिश्री हो जाएगी।Blogger  Blogger Abhishek Ojha का कहना था - ...जनता ऐसी शहादतों को भुलाने में बहुत वक्त नहीं लगाती।  ललित शर्मा जी का कहना भी कुछ भिन्न नहीं था - राजनेताओं के हाथ माफ़िया की डोरी है। भ्रष्टाचार का पेड़ उल्टा है, जिसकी जड़ें आसमान में हैं। शाखाएं जमीन पर। इस महारोग का इलाज असंभव है।  Raviratlami जी तो पेट्रोल की मिलावट के भुक्तभोगी निकले - मेरे नए वाहन के इंजिन का हेड जिसकी गारंटी अवधि (गनीमत) अभी खत्म भी नहीं हुई थी, मिलावटी पेट्रोल की वजह से ब्लॉक हो गया था... आमतौर पर पेट्रोल में हर जगह भयंकर रूप से मिलावट होती है। अपवाद स्वरूप ही किसी पेट्रोलपंप में शुद्ध पेट्रोल मिलता होगा। जाहिर है, अफ़सरों से लेकर नेताओं तक सभी का मिला-जुला कारनामा होता है यह। मुझे नहीं लगता कि सोनवणे की शहादत से बाल बराबर भी कोई फ़र्क़ कहीं आएगा... Blogger महेन्द्र मिश्र  का कहना था - निसंदेह दुखद वाकया है ... इस तरह की घटनाओं से व्यवस्था से विश्वास उठ जाता है। Blogger cmpershad जी का सोचना भी कुछ भिन्न नहीं था - सत्येंद्र दुबे..... सोनवाने.... ना जाते कितने गए इस ईमानदारी की घुट्टी के कारण :( परिणाम तो वही ढाक के तीन पात।
ब से तीव्र प्रतिक्रिया सुरेश चिपलूनकर  जी की थी। मेरे महाराष्ट्र के 18 लाख सरकारी कर्मचारियों के बारे में यह कहने पर कि उन में अधिकांश ईमानदार हैं। वे अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वाह करते हैं और उन्हें जो कुछ वेतन के रूप में मिलता है उसी से अपना जीवन यापन करते हैं...  उन्हों ने एक लंबा ठहाका चस्पा किया, फिर लिखा - हा हा हा, सर जी… मुझे नहीं पता था कि आप इतना बढ़िया "हास्य-व्यंग्य" भी लिख लेते हैं… :) फिर मेरे यह कहने पर कि ये सभी कर्मचारी केवल इतना संकल्प कर लें कि वे सरकारी मशीनरी में कोई भ्रष्टाचार नहीं करेंगे और न होने देंगे…"  उन का कहना था कि - यह "सपना" मैं भी देखता हूँ, आप भी देखिये… :)
सुरेश जी की टिप्पणी पर मैं ने प्रतिटिप्पणी की - भ्रष्टाचार को समाप्त करने या नियंत्रित करने के प्रश्न पर अधिकतर टिप्पणीकर्ताओं की राय निराशावादी है। यानी कि वे मानते हैं कि यह वह फोड़ा है जो ठीक नहीं हो सकता, कैंसर ही सही। कैंसर अभी तक लाइलाज है। लेकिन उस की चिकित्सा किए जाने के प्रयास छोड़ नहीं दिए गए हैं। चिकित्सक और शोधकर्ता लगातार उस ओर प्रयासरत हैं। मुझे विश्वास है कि उस की चिकित्सा कभी न कभी संभव हो जाएगी।
चिपलूनकर जी इसे मजाक, व्यंग्य या हास्य समझते हैं कि अधिकांश कर्मचारी ईमानदार हैं। लेकिन यह ठोस हकीकत है। सब लोग कभी बेईमान नहीं हो सकते। एक समूह की केवल अल्पसंख्या ही बेईमान हो सकती है, अधिसंख्या नहीं।
बेईमान व्यक्ति भी हर व्यवहार में बेईमान नहीं होता, न हो सकता है।
ईमानदारी मनुष्य का मूल गुण है, बेईमानी नहीं। इस कारण बेईमान से बेईमान व्यक्ति में भी ईमानदारी का गुण मौजूद रहता है। जरूरत तो इस बात की है कि लोगों के अंदर छिपे ईमानदारी के उस गुण को उभारा जाए। बेईमानी को हतोत्साहित किया जाए। यह समूह ही कर सकता है। जब लोग बेईमानी के विरुद्ध उद्वेलित हों तो वे सामूहिक रूप से इस तरह के निर्णय ले सकते हैं। यदि समूह के नेतृत्व में इच्छा हो तो वह इसे अभियान के रूप में ले सकता है।
इसे अभी मजाक, व्यंग्य या हास्य समझा जा सकता है। लेकिन वह दिन तो अवश्य आना है जब यही जनसमूह ऐसे निर्णय करेगा। इतिहास और मिथक ऐसी घटनाओं और कहानियों से भरा पड़ा है। जनता जब करने की ठान लेती है तो कर गुजरती है। मुझे तो जनता की शक्ति पर अटूट विश्वास है। बस देर इस बात की है कि स्वयं जनता उस शक्ति को कब और कैसे पहचानती है।
स पर चिपलूनकर जी ने पुनः टिप्पणी करते हुए लिखा - यह निराशावादी नहीं बल्कि "यथार्थवादी" विचार हैं…। आपने स्वयं स्वीकार किया कि भ्रष्टाचार अब "कैंसर" बन चुका है तब सरकारी कर्मचारियों में "अधिकांश"(?) कैसे ईमानदार रह सकते हैं? कैंसर का इलाज क्रोसिन से होने वाला नहीं है, इसके लिये एक बड़े और दर्दनाक ऑपरेशन की जरुरत है… वरना सोनवणे, सत्येन्द्र दुबे, मंजूनाथ जैसे अधिकारी मारे ही जाते रहेंगे…। जनता तो जागने से रही, फ़िलहाल सरकारी कर्मचारी भी इसलिये "जागे"(?) हैं कि उनका साथी मारा गया है, कुछ दिन बीतने दीजिये सारा उबाल ठण्डा पड़ जायेगा… पिछले 15 साल से महाराष्ट्र में कांग्रेस-NCP की सरकार है, मालेगाँव में राष्ट्रीय जाँच एजेंसियों का "आना-जाना" लगा ही रहता है… क्या सब के सब अंधे-बहरे हैं? कौन नहीं जानता कि कहाँ-कहाँ पर क्या-क्या हो रहा है… यही यथार्थ है, निराशावाद नहीं…  और जिस "जनता" से आप आशा लगाये बैठे हैं, उसे जानबूझकर महंगाई के कुचक्र में ऐसा फ़ँसा दिया गया है, कि उसके पास दो जून की रोटी के बारे में सोचने के अलावा कुछ अन्य सोचने की फ़ुर्सत ही नहीं है…
संयोग से कल मैं चिपलूनकर जी के नगर के ही एक सेवानिवृत्त अधिकारी के सानिध्य में था। मैं ने उन से भी यही प्रश्न पूछा कि सरकारी कर्मचारियों में कितने ईमानदार होंगे? उन का दृष्टिकोण चिपलूनकर जी से बहुत अधिक भिन्न नहीं था। जब मैं ने उन से जिन विभागों में वे रहे उन के बारे में एक-एक कर पूछना आरंभ किया तो उन का कहना था कि ऊपर के अफसरों से ले कर निचले अफसरों तक में मुश्किल से एक प्रतिशत लोग ईमानदार होंगे। लेकिन जब क्लर्कों, चपरासियों और अन्य कर्मचारियों के संबंध में बात की गई और हिसाब लगाया तो पता लगा कि उन में से अधिकांश ईमानदार हैं। फिर मैं ने उन से किसी भी विभाग के सभी कर्मचारियों और अफसरों की संख्या में ईमानदार लोगों के बारे में हिसाब लगाने को कहा तो उन्हें मानना पड़ा कि सरकारी कर्मचारियों में अभी भी आधे से अधिक ईमानदार हैं। 
वास्तव में होता यह है कि हम जब भी सरकारी कर्मचारियों के बारे में बात करते हैं तो उन के बारे में बात करते हैं जिन से हमारा काम पड़ता है। वहाँ हमें अधिकांश लोग बेईमान दिखाई पड़ते हैं। इस से हमारी यह धारणा बनती है कि अधिसंख्य सरकारी कर्मचारी बेईमान हैं। लेकिन यह यथार्थ नहीं है। यदि हम यह मान लें कि सारा सरकारी अमला बेईमान है तो फिर देश में एक व्यक्ति भी ऐसा नहीं जिसे किसी सरकारी कार्यालय से कभी काम न पड़ा हो। फिर तो जरूर उस ने कभी न कभी अपना काम कराने के लिए कर्मचारी को पैसा दिया होगा।  इस तरह काम कराने के लिए पैसा देना भी तो बेईमानी और भ्रष्टाचार है। इस तरह तो भारत की सम्पूर्ण आबादी बेईमान है। भारत बेईमानों का देश है। इस से निजात एक ही रीति से संभव है कि भारत की तमाम आबादी नष्ट हो जाए। फिर नए सिरे से ईमानदार लोग पैदा हों। नई सृष्टि की रचना हो। यानी प्रलय और पुनः सृजन। यह तो अनीश्वरवादी सांख्य का दृष्टिकोण है जो चिपलूनकर जी के माध्यम  से निसृत हुआ है। 
सा भी नहीं था कि इस पोस्ट पर सारे ही स्वर निराशावादी हों, कुछ स्वर ऐसे भी थे जिन में आशा झलकती थी। Blogger प्रवीण पाण्डेय का कहना था -यही समय है, कमर कसने के लिये। Udan Tashtari वाले समीरलाल जी का कह रहे थे - हद हो चुकी है अब!Blogger राज भाटिय़ा  कहना था -ये ही वे लोग हैं जो चाहें तो दुनिया को पलट सकते हैं।जी आप की इस बात से मै शत प्रति शत सहमत हुं, ओर जिस दिन इस जनता मे एक जुटता आ गई उस दिन इन नेताओ को भागना भी कठिन होगा, ओर यह दिन अब दुर नहीDeleteBlogger Rangnath Singh ने कहा - दुष्यंत के शब्दों में कहें तो, हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए..Blogger निर्मला कपिला जी  का कहना था कि, - 'ये सभी कर्मचारी केवल इतना संकल्प कर लें कि वे सरकारी मशीनरी में कोई भ्रष्टाचार नहीं करेंगे और न होने देंगे। जो भी भ्रष्ट आचरण करेगा उस के विरुद्ध समूहबद्ध हो कर खड़े हो जाएंगे और तब तक चैन से नहीं बैठेंगे जब तक कि भ्रष्टाचार जड़ से समाप्त नहीं हो जाए।' निश्चित रूप से यही विकल्प बचा है लेकिन क्या आम आदमी इस रोग से अछूता है? आखिर हम जैसे लोग भी तो इसमे लिप्त हैं। फिर भी अगर चन्द बचे हुये ईमानदार कोशिश करें तो जरूर सुधार हो सकता है।Blogger रमेश कुमार जैन ने कहा -आपके पोस्ट और टिप्पणियों में व्यक्त विचारों से सहमत हूँ।  मगर कई अन्य लेखकों के विचार भी तर्क पूर्ण है. उनके तर्कों नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। 
जैसा भी समाज और राज्य व्यवस्था मौजूदा समय में है, निश्चित रूप से वह ठीक नहीं। मनुष्य जीवन बहुत बदसूरत हो चला है। उसे यदि ठीक करना है और एक नई खूबसूरत दुनिया बनानी है तो जो कुछ है और जहाँ है उसी से आरंभ करना होगा। कुछ लोगों ने यह भी सही कहा कि सब कुछ ऊपर से चल रहा है, वहीं से दुरुस्त हो सकता है। लेकिन हम तो सब से नीचे बैठे हैं, उसे दुरुस्त कैसे करें?  तो भाई ऊपर चलना होगा। कुतुब की मरम्मत करनी है, ऊपर की मंजिल से आरंभ करनी है। हम नीचे खड़े हैं, ऊपर जाना है। पहले सीढ़ियाँ चढ़ कर ऊपर तक पहुँचना होगा। फिर उस के लिए आरंभ नीचे से ही करना होगा। कुतुब की पहली सीढ़ी नीचे ही है जिस पर हम पैर रख कर ऊपर चढ़ेंगे। निश्चित रूप से हमें खुद से, अपने आसपास से आरंभ करना होगा। हम जहाँ हैं वहाँ से इस का आरंभ कर सकते हैं। यह आरंभ कैसे करें? यह मैं बताउंगा तो आप उसे मानेंगे नहीं, और उसे स्वीकार भी नहीं करेंगे, इसलिए नहीं बताउंगा। आप खुद अपने आसपास तलाश कीजिए, कि आप कैसे आरंभ कर सकते हैं?
 

गुरुवार, 27 जनवरी 2011

सोनवणे की शहादत अपना मोल वसूल कर सकती है

तिरिक्त कलेक्टर यशवंत सोनवणे को तेल माफिया द्वारा जिंदा जलाकर मारने के विरोध में महाराष्ट्र के 18 लाख सरकारी कर्मचारी आज हड़ताल पर रहे। कर्मचारियों के इस दबाव में महाराष्ट्र सरकार को मजबूर कर दिया कि वह तेल माफिया के खिलाफ दिखाई देने वाली कार्यवाही करे। आज ही महाराष्ट्र में करीब 200 जगहों पर तेल में मिलावट करने वालों पर छापा डाला गया है। और इस कार्रवाई में अब तक 180 लोगों को गिरफ्तार करने की सूचना है। पुलिस ने इस हत्याकांड के 11 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। लेकिन महाराष्ट्र में यह आम चर्चा है कि तेल माफियाओं की कमान प्रदेश के राजनेताओं के हाथों में है, कहीं कहीं दबी जुबान से इस बात को मीडिया ने भी कहा है।उधर नई दिल्ली में भी केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी ने आपात बैठक बुलाई है जिस में तेल कंपनियों के अधिकारी और अन्य वरिष्ठ अधिकारी भाग ले रहे हैं। इस बैठक का दिखता हुआ  उद्देश्य देश भर में पेट्रोल में चल रहे मिलावट के गोरखधंधे पर लगाम लगाने के लिए योजना बनाना है।
प्रश्न सामने हैं कि महाराष्ट्र सरकार, उस की पुलिस और केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्रालय यह सब कार्यवाही करने के लिए अब तक क्या यशवंत सोनवणे की हत्या किए जाने की प्रतीक्षा कर रहा था? यह सब कार्यवाही पहले क्यों नहीं की जा सकती थी? क्या ये सब कार्यवाहियाँ लगातार नहीं चलती रहनी चाहिए थीं? वास्तविकता यह है कि यशवंत सोनवणे की हत्या से महाराष्ट्र सरकार, उस की पुलिस और केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्रालय को कोई फर्क नहीं पड़ता। ये सब उसी मशीनरी के हिस्से हैं जो इस माफिया को पनपाता है। इस व्यापार में इन सब की भी कहीं न कहीं भागीदारी है। फिर भी महाराष्ट्र सरकार, उस की पुलिस और केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्रालय को कार्यवाही इसलिए करनी पड़ रही है कि इस घटना ने महाराष्ट्र के सरकारी कर्मचारियों, तेल उपभोक्ताओं और आम जनता को उद्वेलित किया है। उद्वेलित जनता कुछ भी कर सकती है। उसी के भय से इन्हें यह सब करना पड़ रहा है। हमारा अनुभव है कि समय गुजरने के साथ ये सब कार्यवाहियाँ दिखावा या आत्मरक्षा के लिए की गई फौरी कार्यवाहियाँ साबित होती हैं।
न 18 लाख सरकारी कर्मचारियों में, जो आज हड़ताल पर रहे हैं अधिकांश ईमानदार हैं। वे अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वाह करते हैं  और उन्हें जो कुछ वेतन के रूप में मिलता है उसी से अपना जीवन यापन करते हैं या फिर कुछ कमी हो तो उस के लिए नौकरी के बाद कुछ न कुछ काम करते हैं। वे श्रमजीवी हैं, वे ही हैं जो सारी मार झेलते हैं, चाहे वह महंगाई हो, या फिर मिलावट कर के फैलाया जा रहा ज़हर हो। ये ही वे लोग हैं जो चाहें तो दुनिया को पलट सकते हैं। कमी है तो इस बात की है कि उन्हें अपनी इस शक्ति का बोध नहीं है। उस के इस्तेमाल के लिए वे उस तरह से संगठित भी नहीं हैं जैसे उन्हें होना चाहिए था। यह ही वह शक्ति है जो केवल दिनों में नहीं घंटों में भ्रष्टाचार से निपट सकती है, उसे क़ब्र में दफ़्न कर सकती है। केवल एक चेतना और एक साथ कार्यवाही करने की क्षमता इन में उत्पन्न हो जाए तो यह बात कोई स्वप्न नहीं है, यह हो सकता है और एक दिन हो कर रहेगा। ये सभी कर्मचारी केवल इतना संकल्प कर लें कि वे सरकारी मशीनरी में कोई भ्रष्टाचार नहीं करेंगे और न होने देंगे। जो भी भ्रष्ट आचरण करेगा उस के विरुद्ध समूहबद्ध हो कर खड़े हो जाएंगे और तब तक चैन से नहीं बैठेंगे जब तक कि भ्रष्टाचार जड़ से समाप्त नहीं हो जाए। निश्चित रूप से महंगाई, भ्रष्टाचार, मिलावट के ज़हर से सताई हुई जनता भी इन्हीं के साथ खड़ी होगी। यह वक्त है जब वे यह संकल्प कर सकते हैं और उस पर चल सकते हैं। यही वह रास्ता है जिस से यशवंत सोनवणे की शहादत अपना मोल वसूल कर सकती है।

बुधवार, 26 जनवरी 2011

जनशिक्षण और जनसंगठन के कामों में तेजी लानी होगी

ज से 61 वर्ष पूर्व दुनिया का सब से बड़ा लिखित संविधान अर्थात हमारे भारत का संविधान लागू हुआ। इसे भारत की संविधान सभा ने निर्मित किया। संविधान सभा का गठन ब्रिटिश सरकार के तीन मंत्रियों के प्रतिनिधि मंडल, केबीनेट मिशन  ने  किया था। इस मिशन का मुख्य कार्य भारत की राजसत्ता को भारतियों के हाथों हस्तांतरण करना था। इस ने ब्रिटिश भारत के प्रांतों के चुने हुए प्रतिनिधियों, रजवाड़ों के प्रतिनिधियों तथा भारत के प्रमुख राजनैतिक दलों से बातचीत की जिस के परिणाम स्वरूप यह संविधान सभा अस्तित्व में आयी। इस संविधान सभा में आरंभ में 389 सदस्य थे, जिन में 292 सदस्य प्रान्तों की विधानसभाओं के द्वारा चुने हुए थे, 93 सदस्य रजवाड़ों के प्रतिनिधि थे, 4 सदस्य कमिश्नर प्रान्तों के थे। बाद में 3 जून 1947 की माउण्टबेटन योजना के अन्तर्गत भारत का विभाजन हो जाने के फलस्वरूप पाकिस्तान के लिए अलग संविधान सभा गठित की गई और कुछ प्रान्तों के प्रतिनिधियों की सदस्यता समाप्त हो जाने के कारण अंततः इस की सदस्य संख्या 299 रह गई।

स संविधान का निर्माण  का आधार इस के प्रतिनिधियों ने इस आधार पर किया कि देश के सभी वे वर्ग जिन की आवाज उठाने वाले लोग मौजूद थे संतुष्ट किया जा सके। हालाँकि संविधान सभा में ऐसे लोग प्रभावी थे जिन की दूरदर्शिता पर यकीन किया जा सकता था, फिर भी सभी तत्कालीन दबाव समूहों को प्रसन्न रखने की दृष्टि ने इस दूरदृष्टि को बहुत कुछ धुंधला किया था। यह एक महत्वपूर्ण कारण था कि हमारा संविधान देश के विकास और भविष्य के लिए कोई स्पष्ट नीति और लक्ष्य रखने में असमर्थ रहा। यदि उस में स्पष्टता रखी जाती तो हो सकता था कि सब की संतुष्टि नहीं होती और एकजुट भारत के निर्माण में बाधा उत्पन्न होती। लेकिन यह संतुष्टि फौरी ही साबित हुई। हर कोई दबाव समूह अपने सपनों का भारत देखना चाहता था। और पहले चुनाव के पहले ही हर दबाव समूह ने अपनी ताकत को बढ़ाने के लिए काम करना आरंभ कर दिया। कालांतर में इन की गतिविधियों ने ही देश और संविधान को वर्तमान रूप की ओर आगे बढ़ाया। 
म जानते हैं कि जो भारत ब्रिटिश साम्राज्य ने हमें सौंपा वह आधा-अधूरा था। उस के दो टुकड़े कर दिए गये थे। जिन का आधार साम्प्रदायिक था। इसी ने भारत में सम्प्रदायवाद को इतना मजबूत किया कि उस विष-बेल के प्रतिफल आज तक स्वतंत्र भारत में पैदा हुई पीढ़ी भुगत रही है। नवजात आजाद भारत में सामंतवाद गहराई से मौजूद था। सभी सामंत अपने अपने हितों को सुरक्षित रखना चाहते थे। हालांकि सामंतवाद की नींव को खोखली करने वाला और उसे समाप्त करने की जिम्मेदारी वहन करने वाला पूंजीपति वर्ग भी कम मजबूत न था। उस ने आजादी के आंदोलन के दौरान ही प्रमुख राजनैतिक दल कांग्रेस में अपनी जड़ें गहरी कर ली थीं। एक तीसरा वर्ग था, जिस की आजादी के आंदोलन में प्रमुख भूमिका थी। यह भारत की विपन्न जनता थी, इस की एकजुटता ही वह शक्ति थी जिस के बल पर आजादी संभव हो सकती थी। यह भारत का विपन्न किसान था जो सामंतों की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था, सामंतों की सारी संपन्नता जिस के बल पर कायम थी,  यह कारखानों में काम करने वाला मजदूर था जिस के श्रम ने भारत के पूंजीपति को मुकाबला करने की शक्ति प्रदान की थी। ये दोनों विशाल वर्ग दबाव समूह तो थे ही लेकिन नेतृत्व में इन का हिस्सा बहुत छोटा था। 
किसान और मजदूर जनता की संख्या विशाल थी और जिस तरह का  संविधान निर्मित हुआ था उस की आवश्यक शर्त यह थी कि इस विशाल जनसंख्या से हर पाँचवें वर्ष सहमति प्राप्त कर के ही कोई सरकार इस देश में बनी रह सकती थी। पहले आम चुनाव ने कांग्रेस को विशाल बहुमत प्रदान किया। लेकिन जो लोग चुने जा कर संसद पहुँचे उन में से अधिकांश पहले दो वर्गों, सामंतों और पूंजीपतियों के प्रतिनिधि थे। पूंजीपतियों को पूंजीवाद की बेहतरी चाहिए थी तो सामंतों को अपने अधिकारों की सुरक्षा। लेकिन दोनों के हित टकराते थे। पूंजीपति उदीयमान शक्ति थे लेकिन उन की बेहतरी इस बात में थी कि देश में सामंती संबंध शीघ्रता से समाप्त हों। जमीनें और किसान सामंतों से आजाद हो जाएँ। किसान भी सामंतों से आजादी चाहते थे। लेकिन मजदूर वे ताकत थे जो पूंजीपतियों से बेहतर सेवा शर्तें चाहते थे और किसानों के ही पुत्र थे।  किसान और मजदूरों जल्दी संगठित और शिक्षित होना पूंजीपति वर्ग के लिए बहुत बड़ा खतरा था। क्यों कि ये ही थे जो पूंजीपति वर्ग के अनियंत्रित विकास के विरुद्ध था और अपने लिए बेहतर जिन्दगी की मांग करता था। आजादी के आंदोलन ने इसे असहयोग की ताकत को समझा दिया था। 
ही वह कारण था जिस ने पूंजीपति और सामंती वर्गों को एक दूसरे के सब से बड़े शत्रु होते हुए भी मित्रता के लिए बाध्य कर दिया, दोनों में भाईचारा उत्पन्न किया। अब दोनों की चाहत यही थी कि भारत की संसद में जो प्रतिनिधि पहुँचें वे उन के हित साधक हों लेकिन इतने होशियार, चंट चालाक भी हों कि किसानों, मजदूरों, खुदरा दुकानदारों आदि को एन-केन-प्रकरेण उल्लू बना कर हर पाँच वर्ष बाद चुन कर संसद में पहुँच जाएँ और उन के हितों की रक्षा करते रहें। आजादी के बाद का भारत का इतिहास इसी खेल की कहानी है। राजनैतिक दल इसी खेल का हिस्सा हैं। देश की नौकरशाही राजनैतिक दलों और प्रभुवर्गों के बीच संबंधों को बनाए रखने का काम करती है। यह खेल पर्दे के पीछे काले धन और भ्रष्टाचार के व्यापार के बिना चल नहीं सकता। इस व्यापार के दिन दुगना और रात चौगुना बढ़ने का कारण यही है। यह रुके तो कैसे? यही तो प्रभुवर्गों का प्राणरक्षक है।
क ओर दोनों प्रभुवर्गों का प्रतिनिधित्व करने वाले दल हैं जो जनता को उल्लू बनाते हैं और हर पाँच वर्ष बाद संसद में पहुँच जाते हैं। दूसरी ओर किसानों और मजदूरों का प्रतिनिधित्व करने वाले दल भी हैं, लेकिन वे कमजोर हैं और बंटे हुए हैं। प्रभुवर्ग भी यही चाहते हैं कि इस श्रमजीवी जनता का प्रतिनिधित्व करने वाली राजनीति कमजोर और बंटी हुई ही रहे। यही कारण है कि इन का प्रतिनिधित्व करने वाले दोनों बड़े दल और उन के सहायक दल जनता को बाँटने वाली राजनीति का अनुसरण करते हैं और जनता में विद्वेष फैलाने का कोई अवसर नहीं छोड़ते। चाहे वह सम्प्रदायवाद हो, जातियों पर बंटी हुई राजनीति, घोर अंध राष्ट्रवाद हो या कोई और तरीका। हमारी जनता की पुरानी मान्यताएँ इन का साथ देती हैं। इस के मुकाबिल श्रमजीवी जनता की राजनीति अत्यन्त कठिन और दुष्कर है। उसे इन सब चीजों से जूझना पड़ता है। जनता को लगातार शिक्षित और संगठित करना पड़ता है। श्रमजीवी जनता की राजनीति इसी काम में बहुत पिछड़ी हुई है। जनता के साथ संपर्क के साधनों और मीडिया पर दोनों प्रभुवर्गों का कब्जा उस के इस काम को और दुष्कर बनाता है। यदि श्रमजीवी जनता को मुक्त होना है तो उन के अगुआ लोगों को जनशिक्षण और जनसंगठन के कामों में तेजी लानी ही होगी। यही एक मार्ग है जिस से देश की श्रमजीवी जनता को जीवन की कठिनाइयों से मुक्ति प्राप्त हो सकती है और हम भारत को एक स्वस्थ जनता के जनतांत्रिक गणतंत्र बना सकते हैं।

सोमवार, 24 जनवरी 2011

शादी में रोला और हाड़ौती साहित्यकार गिरधारी लाल मालव जी से मुलाकात

रसों रात ही यह तय हो गया था कि रविवार को यहाँ से पचास किलोमीटर दूर स्थित कस्बे अन्ता में एक शादी में जाना है। इस तरह की शादी में जाना हमेशा इस दृष्टि से लाभदायक रहता है, कि उस में बहुत लोगों से मिलना जुलना होता है, जिन में अधिकतर रिश्तेदार होते हैं। रिश्तेदारों से मिलना विवाह आदि समारोहों में ही हो पाता है। एक समारोह बहुत सी पिछली यादें ताजा कर देता है। मैं पत्नी-शोभा को तो जाना ही था। शोभा की एक बहिन और उस के जेठ का पुत्र भी आ गए। इस तरह हमारी मारूती-800 के लिए सवारियाँ पूरी हो गईं। हम सुबह 11 बजे रवाना हो गए। कोई छह किलोमीटर चलने के बाद एक्सप्रेस हाई-वे पर पहुँच गए। यह हाई-वे अभी पूरा नहीं बना है लेकिन जितना बना है वह सुख देता है। हाई-वे पर एक-आध किलोमीटर ही चले होंगे कि समीर लाल जी का स्मरण हो आया। उन की उपन्यासिका 'देख लूँ तो चलूँ' परसों शाम ही मिली थी। उसे आधी ही पढ़ पाया था। लेकिन फिर भी मैं उन के अनुभव से अपने होने वाले अनुभव से तुलना करने लगा। लेकिन बहुत अंतर था। कुछ ही दूर चले थे कि एक लंबा ट्रक लेन पर तिरछा हो रहा था, उस का अगला एक्सल टूटा पड़ा था। गाड़ी निकलने का स्थान न था। कार को वापस मोड़ा और पिछले कट से वापसी की लेन पकड़ी, सामने वाले को नजर आ जाएँ इस लिए दिन में सवा ग्यारह पर भी कार की हेडलाइट चालू कर ली। कोई एक किलोमीटर आगे कट मिला वहाँ से अपनी लेन पर आए। हम ने कार की गति बढ़ाई तो, सौ तक ले गए लेकिन उसे सुरक्षित न जान कर अस्सी-नब्बे के बीच चलना ठीक समझा। अब समीर जी की कार जैसा क्रूज तो मारूती-800 में था नहीं, इस लिए एक्सीलेटर भी संभालना पड़ा और स्टीयरिंग भी। बीस किलोमीटर चलने पर टोल मिला तो उस ने आने-जाने के पचास रुपये ले लिए। इस राशि में कोटा से अंता एक आदमी बस से जा कर लौट सकता था।
जिस धर्मशाला में विवाह का प्रोग्राम हो रहा था, उस के बाहर की सड़क पर सब्जी मंडी लगी थी। बीच की सड़क पर पहले से इतने वाहन खड़े थे कि वहाँ पार्क करना आसान नहीं था। हम ने बाकी सब को वहीं उतारा और पास सौ मीटर के दायरे में एक अन्य संबंधी के घर के बाहर कार को पार्क किया। उन के यहाँ अंदर गए तो स्वागत में पानी का एक गिलास मिला। मुझे लगा कि अंदर गृहणी रसोई में चाय के लिए खटपट कर रही है। मैं ने जोर से आवाज लगाई -चाय मत बनाना, मैं चाय नहीं पीता, बीस साल हो गए छोड़े हुए। मेजबान ने तुरंत कॉफी का ऑफर दिया जो कुछ ही देर में बन कर आ गई। अब अंदर कुछ भी चल रहा हो, अपनी तो पौन घंटे के कार चालन के बाद कॉफी का जुगाड़ हो ही गया। कॉफी जुगाड़ने की अपनी यह तरकीब अब तक सौ-फीसदी कामयाब रही है। कभी असफलता नहीं मिली। 
मैं वापस पहुँचा तो दूल्हे का यज्ञोपवीत संस्कार अंतिम चरण में था। दूल्हा अपने गुरू के लिए भिक्षाटन पर निकला था। भिक्षा पात्र में कोई सौ रुपए एकत्र हुए, दानदाताओं ने इस काम में बहुत कंजूसी की। कुछ देर बाद ही फिर से दूल्हा भिक्षाटन के लिए निकल पड़ा। इस बार भिक्षा माँ की भेंट के लिए थी। इस बार लोगो की कंजूसी कम हो गई। लोग पचास-बीस और दस के नोट अपने बटुओं में से निकाल कर डालने लगे। इस दौर में पिछले दौर के मुकाबले कम से कम दस गुना राशि भिक्षा पात्र में प्राप्त हुई। गणित साफ थी पहले वाली कमाई तो यज्ञोपवीत संस्कार कराने वाले पंडित को मिलनी थी, इस बार दूल्हे की माँ को। पहली वाली में रिटर्न की गुंजाइश शून्य थी,  दूसरी में भरपूर। वैसे यह परिणाम नया नहीं है। कोई सैंतालीस बरस पहले जब मेरी जनेऊ हुई थी तब भी माजरा ऐसा ही था, फर्क था तो इतना कि तब अनुपात 1:10 का न हो कर 1:4 का रहा होगा। यज्ञोपवीत संस्कार के संपन्न होते ही। लोग छोटे बड़े थैले ले आगे बढ़ने लगे, दूल्हे, उस के माता-पिता और परिजनों को भेंट देने के लिए कपड़े लाए थे। दूल्हे के पिता ने दूल्हे के अतिरिक्त शेष लोगों को कपड़े पहनाने के लिए मना करते हुए क्षमा मांगी। वहाँ रौला मच गया। लोग तो पैसा खर्च कर के कपड़े आदि लाए थे। उन्हें इस में अपनी हेटी जान पड़ी। 
वास्तव में अब कुछ लोगों का मंतव्य यह बनने लगा है कि यह कपड़े पहनाने  की कुरीति बंद होनी चाहिए। इस में फिजूलखर्ची बहुत होती है। बात तो सही और उचित है, लेकिन जब भी कोई इस के लिए आगे बढ़ता है ऐसे ही बाधा आ जाती है। कपड़े पहनाने वाले जोर से बोलने लगे। उन में एक को बहुत तकलीफ हो रही थी। वह  व्यक्ति दूल्हे की माँ को राखी बांधता था, और कम से कम पचास हजार खर्च कर कपड़े ले कर आया था। मैं उसे पास के कमरे में ले गया। समझाया तो उस की रुलाई फूट पड़ी, कहने लगा। बरसों से बहन मुझे राखी बांधती है, बड़ी हसरत से आज उस के सारे परिवार के लिए कपड़े ले कर आया हूँ तो यह देखना पड़ा है। मैं सगा भाई होता तो शायद ऐसा न होता। गलती तो दूल्हे के पिता की भी थी। उस ने जो कदम उठाया वह सुधार का अवश्य था। पर इन लोगों को पहले से इस बात से अवगत कराना था। कम से कम उन के मन की हसरतें वहीं शांत हो जातीं, और खर्च भी न होता। पर गलती तो हो चुकी थी। यदि वह अपना निश्चय तोड़ता तो यह दूसरी गलती होती, सुधार का एक कदम पीछे लौट जाता। खैर, समझाने पर थोड़ी देर में रोला खत्म हो गया। लोगों को भोजन के लिए आमंत्रण मिला तो सब भोजन स्थल की चल पड़े। 
दोपहर का भोजन आशा से बहुत अधिक अच्छा था। लेकिन उस में हाड़ौती के स्थाई पुराने मेनू  के नुकती (बूंदी)  और नमकीन सेव गायब थे। नुकती का स्थान मूंगदाल के हलवे और सेव का स्थान तले हुए पोहे की बनी खट्टी-मीठी नमकीन ने ले ली थी।  भोजन के बाद कुछ कार्यक्रम था। सब लोग उस की तैयारी करने लगे। मुझे उस में रुचि कम थी। भोजन स्थल से कोई दो किलोमीटर दूर गाँव बरखेड़ा में हाड़ौती के साहित्यकार कवि गिरधारी लाल मालव का निवास है। मैं चुपचाप कार में बैठा और उस तरफ चल पड़ा। 

मालव जी के घर के पिछवाड़े की बगीची

मालव जी के घर के पीछे आंगन में विश्राम करती भैंसें



मालव जी
मालव जी घर पर न थे, उन की बेटी मिली जो निकट के ही एक घर से उन्हें बुलाने चली। मैं भी उस के साथ ही चला। वह घर के भीतर गई मैं बाहर रुक गया। मिनट भर बाद ही मालव जी बाहर आ गए। मुझे देखते ही उन की बाँछे खिल गई, उन्हों ने मुझे बाजुओं में जकड़ कर भींच लिया। हम उन के घर के पिछवाड़े खुले में आ बैठे। जिस के एक और उन का घर था दूसरी ओर छोटी सी बगीची, जिस में उन्हों ने शिव मंदिर बनाया हुआ है। मालव जी अध्यापक थे। कोई चौदह वर्ष से सेवा निवृत्त हो गए हैं। उम्र अब 72 की है। उन का घर अभी भी मिट्टी की कच्ची दीवारों और खपरैल की छत का है। हम वृक्ष के पत्तों से छन कर आयी धूप में बैठ गए। बातें करने लगे। हाड़ौती की कविता, गीतों की बात हुई, गद्य की बात हुई। मुझे पता न था। कि उन का एक कहानी संग्रह और एक उपन्यास प्रकाशित हो चुका है। उन्हों ने दोनों मुझे भेंट किए। उन्हें ब्लागीरी की कोई जानकारी न थी। जब मैं ने उन्हें बताया कि मैं साल में एक पोस्ट मकर संक्रांति पर हाड़ौती में लिखता हूँ तो उन्हें बेहद खुशी हुई। मैं चाय नहीं पीता तो हम ने एक एक कप दूध पिया। उन के अपने घर की भैंसों का शुद्ध दूध। उसे पी कर मुझे मेरे बचपन की स्मृति हो आई। वे अपनी योजनाओं के बारे में बताने लगे, वे हाड़ौती के साहित्य के इतिहास पर कुछ लिखना चाहते हैं।  मैं ने उन्हें कहा कि वे इसे जल्दी लिखें, यह एक धरोहर बनने वाला है। साढ़े चार बजते-बजते फोन की घंटी बज गई। मेरे लिए बुलावा था। मैं ने उन से विदा चाही। वे मुझे सड़क तक छोड़ने आए। हम दोनों ने ही जल्दी फिर मिलने की आस जताई। मैं वापस विवाह स्थल पहुँचा तो शोभा अपनी बहिन सहित वापसी के लिए तैयार थी। शोभा की बहिन को शाम को कोटा में एक और विवाह में जाना था। हम तुरंत ही लौट पड़े। मालव जी की दो पुस्तकें मेरे लिए अमूल्य भेंट हैं। न जाने क्यों पिछले तीन दिनों से पुस्तकें मिल रही हैं। दो दिन पहले ही महेन्द्र नेह के घर गया था। वहाँ से सात पुस्तकें मुझे मिलीं, परसों शाम समीर जी की उपन्यासिका और अब कल ये दो पुस्तकें। लगता है अगला सप्ताह इन्हें पढ़ने में बीतेगा।  

मालव जी कुछ सोचते हुए
मालव जी अपने उपन्यास के साथ



















शनिवार, 22 जनवरी 2011

अंधे आत्महत्या नहीं करते

अंधे आत्महत्या नहीं करते

  • दिनेशराय द्विवेदी

जिधर देखते हैं,
अंधकार दिखाई पड़ता है,
नहीं सूझता रास्ता,
टटोलते हैं आस-पास
वहाँ कुछ भी नहीं है, जो संकेत भी दे सके मार्ग का

तब क्या करेगा कोई?
खड़ा रहेगा, वहीं का वहीं,
या चल पड़ेगा किधर भी।
चाहे गिरे खाई में या टकरा जाए किसी दीवार से
या बैठ जाए वहीं और इंतजार करे 
किसी रोशनी कि किरन का,
या लमलेट हो वहीं सो ले।

लेकिन एक आदमी है 
जो ऐसे में भी रोशनी की किरन तलाश रहा है।
उस की दो आँखें 
अंधेरे में देखने का अभ्यास करने में मशगूल हैं
वह जानता है कि सारे अंधे आत्महत्या नहीं करते
जीवन जीते हैं, वे

आप जानते हैं? इस आदमी को
नहीं न? 
मैं भी नहीं जानता, कौन है यह आदमी?

पर जानता हूँ 
यही वह शख्स है 
जो काफिले को ले जाएगा, उस पार
जहाँ, रोशनी है।

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शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

बलात्कार की रपट थाने में नहीं उच्च न्यायालय में दर्ज कराएँ

क महिला के साथ छेड़छाड़ हो जाए, यह केवल सारे समाज के लिए शर्म की बात ही नहीं है, अपितु भारतीय दंड संहिता में अपराध है, जिस के लिए अपराधी को दंडित कराने की जिम्मेदारी सरकार की है। सरकार ने यह जिम्मेदारी अपनी पुलिस को सौंपी हुई है। पुलिस इस तरह के मामलों में किस तरह का बर्ताव करती है, यह सर्वविदित है। पुलिस को इस तरह के छोटे-मोटे मामलों पर शर्म नहीं आती। आए भी क्यों जब पुलिस महानिदेशक ऐसा करे तो साधारण पुलिस वाले तो उस का अनुकरण कर ही सकते हैं।
लो छेड़छाड़ की बात छोड़ दी जाए। किसी महिला के साथ बलात्कार हो, वह भी एक के साथ नहीं, एकाधिक महिलाओं के साथ और एक बार नहीं, पूरे सप्ताह भर तक; फिर यह सब करें पुलिस वाले, वह भी पुलिस थाने में और पुलिस थाने से महिला की आँखों पर पट्टी बांध कर कहीं और ले जा कर।   पुलिस को इस पर भी शर्म आने से रही। शायद वे ऐसा न करें तो उन की मर्दानगी पर लोग सन्देह जो करने लगेंगे। फिर जब वे महिलाएँ पुलिस के उच्चाधिकारियों के पास जा कर अपनी रिपोर्ट दर्ज करने की कहें और उच्चाधिकारी सुन लें यह कदापि नहीं हो सकता। वे ऐसा कैसे कर सकते हैं? पुलिस महकमे की इज्जत जो दाँव पर लगी होती है। आखिर पुलिस महकमे की इज्जत किसी महिला की इज्जत थोड़े ही है जिस से जब चाहे खेल लिया जाए। 
ब महिलाएँ क्या करें? कहाँ जाएँ? महिलाओं ने हिम्मत की और उच्चन्यायालय को शिकायत लिखी। उच्च न्यायालय ने पुलिस से जब जवाब तलबी की तब  जा कर पुलिस ने महिलाओं के बयान दर्ज किए। पुलिस को अब भी विश्वास नहीं है कि उन के सिपाही ऐसा कर सकते हैं, यह करतब कर दिखाने वाली अंबाला पुलिस  का कहना है कि यह राजस्थान के बावरिया गिरोह की सदस्य महिलाएँ हैं और खुद पर लगे आरोपों से बचने के लिए उलटे पुलिस पर ऐसे आरोप लगा रही हैं। महिलाओं के आरोप हैं कि पुलिस वालों ने न केवल बलात्कार किया, उन्हें बिजली का करंट भी लगाया जिस से एक महिला का गर्भ गिर गया और यह भी कि एक महिला इस बलात्कार के परिणाम स्वरूप गर्भवती हो गयी। 
खैर, पुलिस आखिर अपने सिपाहियों और अफसरों का बचाव न करेगी तो जनता उस के चरित्र पर संदेह करने लगेगी। लेकिन अब जनता क्या समझे? ये कि अब किसी महिला के साथ बलात्कार हो तो उसे पुलिस में रिपोर्ट करने नहीं जाना चाहिए, बल्कि सीधे उच्च न्यायालय में रिपोर्ट दर्ज करानी चाहिए। यानी अब पुलिस थाने का काम उच्च न्यायालय किया करेंगे?  
पुलिस द्वारा रिपोर्ट दर्ज न करने का किस्सा आम है। एक आम आदमी, जब भी उसे पुलिस में किसी अपराध की रिपोर्ट दर्ज करानी हो तो किसी रसूख वाले को क्यों ढूंढता है? यह किसी एक राज्य का किस्सा नहीं है, कुछ अपवादों को छोड़ दें तो पूरे भारत में पुलिस का यह चरित्र आम है। तो फिर क्यों नहीं पुलिस के चरित्र को बदलने के बारे में गंभीरता से नहीं सोचा जाता। लगता है सरकारों, राजनेताओं और उन के आका थैलीशाहों को ऐसी ही पुलिस की जरूरत है।

गुरुवार, 20 जनवरी 2011

'राकेश' जी ने सिद्ध किया कि हाडौ़ती केवल बोली नहीं, एक स्वतंत्र भाषा है।

हाडौती को राजस्थानी की एक शैली के रुप में जाना जाता है। राजस्थान के हाडौ़ती अंचल की यह सर्वसामान्य बोली है। इसे हिन्दी की 48 बोलियों में से एक के रूप में भी जाना जाता रहा है। लेकिन बोली के पास एक लिपि और लिपिबद्ध सामग्री हो तो वह एक स्वतंत्र भाषा का दर्जा प्राप्त करने में सक्षम हो जाती है। लेकिन हाड़ौती को तो देवनागरी में बहुत पहले से लिखा और बोला जाता रहा है। इसे भाषा का दर्जा बहुत पहले प्राप्त था। आजादी के पहले जब कोटा को एक स्वतंत्र राज्य का दर्जा प्राप्त था तो समस्त राजकाज इसी भाषा में होता रहा। इस भाषा में लिखे गए दस्तावेज अभिलेखागारों में उपलब्ध हैं। लेकिन क्या भाषा के लिए इतना ही पर्याप्त है? शायद नहीं। उस के लिए यह भी आवश्यक है कि उस भाषा में पर्याप्त मात्रा में लिखा गया साहित्य भी हो। हाडौती के पास लिखा हुआ और छपा हुआ साहित्य शायद उस वक्त तक इतनी मात्रा में नहीं था। यही कारण है कि उसे एक भाषा कह पाना संभव नहीं हो पा रहा होगा। वैसे समय में एक व्यक्ति ने इस काम का बीड़ा उठाया। उस ने हाड़ौती में काव्य सृजन की परंपरा को आगे बढ़ाया। उस के प्रकाशन की व्यवस्था की और हाडौती में सृजित साहित्य की उपलब्धता बढ़ने लगी। आज अनेक कवि और लेखक हैं जिन्हें हाडौ़ती के साहित्यकार के रूप में पहचाना जाता है। लेकिन इस पहचान को बनाने में जिस व्यक्ति ने अहम् और केन्द्रीय भूमिका अदा की उस का नाम शांति भारद्वाज राकेश था।  जब तक हाड़ौती बोलने, लिखने और पढ़ने वाले रहेंगे, राकेश जी का नाम अमर रहेगा।
तीन दिन पहले राकेश जी नहीं रहे। एक लंबी बीमारी के उपरान्त उन का देहान्त हो गया। पहले भी वे ऐसे ही गंभीर रूप से बीमार हुए थे कि लोगों ने अस्पताल से लौट कर घर आने की संभावनाओं को अत्यंत क्षीण बताया। लेकिन हर बार उन की जिजिविषा उन्हें लौटा लाई और हर बार उन्हों ने लौट कर लेखन में नए कीर्तिमान स्थापित किए। कुछ दिन पहले अस्पताल में उन्हों ने ऐसा ही अभिव्यक्त किया था कि उन के दिमाग में पूरा एक उपन्यास मौजूद है, और ठीक हो कर घर लौटने पर वे उसे अगली बार बीमार हों उस के पहले पूरा कर देंगे। लेकिन प्रकृति ने उन्हें यह अवसर प्रदान नहीं किया। वे वापस नहीं लौटे। आज जब उन की शोक-सभा आयोजित हुई तो कोटा का शायद ही कोई अभागा साहित्य प्रेमी होगा जो वहाँ उपस्थित नहीं हो सका होगा। 
राकेश जी की कुल 15 पुस्तकें उन के जीवन काल में प्रकाशित हो चुकी थीं। सूर्यास्त उपन्यास, परीक्षित कथा काव्य, समय की धार काव्य, इतने वर्ष काव्य, पोरस नाटक और हाडौ़ती का प्रथम उपन्यास उड़ जा रे सुआ प्रमुख हैं। मुझे साहित्य से आरंभ से प्रेम था, लेकिन लेखन के नाम पर मेरे पास अपनी दो-चार कविताओं और इतनी ही कहानियों के अतिरिक्त कुछ न था। तब एक पत्रिका के विमोचन समारोह में अचानक ही मुझे बोल देने को कहा गया। वह भी मुख्य अतिथि शांति भारद्वाज राकेश के तुरंत बाद। संकोच के साथ मैं खड़ा हुआ और बोलने लगा तो बहुत समय ले गया। बाद में राकेश जी ने मुझे कहा कि तुम लिखते क्यों नहीं हो। मैं ने उन से कहा मैं गृहत्यागी हूँ, और अदालती दावे और दरख्वास्तें लिखता हूँ, उन्हें न लिखूंगा तो घर कैसे बसा सकूंगा। वे मुझे हमेशा लिखने को प्रोत्साहित करते रहे और जब भी लिखा। उन्हों ने उसे सराहा और शिकायत की कि मैं नियमित क्यों नहीं हूँ। उन्हें मेरे ब्लाग लेखन का पता नहीं था, होता तो शायद वे संतुष्ट होते। 
हाँ मैं उन की एक छोटी सी हाडौती कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ, यही मेरी उन के प्रति श्रद्धांजली है-

आप मरियाँ ही सरक दीखैगो
  • शांति भारद्वाज 'राकेश'

आज
अश्यो कुण छै- 
सत्त को सरज्यो 
ज्ये मेट द्ये
ईं गाँव की भूख?

कुण छै -
ज्ये धोळाँ दफैराँ 
चतराम द्ये 
ईं गाँव का सपना को उजास?

कुण छै-
ज्ये सणगार द्ये
ईं गाँव की मोट्याराँ की सळोटाँ
अर बाळकाँ की आस?

बात  को तोल 
अर धरम को मोल
म्हारों गाँव फेर सीखैगो
पण, बडा कह ग्या छै 
कै
आप मरियाँ ही सरग दीखैगो.

उन की विदाई में 'अनवरत' की आँखें नम हैं और सिर श्रद्धावनत।

बुधवार, 19 जनवरी 2011

भय के कारण को ही तुच्छ समझने की चेष्टा

गालियाँ दी जाती रही हैं, और दी जाती रहेंगी और चर्चा का विषय भी बनती रहेंगी। गालियाँ क्यों दी जाती हैं? इस पर खूब बातें हो चुकी हैं, लेकिन कभी कोई कायदे का शोध इस पर नहीं हुआ। शायद विश्वविद्यालयी छात्र का इस ओर ध्यान नहीं गया हो, ध्यान गया भी हो तो विश्वविद्यालय के किसी गाइड ने इस विषय पर शोध कराना और गाइड बनना पसंद नहीं किया  हो, और कोई गाइड बनने के लिए तैयार भी हो गया हो तो विश्वविद्यालय समिति ने इस विषय पर शोध को मंजूरी ही न दी हो। विश्वविद्यालय के बाहर भी किसी विद्वान ने इस विषय पर शोध करने में कोई रुचि नहीं दिखाई है, अन्यथा कोई न कोई प्रामाणिक ग्रंथ इस विषय पर उपलब्ध होता और लिखने वालों को उस का हवाला देने की सुविधा मिलती। मुझे उन लोगों पर दया आती है जो इस विषय पर लिखने की जहमत उठाते हैं, बेचारों को कोई संदर्भ ही नहीं मिलता। 
ब्लाग जगत की उम्र अधिक नहीं, हिन्दी ब्लाग जगत की तो उस से भी कम है। लेकिन हमें इस पर गर्व होना चाहिए कि हम इस विषय पर हर साल एक-दो बार चर्चा अवश्य करते हैं। इस लिए यहाँ से संदर्भ उठाना आसान होता है। मुश्किल यह है कि हर चर्चा के अंत में गाली-गलौच को हर क्षेत्र में बुरा साबित कर दिया जाता है और चर्चा का अंत हो जाता है।  ब्लाग पर लिखे गए शब्द और वाक्य भले ही अभिलेख बन जाते हों पर हमारी स्मृति है कि धोखा दे ही जाती है। साल निकलते निकलते हम इस मुद्दे पर फिर से बात कर लेते हैं।  कुछ ब्लाग का कुछ हिन्दी फिल्मों का असर है कि मृणाल पाण्डे जैसी शीर्षस्थ लेखिकाओं को भास्कर जैसे 'सब से  आगे रहने वाले' अखबार के लिए आलेख लिखने का अवसर प्राप्त होता है। वे कह देती हैं, "नए यानी साइबर मीडिया में तो ब्लॉग जगत गालीयुक्त हिंदी का जितने बड़े पैमाने पर प्रयोग कर रहा है, उससे लगता है कि गाली दिए बिना न तो विद्रोह को सार्थक स्वर दिया जा सकता है, न ही प्रेम को।" वे आगे फिर से कहती हैं, "पर मुंबइया फिल्मों तथा नेट ने एक नई हिंदी की रचना के लिए हिंदी पट्टी के आधी-अधूरी भाषाई समझ वालों को मानो एक विशाल श्यामपट्ट थमा दिया है।"
न्हें शायद पता नहीं कि यह हिन्दी ब्लाग जगत इतना संवेदनहीन भी नहीं है कि गालियों पर प्रतिक्रिया ही न करे, यहाँ तो गाली के हर प्रयोग पर आपत्ति मिल जाएगी। प्रिंट मीडिया में उन की जो स्थिति है, वे ब्लाग जगत में विचरण क्यों करने लगीं? वैसे भी अब प्रिंट मीडिया इतनी साख तो है ही कि वहाँ सुनी सुनाई बातें भी अधिकारिक ढंग से कही जा सकती हैं। फिर स्थापित लेखक लिखें तो कम से कम वे लोग तो विश्वास कर ही सकते हैं जो हिन्दी ब्लाग जगत से अनभिज्ञ हैं, यथा लेखक तथा पाठक। ब्लाग जगत का यह अदना सा सदस्य इस विषय पर शायद यह पोस्ट लिखने की जहमत न उठाता, यदि क्वचिदन्यतोअपि पर डा. अरविंद मिश्रा ने उस का उल्लेख न कर दिया होता।
न के इस कथन के पीछे क्या मन्तव्य है? यह तो  मैं नहीं जानता। पर कहीं यह अहसास अवश्य हो रहा है कि प्रिंट मीडिया में लिखने वालों को ब्लाग जगत के लेखन से कुछ न कुछ खतरे का आभास अवश्य होता होगा। कुछ तो सिहरन होती ही होगी। जब किसी को भय का आभास होता है तो प्राथमिक प्रतिक्रिया यही होती है कि वह उसे झुठलाने का प्रयास करता है। भय के आभास को मिथ्या ठहराने के प्रयास में वह भय के कारण को ही तुच्छ समझने की चेष्टा करता है। कहीं यही कारण तो नहीं था मृणाल जी के उस वक्तव्य के पीछे जिस में वे कहती हैं कि "ब्लॉग जगत गालीयुक्त हिंदी का जितने बड़े पैमाने पर प्रयोग कर रहा है, उससे लगता है कि गाली दिए बिना न तो विद्रोह को सार्थक स्वर दिया जा सकता है, न ही प्रेम को।" यदि उन का मंतव्य यही था तो फिर उन का यह वक्तव्य निन्दा के योग्य है। वह ब्लाग जगत के बारे में उन के मिथ्या ज्ञान को ही अभिव्यक्त करता है।

मंगलवार, 18 जनवरी 2011

सरकारों और निगमों की मर्जी से ही बनते हैं आदर्श सोसायटी और लवासा

आदर्श सोसायटी बिल्डिंग
देश की जनसंख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। नगर सुविधा संपन्न हैं और वहाँ पूर्णकालिक नहीं तो आंशिक रोजगार मिलने की संभावना सदैव बनी रहती है। नतीजा ये है कि नगरों की आबादी तेजी से बढ़ रही है। अब नगरों की इस आबादी को रहने का ठौर भी चाहिए। लेकिन जिस गति से आबादी बढ़ रही है उस गति से उन्हें आवास की वैधानिक सुविधा नहीं मिल पा रही है। वैधानिक सुविधा से मेरा तात्पर्य यह है कि आबादी भूमि पर नगर पालिका नियमों के अंतर्गत बने और मंजूरशुदा मकान लोगों को उपलब्ध नहीं हो रहे हैं। उस का एक प्रमुख कारण आवश्यक मात्रा में कृषि भूमि से नगरीय भूमि में रूपांतरण न होना है। राज्य सरकारें नगरों का विस्तार कर देती हैं। गजट में सूचना प्रकाशित हो जाती है कि अमुक-अमुक गाँवों को नगरीय सीमा में शामिल कर दिया गया है। लेकिन इन गावों की भूमि अभी भी कृषि भूमि में ही बनी हुई है। जिन के पास काला-सफेद धन है वे इस कृषि भूमि को खरीदते हैं, उन पर अपनी मर्जी के मुताबिक आवासीय योजना बनाते हैं और योजना के भूखंड बेच देते हैं। इन भूखंडों को जो लोग खरीदते हैं उन की  मंशा उन पर आवास बनाने की नहीं है। वे केवल उसे निवेश की दृष्टि से खरीदते हैं और रोक लेते हैं। एक कृषक द्वारा भूमि का विक्रय करते ही उस पर कृषि कार्य बंद हो जाता है। उन पर आवास निर्माण नहीं होता है। नतीजे के तौर पर भूमि कुछ बरसों के लिए बेकार हो जाती है।

लवासा (महाराष्ट्र)

ब राज्य सरकार भू-परिवर्तन के लिए नियम बनाती है। नियम ऐसे हैं कि केवल कॉलोनाइजर्स ही भू-परिवर्तन करा सकते हैं। लेकिन वे तो भूखंडों को अनेक लोगों को विक्रय कर चुके हैं। उन्हों ने अपना पैसा समेट लिया है और मुनाफा बना लिया है। वे आगे और कृषि भूमि खरीद रहे हैं, नयी योजनाएँ बना रहे हैं। अब जिन लोगों को ने भूखंड रोके हैं उन में से कुछ को पैसों की जरूरत है, वे खरीददार मिलने पर भूखंडों को बेच रहे हैं। खरीददारों में भी अधिकांश ने निवेश की दृष्टि से ही उन्हें खरीदा है। इक्का-दुक्का जरूरत मंदों ने भी खरीदा है, वे वहाँ मकान बना रहे हैं। भूमि अभी आबादी की नहीं है, इस कारण से नगर पालिका या विकास न्यास उन पर मकान बनाने की इजाजत नहीं दे सकता। 
कान फिर भी बन रहे हैं। कभी-कभी इन निर्माणों को रोकने की कवायद भी होती है, पर अधिकतकर अनदेखी होती है।  जैसे-जैसे मकान बनते रहते हैं जमीन की कीमतें बढ़ती रहती है। जब किसी योजना में तकरीबन आधे मकान बन चुके होते हैं तो सरकार भू-परिवर्तन नियमों में छूट देती है और उन का नियमन होने लगता है।इन योजनाओं में भूखंड हैं और सड़कें हैं। बिजली विभाग बिजली कनेक्शन देने में कोई आनाकानी नहीं करता। लेकिन पानी की सप्लाई नहीं है, हर घर में एक नलकूप बनता है। पानी की व्यवस्था भी हो गई है। लेकिन केवल इतना ही तो नहीं चाहिए। एक आबादी के बच्चों को खेल की जगह भी चाहिए, पार्क भी चाहिए और पेड़ पौधे भी। लेकिन वे इन योजनाओं से नदारद हैं। इस तरह हमारे नगर विकसित हो रहे हैं।
लवासा
रकारें और पालिकाएँ नगर की जरूरत को आँक कर, भूमि अधिग्रहण कर, लोगों को  समय पर आवास और आवास हेतु भूमि उपलब्ध कराए तो उन्हें राजस्व भी मिले। ठीक ढंग से योजनाओं में विकास भी हो, नागरिकों को उचित सुविधाएँ भी प्राप्त हों। लेकिन वह ऐसा नहीं करती। सरकार जब योजनाएँ बना कर भूखंड उपलब्ध कराती भी है तो चाहे वह नीलामी से बेचे या फिर आवेदन के आधार पर हर बार अधिकांश भूखंड उन्हीं के पास पहुँच जाते हैं जिन्हें उन में धन निवेश करना है। जरूरतमंद आदमी हमेशा एक उचित मूल्य के घर के लिए ताकता रहता है। एक सवाल यह भी उठता है कि सरकारें आवास की समस्या से निपटने में वाकई इतनी अक्षम हैं, या जानबूझ कर अक्षम बनी रहना चाहती हैं? इस प्रश्न का उत्तर सब को पता है कि सरकारें सक्षम हो जाएँ तो जिन लोगों के पास फालतू सफेद-काला धन है, उन्हें उसे दुगना-चौगुना अवसर कैसे मिले? 
ही कारण है कि देश में  आदर्श सोसायटी और लवासा जैसे कांड सामने आते हैं। अब इन पर कार्यवाही की जा रही है। लेकिन कितनी? हर नगर में एकाधिक आदर्श सोसायटियाँ और हर राज्य में लवासा जैसे एकाधिक नगर हैं।