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बुधवार, 21 मई 2008

क्या आप एक प्रोफेशनल हैं?

इस प्रश्न पर कि क्या आप एक प्रोफेशनल हैं? साइंटोलॉजी (सत्य का अध्ययन) के प्रवर्तक एल. रॉन हबार्ड क्या कहते हैं?  जरा उस की बानगी देखिए-

आप कैसे देखते हैं? बात करते हैं , लिखते हैं, कैसे चलते हैं? और कैसे काम करते हैं? ये बातें यह निर्धारित करती हैं कि आप एक प्रोफेशनल हैं, या एक शौकिया।  कोई भी समाज प्रोफेशनलिज्म के महत्व पर जोर नही देता, इसलिए लोगों का मानना है कि शौकिया काम करने के तरीके सामान्य श्रेणी के हैं।

विद्यालय और विश्वविद्यालय उन छात्रों को भी स्नातक का तमगा दे देते हैं, जो अपनी भाषा को भी ठीक से पढ़ना नहीं जानते। ड्राइविंग लायसेंस के लिए टेस्ट देते समय आप जरूरी सवालों में से साठ प्रतिशत के सही और बाकी के गलत जवाब देकर भी लायसेंस प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन यह शौकिया रवैया है।

प्रोफेशनल रवैया इस से अलग है। कोई भी चाहे तो अपने रवैये में बदलाव कर के खुद को प्रोफेशनल बना सकता है। यही बात चिट्ठाकार, लेखक और कोई भी अन्य काम करने वाले के लिए सही है। ऐसा किया जा सकता है, बशर्ते कि आप अपनी कुछ बातों पर ध्यान दें।

  • आप कभी भी, कुछ भी यह सोच कर नहीं करें कि आप एक शौकिया काम कर रहे हैं।
  • आप कुछ भी करें,  तो उसे यह सोच कर करें कि आप एक प्रोफेशनल हैं, और प्रोफेशनल स्तर के अनुरूप करने का प्रयास करें।
  • अगर आप कोई भी काम यह सोच कर करते हैं कि आप केवल खेल रहे हैं, या आनंद ले रहे हैं तो इस काम को करने से आप को कोई संतोष नहीं मिलेगा। क्यों कि इस काम को करने पर आप खुद पर गर्व नहीं कर सकते।
  • आप अपने दिमाग को इस तरह से ढालें कि जो भी आप को करना है, वह एक प्रोफेशनल की तरह करना है और काम की गुणवत्ता को प्रोफेशनल स्तर तक ले जाना है।
  • आप अपने बारें में लोगों को यह कहने का मौका नहीं दें कि आप एक शौकिया जीवन जी रहे हैं।
  • प्रोफेशनल्स परिस्थिति का अध्ययन करते हैं और उस का सामना करते हैं, वे उन से कभी भी शौकिया के तौर पर नहीं निपटते।
  • इसलिए इसे जीवन के प्रथम सबक के रूप में सीख लेना चाहिए कि जिनका दृष्टिकोण प्रोफेशनल होगा वे किसी भी क्षेत्र में सफल हो सकेंगे, यहाँ तक कि जिन्दगी को जीने में भी, और वे ही अपने को अच्छा प्रोफेशनल बना पाएंगे।

138 वर्षीय हाजी हबीब ने नहीं मनाया जन्मदिन

राष्ट्रीय सहारा पर प्रकाशित जयपुर राजस्थान की इस खबर को जरुर पढ़ें। लिंक यहाँ मौजूदहै।

सोमवार, 19 मई 2008

अटक जाती है सुई, चूड़ी-बाजे की तरह

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शायद नए लोगों को तो पता भी नहीं होगा कि डीवीडी के पहले सीडी और उस से भी पहले कैसेट, और उस से भी पहले म्युजिक रिकॉर्ड करने के लिए एक साधन हुआ करता था ग्रामोफोन। इस में एक थाली के आकार की प्लेट पर ध्वनि वलयों के रुप में अंकित होती थी। इसी कारण ग्रामोफोन को "चूड़ी-बाजा" भी कहते थे।इस प्लेट को ग्रामोफोन रिकॉर्ड कहा जाता था, इस के मध्य में एक सूराख होता था। ग्रामोफोन की डिस्क जिस के मध्य में एक कील सी होती थी। इस डिस्क पर ग्रामोफोन रिकार्ड को उस के मध्य के सूराख को कील में फंसा कर चढ़ा दिया जाता था। फिर यांत्रिक चाबी के जरिए उस डिस्क को घुमाया जाता था, जिस से रिकॉर्ड भी घूमते हुए नाचने लगता था। इस के घूमना शुरु करने के बाद ग्रामोफोन पर लगे एक हाथनुमा छड़ को जिस के एक सिरे पर एक सुई लगी होती थी सुई के सहारे रिकॉर्ड के बाहरी सिरे पर रख दिया जाता था। नाचते हुए रिकार्ड पर सुई सरकती हुई मध्य में कील की तरफ सरकते हुए रिकॉर्ड पर दर्ज ध्वन्यांकन को पढ़ती थी जिसे बाद में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से स्पीकर तक पहुंचा कर मधुर संगीत का आनन्द लिया जाता था।

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कभी कभी सुई सरकने के स्थान पर एक ही वलय पर अटक जाती थी और उस एक वलय पर अंकित ध्वनि ही दोहराई जाती रहती थी। जैसे - वहाँ अगर "मैं जाऊं" अंकित होता तो ग्रामोफोन "मैं जाऊं" "मैं जाऊं" "मैं जाऊं" "मैं जाऊं" ही दोहराता रहता था जब तक कि उसे मैनुअली ठीक नहीं किया जाता था।

अब आप कहेंगे। मैं इस पुराण को क्यों बाँच रहा हूँ तो इस की वजह यह है कि इस सीडी डीवीडी के जमाने में न्यूज चैनलों की सुई रोज किसी न किसी वलय पर अटक जाती है। बाकी का रिकॉर्ड बजता ही नहीं है। सिर्फ एक वलय ही बजता रहता है।

मार्के की बात यह कि यह सुई मैनुअली भी तब तक नहीं हटती है। जब तक कि रिकार्ड टूट न जाए। रिकार्ड का श्रवण तक अधूरा रह जाता है।

एक टूटते ही चैनल वाले फिर दूसरा रिक़ार्ड चढा देते हैं, वह चलता रहता है टूटने तक। ये चैनल वाले अपनी सुई क्यों नहीं बदल देते जो हर बार अटकती रहती है, बार-बार अटकती है। कोई रिकार्ड पूरा बजने ही नहीं देती।

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