@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत

शुक्रवार, 6 मार्च 2009

जी, वकालत करता हूँ।

अंग्रेजी शब्दों का हिन्दी में अनुवाद करना और उन का प्रचलित होना भी अजीब झमेला है।  भारत का हिन्दी बोलने और व्यवहार करने वाला क्षेत्र बहुत ही व्यापक है, और इसी लिए जो नतीजे सामने आते हैं वे भी बहुत विविध होते हैं।  अब अंग्रेजी में दो शब्द हैं, लॉ'यर (Lawyer) और एड'वॅकेट (Advocate)।  पहले शब्द का अर्थ होता है जो विधि (कानून) की जानकारी रखता है और उसी का व्यवसाय करता है।  दूसरे शब्द का अर्थ है किसी अन्य की पैरवी करने वाला।  भारत में अंग्रेजी का प्रभाव आरंभ होने के सदियों पहले से इन दोनों शब्दों के लिए एक बहुत ही सुंदर शब्द प्रचलित है 'वकील' जिस में ये दोनों भाव मौजूद हैं।  मुस्लिम निकाह के दौरान जहाँ वधू पर्दे में होती है और सब के सामने नहीं आ सकती, वहाँ वर की ओर से वधू को अपनी जीवन संगिनी बनाए जाने का प्रस्ताव ले कर वधू के पास जाने वाले और उस का उत्तर ले कर काजी तक पहुँचाने वाले व्यक्ति को भी वकील कहते हैं।  क्यों कि वह वर का प्रस्ताव ले जा कर वधू को देता है।  इस से यह स्पष्ट है कि इस शब्द में दूसरे की बात को किसी तीसरे के सामने रखने वाले व्यक्ति को वकील कहा जाता है।  सामान्य रूप से यदि कहीं किसी विवाद में हम अनपेक्षित रूप से किसी को अचानक किसी उपस्थित या अनुपस्थित व्यक्ति का तर्क सहित समर्थन करता देखें तो तुरंत उसे यह कह बैठते हैं कि, तुम उस के वकील हो क्या?  कुल मिला कर वकील एक व्यापक शब्द है जो अंग्रेजी के उक्त दोनों शब्दों के लिए पूरी तरह उपयुक्त है, व्यवहार में आसान है और इसलिए हिन्दी भाषियों के बीच बहुप्रचलित है।

लॉ'यर (Lawyer) शब्द जिन के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है, जरूरी नहीं कि वे किसी की पैरवी भी करते हों।  वे केवल कानून के व्याख्याकार भी हो सकते हैं।  किसी समस्या के समय उपस्थित होने वाले इस प्रश्न को कि, कानून उन्हें किस प्रकार से व्यवहार करने को कहता है?  हल करने वाले को भी लॉ'यर (Lawyer) कहते हैं।  भारत की अदालतों में जब पैरवी करने वालों के व्यवसाय के नियमन के लिए कानून की जरूरत हुई तो  एडवोकेट, शब्द का उपयोग हुआ और एडवोकेट एक्ट बनाया गया। जो व्यक्ति बार कौंसिल में पंजीकृत हो और व्यावसायिक रूप से अदालतों के समक्ष पैरवी करने को अधिकृत हो उसे एडवोकेट कहा गया।  इस कानून के पहले तक इस व्यवसाय को करने वालों को सामान्य रूप से वकील ही कहा जाता था।  वे लोग भी वकील कहे जाते थे जो बिना किसी विशिष्ठ शैक्षणिक प्रमाण पत्र या डिग्री के भी स्वयमेव अभ्यास से हासिल योग्यता के आधार पर पैरवी करने के लिए मान्यता हासिल कर लेते थे।  इस कानून के बनने के बाद बिना मानक शैक्षणिक योग्यता के पैरवी का अधिकार प्राप्त करना असंभव हो गया।

जब केवल मानक शैक्षणिक योग्यता वाले लोग ही वकील बनने लगे तो उन्हों ने खुद को पुराने अभ्यास के आधार पर वकील बने लोगों से खुद को अलग दिखाने के लिए खुद को एडवोकेट लिख कर प्रचारित करना प्रारंभ कर दिया जिस से वे ये दिखा सकें कि वे केवल अभ्यासी नहीं अपितु विधि स्नातक की योग्यता धारी वकील हैं।  जब अंग्रेजी शब्दों का हिन्दीकरण शुरू हुआ तो इस एडवोकेट शब्द का भी हिन्दीकरण आरंभ हो गया।  जो कहीं अभिभाषक हुआ तो कहीं अधिवक्ता हो गया।  इस का नतीजा यह हुआ कि यहाँ राजस्थान में हम एडवोकेट को अभिभाषक कहते हैं और बार ऐसोसिएशन अभिभाषक  परिषद लेकिन छत्तीसगढ़ में उसे हिन्दी में अधिवक्ता और अधिवक्ता संघ कहते हैं।  लेकिन यह लिखने भर को ही है।  एडवोकेट शब्द के लिए अब वकील शब्द ही सर्वाधिक उपयोग में लिया जाता है और वकीलों के संगठन के लिए बार एसोसिएशन शब्द।

शब्दों के उपयोग और उनके प्रचलन के अनेक आधार हैं।  यहाँ उन की चर्चा अप्रासंगिक होगी और उस का अधिकार केवल भाषा-शास्त्रियों को है, मुझे नहीं।  लेकिन शब्दों का उपयोग लोग अपनी सुविधा के अनुरूप करते हैं,  किसी कानून और कायदे से नहीं।  यही कारण है कि भाषाओं के विकास को कभी भी नियंत्रित किया जाना संभव नहीं हो सका है और न कभी हो पाएगा।  अंत में इतनी सी बात और कि कोई खुद को एडवोकेट, अभिभाषक, अधिवक्ता या वकील कुछ भी कहना-कहलाना पसंद करता हो लेकिन जब उस से पूछा जाता है कि वह क्या करता है तो वह यही कहता है,  जी, वकालत करता हूँ !

बुधवार, 4 मार्च 2009

दुर्ग जिला अदालत परिसर का हाल भी भारत भर जैसा ही बुरा

दुर्ग जिला न्यायालय परिसर में जब पाबला जी की वैन ने प्रवेश किया तो वहाँ का नजारा वैसा ही था जैसा लगभग सभी स्थानों पर अदालत परिसरों का है।  सारा खाली स्थान दुपहिया, चौपहिया वाहनों से अटा पड़ा था।  लगता था कि वैन अब रोकनी पड़ेगी।  पर पाबला जी का इस परिसर का अनुभव शानदार निकला। वे वैन को अंतिम छोर तक इस कुशलता से ले गए कि वैन को देख रहे दर्शक भी चकित रह गए।  वैन से उतरे तो सामने ही अभिभाषक परिषद का पुस्तकालय था।  मैं ने समय देखा तो दो बजने में कुछ मिनट शेष थे।  किसी को वहाँ न पा कर पाबला जी ने संजीव तिवारी को फोन किया।  कुछ देर बाद ही वे आ गए।  उन के साथ ही शकील अहमद थे।  हम ने सब से पहले पुस्तकालय देखा।  पुस्तकालय में पुस्तकें कोटा  अभिभाषक परिषद के पुस्तकालय से आधी से भी कम रही होंगी।  बताया कि पुस्तकालय अभी कुछ वर्षों पूर्व ही प्रारंभ हुआ है और धीरे धीरे इसे धनी बनाने के प्रयत्न जारी हैं।  पुस्तकालय में ही टीवी रखा था, कुछ वकील उसे देख रहे थे, कुछ पुस्तकें पढ़ने और तलाशने में मशगूल थे। 

जब मैं वकालत में आया तो अभिभाषक परिषद के पास न बाराँ में पुस्तकालय था और न ही कोटा में।  और तब दो या तीन जर्नलों से काम चल जाया करता था। एक एआईआर था जो सब वकील मंगाया करते थे।  एक फौजदारी का जर्नल होता था, एक रेवेन्यू का और एक राज्य स्तरीय जर्नल।  इन से काम चल जाता था।  इन जर्नलों में वे मुख्य मुकदमें प्रकाशित होते थे जिन में कोई नया कानूनी बिंदु तय हुआ करता था।  लेकिन फिर जर्नलों की एकाएक बाढ़ सी आ गई।  श्रम , उपभोक्ता, दुर्घटना, विवाह-परिवार, मकान मालिक किरायेदार आदि मामलों के अलग अलग जर्नल निकलने लगे। हर विषय पर दो-दो, चार-चार और उस से भी अधिक। उन में प्रतिस्पर्धा प्रारंभ हो गई।  जर्नलों के सालाना खंड़ो की संख्या दो से छह तक हो गई और उन में छपने वाले निर्णयों की बाढ़ आ गई।   जो कानूनी बिंदु एक मामले में तय हो चुका है उसी पर एक जैसे अनेक निर्णय़ जर्नलों में छपने लगे।  अब स्थिति यह हो गई है कि किसी भी जर्नल के एक खंड में नयी नजीर वाले मुकदमे इक्का दुक्का ही होते हैं शेष पिछले निर्धारित बिंदुओं को दोहराने वाले होते हैं।  अदालतें भी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बरसों पहले अंतिम रूप से निर्धारित बिंदु पर लेटेस्ट रूलिंग मांगने लगी हैं।  स्थिति यह है कि पचासों जर्नल खरीदना किसी भी वकील के बस का नहीं रह गया है और अभिभाषक परिषद के पुस्तकालय आवश्यक हो चले हैं।  लगभग सभी जिला स्तर की अभिभाषक परिषदों के पुस्तकालय विकास के दौर में हैं। 

शकील अहमद जी ने बताया कि कोई बड़ा कार्यक्रम नहीं रखा है।  केवल अभिभाषक संघ की कार्यकारिणी और कुछ वरिष्ठ सदस्यों के साथ ही बैठक रखी गई है जो कि संघ के कार्यालय में रख ली गई है।  कुछ देर में सभी वहाँ एकत्र हो रहे हैं।  मै ने तब तक न्यायालय परिसर देखना चाहा।  मैं और संजीव निकल पड़े।  कोई दस मिनट में हम पूरी इमारतों को एक नजर देखते हुए अभिभाषक संघ के कार्यालय पहुँचे।  जितनी अदालतों के लिए इमारत बनाई गई थी उस से कहीं अधिक अदालतें वहाँ चल रही थीं। वकीलों के बैठने के स्थान का इमारत बनने के वक्त भी शायद कोई स्थान न रहा होगा।  क्यों कि सब वकील अदालत के बाहर की गैलरी में अपनी अपनी टेबलें और कुर्सियाँ इस कदर लगाए थे कि लोगों को आने जाने में भी तकलीफ थी।  मैं ने अनेक अदालत परिसरों को देखा है।  हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट परिसरों को छोड़ कर सभी स्थानों की यही स्थिति है। वकील बरामदों और जहाँ खुला स्थान उपलब्ध है वहाँ पेड़ आदि के नीचे ही अपने बैठने का स्थान बना लेते हैं।  पता नहीं कब अदालतों की इमारतों में अदालतों के नजदीक ही वकीलों के बैठने के लिए स्थान बनाने की शुरुआत होगी।

अब बरामदों और आने जाने के रास्तों पर वकीलों के बैठने के स्थान के बाद आने जाने के लिए भी स्थान अपर्याप्त हो तो न्यायार्थियों को कहाँ स्थान मिलेगा?  मेरे हिसाब से दुर्ग जिला न्यायालय परिसर अपर्याप्त हो चला है।  यह तो स्थिति तब है जब कि अदालतों की संख्या एक चौथाई से भी कम है।  यदि उस कमी का चतुर्थांश भी पूरा किया जाए तो तुरंत ही न्यायालय परिसर के लिए नया स्थान चाहिए।  मेरे विचार में पूरे देश की सरकारों को न्यायालयों के लिए नए परिसरों के निर्माण के लिए नए स्थान नियत कर देने चाहिए जो इतने बड़े हों कि वहाँ वर्तमान की जरूरत की इमारत बनाने के उपरांत कम से कम आठ दस गुना स्थान रिक्त हो,  वाहन पार्किंग हो।   भारत में प्रत्येक अदालत के पीछे कम से कम पच्चीस वकील हैं इस कारण से हर अदालत के इजलास के पास ही कम से कम एक हॉल हो जिस में कम से कम पच्चीस वकीलों के बैठने और प्रत्येक वकील के साथ कम से कम पाँच व्यक्ति और बैठने का स्थान जरूर बना हो।  अदालत परिसर में टाइपिस्ट अनिवार्य हैं जिन का स्थान अब क्म्प्यूटर ऑपरेटर ले रहे हैं।  प्रत्येक अदालत परिसर में स्थित वकीलों के प्रत्येक हॉल में कम से कम दो टाइपिस्टों या कम्प्यूटर ऑपरेटरों के लिए स्थान का होना जरूरी है। अदालत में स्टाम्प वेंडर भी जरूरी हैं जो जरूरी फार्म व स्टेशनरी उपलब्ध कराते हैं,  उन के लिए भी स्थान निर्धारित होना चाहिए। कुछ फोटो कॉपी मशीनों आदि के लिए और जलपान के लिए भी पर्याप्त स्थान चाहिए।  इन सभी जरूरतों से युक्त अदालत परिसर हम कब देख पाएँगे? मैं निकट भविष्य में तो इन की कल्पना तक नहीं कर पाता। अभी तो हमें जितनी अदालतें वर्तमान में हैं उन की चार गुना अदालतों की स्थापना तक बढ़ना है।  भारत के मुख्य न्यायाधीश तो केवल दुगनी करने की बात कर रहे हैं।  लेकिन जिन राज्य सरकारों को यह सब करना है, उन के किसी मुख्य मंत्री या राज्यपाल के कान पर तो अभी जूँ भी नहीं रेंग रही है।

चित्र  
1 दुर्ग न्यायालय  परिसर का गूगल अर्थ चित्र  2. एक पुस्तकालय 3 व 4 न्यायालय परिसरों के चित्र


मंगलवार, 3 मार्च 2009

भिलाई में पाबला जी के घर यात्रा का आखिरी दिन और डेजी का व्यवहार

अगले दिन सुबह वही गुरप्रीत ने सोने के पहले कॉफी पिलाई।  नींद पूरी न हो पाने के कारण मैं फिर चादर ओढ़ कर सो लिया।  दुबारा उठा तो डेजी चुपचाप मुझे तंग किए बिना मेरे पैरों को सहला रही थी।  मुझे उठता देख तुरंत दूर हट कर बैठ गई और मुझे देखने लगी।  हमारे  पास भैंस के अतिरिक्त कभी कोई भी पालतू नहीं रहा।  उन की मुझे आदत भी नहीं।  पास आने पर और स्वैच्छापूर्वक छूने पर अजीब सा लगता है।  डेजी को मेरे भरपूर स्नेह के बावजूद लगा होगा कि मैं शायद उस का छूना पसंद नहीं करता इस लिए वह पहले दिन के अलावा मुझ से कुछ दूरी बनाए रखती थी।  उस दिन मुझे वह उदास भी दिखाई दी।  जैसे ही पाबला जी ने कमरे में प्रवेश किया वह बाहर चल दी।  लेकिन उस के बाद मैं ने महसूस किया कि वह मेरा पीछा कर रही है। मैं जहाँ भी जाता हूँ मेरे पीछे जाती है और मुझे देखती रहती है।  मैं उसे देखता हूँ तो वह भी मुझे उदास निगाहों से देखती है।  मुझे लगा कि मेरे हाव भाव से उसे महसूस हो गया है कि मैं जाने वाला हूँ।  उस का यह व्यवहार सिर्फ मेरे प्रति था, वैभव के प्रति नहीं। शायद उसे यह भी अहसास था कि वैभव नहीं जा रहा है, केवल मैं ही जा रहा हूँ।
हमें दो बजे तक दुर्ग बार ऐसोसिएशन पहुँचना था।  मैं धीरे-धीरे तैयार हो रहा था।  पाबला जी की बिटिया के कॉलेज जाने के पहले उस से बातें कीं।  फिर कुछ देर बैठ कर पाबला जी के माँ-पिताजी के साथ बात की।  हर जगह डेजी मेरे साथ थी।  मैं ने पाबला जी को बताया कि डेजी अजीब व्यवहार कर रही है, शायद वह भाँप गई है कि मैं आज जाने वाला हूँ। 

इस बीच अवनींद्र का फोन आ गया।  मैं ने उसे बताया कि 5 बजे मुझे छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस पकड़नी है दुर्ग से। उस से पहले दो बजे दुर्ग बार एसोसिएशन जाना है।  तो वह कहने लगा कि वहाँ से वापस आकर निकलेंगे तो ट्रेन पकड़ने में परेशानी होगी।  मैं ने उसे बताया कि मैं अपना सामान ले कर उधर से ही निकल लूंगा।  हम नहीं मिल पाएँगे।  उस ने कहा वैसे उस की कुछ मीटिंग्स हैं। यदि वह उन से फुरसत पा सका तो दुर्ग स्टेशन पहुँचेगा।   कुछ देर में दुर्ग बार से शकील अहमद जी का फोन आ गया उन की भी यही हिदायत थी कि हम दो बजे के पहले ही पहुँच लें। वहाँ एक डेढ. घंटा लग सकता है, फिर लंच में भी घंटा भर लगेगा तो मैं सामान साथ ही ले लूँ।  थोड़ी ही देर में संजीव तिवारी का भी फोन आ गया।  मैं सवा बजे पाबला जी के घर से निकलने को तैयार था।  मैं ने अपना सभी सामान चैक किया।  कुल मिला कर एक सूटकेस और एक एयर बैग साथ था। मैं ने पैर छूकर स्नेहमयी माँ और पिता जी से विदा ली।  मैं नहीं जानता था कि उन से दुबारा कब मिल सकूँगा? या कभी नहीं मिलूँगा।  लेकिन यह जरूर था कि मैं उन्हें शायद जीवन भर विस्मृत न कर सकूँ।

मैं सामान ले कर  दालान में आया तो देखा वे मुझे छोड़ने दरवाजे तक आ रहे हैं और डेजी उन के आगे है।  मैं डेजी को देख रुक गया तो वह दो पैरों पर खड़ी हो गई  बिलकुल मौन।  मैं ने उसे कहा बेटे रहने दो। तो वापस चार पैरों पर आ गई।  गुरप्रीत पहले ही बाहर वैन के पास खड़ा था। उस ने मेरा सामान वैन के पीछे रख दिया।  मैं पाबला जी और वैभव हम वैन में बैठे सब से विदाई ली।  डेजी चुप चाप वैन के चक्कर लगा रही थी। शायद अवसर देख रही थी कि पाबला जी का इशारा हो और वह भी वैन में बैठ जाए।  पाबला जी ने उसे अंदर जाने को कहा। वह घर के अंदर हो गई और वहाँ से निहारने लगी।  हमारी वैन दुर्ग की ओर चल दी।  मैं ने डेजी जैसी पालतू अपने जीवन में पहली बार देखी जो दो दिन रुके मेहमान के प्रति इतना अनुराग कर बैठी थी।  मैं जानता था कि कभी मैं दुबारा वहाँ आया तो वह तुरंत शिकायत करेगी कि बहुत दिनों में आ रहे हो।

 
 

चित्र---
1-2.  डेजी,  3.  डेजी और गुरप्रीत, 4. अवनीन्द्र और ज्योति, 5.  अवनीन्द्र, ज्योति और उन के दोनों पुत्र

सोमवार, 2 मार्च 2009

अवनींद्र के घर भोजन लेकिन नहीं हो सकी तीसरा खंबा डॉट कॉम की डिजाइनिंग

रायपुर की यह लघु यात्रा बहुत सुखद थी।   पाबला जी के घर वापस भिलाई लौटते रात हो चुकी थी।  सात बजे होंगे।   पहुँचते ही अवनीन्द्र का फोन आ गया।  वह कह रहा था कि भोजन पर पाबला जी का परिवार भी साथ होगा।  लेकिन बच्चे कुछ और कार्यक्रम बना चुके थे और पाबला जी कह रहे थे कि कल आप चले जाएँगे और अवनीन्द्र से संभवतः भिलाई में यह आखिरी मुलाकात हो इसलिए वे हमारे साथ नहीं जाएँगे।  आप लोग घऱ परिवार की बातें कीजिए।  मुझे वे हमारे साथ चलने को बिलकुल सहमत नहीं थे।  मैं ने भी पाबला जी की सोच को सही पाया।  पाबला जी ने आश्वासन दिया कि हम तो यहीं भिलाई में हैं।  कभी भी एक दूसरे के घर भोजन पर आ जा सकते हैं।  मैं ने अवनीन्द्र को कह दिया कि हम दोनों पिता-पुत्र ही आ रहे हैं।  कुछ देर विश्राम कर तरोताजा हो मैं और वैभव अवनीन्द्र के घर पहुँचे।

कुछ देर हम घर परिवार की बातें स्मरण करते रहे, अवनीन्द्र की पत्नी ज्योति ने शीघ्र ही भोजन के लिए बुला लिया।  हम खाने की मेज पर बैठे जो भोज्य पदार्थों से सजी थी।  लगता था कि ज्योति कोई कोर कसर नहीं रखना चाहती थी।  मेरा ज्योति के हाथ का पका भोजन पाने का यह पहला अवसर था।  हम जब भी मिले किसी पारिवारिक भीड़ भरे आयोजन में।   तब उस के हाथ का बना भोजन पाने का अवसर ही  न होता था। भोजन आरंभ हुआ तो जल्दी ही पता लग गया कि ज्योति ने भोजन को स्वादिष्ट बनाने में कोई कसर नहीं रखी थी।  हालत यह हुई कि मेरा सुबह से लिया व्रत  कि आज बिलकुल भी जरूरत से अधिक भोजन नहीं लूंगा, जल्द ही फरार हो गया।  मैं ने छक कर भोजन किया।  मैं ने भोजन की थोड़ी बहुत तारीफ भी की लेकिन जल्द ही अहसास हो गया कि मेरी कितनी भी तारीफ ज्योति की उस शिकायत को कभी दूर नहीं कर पाएगी कि मैं उस के यहाँ ठहरने के स्थान पर पाबला जी के यहाँ क्यों रुका?

मैं ने बताया कि वैभव अभी अप्रेल अंत तक भिलाई में है,  वह शीघ्र ही शायद होस्टल रहने चला जाएगा लेकिन  यहाँ आता रहेगा।  पर यह बात अभी तक अधूरी है।  न वैभव होस्टल में गया और न ही वह अवनीन्द्र के यहाँ अभी तक जा सका।  भोजन के बाद हम देर तक बातें करते रहे और लौट कर पाबला जी के यहाँ आने लगे तो अवनीन्द्र भी साथ हो लिया।  मुझे पान की याद आ रही थी जो मुझे कोटा छोड़ने के बाद अभी तक नहीं मिला था।  हम ने रास्ते में पान की दुकान तलाश करने की कोशिश की तो मुश्किल से एक दुकान मिली। हम बाजार से दूर जो थे।  पान भी जैसा तैसा मिला लेकिन मिला बहुत  सस्ता।  हम पाबला जी के यहाँ पहुँचे तो उन्हों ने अवनीन्द्र को कॉफी के लिए रोक लिया।  हम पाबला जी के कम्प्यूटर कक्ष में जहाँ मैं पिछली रात सोया भी था, आ बैठे।  पाबला जी ने webolutions.in के बैनर पर उन के पुत्र गुरप्रीत सिंह (मोनू) द्वारा बनाई गई वेबसाइट्स बताना आरंभ किया तो पता ही नहीं चला कि कितना समय निकल गया।  एक बार अवनीन्द्र को घर से फोन भी आ गया।  उसे विदा किया तो तारीख बदल चुकी थी।


मेरा इस भिलाई यात्रा का एक सब से बड़ा स्वार्थ था कि मैं पाबला जी पुत्र गुरप्रीत से तीसरा खंबा डॉट कॉम की वेबसाइट डिजाइन करवा सकूँ।  केवल आज की रात थी जब यह काम मैं गुरप्रीत से करवा सकता था।  लेकिन समय इतना हो चुका था और दिन भर में दिमाग इतनी कसरत कर चुका था कि तीसरा खंबा की डिजाइनिंग के बारे में ओवरटाइम कर सकने की उस की हिम्मत शेष नहीं थी।  मैं सोचता रह गया कि आखिर कब और कैसे यह डिजायनिंग हो सकेगी?

चित्र- 1. पाबला जी का घर  2. मैं और अवनीन्द्र  3 पाबला जी के घर का दालान

शनिवार, 28 फ़रवरी 2009

अनिल पुसदकर जी, संजीत त्रिपाठी और पाबला जी के साथ दोपहर का भोजन

 त्रयम्बक जी के जाने के पहले ही एक फोन पुसदकर जी के पास आया।  फोन पर उत्तर देते हुए पुसदकर जी ने  कहा कि वे किसी मेहमान के साथ प्रेस क्लब में व्यस्त हैं, अभी नहीं आ सकते हाँ मिलना हो तो वे खुद प्रेस क्लब आ जाएँ।  खुद पुसदकर जी ने बताया कि यह रायपुर के मेयर का फोन था।  मुझे बुला रहा था, मैं ने उसे यहाँ आने के लिए कह दिया है।  कुछ देर में ही रायपुर के नौजवान मेयर सुनील सोनी अपने एक सहायक के साथ वहाँ विद्यमान थे।  पुसदकर जी ने मेरा व पाबला जी का मेयर से परिचय कराया और फिर मेयर को कहने लगे कि वे प्रेस क्लब और पत्रकारों के लिए उतना नहीं कर रहे हैं जितना उन्हें करना चाहिए।  उसी समय उन्हों ने संजीत त्रिपाठी को कुछ लाने के लिए कहा।  संजीत जो ले कर आए वह एक खूबसूरत मोमेण्टो था।  उन्हों ने मेयर को कहा कि प्रेस क्लब द्विवेदी जी के आगमन पर उन्हें मोमेंटो देना चाहता था।  अब जब आप आ ही गए हैं तो यह आप के द्वारा ही दिया जाना चाहिए।  आखिर मेयर ने मुझे प्रेस क्लब की वह मीठी स्मृति मोमेंटो भेंट की।  कॉफी के बाद मेयर वहाँ से प्रयाण कर गए।

तब तक दो बजने को थे।  पुसदकर जी ने हमें दोपहर के भोजन के लिए चलने को कहा।  हम सभी नीचे उतर गए।  पुसदकर जी की कार में हम तीनों के अलावा केवल संजीत त्रिपाठी थे। पुसदकर जी  खुद वाहन ड्राइव कर रहे थे।  वे कहने लगे अगर समय हो तो भोजन के बाद त्रिवेणी संगम है वहाँ चलें, यहाँ से तीस किलोमीटर दूर है।  मैं ने और पाबला जी ने मना कर दिया इस में रात वहीं हो जाती।  मैं उस दिन रात का खाना अपने भाई अवनींद्र के घर खाना तय कर चुका था, यदि यह न करता तो उसे खास तौर पर उस की पत्नी को बहुत बुरा महसूस होता।  मैं पहले ही उसे नाराज होने का अवसर दे चुका था और अब और नहीं देना चाहता था। अगले दिन मेरा दुर्ग बार में जाना तय था और कोटा के लिए वापस लौटना भी।  रास्ते मे पुसदकर जी रायपुर के स्थानों को बताते रहे, यह भी बताया कि जिधर जा रहे हैं वह वही क्षेत्र है जहाँ छत्तीसगढ़ की नई राजधानी का विकास हो रहा है।  कुछ किलोमीटर की यात्रा के बाद हम एक गेस्ट हाऊस पहुंचे जो रायपुर के बाहर था जहाँ से एयरपोर्ट और उस से उड़ान भरने वाले जहाज दिखाई दे ते थे। बीच में हरे खेत और मैदान थे।  बहुत सुंदर दृश्य था।  संजीत ने बताया कि यह स्थान अभी रायपुर से बाहर है लेकिन जैसे ही राजधानी क्षेत्र का विकास होगा यह स्थान बीच में आ जाएगा।

किसी ने आ कर बताया कि भोजन तैयार है। बस चपातियाँ सेंकनी हैं।  हम हाथ धोकर अन्दर सजी डायनिंग टेबुल पर बैठ गए।  भोजन देख कर मन प्रसन्न हो गया। सादा सुपाच्य भोजन था, जैसा हम रोज के खाने में पसंद करते हैं।  सब्जियाँ, दाल, चावल और तवे की सिकी चपातियाँ।  पुसदकर जी कहने लगे भाई कुछ तो ऐसा भी होना चाहिए था जो छत्तीसगढ़ की स्मृति बन जाए, लाल भाजी ही बनवा देते।  पता लगा लाल भाजी भी थी।  इस तरह की नयी खाद्य सामग्री में हमेशा मेरी रुचि बनी रहती है।  मैं ने भाजी के पात्र में हरी सब्जी को पा कर पूछा यह लाल भाजी क्या नाम हुआ।  संजीत ने बताया कि यह लाल रंग छोड़ती है।  मैं ने अपनी प्लेट में सब से पहले उसे ही लिया।  उन का कहना सही था। सब्जी लाल रंग छोड़ रही थी।  उसे लाल के स्थान पर गहरा मेजेण्टा रंग कहना अधिक उचित होगा।  संजीत ने बताया कि यह केवल यहीं छत्तीसगढ़ में ही होती है, बाहर नहीं।  सब्जी का स्वाद बहुत कुछ हरी सब्जियों की ही तरह था। सब्जी अच्छी लगी।  उसे खाते हुए मुझे अपने यहाँ के विशेष कट पालक की याद आई जो पूरी सर्दियों हम खाते हैं। बहुत स्वादिष्ट, पाचक और लोह तत्वों से भरपूर होता है और जो हाड़ौती क्षेत्र में ही खास तौर पर होता है, बाहर नहीं। हम उसे देसी पालक कहते हैं। दूसरी चीज जिस की मुझे याद आई वह मेहंदी थी जो हरी होने के बाद भी लाल रंग छोड़ती है।

भोजन के उपरांत हमने करीब दो घंटों का समय उसी गेस्ट हाउस में बिताया।  बहुत बातें होती रहीं।  छत्तीसगढ़ के बारे में, रायपुर, दुर्ग और भिलाई के बारे में, बस्तर और वहाँ के आदिवासियों के बारे में माओवादियों के बारे में और ब्लागिंग के बारे में, ब्लागिंग के बीच समय समय पर उठने वाले विवादों के बारे में।  माओवादियों के बारे में पुसदकर जी और संजीत जी की राय यह थी कि वास्तव में ये लोग किसी वाद के नहीं है, उन्हों ने केवल माओवाद और मार्क्सवाद की आड़ ली हुई है, ये पड़ौसी प्रान्तों के गेंगेस्टर हैं और यहाँ बस्तर के जंगलों का लाभ उठा कर अपने धन्धे चला रहे हैं।  इन का आदिवासियों से कोई लेना-देना नहीं है।  आदिवासी भी एक हद तक इन से परेशान हैं।  इन का आदिवासियों के जीवन और उत्थान से कोई लेना देना नहीं है।  पुसदकर जी कहने लगे कि कभी आप फुरसत निकालें तो आप को बस्तर की वास्तविकता खुद आँखों से दिखा कर लाएँ।  ब्लागिंग की बातों के बीच संजीत ने छत्तीसगढ़ में एक ब्लागर सम्मेलन की योजना भी बनाने को पुसदकर जी से कहा।  उन्हों  ने कोशिश करने को अपनी सहमति दी। 

चार बजे के बाद कॉफी आ गई जिसे पीते पीते हमें शाम के वादे याद आने लगे।  मैंने चलने को कहा।  हम वहाँ से प्रेस क्लब आए तब तक सांझ घिरने लगी थी।  हमने संजीत और पुसदकर जी से विदा ली। वे बार बार फुरसत निकाल कर आने को कहते रहे और मैं वादा देता रहा।  मुझे भी अफसोस हो रहा था कि मैं ने क्यों रायपुर के लिए सिर्फ आधे दिन का समय निकाला।  पर वह मेरी विवशता थी। मुझे शीघ्र वापस कोटा पहुँचना था।  दो फरवरी को बेटी पूर्वा के साथ बल्लभगढ़ (फरीदाबाद) जो जाना था।   हम संजीत और पुसदकर जी से विदा ले कर पाबला जी की वैन में वापस भिलाई के लिए लद लिए।

कल के आलेख पर आई टिप्पणियों में एक प्रश्न मेरे लिए भारी रहा कि मैं ने संजीत के लिए कुछ नहीं लिखा।  इस प्रश्न का उत्तर दे पाना मेरे लिए आज भी कठिन हो रहा है।  मुझे पाबला जी के सौजन्य से जो चित्र मिले हैं उन में संजीत एक स्थान पर भी नहीं हैं।  वे रायपुर में छाया की तरह हमारे साथ रहे।  वार्तालाप भी खूब हुआ। लेकिन? पूरे वार्तालाप में व्यक्तिगत कुछ भी नहीं था।  उन के बारे में व्यक्तिगत बस इतना जाना कि वे पत्रकार फिर से पत्रकारिता में लौट आए हैं और किसी दैनिक में काम कर रहे हैं जिस का प्रतिदिन एक ही संस्करण निकलता है।  वास्तव में उन के बारे में मेरी स्थिति वैसी ही थी जैसे किसी उस व्यक्ति की होती जो वनवास के समय राम, लक्ष्मण से मिल कर लौटने पर राम का बखान कर रहा होता और जिस से लक्ष्मण के बारे में पूछ लिया जाता।  मिलने वाले का सारा ध्यान तो राम पर ही लगा रहता लक्ष्मण को देखने, परखने का समय कब मिलता? और राम के सन्मुख लक्ष्मण की गतिविधि होती भी कितनी? मुझे लगता है संजीत को समझने के लिए तो छत्तीसगढ़ एक बार फिर जाना ही होगा।  हालांकि संजीत खुद अपने बारे में कहते हैं कि वे जब से जन्मे हैं रायपुर में ही टिके हुए हैं।  उन्हों ने अपना कैरियर पत्रकारिता को बनाया।  उस में बहुत ऊपर जा सकते थे।  लेकिन? केवल रायपुर न छोड़ने के लिए ही उन्हों ने पत्रकारिता को त्याग दिया और धंधा करने लगे।  मन फिर पत्रकारिता की ओर मुड़ा तो वे किसी छोटे लेकिन महत्वपूर्ण समाचार पत्र से जुड़ गए।  उन की विशेषता है कि वे स्वतंत्रता सेनानियों के वंशज हैं और आज भी उन्हीं मूल्यों से जुड़े हैं।  खुद खास होते हुए भी खुद को आम समझते हैं।  आप खुद समझ सकते हैं कि उन्हें समझने के लिए खुद कैसा होना होगा?

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2009

वेबोल्यूशन्स की लेब और रायपुर के प्रेस क्लब में पुसदकर जी, संजीत त्रिपाठी और त्रयम्बक शर्मा से भेंट

पाबला जी के यहाँ पहली रात थी, फिर भी थके होने से नीन्द जल्दी ही आ गई।   सुबह 5-6 बजे के बीच खटपट से नींद खुली तो देखा मोनू कुछ कर रहा था।  मुझे उठा देख उस ने पूछा, अंकल आप के लिए कॉफी बनाऊँ?  मैं ने  आश्चर्य व्यक्त किया कि, तुम जाग भी गए! बोला, अंकल मैं तो कॉफी पी कर दस पन्द्रह मिनट काम करुंगा फिर सोने जाउंगा, मेरा तो यह रूटीन है।  मैं इसी वक्त सोता हूँ और 11-12 बजे तक उठता हूँ।  सारी रात तो मेरा काम ही चलता रहता है।  वह webolutions.in के नाम से वेबसाइट डिजाइन करने और उन्हें संचालित करने का काम करता है।  मैं भी अपनी वेबसाइट उसी से डिजाइन कराने का इरादा रखता था।  मैं ने उसे कहा कि हम अपनी तीसरा खंबा के लिए कब बैठेंगे? अंकल आज शाम तो मेरे पास काम है हाँ आधी रात के बाद बैठ सकते हैं।  मैं ने उसे हाँ कह दिया।   तब तक उस ने मुझे कॉफी दे दी, वह अपना कप ले कर अपनी लेब में चला गया, वही उस के सोने का स्थान भी है। इसी लेब के साथ का टॉयलट मैं ने कल दिन भर प्रयोग किया था।  इस लेब में एक पीसी और एक लेपटॉप था। पीसी पर मोनू का सहायक और लेपटॉप पर खुद मोनू काम करते थे।  पूरे घर में ऐसी व्यवस्था थी कि किसी भी कंप्यूटर या लैपटॉप पर बिना कोई तार के इंटरनेट एक्सेस किया जा सकता था।   
संजीव तिवारी, मैं अभिभाषक वाणी के ताजा अंक हाथ में लिए, 
शकील अहमद सिद्दीकी और बी.एस. पाबला
मेरी सफर और नए शहर की थकान नहीं उतरी थी कॉफी से भी आलस गया नहीं। मैं ने फिर से चादर ओढ़ ली और जल्दी ही नींद फिर से आ गई।  अब की बार पाबला जी ने जगाया तब तक सात से ऊपर समय हो चुका था, वे घोषणा कर रहे थे कि हमें 10 बजे रायपुर के लिए निकलना है।  मुझे तुरंत तैयार होना था।  वे नाश्ते की पूछते इस से पहले ही मैं ने उन से उस के लिए माफी चाही, एक दिन पहले खाए-पिए से ही निजात नहीं मिल सकी थी।  पाबला जी ने कुछ ना नुकर के साथ मुझे माफ कर दिया।  कुछ देर बाद ही पता लगा कि साढ़े नौ बजे संजीव तिवारी के साथ दुर्ग के वकील शकील जो अधिवक्ता संघ दुर्ग के मासिक पत्र अभिभाषक वाणी के संपादक शकील अहमद सिद्दीकी साहब आ रहे हैं।  मैं और वैभव शीघ्रता से तैयार हो गए।  उन्हें आते आते 10 बज गए।  मैं दोनों से पहली बार मिला।  वे ऐसे मिले जैसे बिछड़े परिजन मिले हों।  बीसेक मिनट उन से बात चीत हुई और 30 जनवरी को 2 बजे दुर्ग बार एसोसिएशन पहुँचने का कार्यक्रम तय हो गया।

रायपुर के लिए पाबला जी के घर से निकलते निकलते साढ़े दस बज गए थे।  पाबला जी को वैन में एलाइनमेंट की समंस्या नजर आई। वैन को टायर वाले के यहाँ ले गए।  पाबला जी के कहने पर उसने एलाइनमेंट का काम पन्द्रह मिनट में पूरा कर दिया।  वैन बाहर आई तो अचानक ऐक्सीलेटर ने जवाब दिया।   उसे  दुरुस्त करा कर हम रायपुर के लिए रवाना हुए।  मुझे यह देख कर आश्चर्य हुआ कि भिलाई से रायपुर तक सड़क के दोनों ओर उद्योगिक इकाइयाँ और खाली भूमि नजर आई लेकिन खेती का नामोनिशान तक न था।  लगता  था दुर्ग से ले कर रायपुर तक सब जगह केवल उद्योग हैं या बस्तियाँ।  भिलाई में जरूर सघन वृक्षावली नजर आती हैं लेकिन वह भिलाई स्टील प्लाण्ट और टाउनशिप के निर्माताओं के प्रारूपण का कमाल है।  भिलाई 52 कारखाने और उन का प्रदूषण होते हुए भी उस का असर इस वृक्षावली के कारण ही कम नजर आता है।  पता नहीं कब नगर नियोजकों को यह गुर समझ आएगा कि नगर में भी बीच बीच में खेती और बागवानी के लिए भूमि आरक्षित की जाए तो प्रदूषण का मुकाबला करना कितना आसान हो सकता है?

 कार्टून वॉच का जनवरी अंक मेरे हाथ में, अनिल पुसदकर, त्रयम्बक शर्मा और वैभव
रायपुर प्रेसक्लब पहुँचे तो एक बज चुके थे।  अनिल पुसदकर जी और संजीत त्रिपाठी कुछ अन्य पत्रकार साथियों के साथ बाहर ही प्रतीक्षा करते मिले।  पुसदकर जी जैसे चित्र में लगते हैं, उस से  कहीं कम उम्र के लगे।  पहले उन्हों ने हमें प्रेस क्लब की पूरी इमारत का अवलोकन कराया।  भूतल के एक हॉल में प्रेस कान्फ्रेंस चल रही थी। पूरी इमारत दिखाने के बाद प्रथम तल के एक बड़े कॉन्फ्रेन्स हॉल में मंच के दाहिनी और हम सब बैठे बतियाने लगे।  सब से परिचय हुआ।  वे बताने लगे कि कैसे उन्हों ने अपने पत्रकारिता जीवन में अनेक समाचार पत्रों और टीवी चैनलों के लिए पत्रकारिता का कार्य किया है।  पूरे विवरण में जो जरूरी बात नोट की जिसे वे छिपा रहे वह यह कि उन का छत्तीसगढ़ से बहुत लगाव रहा है।  उन्हों ने छत्तीसगढ़, वहाँ की जनता और पत्रकारों के हितों के लिए अनेक बार अपने रोजगार को भी दाँव  पर लगाया मुख्यमंत्री और उस स्तर तक के नेताओं से कभी समझौता नहीं किया।  आज मोतीबाग के बीच प्रेस क्लब की जो शानदार और सुविधाजनक इमारत खड़ी है।  उस में उन का योगदान सर्वोपरि है।

ब्लागरी के बारे में बात चली तो अनिल जी कहने लगे कि यह एक ऐसा माध्यम है जहाँ अपने विचार बिना किसी संकोच, दबाव और प्रभाव के स्वतंत्रता पूर्वक रखे जा सकते हैं।  वहाँ हाजिर सभी व्यक्ति  सहमत थे। वहीं कार्टून वॉच के संपादक त्रयम्बक शर्मा आ गए और चर्चा में सम्मिलित हो गए।  उन्हों ने मुझे और पाबला जी को पत्रिका के जनवरी अंक की एक-एक प्रति भेंट की।  कार्टून वॉच को इंटरनेट पर भी देखा है। लेकिन पत्रिका के रूप में देखना बहुत अच्छा लगा। मुझे बरसों पहले प्रकाशित होने वाली एक मात्र पत्रिका शंकर्स वीकली का स्मरण हो आया।  जिस का मैं नियमित ग्राहक था। यहाँ तक कि उस में प्रकाशित होने वाले कार्टूनों की नकल कर के अपने कार्टून बनाने के प्रयास भी किए।  लेकिन कुछ समय बाद वह पत्रिका बन्द हो गई और हमारे कार्टूनिस्ट कैरियर का वहीं अंत हो गया।  मैं ने त्रयम्बक जी ने बताया कि पत्रिका 12 वर्षों से लगातार निकल रही है और देश की एकमात्र कार्टून पत्रिका है।  मैं इस तथ्य से ही रोमांचित हो उठा। मैं ने त्रयम्बक जी को उसी समय वार्षिक शुल्क दिया।  उन्होंने उस की रसीद देने में असमर्थता जताई।  लेकिन रसीद के रूप में पत्रिका का फरवरी अंक मुझे समय पर मिल गया।  मेरी सोच यह है कि ब्लागरों को इस पत्रिका का शुल्क दे कर इस का ग्राहक बनना चाहिए।  जिस से इस एकमात्र कार्टून पत्रिका को आगे बढ़ने का अवसर मिले। त्रयंबक जी को कहीं और काम होने से वे जल्दी ही चले गए।  ...........आगे अगली कड़ी में
 कार्टून वॉच के लिए संपर्क

बुधवार, 25 फ़रवरी 2009

वसंत का अंत, इतनी जल्दी

 
जब भी वसंत आता है तो चार बरस की उमर में दूसरी कक्षा की पुस्तक का एक गीत स्मरण हो आता है....

आया वसंत, आया वसंत
वन उपवन में छाया वसंत 
गैंदा और गुलाब चमेली
फूल रही जूही अलबेली 
देखो आमों की हरियाली 
कैसी है मन हरने वाली
जाड़ा बिलकुल नहीं सताता
मजा नहाने में है आता .....

इस के आगे की पंक्तियाँ अब स्मरण नहीं हैं।  यह गीत भी इसलिए याद आता है कि माँ वसन्त पंचमी के दिन से ही स्कूल जाने के पहले मुझे नहलाने के पहले इसे जरूर सुनाती थी, और मैं इसे सुनते-गाते ताजे पानी की ठंडक झेल जाता था।  वाकई वसंत खूबसूरत मौसम है। समस्या इस के साथ यह कि यह हमारे यहाँ बहुत जल्दी चला भी जाता है।  31 जनवरी को जब वसंत पंचमी थी तो फूल ठीक से खिलने भी नहीं लगे थे।  उस के बाद शादियों का दौर चला कि भाग दौड़ में पता ही नहीं चला कि वसंत भी है और अब जब वसंत को चीन्हने की फुरसत हुई है तो देखता हूँ नीम में पतझऱ शुरू हो गया है।  हमारे अदालत परिसर में नीम बहुत हैं।   इन दिनों अदालत परिसर की भूमि इन गिर रहे पत्तों से पीली हुई पड़ी है।  शहर की सड़कों का भी यही नजारा है जहाँ किनारे-किनारे नीम लगे हैं।  पर यह पतझर भी नवीन के आगमन का ही संकेत है।  कुछ दिनों में नयी कोंपलें फूटने लगेंगी और हमारा नया साल आ टपकेगा।  उस दिन से कोंपलों की चटनी की गोलियाँ जो खानी है।

अभी नए साल में महीना शेष है। अभी तो होली के दिन हैं, फाग का मौसम।  पर इस बार कहीं चंग की आवाज सुनाई नहीं देने लगी है।  नगर के लोगों में गाने, बजाने और नाचने का शऊर नहीं, वे नाचेंगे भी तो कैसेट या सीडी बजा कर।    वाद्य तो गायब ही हो चुके हैं।  चमड़े का स्थान किसी एनिमल फ्रेण्डली प्लास्टिक ने ले लिया है, इस से आवाज तो कई गुना तेज हो गई है लेकिन मिठास गायब है।   इस साल घर के आसपास किसी इमारत का निर्माण भी नहीं चल रहा है जिस में लगे मजदूर रात को देसी के सरूर में चंग बजाते फाग गाएँ और अपनी अपनी प्रियाओं को रिझाएँ।  मुझे याद आता है कि दशहरा मैदान में नगर निगम के नए दफ्तर की इमारत बन रही है।  रात को स्कूटर ले कर उधर निकलता हूँ तो कोई हलचल नजर नहीं आती।  कुछ छप्परों में आग जरूर जल रही होती है।  मैं वहाँ से निकल जाता हूँ।  वापस लौटता हूँ तो चंग की आवाज सुनाई देती है।   मजदूर इकट्ठे होने लगे हैं। कोई एक गाना शुरू करता है।  उन में से एक चंग पर थाप दे रहा है।   कुछ ही देर में प्रियाएँ भी निकल आती हैं वे भी सुर मिलाने लगती हैं और नाच शुरू हो जाता है।  मैं सड़क किनारे अकेला स्कूटर रोक कर उस पर बैठा हूँ।  लोग उन्हें देख कर नहीं, मुझे देख देख कर जा रहे हैं जैसे मैं कोई अजूबा हूँ।  मैं अजूबा बनने के पहले ही वहाँ से खिसक लेता हूँ।

घर लौटता हूँ तो दफ्तर में कोई बैठा है।  मैं उन से बात करता हूँ।  वे जाने लगते हैं तो दरवाजे तक छोड़ने आता हूँ।  दरवाजे के बाहर लगे सफेद फूलों से लदे कचनार पर उन की दृष्टि जाती है तो कहते हैं, फूल शानदार खिले हैं, खुशबू भी जोरदार है।  मैं अपनी नाक में तेजी से फूलों की खुशबू घुसती मंहसूस करता हूँ।  वे चल देते हैं।  तभी छींक आती है।  मैं अंदर दफ्तर में लौटता हूँ। कुछ ही देर में नाक में जलन आरंभ हो जाती है और समय के साथ बढती चली जाती है।  मैं समझ जाता हूँ कि कचनार के फूलों से निकले पराग कणों ने प्रिया से न मिल पाने का सारा गुस्सा मुझ पर निकाला है।  मैं जुकाम और  "हे फीवर" की दवा में लग जाता हूँ।  तीन दिन यह वासंती कष्ट भुगतने पर कुछ आराम मिलता है।  शाम को बेटी से फोन पर बात करता हूँ तो उस की आवाज भारी लगती है।  बताती है उसे जुकाम हो गया है। पत्नी कहती है, पापा को हुआ था तो बेटी को तो होना ही था।  वह फोन  पर बेटी को दवाओं के नामं और उन्हें लेने की हिदायतें देने लगी है।  बेटी  बताती है कि वह उन हिदायतों पर पहले ही अमल शुरू कर चुकी है।  इधर दिन में तेज गर्मी होने लगी है।  मेरे कनिष्ठ वकील नन्दलाल दिन में कह रहे थे, तापमान बढ़ जाने से इस बार फसलें एक माह से बीस दिन  पहले ही पक गई हैं।  मैं कहता हूँ, अच्छा है फसल जल्दी आ गई।   वे बताते हैं, लेकिन फसल का वजन कम हो गया है।

सोमवार, 23 फ़रवरी 2009

तुम्हारी जय !

'गीत'

तुम्हारी जय!
  • महेन्द्र 'नेह'
अग्नि धर्मा
ओ धरा गतिमय
तुम्हारी जय !

सृजनरत पल पल
निरत अविराम नर्तन
सृष्टिमय कण-कण
अमित अनुराग वर्षण

विरल सृष्टा
उर्वरा मृणमय
तुम्हारी जय !

कठिन व्रत प्रण-प्रण
नवल नव तर अनुष्ठन
चुम्बकित तृण तृण
प्रकाशित तन विवर्तन

क्रान्ति दृष्टा
चेतना मय लय
तुम्हारी जय !
                   - महेन्द्र नेह

रविवार, 22 फ़रवरी 2009

 पुरुषोत्तम ‘यक़ीन’ 
की ये ग़ज़ल अपनी अनभिज्ञताओं के बारे में ......

      क्या पता ?
  •  पुरुषोत्तम ‘यक़ीन’

मेरी ग़ज़लें आप बाँचें, क्या पता
ये ही कुछ दुखदर्द बाँटें, क्या पता

ज़ुल्मतें हम दिल की छाँटें, क्या पता
या यूँ ही जग-धूलि फाँकें, क्या पता

नित नई फ़र्माइशें दरपेश हों
या कभी वो कुछ न माँगें, क्या पता

ज़िन्दगी जैसे कोई दुःस्वप्न है
किस घड़ी खुल जाऐं आँखें, क्या पता

ले गये तो हैं मेरी तस्वीर वो
फैंक दें, कमरे में टाँकें, क्या पता

टेक दें घुटने कि फिर वो सामने
ठोक कर आ जाऐं जाँघें, क्या पता

इक कबूतर की तरह ये जान कब
खोल कर उड़ जाए पाँखें, क्या पता

वो मुझे पहचान तो लेंगे ‘यक़ीन’
पर इधर झाँकें न झाँकें, क्या पता


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शनिवार, 21 फ़रवरी 2009

सच कहा........

महेन्द्र 'नेह' का एक और गीत

सच कहा 


सच कहा
   सच कहा
     सच कहा

बस्तियाँ बस्तियाँ सच कहा
कारवाँ कारवाँ सच कहा

सच कहा जिंदगी के लिए
सच कहा आदमी के लिए
सच कहा आशिकी के लिए

सच कहा, सच कहा, सच कहा

सच कहा और जहर पिया
सच कहा और सूली चढ़ा
सच कहा और मरना पड़ा

पीढ़ियाँ पीढ़ियाँ सच कहा
सीढ़ियाँ सीढ़ियाँ सच कहा

सच कहा, सच कहा, सच कहा

सच कहा फूल खिलने लगे
सच कहा यार मिलने लगे
सच कहा होठ हिलने लगे

बारिशें बारिशें सच कहा
आँधियाँ आधियाँ सच कहा

सच कहा, सच कहा, सच कहा
                            -महेन्द्र नेह

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2009

ब्लागिरी में जरूरी व्यवधान

इधर मैं अपनी यात्रा के बारे में लिख रहा था।  इस बीच साले साहब के बेटे की शादी आ गई। 16 को ही कोटा से निकलना पड़ा।   इस बीच 16 और 17 के लिए आलेख सूचीबद्ध किए हुए थे।  महेन्द्र 'नेह' का गीत और पुरुषोत्तम 'यक़ीन' ग़ज़ल  पर अच्छी प्रतिक्रियाएँ पढ़ने को मिली हैं।  रौशन जी की टिप्पणी थी कि, 'इसे पढने के बाद यकीन जी की और ग़ज़लें पढने का मन होने लगा है।'  वाकई पुरुषोत्तम 'यक़ीन' बहुत समर्थ ग़ज़लकार हैं।  उन की पाँच काव्य पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  अगली बार जब भी उन की ग़ज़ल ले कर आऊंगा तो उन का पूरा परिचय, उन की पुस्तकों के बारे में जानकारी के साथ आलेख को सचित्र बनाने की कोशिश रहेगी।

मेरी ससुराल जयपुर जबलपुर राजमार्ग क्रमांक 12 पर राजस्थान के झालावाड़ जिले में स्थित अकलेरा कस्बे में है, यह मध्य प्रदेश सीमा से पहले अंतिम कस्बा है।  अब तक तो वहाँ पूछने पर पता लगता था कि वहाँ भी इंटरनेट का प्रयोग आरंभ हो चुका है।  लेकिन जब तलाशने की बारी आती थी तो पता लगता था कि कुछ व्यवसायी केवल रिजल्ट आदि देखने के लिए इंटरनेट का उपयोग करते हुए धनोपार्जन करते हैं।  इस बार वहाँ  एक साइबर कैफे खुला मिला।  इस में चार कम्प्यूटर लगे थे,  उनमें से भी एक दो हमेशा और कभी-कभी सभी खाली मिल जाते थे।  पूछने पर पता लगा कि अभी छह माह पहले ही आरंभ किया है। वह नैट उपयोग के लिए 20 रुपए प्रतिघंटा शुल्क लेता था।  मुझे यह महंगा लगा, मैं ने मालिक को कहा भी। तो उस ने बताया कि अभी तो हम खर्चा भी बमुश्किल निकाल पा रहे हैं।  धीरे धीरे लोग इस का उपयोग करने लगें तो सस्ता कर देंगे।

मैं ने वहीं मेल खोल कर देखी। कुछ पोस्टें पढ़ीं। टिप्पणी करना चाहा तो इन्स्क्रिप्ट हिन्दी टाइप करने की सुविधा नहीं थी।  रोमन से हिन्दी टाइप करने में मुझे अब परेशानी आने लगी है और समय बहुत लगता है।  इस लिए कोशिश की गई कि कम से कम एक कंप्यूटर पर हिन्दी टाइपिंग की व्यवस्था बना ली जाए। संचालक की मदद से वह काम हमने कर लिया। लेकिन विवाह ससुराल का था और मेरे अनेक स्नेही संबंधी वहाँ मौजूद थे।  मैं ने नैट का उपयोग करने के स्थान पर अपना दो दिनों का समय उन के सानिध्य में ही बिताने का प्रयत्न किया।  यह सुखद भी रहा। इस के कारण मैं अधिक से अधिक लोगों के संपर्क में रह सका और उन की वर्तमान की समझ को जान सका।

वैसे मैं 18 फरवरी की रात्रि को कोटा पहुँच गया था।  इसी दिन मुझे एक मित्र के बेटे के विवाह के समारोह में शामिल होना पड़ा।  कल 19 फरवरी को मेरी फुफेरी और भिलाई में पोस्टेड अवनींद्र की बहिन के बेटे के समारोह में भाग लेना था।  लेकिन व्यवसायिक कामों से शाम को फुरसत मिली भी तो टेलीफोन ने रात दस बजे तक व्यस्त रखा और विवाह में रात साढ़े दस बजे ही पहुँच सका।  तसल्ली यह रही कि तब तक बरात पहुँची ही थी और मैं अधिक देरी से नहीं था।

आज दिन में अदालती कामों को करने के बाद ही आज लिखने बैठ पाया हूँ।  सोचा तो था कि भिलाई से आगे का यात्रा विवरण जो बीच में अधूरा छूट रहा उसे ही पूरा किया जाए लेकिन कल का ही दिन बीच में हैं।  फिर से रवि-सोम दो दिन बाहर रहना पड़ेगा।   उस में फिर से व्यवधान आए इस से अच्छा है उसे अभीस्थगित ही रखा जाए।  आज के लिए इतना ही बहुत।  कल मिलते हैं एक नए आलेख के साथ। 

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009

मेरे सीने में आग पलती है

और  आज पढिए पुरुषोत्तम 'यकीन' की ग़ज़ल "मेरे सीने में आग पलती है"


ग़ज़ल
मेरे सीने में आग पलती है
  •  पुरुषोत्तम ‘यक़ीन’

अपने उद्गम से जब निकलती है
हर नदी तेज़-तेज़ चलती है

टकरा-टकरा के सिर चटानों से
धार क्या जोश में उछलती है

गोद पर्वत की छोड़ कर नदिया
आ के मैदान में सँभलती है

जाने क्या प्यास है कि मस्त नदी
मिलने सागर से क्या मचलती है

ख़ुद को कर के हवाले सागर के
कोई नदिया न हाथ मलती है

शैर मेरे कहाँ क़याम करें
अब ग़ज़ल की ज़मीन जलती है

नाम सूरत लिबास सब बदला
फिर भी सीरत कहाँ बदलती है

कैसे तुझ को बसा लूँ दिल में ‘यक़ीन’
मेरे सीने में आग पलती है

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सोमवार, 16 फ़रवरी 2009

माटी के बेटों की खामोशी टूटी

पिछले साल पानी की मांग पर राजस्थान के टोंक जिले में पानी की मांग कर रहे किसानों पर गोली चली। देश में ऐसी घटनाएँ हर साल बहुत घटती हैं। प्रस्तुत है इन्हीं घटनाओं से प्रेरित महेन्द्र नेह का एक गीत ...


'गीत'
"माटी के बेटों की खामोशी टूटी"

  • महेन्द्र नेह

फिर माटी के बेटो की
खामोशी टूटी
सूखे खेतों ने थोड़ा सा
पानी माँगा
नये आधुनिक राजाओं का
माथा ठनका
लोकतंत्र ने
बारूदी भाषा अपनाई !
खेत नहीं बेचेंगे अपने
हलधर बोले
जड़ें नही छोड़ेंगे अपनी
तरूवर बोले
राजनीति के अंधे विषधर
फिर फुंकारे
धन-सत्ता ने
अमरीकी बन्दूक उठाई !
खलिहानों में पगडंडी पर
लाश बिछी हैं
कंधों पर किसान की बेटी
उठा रही हैं
चारों ओर लाठियाँ, गोली
हिंसा नत्र्तन
घायल बचपन
घायल गाँवो की तरूणाई ! 
गोलबंद हैं वृक्ष जमीं पर
तने हुए हैं
सत्ता के हिंसक ताँडव
से डरे नहीं है
जीवित सदा रहेंगे सपने
नही मरेंगे
पूरब में उगती
अरूणाई !
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रविवार, 15 फ़रवरी 2009

अवनीन्द्र को सरप्राइज और रेस्टोरेंट केवल परिवार के लिए

मैं, वैभव और पाबला जी तीनों पैदल ही अवनींद्र के घर की ओर चले।   रास्ते में पाबला जी ने बताया कि रायपुर से संजीत त्रिपाठी पूछ रहे थे कि द्विवेदी जी रायपुर कब आ रहे हैं।  संजीव तिवारी ने फोन पर बताया कि दुर्ग बार चाहती है कि मैं वहाँ आऊँ।  लेकिन वह कल व्यस्त रहेगा।  मैं ने रास्ते में ही गणित लगाई कि 30 को शाम पांच बजे मेरी वापसी ट्रेन है इसलिए उस दिन रायपुर जाना ठीक नहीं, हाँ दुर्ग जाया जा सकता है।   मैं ने उन्हें बताया कि कल रायपुर और परसों दुर्ग चलेंगे।  कोई दो-तीन सौ मीटर पर ही हम दूर संचार कॉलोनी पहुँच गए।  गेट पर पूछताछ पर पता लगा कि आखिरी इमारत की उपरी मंजिल के फ्लेट में अवनीन्द्र का निवास है।

निचली मंजिल के दोनों फ्लेट के दरवाजों के आस पास कोई नाम पट्ट नहीं था।  इस से यह पहचानना मुश्किल था कि किस फ्लेट में कौन रहता होगा।  ऊपर की मंजिल पर भी यही आलम हुआ तो गलत घंटी भी बज सकती है। ऊपर पहुंचे तो एक फ्लेट पर अवनींन्द्र के नाम की खूबसूरत सी नाम पट्टिका देख कर संतोष हुआ।  घंटी बजाने पर अवनीन्द्र की पत्नी ज्योति ने दरवाजा खोला।  मुझे और पाबला जी को देख वह आश्चर्य में पड़ गई।  मैं  ने मौन तोड़ा, पूछा-अवनीन्द्र है? हाँ कहती हुई उस ने रास्ता दिया।  अवनीन्द्र ड्राइंग रूम में मिला।  देखते ही जो आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता उस  के चेहरे पर दिखाई दी उसका वर्णन कर पाना संभव नहीं है।  मैं ने बताया ये पाबला जी हैं।  उस ने पाबला जी से हाथ मिलाये।  मेरे संदर्भ से पाबला जी और अवनींद्र फोन पर बतिया चुके थे।
चित्र में अवनीन्द्र, मैं और वैभव
मैं ने बताया, तुम्हें सूचना न देना और अचानक आ कर सरप्राइज देना पाबला जी की योजना का अंग था जिसे मैं ने स्वीकार कर लिया।  पानी आ गया।  ज्योति ने कॉफी के लिए पूछा। तो हमने हाँ कह दी। बातें चल पड़ी घर परिवार की।   इस बीच कुछ मीठा, कुछ नमकीन आ गया।  परिवार की बातों के बीच पाबला जी कुछ अप्रासंगिक होने लगे तो मैं चुप हुआ फिर भिलाई के बारे में पाबला जी और अवनींद्र बातें करते रहे।  शहर के बारे में, बीएसपी के बारे में, बीएसएनएल के बारे में  और भिलाई के एक शिक्षा केन्द्र बनते जाने के बारे में।  पता लगा कि कोटा के सभी प्रमुख कोचिंग संस्थानों की शाखाएँ भिलाई में भी हैं।  भिलाई को कोटा से जोड़ने का एक महत्वपूर्ण बिंदु यह भी था।  इन संस्थानों में कोटा के लोग काम कर रहे थे। ज्योति कॉफी ले आई। उस ने भोजन के लिए पूछा तो मैं ने कहा आज पाबला जी ने इतना खिला दिया है कि खाने का मन नहीं है।  कल शायद दुर्ग या रायपुर जाना हो, तो कल शाम को यहाँ खाना पक्का रहा।  उस ने उलाहना दिया कि मुझे वहीं उस के यहाँ रहना चाहिए था।  उस की बात वाजिब थी।  मैं ने बताया कि मुझे पाबला जी से वेबसाइट का काम कराना है तो वहीं रुकना सार्थक होगा।  उस की शिकायत का यह सही उत्तर नहीं था, शिकायत अब भी उस की आँखों में मौजूद थी।

हम अवनीन्द्र के यहाँ कोई डेढ़ घंटा रुके।  इस बीच अवनींद्र के बारे में मैं ने पाबला जी को बताया कि वह पढ़ने में शुरू से आखिर तक सबसे ऊपर रहा।  एक वक्त तो उस की हालत यह थी कि महिनों वह बिस्तर पर नहीं सोता था।  टेबल कुर्सी पर पढ़ते पढते तकिया टेबल पर रखा और उसी पर सिर टिका कर सो लेता। सुबह उठता तो हमें लगता कि जैसे वह जल्दी उठ कर नहा धो कर तैयार हो लिया है।  उस का राज बुआ ने बताया कि यह नींद से जागते ही मुहँ धोता है और बाल गीले कर, पोंछ तुरंत कंघी कर लेता है।  जिस से वह हमेशा तरोताजा रहता है।  मैं ने भी आज तक ऐसा विलक्षण विद्यार्थी नहीं देखा।  वहाँ से चलने के पहले पाबला जी ने अपने कैमरे से हमारे चित्र लिए।

हम वापस पाबला जी के यहाँ पहुँचे तो पाबला जी की बिटिया सोनिया (रंजीत कौर) से भेंट हुई। सुबह उस से ठीक से भेंट न हो सकी थी वह कब तैयार हो कर अपने कॉलेज चली गई थी हमें पता ही नहीं लगा।  वह बहुत छोटी लग रही थी।  मैं समझा वह ग्रेजुएशन कर रही होगी।  पता लगा वह मोनू से कुछ मिनट बड़ी है और अक्सर यह बात अपने भाई को जब-तब याद दिलाती रहती है।  वह एमबीए कर रही है।   पाबला जी ने संजीत और संजीव को मेरा कार्यक्रम बता दिया।  संजीव ने बताया कि वह सुबह कुछ वकीलों के साथ आएँगे।  कुछ ही देर में पाबला जी ने घोषणा की कि भोजन के लिए बाहर चलना है।  हम चारों मैं, पाबला जी, मोनू और वैभव वैन में लद लिए।  जिस रेस्टोरेंट में हम गए वह बहुत ही विशिष्ठ था। मंद रोशनी और धीमे मधुर संगीत में भोजन हो रहा था और सभी टेबलों पर परिवार ही हमें दिखाई दिए।  मैं ने पूछा तो बताया गया कि इस रेस्टोरेंट में बिना महिलाओं के प्रवेश वर्जित है।  मैं समझ गया कि यह सार्वजनिक स्थल पर शांति बनाए रखने का सुगम तरीका है।  हमारे एक लीडर का वक्तव्य याद आ गया कि किसी भी संस्था की कार्यकारिणी की बैठक में फालतू बातों को रोकना हो तो एक दो महिलाएँ सदस्याएं होना चाहिए।

हमारे साथ कोई महिला न थी फिर भी हम वहाँ थे।  पाबला जी ने बताया कि प्रवेश करने के पहले द्वार पर मैनेजर ने टोका था और उसे यह कहा गया है कि बिटिया पीछे आ रही है।  लेकिन बाद में फोन पर रेस्टोरेंट के संचालक से बात करने पर ही भोजन का आदेश लिया गया।  भोजन स्वादिष्ट था।  हम घर लौटे तो ग्यारह बजे होंगे।  इतना थक गए थे कि वेबसाइट का काम कर पाना संभव नहीं था।  उसे अगली रात के लिए छोड़ दिया गया।  वैभव मोनू के कमरे में चला गया।  मैं भी कुछ देर नेट पर बिताने के बाद बिस्तर के हवाले हुआ।

शनिवार, 14 फ़रवरी 2009

पाबला जी के घर और बीएसपी के मानव संसाधन भवन के पु्स्तकालय में

पाबला जी बताते जा रहे थे, यहाँ दुर्ग समाप्त हुआ और भिलाई प्रारंभ हो गया। यहाँ यह है, वहाँ वह है।  मेरे लिए सब कुछ पहली बार था, मेरे पल्ले कुछ नहीं पड़ रहा था।  मेरी आँखे तलाश रही थीं, उस मकान को जिस की बाउण्ड्रीवाल पर केसरिया फूलों की लताएँ झूल रही हों।  और एक मोड़ पर मुड़ते ही वैसा घर नजर आया।  बेसाख्ता मेरे मुहँ से निकला पहुँच गए।  पाबला जी पूछने लगे कैसे पता लगा पहुँच गए? मैं ने बताया केसरिया फूलों से। वैन खड़ी हुई, हम उतरे और अपना सामान उठाने को लपके।  इस के पहले मोनू (गुरूप्रीत सिंह) और वैभव ने उठा लिया। हमने भी एक एक बैग उठाए।  पाबला जी ने हमें दरवाजे पर ही रोक दिया।  अन्दर जा कर अपनी ड़ॉगी को काबू किया। उन का इशारा पा कर वह शांत हो कर हमें देखने लगी।  उस का मन तो कर रहा था कि सब से पहले वही हम से पहचान कर ले।  उस ने एक बार मुड़ कर पाबला  की और शिकायत भरे लहजे में कुछ कहा भी। जैसे कह रही हो कि मुझे नहीं ले गए ना, स्टेशन मेहमान को लिवाने।  डॉगी बहुत ही प्यारी थी।

लॉन में पाबला जी के पिताजी से और बैठक में माता जी से भेंट हुई।  बहुत ही आत्मीयता से मिले।  मुझे लगा मेरे माताजी पिताजी बैठे हैं।  उन के चरण-स्पर्श में जो आनंद प्राप्त हुआ कहा नहीं जा सकता।  जैसे मैं खुद अपने आप के पैर छू रहा हूँ।  पाबला जी ने बैठक में बैठने नहीं दिया।  बैठक के दायें दरवाजे से एक छोटे कमरे में प्रवेश किया जहाँ डायनिंग टेबल थी और उस के पीछे एक छोटा सा कमरा।  जिस में एक टेबल पर पीसी था।  पीसी पर काम करने की कुर्सी, और एक तखत। एक अलमारी जिस में किताबें सजी थीं। पाबला जी बोले, बस यही हमारी सोने और काम करने की जगह है।  अब भिलाई प्रवास तक आप के हवाले। फिर पूछा, क्या? चाय या कॉफी? मैं ने तुरंत कॉफी कहा, चाय मैं ने पिछले सोलह साल से नहीं पी।

कॉफी के बाद हमें टायलट दिखा दी गई। हमने उन का उपयोग किया और प्रातःकालीन सत्कार्यों से निवृत्त हो लिए।  तब तक टेबल पर नाश्ता तैयार था।  दो पराठे हमने मर्जी से लिए, तीसरा पाबला जी के स्नेह के डंडे से। उस के तुरंत बाद पाबला जी हमें ले कर स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लि. के भिलाई स्टील प्लांट के मानव संसाधन भवन पहुँचे।  हमें वहाँ अपने कुछ सह कर्मियों और अधिकारियों से मिलाया।  फिर पुस्तकालय दिखाया। पुस्तकालय में बहुत किताबें थीं।  तकनीकी तो थी हीं,  कानून की महत्वपूर्ण और नई पुस्तकें भी वहाँ मौजूद थीं।  रीडिंग रूम में दुनिया भर की महत्वपूर्ण पत्रिकाएं और जर्नल मौजूद थे।  बहुत कम सार्वजनिक उपक्रमों में ऐसे पुस्तकालय होंगे।  पुस्तकालय घूमते हुए किसी बात पर जरा जोर से हँसी आ गई। पाबला जी ने मुझे तुरंत टोका।  मुझे अच्छा लगा कि वहाँ लोग अनुशासन बनाए रखने का प्रयत्न करते हैं।  उस दिन वैभव के पंजीकरण का काम नहीं होना था, यह पाबला जी पहले ही बता चुके थे।  कुछ आवश्यक कारणों से यह काम कुछ दिनों से केवल सोमवार को होने लगा था।  इस समाचार को जानते ही मैं बिलकुल स्वतंत्र हो गया था।  वैभव का जो भी होना था मेरे वहाँ से लौटने के बाद होना था।  हम घूम फिर कर वापस घर आ गए।

घर पहुँचे तब तक माता जी दोपहर के भोजन की तैयारी कर चुकी थीं।  मेरे जैसे केवल दो बेर खाने वाले प्राणी को यह ज्यादती लगी।  अभी तो सुबह के पराठों ने पेट के नीचे सरकना शुरू ही किया था।  माता जी ने बनाया है तो भोजन तो करना पड़ेगा, पाबला जी की इस सीख का कोई जवाब हमारे पास नहीं था। फिर याद आयी दादा जी की सीख, कि बने भोजन और मेजबान का अनादर नहीं करते।  हम चुपचाप टेबल पर बैठ गए। सोचा केवल दो चपाती खाएंगे।  इस बार माता जी के आग्रह पर फिर तीन हो गईं।  भोजन के बाद कुछ देर अपनी मेल देखी और पाबला जी के तख्त पर ढेर हो गए।  वैभव बैठक के दूसरी ओर बने मोनू के कमरे में चला गया।  यहाँ तो बाकायदे गर्मी थी। सर्दी का नामोनिशान नहीं।  पंखा चल रहा था। नींद आ गई।

आँख खुली तो डॉगी चुपचाप मेरी गंध ले रही थी।  मन तो कर रहा था उसे सहला दूँ।  पर सोच कर कि यह चढ़ बैठेगी, चुप रहा। तभी पाबला जी ने कमरे में प्रवेश किया।  उन्हें देख कर वह तुरंत कमरे से निकल गई।  पाबला जी ने पूछा, परेशान तो नहीं किया?  -नहीं केवल पहचान कर रही थी।  बाहर देखा तो शाम होने को थी।   मैं ने पूछा- अवनींद्र के यहाँ कब चलेंगे?  बोले छह बजे के बाद चलेंगे, तब तक वे ऑफिस से भी आ लेंगे।  अवनींद्र, मेरा भाई, मेरी बुआ का पुत्र, भिलाई में ही बीएसएनएल में अधिकारी है।  मैं उस को कोटा से रवाना होने के पहले सूचित करना चाहता था।  पर पाबला जी ने मना कर दिया था, कि उस के घर सीधे जा कर बेल बजाएँगे।  सरप्राइज देंगे तो आनंद कुछ और ही होगा।  मैं उन से सहमत हो गया।  समय था, इस लिए कॉफी पी गई और मैं तैयार हो गया।  मैं, वैभव और पाबला जी तीनों पैदल ही अवनींद्र के घर की ओर चले।
चित्र
1. पाबला जी के घर की बाउंड्रीवाल,   2. पाबला जी के पिता जी और माता जी,   3. भिलाई स्टील प्लाण्ट,    4. पाबला जी का घर बाहर से और   5. पाबला जी का पुत्र गुरूप्रीत सिंह (मोनू)
 

और यहाँ नीचे देख सकते हैं मोनू और डॉगी का शानदार वीडियो।

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2009

हबीबगंज से भिलाई तक

यह भोपाल का हबीबगंज स्टेशन था।  उपयुक्त प्लेटफार्म पर पहुंचने के कुछ ही देर बाद छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस आ गई और हम उस में लद लिए।  यह ट्रेन रोज अमृतसर से शाम साढ़े चार बजे चलती है और तीसरे दिन दोपहर 11.50 बजे बिलासपुर जंक्शन पहुंचती है।  इस नाम की एक डाउन और एक अप ट्रेन हमेशा ट्रेक पर रहती है।  गाड़ी चली तो आधे घंटे से कुछ अधिक ही लेट थी।  एकाध घंटे हम बैठे रहे। पर जैसे जैसे रात गहराती गई मिडल बर्थ खुलने लगी और दस बजते बजते मैं भी मिडल बर्थ पर पहुंच लिया। चाय की आवाजों से नींद खुली तो ट्रेन नागपुर स्टेशन पर खड़ी थी। कोई चार से साढ़े चार का समय था।  मैं ने वैभव से पूछा चाय पियोगे तो उस ने मना किया। लेकिन मैं उतर कर नागपुर प्लेटफार्म देखने का लोभ संवरण नहीं कर सका।  प्लेटफॉर्म पर आया तो कोई सर्दी नहीं थी।  प्लेटफॉर्म नगर अपनी प्राचीनता की कहानी स्वयं कह रहा था।  ट्रेन बहुत देर वहाँ रुकी रही।  मैं वापस अपनी बर्थ में आ कर कंबल में दुबक लिया।

अगली बार नीन्द दो स्त्रैण ध्वनियों ने भंग की कूपा लगभग खाली था,  सुबह की रोशनी खिड़कियों से प्रवेश कर रही थी।  सामने वाली मिडल बर्थ को गिराया जा चुका था ट्रेन किसी प्लेटफॉर्म पर खड़ी थी। शायद वे दोनों वहीं से बैठी थीं और उन्हें छोड़ने वाले प्लेटफॉर्म पर खड़े उन्हें हिदायतें दे रहे थे।  उन में एक अधेड़ होने का आतुर विवाहिता और दूसरी किशोरावस्था की अंतिम दहलीज पर खड़ी कोई छात्रा थी। मैं ने स्टेशन का नाम पूछा तो गोंदिया बताया गया।  मुझे बीड़ियों का स्मरण हो आया, ब्रांड शायद तीस छाप रहा होगा।  कोई कह रहा था,  ट्रेन कोई एक घंटा लेट हो गई है, या हो जाएगी।  तभी मोबाइल ने पाबला जी की धुन गुन गुनाई।  पूछ रहे थे ट्रेन कहाँ पहुंची।  मैं ने बताया, गोंदिया में खड़ी है।  नागपुर में आधे घंटे से कुछ अधिक लेट थी। यहाँ लोग एक घंटे के करीब बता रहे हैं।  बाकी का अनुमान आप खुद लगाएँ।  उन्हों ने बताया कि वे दुर्ग प्लेटफॉर्म पर हमें खड़े मिलेंगे।  अभी ढाई घंटों का मार्ग शेष था। मुझे नींद की खुमारी थी।  मैं फिर से कंबलशरणम् गच्छामि हो गया।

इस बार आँखें खुली तो तुरंत मोबाइल में समय देखा गया। अभी आठ बीस हो रहे थे। डब्बे में विद्यार्थियों, विशेष रुप से छात्राओं की भारी संख्या थी।  जैसे वह शयनयान न हो कर जनरल डब्बा हो।  गाड़ी की देरी के स्वभाव को देखते हुए दुर्ग पहुँचने में अभी पौन घंटा शेष था।  कुछ ही देर में किसी गाड़ी नगरीय सीमा में प्रवेश करती दिखाई दी।  मैं ने ऐतिहातन पूछ लिया कौन नगर आया?  जवाब दुर्ग था।  मैं एक दम चैतन्य हो उठ बैठा। कंबल आदि समेट कर बैग के हवाले किए और उतरने को तैयार।

प्लेटफॉर्म पर उतरे तो इधर उधर निगाहें दौड़ाई कि कही कोई पगड़ीधारी सिख किसी का इंतजार करता दिखा तो जरूर पाबला जी होंगे।  कुछ सिख दिखे तो, लेकिन उन में से किसी के पाबला होने की गुंजाइश एक फीसदी भी नहीं थी।  उतरी हुई सवारियाँ सब चल दीं, फिर ट्रेन भी। आखिर मोबाइल का सहारा लिया।  पाबला जी पूछ रहे थे ट्रेन कहाँ पहुंची? मैं ने बताया हमें दुर्ग स्टेशन पर उतार कर आगे चल दी।  वे बोले- हम तो अभी घर से निकले ही नहीं।  देरी के हिसाब से तो अभी पहुँचने में पौन घंटा होना चाहिए।  मैं ने कहा कम्बख्त ने गोंदिया के बाद सारी देरी कवर कर ली।  आप चलिए हम प्लेटफॉर्म  छोड़ कर स्टेशन के बाहर निकलते हैं।  वे बोले मैं बीस मिनट में पहुँचता हूँ।

हम दोनों स्टेशन के बाहर निकल कर वहाँ आ गए जहाँ कारों की पार्किंग थी।  कुछ दूर ही स्टेशन का क्षेत्र समाप्त हो रहा था और बाहर की दुकानें दिखाई दे रही थीं।  वहाँ जरूर कोई चाय-कॉफी की दुकान होगी।  सुबह की कॉफी नहीं मिली थी।  पर मुझे यह गवारा न था कि पाबला जी को हमें तलाशने में परेशानी हो।  हम वहीं उन का इंतजार करते रहे।  मैं हर आने वाली वैन में पगड़ी धारी सिख को देखने लगा।  आखिर वह वैन आ ही गई।  हमने अपने बैग उठाए और उसकी और बढ़े।  हमारी बढ़त देख पाबला जी ने भी हमें पहचान लिया।  पाबला जी के साथ उन का पुत्र मोनू (घरेलू नाम) था। दोनों ने हमारे हाथों से बैग लगभग छीने और वैन के हवाले किए।  वैभव को चालक सीट पर बैठे मोनू के साथ बिठाया और पाबला जी मेरे साथ पीछे बैठे।  हम चल दिए भिलाई स्टील प्लांट की टाउनशिप में स्थित पाबला जी के घऱ की ओर।
चित्र -
1.  हबीबगंज (भोपाल)  रेलवे स्टेशन 
2. दुर्ग रेलवे स्टेशन है  
3. पाबला जी।

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2009

अजित वडनेरकर के साथ चार घंटे

शब्दों के सफर वाले अजित वडनेरकर जी कोटा रह चुके हैं, और कोटा की कचौड़ियों के स्वाद से भली तरह परिचित हैं।  मैं ने जब उन से भिलाई जाने का उल्लेख किया तो उन्हें तुरंत ही कचौड़ियाँ याद आ गईं। हमारी योजना सुबह बस से चल कर शाम को भोपाल से छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस पकड़ने की थी।  लेकिन अजित जी ने कहा कि बस के भोपाल पहुँचने और छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस पकड़ने में दो ही घंटों का अंतराल है जो बहुत कम है।  हमने योजना बदली और 27 जनवरी को सुबह निकलने के बजाय 26 की रात को ट्रेन से निकलने का मन बनाया और आरक्षण करवा लिया।  अब हमारे पास भोपाल में आठ घंटे थे।  अजित जी को बताया गया कि कचौड़ियाँ भोपाल पहुंचने की व्यवस्था हो गयी है,  पर वहाँ आप तक कैसे पहुंचेगी? बोले,  ट्रेन से उतर कर मेरे घर आ जाइए।

भोपाल में इतने कम अंतराल में अजित जी के घर जाने का अर्थ था किसी अन्य से न मिल पाना।  वैसे भी हमारे पास चार बैग होने से कहीं आना जाना दूभर था।  पर पल्लवी त्रिवेदी से मिलने की इच्छा थी, भोपाल जंक्शन के आस पास ही उन का ऑफिस होने से उन से मिल पाना संभव प्रतीत हो रहा था।  पर पता लगा कि वे राजस्थान यात्रा पर हैं और उसी दिन भोपाल पहुंचेंगी।  रवि रतलामी जी से मिल सकता था।  पर वे भी दूर थे।  अन्य के बारे में तो इस अल्प अंतराल में मिल पाने की सोचना भी संभव नहीं था।  मैं ने किसी को बताया भी नहीं।  मेरे साढ़ू भाई हॉकी रिकार्डों के संग्रहण के लिए विश्व प्रसिद्ध हॉकी स्क्राइब बी.जी. जोशी इस अंतराल में सीहोर उन के घर आने का निमंत्रण दे रहे थे।  पर उन से माफी मांग ली गई, अजित जी के यहाँ जाना तय हो गया।

26 को यात्रा से निकलने के पहले अजित जी की कचौड़ियों के साथ साथ भिलाई तक ले जाने के लिए दौ पैकेट लोंग के सेव भी लाए गए।  पता किया तो ट्रेन 22.30 के बजाय 23.30 पर आने वाली थी।  हम 23.10 पर ही स्टेशन पहुँच गए।  ट्रेन लेट होती गई और 27 जनवरी को 00.30 बजे उस ने प्लेटफार्म प्रवेश किया और एक बजे ही रवाना हो सकी।  ट्रेन चलते ही हम सो लिए।  आँख खुली तो सुबह हो चुकी थी और ट्रेन अशोक नगर स्टेशन पर खड़ी थी।  कॉफी की याद आई, लेकिन पैसेन्जर ट्रेन में कहाँ कॉफी?  बीना पहुँची तो सामने ही स्टाल पर कॉफी थी।  उतर कर स्टॉल वाले से कॉफी देने को कहा तो बोला 10 मिनट बाद बिजली आने पर।  मैं ने पूछा यहाँ पावर कट है?  बताया गया कि बिजली 10 बजे आएगी।  यानी भोपाल पहुंचने का समय हो चुका था।  ट्रेन भोपाल पहुंचने तक वडनेरकर जी का दो बार फोन आ गया।  स्टेशन पर गाड़ी रुकते ही पल्लवी जी का खयाल आया।  लेकिन घड़ी ने सब खयाल निकाल दिए।  ऑटोरिक्षा की मदद से वडनेरकर जी के घर पहुंचे तो दो बज चुके थे।  वापसी में मात्र चार घंटों का समय था।

सैकण्ड फ्लोर पर दो छोटे फ्लेट्स को मिला कर बनाया हुआ घर।  एक दम साफ सुथरा और सुरुचिपूर्ण ढंग से सजाया हुआ।  बरबस ही  आत्मीयता प्रदर्शित करते छोटे-छोटे कमरे।  कमरों में फर्श से केवल छह इंच ऊंचा फर्नीचर।  मैं ने फोन पर ही उन्हें बता दिया था कि हम दोनों बाप-बेटे मंगलवारिया हैं सो नाश्ते वगैरह की औपचारिकता न हो।  जवाब मिला था, कैसा नाश्ता? भोजन तैयार है।  जाते ही अजित और मैं बातों में मशगूल। भाभी हमारे लिए कॉफी ले आईं।  हमें प्रातःकालीन कर्मों से भी निवृत्त होना था।  कॉफी सुड़क कर जैसे ही मैं स्नानघर में घुसने लगा अजित जी को कचौड़ियाँ याद आ गई। बोले, मेरी कचौड़ियाँ? भाई एक तो निकाल कर दे ही दो। वैभव कचौड़ियों के पैकेट के लिए बैग संभालने लगा।  मैं ने पूछा- आप को तो पांच बजे नौकरी पर जाना होगा? तो बताया कि उन्हों ने सिर्फ मेरी खातिर आज अवकाश ले लिया है।

दोनों पिता पुत्र प्रातःकालीय कर्मों से निवृत्त हुए तो भोजन तैयार था।  हम दोनों और अजित बैठ गए।  दाल, सब्जियाँ, चपाती और देश में उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ बासमती चावल, साथ में नमकीन और अचार। भूख चरम पर पहुंच गई।  हम भोजन के साथ बातें करते रहे।  अजित बता रहे थे कुछ दिनों पहले यात्रा के बीच ही अफलातून जी उन के मेहमान रह चुके हैं। उन के साथ बिताए समय के बारे में बताते रहे।  ब्लागरी और ब्लागरों के बारे में, कुछ भोपाल, कोटा और राजगढ़ जहाँ अजित का बचपन गुजरा के बारे में बातें हुई।  इस बीच हम जरूरत से अधिक ही भोजन कर गए।  तभी भाभी जी ने ध्यान दिलाया कि उन का पुत्र किस तरह पढ़ते पढ़ते सो गया है।  अजित देखने गए तो उसका चित्र कैमरे में कैद कर लाए।  भोजन के उपरांत भी हम बातें ही करते रहे। पता लगा भाभीजी अध्यापिका हैं और रोज 40 किलोमीटर दूर एक कस्बे में अध्यापन के लिए जाती हैं।  पूरी तरह एक श्रमजीवी परिवार।  इस बीच अजित जी ने हमारे अनेक चित्र ले डाले। बातों में कब पाँच बज गए पता न चला। भाभी जी ने फिर गरम गरम कॉफी परोस दी।

अब चलने का समय हो चला था।  अजित के माता पिता सैकण्ड फ्लोर पर चढ़ने उतरने की परेशानी के चलते निकट ही ग्राउंड फ्लोर पर अपने घर पर निवास करते हैं। हम अपने सामानों की पैकिंग करने लगे, कोई जरूरी वस्तु छूट न जाए।  अजित वैभव को साथ ले कर पिता जी के घर खड़ी कार निकालने चल दिए। वे कार ले कर लौटे तो मैं ने अपने बैग उठाए। शेष सामान अजित का पुत्र उठाने लगा तो लगा वह घायल है। भाभी ने बताया कि वह दो दिन पहले ही वह बाइक पर टक्कर खा चुका है।  उस के पूरे शरीर पर चोटें थीं।  चोटें टीस रही थीं, जिस तरह वह चल रहा था लगा बहुत तकलीफ में है।  फिर भी वह सामान उठाने को तत्पर था।  मेरे पूछने पर भाभी ने बताया कि क्या क्या चिकित्सा कराई गई है।

जब भी मैं किसी को बीमार या चोटग्रस्त देखता हूँ और चिकित्सा के बारे में पता करता हूँ तो खुद बहुत तकलीफ में आ जाता हूँ।  मैं ने अपने घर आयुर्वेदिक चिकित्सा देखी और सीखी, बाद में होमियोपैथी सीखी, और उसे अपनाया तो घर में ही दवाखाना बन गया।  धीरे धीरे यह काम कब पत्नी शोभा ने हथिया लिया पता ही नहीं लगा। होमियोपैथी की बदौलत दोनों बच्चे बड़े हो गए कभी बिरले ही किसी डाक्टर या अस्पताल जाने का काम पड़ा। 

मैं ने भाभी को होमियोपैथिक दवा लिख कर दे दी।   कार आ चुकी थी, हम सामान सहित कार में लद लिए अजित, भाभी और उन का पुत्र साथ थे।  हम स्टेशन पहुंचे तो ट्रेन आने में मात्र दस मिनट थे।  अजित के पुत्र को चलने में तकलीफ थी।  मैं ने अजित जी को प्लेटफार्म  तक पहुँचाने की औपचारिकता करने से मना किया।  वे राजी हो गए। जाते जाते उन्हें यह जरूर कहा कि वे होमियोपैथी दवा आज ले कर बेटे को जरूर दें। उन्हों ने आश्वस्त किया कि वे जरूर देंगे।  अजित जी को विदा कर हम अपना सामान उठाए अपने प्लेटफार्म की ओर चले।  ऐसा लग रहा था जैसे हम अभी अभी अपना घर और परिजन छोड़ कर आ रहे हैं।

पुणे के स्थान पर बल्लभगढ़ और पाबला जी का गुस्सा

विनोद जी और अनिता जी

अभिषेक ओझा बता रहे थे कि मैं पूर्वा से बात कर लूंगा कि वह किस बस से कहाँ उतरेगी।  हम ने दोनों ही स्थितियाँ पूर्वा की माताजी को बता दीं।  वे तनिक आश्वस्त हो गयीं।  अगले दिन सुबह आठ बजे मैं ने पूर्वा को फोन लगाया तो वह बस में थी।  उस ने बताया कि विनोद अंकल उस के इंस्टीट्यूट पर आकर उसे बस में बिठा गए थे।  उस का अभिषेक से भी संपर्क हो चुका था।  शाम को जब दुबारा फोन पर बात हुई तो  पता लगा कि वह साक्षात्कार दे कर मुम्बई वापस भी पहुँच चुकी थी।  जब उस की बस पूना पहुँची तो अभिषेक बस स्टॉप पर उस का इंतजार करते मिले।  उसे केईएम अस्पताल छोड़ा।  साक्षात्कार आधे घंटे में ही पूरा हो लिया।  वह बाहर आई तो अभिषेक अभी गए नहीं थे।   दोनों ने किसी रेस्तराँ में नाश्ता किया और पूर्वा को मुम्बई की बस में बिठा कर ही अभिषेक अपने काम पर लौटे।  इस खबर को जान कर शोभा प्रसन्न हो गईं।  उन की बेटी पहली बार पूना गई थी और उसे अकेला नहीं रहना पड़ा था।

कुछ दिन बाद पता लगा कि पूना केईएम अस्पताल में जिस स्थान के लिए पूर्वा ने साक्षात्कार दिया था वैसा ही एक स्थान बल्लभगढ़ (फरीदाबाद) के सिविल अस्पताल में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) हरियाणा सरकार और एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था इण्डेप्थ नेटवर्क के संयुक्त प्रयासों से चल रहे व्यापक जन स्वास्थ्य सेवाओं के प्रोजेक्ट में भी स्टेटीशियन/ डेमोग्राफर का स्थान रिक्त है।  उस ने वहाँ के लिए आवेदन किया और एक टेलीफोनी साक्षात्कार के उपरांत यह तय हो गया कि पूर्वा को पूना के स्थान पर बल्लभगढ़ में ही यह पद मिल जाएगा।  वह अपने नियुक्ति पत्र की प्रतीक्षा करने लगी।  उस का नियुक्ति पत्र किन्हीं कारणों से विलंबित हो गया जिस का लाभ यह हुआ कि उस ने आश्रा प्रोजेक्ट के उस के जिम्मे के सभी कामों को पूरा कर दिया जिस से उस की अनुपस्थिति से आश्रा प्रोजेक्ट को कोई हानि न हो। बाद में यह तय हुआ कि वह 2 फरवरी को बल्लभगढ़ में अपनी नयी नियुक्ति पर उपस्थिति देगी।  इधर वैभव को भी जनवरी के अंत तक अपना प्रोजेक्ट और ट्रेनिंग शुरू करनी थी।
बलविंदर सिंह पाबला
 
वैभव की स्थिति यह थी कि वह खुद भिलाई जा कर अपना प्रोजेक्ट और ट्रेनिंग प्रारंभ कर सकता था।   लेकिन पाबला जी का आग्रह यह था कि उस के साथ मैं  भी भिलाई पहुँचूँ और कम से कम तीन-चार दिनों के लिए वहाँ रुकूँ।  उस में मेरा स्वार्थ भी था कि मैं वहाँ पाबला जी के पुत्र से तीसरा खंबा की अपनी वेबसाइट डिजाइन करवा लेता।  लेकिन पूर्वा के साथ मुझे और शोभा को वल्लभगढ़ जाना आवश्यक था।  उस के लिए वहाँ मकान तलाशना जो उस के निवास के लिए उपयुक्त हो।  मैं ने इस परिस्थिति का उल्लेख पाबला जी से किया और कहा कि मैं एक दिन से अधिक नहीं रुक सकूंगा।  तो वे गुस्सा हो गए, कहने लगे आप के आने की भी क्या आवश्यकता है।  वैभव को भेज दीजिए काम हो जाएगा।  उन के गुस्से ने यह तय किया कि मैं भिलाई तीन दिन और दो रात रुकूंगा।   कोटा से भोपाल और भोपाल से दुर्ग तक का व वापसी का दुर्ग से भोपाल तक के आरक्षण करवा लिए गए।  अब हमें 26 जनवरी की रात को कोटा से चल कर 28 जनवरी सुबह दुर्ग पहुंचना था।  दुर्ग से मुझे 30 की शाम चल कर 31 को सुबह भोपाल और फिर बस या किसी अन्य साधन से कोटा पहुंचना था।  आखिर 2 फरवरी को मुझे, शोभा और पूर्वा को बल्लभगढ़ के लिए भी रवाना होना था।  जारी