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मंगलवार, 11 मार्च 2008

10 मार्च के दिन को वे राष्ट्रीय शर्म दिवस के रुप में क्यों मनाएँ

भारत में 10 मार्च के दिन को राष्ट्रीय शर्म दिवस के रुप में मनाया जाना चाहिए। क्यों कि आज यह जानकारी हमें मिली कि भारत के राष्ट्रीय खेल हॉकी की राष्ट्रीय टीम भविष्य में कभी ओलम्पिक खेलों में भाग ले पाएगी; यह अब केवल भारतीय जनता का सपना भर बन कर रह गया है।

यह वही खेल है पहली बार जिस खेल को खेलने के लिए भारत का एक देश के रुप में प्रतिनिधित्व करने वाली टीम ने 1926 में देश के बाहर आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैण्ड खेलने के लिए गई। पहली बार यूरोप जापान में प्रतिनिधित्व करने वाली टीम भी हॉकी की ही थी। 1928 पूरे एशिया की ओर से ओलम्पिक स्वर्ण पदक लाने वाली टीम भी भारत की हॉकी टीम ही थी। मेजर ध्यानचंद इस खेल के सरताज थे जिन्हों ने 1926 से 1948 तक अपने जीवन काल में हजार से अधिक गोल किए।

यह खेल हमें अंग्रेजों से मिला। लेकिन हम ने गुलामी के दौर में भी जब हमारे खिलाड़ियों के पास पहनने को जूते भी नहीं थे जूते वाले खिलाड़ियों की टीमों के विरुद्ध बिना जूते खेल कर अपना वर्चस्व स्थापित किया।

यही कारण है कि हम ने इस खेल को आजादी के बाद अपने राष्ट्रीय खेल का दर्जा दिया।

आज तक भी ओलम्पिक खेलों के सब से अधिक स्वर्ण पदक हासिल करने वाली भारतीय हॉकी टीम अब से शायद ही किसी ओलम्पिक में हिस्सा ले पाएगी। यह एक कड़वी सचाई है जिसे जुबान पर लाते हॉकी संघ और इस खेल के लिए जिम्मेदार लोगों को शर्म आ रही है।

आज यह खबर टीवी पर देखते ही मैं सन्न रह गया। निवाला मुहँ तक पहुँचने के स्थान पर हाथ में ही रह गया।

देश के ही नहीं दुनियाँ भर में प्रसिद्ध हाँकी के रिकार्ड को सहेजने वाले हॉकी स्क्राइब श्री बी.जी. जोशी से दिन में फोन पर बात हुई तो वे बहुत दुखी थे। उन्हों ने एक वाक्य में कहा नाउ इण्डियन हॉकी इज आउट ऑफ औलम्पिक्स फॉर ऐवर

मैं समझा वे गहरे दुःख और सदमे के कारण ऐसा कह रहे हैं। मैने उन से दुबारा पूछा। नहीं, ऐसा कैसे हो सकता है?

उन्हों ने फिर कहा- बिलकुल सही है, इट इज फॉर ऐवर

मैं ने उन्हें फिर भी सदमे में ही समझा।

शाम को साढ़े छह बजे उन के घर फोन किया तो वे घर नहीं पहुँच सके थे।

आठ बजे रात्रि फिर फोन किया। तब पुनः उन से बात हुई। तब भी उन का यही कहना था इट इज फॉर ऐवर

वहाँ इतनी प्रतिस्पर्धा है कि भारतीय हॉकी टीम का दुबारा ओलम्पिक में प्रवेश अब असंभव है।

तिस पर भारतीय हॉकी के सर्वेसर्वा गिल साहब अब भी तसल्ली से कह रहे हैं- मैं बाद में इन चीजों का जवाब दूँगा। हमारे पास कोई इंस्टेंट कॉफी मशीन नहीं है कि आपको परिणाम तुरंत मिल जाए। आपको अपना स्थान वापस पाने के लिए समय लगता है। हमने सभी चीजें व्यवस्थित कर दी हैं और परिणाम में कुछ समय लगेगा।

गिल साहब और उन के साथियों ने क्या व्यवस्थित किया? यह सारे देश ने देख लिया है। अब परिणाम भी सामने है। और कौन से परिणाम की वे आशा लगाए बैठे हैं?

हाँ, उन की जिम्मेदारी तो जो है सो है ही। क्या राष्ट्रीय खेल होने के नाते क्या खेल मंन्त्री की कोई जिम्मेदारी नहीं है?

कम से कम एक जिम्मेदारी तो वे निभा ही दें कि 10 मार्च के दिन को वे राष्ट्रीय शर्म दिवस अवश्य घोषित करवा दें।

इस विषय पर अब तक पूर्ण-विराम में नलिन विलोचन ने हॉकी का अंत ?; Shuruwat: जिंदगी सिखाती है कुछ में राजीव जैन ने काश सच होता चक दे; पहलू में चंद्रभूषण ने चकते-चकते चक ही दी हॉकी; डेटलाइन इंडिया में आलोक तोमर ने क्योंकि हॉकी क्रिकेट नहीं है; कोतुहल पर nadeem ने भारतीय हॉकी: धन्य हो के पी एस गिल साहब, आज फेडरेशन ने ४ हज़ार रुपये कमाए और दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका पर दीपक भारत दीप ने दुआएं ही कर सकते हैं कि हाकी का अस्तित्व बचे आलेख लिखे हैं। सभी आलेख महत्वपूर्ण हैं। इन चिट्ठाकारों को मेरा नमन और पहलू में चंद्रभूषण के चकते-चकते चक ही दी हॉकी पर विमल वर्मा ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है, उन्हें भी नमन।

अनवरत पर कल की पोस्ट 10 मार्च राष्ट्रीय शर्म दिवस मनाएँ पर प्रतापग्रही जी, mamta जी, ज्ञानदत्तजी, अरुण जी, घोस्ट बस्टर जी, संजीत त्रिपाठी जी और राज भाटिय़ा जी की टिप्पणियाँ मिलीं। यह पोस्ट भारतीय हॉकी को लगे सदमे की सद्य प्रतिक्रिया थी। संजीत जी तो लिफाफा देख कर मजमून भी भांप चुके थे। उन के साथ साथ अन्य सभी साथी टिप्पणीकारों को प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद।




सोमवार, 10 मार्च 2008

10 मार्च राष्ट्रीय शर्म दिवस मनाएँ



आज 10 मार्च को सभी भारतीय राष्ट्रीय शर्म दिवस मनाएँ।

क्यों ?

आज संध्या को घोषणा की जाएगी।

..............दिनेशराय द्विवेदी..............

रविवार, 9 मार्च 2008

“विश्व सुंदरी”

कल आलेख पोस्ट होने के तुरन्त बाद ही एक और कविता महेन्द्र नेह से प्राप्त हुई। मुझे लगा कि वे इसे कल अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर आप तक पहुँचाना चाहते थे। तब तक ब्लॉगर पर कुछ अवरोध आ गया। मैं ने उन्हें नहीं बताया। लेकिन आज इस कविता विश्व सुंरीको आप के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ.............

विश्व सुंरी


महेन्द्र 'नेह'

चलते चलते

राह में ठिठक गई

इस एक अदद औरत को क्या चाहिए?

इस के पावों को चाहिए

दो गतिमान पहिए

ले जाएँ इसे जो

धरती के ओर-छोर

इसे चाहिए

एक ऐसा अग्निकुण्ड

जिस में नहा कर

पिघल जाए

इस की पोर-पोर में जमी बर्फ

दुनियाँ के शातिर दिमाग

लगा रहे हैं हिसाब

कितने प्रतिशत आजादी

चाहिए इसे?

गुलामी से कितने प्रतिशत चाहिए निजात?

ये, कहीं बहने ना लग जाए

नदी की रफ्तार

कहीं उतर न आए सड़क पर

लिए दुधारी तलवार..........

इस से पहले कि

बाँच सके यह

किताब के बीच

फड़फड़ाते काले अधर

सजा दिए जाएँ

इस के जूड़े में रंगीन गजरे

गायब कर दी जाए

इस की असल पहचान

स्वयं के ही हाथों

उतरवा लिए जाएँ

बदन पर बचे खुचे परिधान

गहरे नीले अंधेरे के बीच

अलंकृत कर दिया जाए

इस के मस्तक पर

विश्व सुंदरी का खिताब

इस से पहले

कि हो सके यह

सचमुच आजाद.............

* * * * * * *

शनिवार, 8 मार्च 2008

महिलाओं पर महेन्द्र “नेह” की कविता और गीत


महेन्द्र नेह से आप परिचित हैं। उन के गीत हम सब नीग्रो हैं और "धूप की पोथी" के माध्यम से करीब दस दिनों से वे घुटने के जोड़ की टोपी (knee joint cap) के फ्रेक्चर के कारण पूरे पैर पर बंधे प्लास्टर से घर पर कैद की सजा भुगत रहे हैं। आज शाम उन से मिलने गया तो अनायास ही पूछ बैठा महिलाओं पर कविता है कोई? फिर फोल्डरों में कविताऐं तलाशी गईं। सात गीत-कविताऐं उन के यहाँ से बरामद कर लाया। एक उन के पसन्द की कविता और एक मेरी पसंद का गीत आप के लिए प्रस्तुत हैं-

महेन्द्र नेह की पसंद की कविता.........

आओ, आओ नदी - महेन्द्र नेह

अनवरत चलते चलते

ठहर झाती है जैसे कोई नदी

इस मक़ाम पर आकर ठहर गई है

इस दुनियाँ की सिरजनहार

इसे रचाने-बसाने वाली

यह औरत।

इतिहास के इस नए मोड़ पर

तमन्ना है उसकी कि लग जाऐं

तेज रफ्तार पहिए उस के पाँवों में

ले जाएं उसे धरती के ओर-छोर।

चाहत है उसकी उग आएं उसके हाथों में

पंख, और वह ले सके थाह

आसमान के काले धूसर डरावने छिद्रों की।

इच्छा है उसकी, जन्मे उसकी चेतना में

एक सूरज, पिघला दे जो

उसकी पोर-पोर में जमी बर्फ।

सपना है उसका कि

समन्दर में आत्मसात होने से पहले

वह बादल बन उमड़े-घुमड़े बरसे

और बिजली बन रचाए महा-रास

लिखे उमंगों का एक नया इतिहास

ब्रह्माण्ड के फलक पर।

इधर धरती है, जो सुन कर उस के कदमों की आहट

बिछाए बैठी है, नए ताजे फूलों की महकती चादर

आसमान है जो उस की अगवानी में बैठा है,

पलक पांवड़े बिछाए

और समन्दर है जो

उद्वेलित है, पूरे आवेग में गरजता-तरजता

आओ-आओ नदी

तुम्हीं से बना, तुम्हारा ही विस्तार हूँ मैं

तुम्हारा ही परिवर्तित सौन्दर्य

तुम्हारे ही हृदय का हाहाकार...........

*************

मेरी पसंद का गीत................

नाचना बन्द करो - महेन्द्र नेह

तुम ने ही हम को बहलाया

तुम ने ही हम को फुसलाया,

तुम ने ही हम को गली-गली

चकलों-कोठों पर नचवाया।

अब आज अचानक कहते हो

मत थिरको अपने पावों पर,

अपनी किस्मत की पोथी को

अब स्वयं बाँचना बन्द करो।

मत हिलो नाचना बन्द करो।।

तुम ने ही हम को दी हाला

तुम ने ही हमें दिया प्याला,

तुम ने औरत का हक छीना

हम को अप्सरा बना ड़ाला।

अब आज अचानक कहते हो

मत गाओ गीत जिन्दगी के,

मुस्कान अधर पर, हाथों में

अब हिना रचाना बन्द करो।

चुप रहो नाचना बन्द करो।।

तुम ने ही हम को वरण किया

तुम ने ही सीता हरण किया,

तुम ने ही अपमानित कर के

यह भटकन का निष्क्रमण किया।

अब आज अचानक कहते हो

मत निकलो घर से सड़कों पर,

अपनी साँसों की धड़कन को

बेचना-बाँटना बन्द करो।

मत जियो, नाचना बन्द करो।।

*********

अब आप बताएं, किस की पसन्द कैसी है?

सोमवार, 3 मार्च 2008

शहर न हुए, हो गए ब्लेक होल।

ब्लेक होल
  • दिनेशराय द्विवेदी
शहर, शहर न हुए,
हो गए ब्लेक होल,
जो भी आता है नजदीक
खीच लिया जाता है उस के अन्दर।
हाँ रोशनी की किरन तक
उस के अन्दर।
नहीं निकलता कोई भी उस से बाहर
कभी नहीं।

क्या है,इस ब्लेक होल में?
कोई नहीं जानता है, या
जानता है कोई कोई।
अभी-अभी किसी बड़े विज्ञानी ने बताया
चन्द रोशनी की किरणें निकल पाती हैं
ब्लेक होल के बाहर
या फिर निकल पड़ता है सब कुछ ही बाहर
जब फट पड़ता है
अपने ही दबाव से ब्लेक होल।
फिर से बनते हैं सितारे, ग्रह, उपग्रह, क्षुद्रग्रह, पूंछ वाले तारे और उल्काएं भी।
न जाने और क्या क्या भी।

तो आओ तलाश करें उन किरनों को,
जो निकल आई हैं उस ब्लेकहोल के बाहर
और शहर, और शहरों के बाहर
पूछें उन से क्या है शहर के भीतर
कैसा लग रहा है,
शहर के बाहर?
और कितना है दबाव अन्दर
कि कब टूट रहा है ब्लेक होल?
कि कब बनेंगे?
नए सितारे, नए ग्रह, नए उपग्रह,
नए क्षुद्रग्रह, पूंछ वाले नए तारे
और नई उल्काएं।
**************************************

ताजा विज्ञान समाचार अब हिन्दी ब्लॉग "कल की दुनियाँ" पर

आप ने हिन्दी ब्लॉग "शब्दों का सफर" और "अदालत " देखें होंगे। इन में से एक हमें नए शब्दों, उन की रिश्तेदारी से परिचित कराते हुए हमारी शब्द सामर्थ्य का विकास कर रहा है। तो दूसरा न्याय जगत की ताजा खबरों से अवगत कराता रहता है। इन दोनों ही चिट्ठों का महत्व प्राथमिक है। ये हमारे ज्ञान को तो बढ़ाते ही हैं हमें लेखन के लिए सामग्री भी उपलब्ध कराते हैं।
इसी श्रँखला में एक नए हिन्दी चिट्ठे "कल की दुनियाँ" ने और जन्म लिया है- यह चिट्ठा हमें आने वाले कल की दुनियाँ के लिए विज्ञान के योगदान की ताजा सूचनाऐं आप तक पँहुचा रहा है। यह आज प्रत्येक चिट्ठा पाठक की जरुरत था। सभी को इस चिट्ठे को रोज पढ़ना चाहिए। चिट्ठाकारों के लिए तो नयी वैज्ञानिक जानकारियाँ प्राप्त करने का यह सर्वोत्तम स्रोत साबित हो सकता है।
इस चिट्ठे के चिट्ठा कार ने अपने संबंध में जानकारियाँ उपलब्ध नहीं कराई हैं। लेकिन कोई अपनी पहचान छुपा कर भी हिन्दी पाठकों की सेवा कर रहा है, यह स्तुत्य है।
आप इस ब्लॉग पर यहाँ "कल की दुनियाँ" पर क्लिक कर के पहुँच सकते हैं।

शुक्रवार, 29 फ़रवरी 2008

गंदगी को मत हटाओ जिससे पता लगता रहे कि उसका उद्गम क्या है

  • गंदगी को आप हटाते रहें, और गंदगी करनेवाला गंदगी करता रहे। यह कब तक चलता रहेगा। आख़िर गंदगी करने वाले के बारे मैं सबको पता लगना चाहिए कि कौन इसे फैला रहा है?
  • अगर म्युनिसिपैलिटी इसे नहीं हटाती है, तो लोग ख़ुद ही उस रस्ते से निकालना बंद कर देंगे।
  • कीडे गंदगी से निकलते ही मर जाते हैं, गंदगी उनके जीवन के लिए जरुरी है

भड़ास को ब्लॉगर ने हटाया

भड़ास को ब्लॉगर द्वारा हटाया जा चुका है। इस पर बात करना बंद करें।
मैंने अभी देखा की कुछ और ब्लोग्स को ब्लॉगर से हटा देने का आव्हान किया गया है। इस बात की मुझे पहले ही आशंका थी।
इससे अब अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो सकने की संभावना हो गई है। यह एक और ख़राब स्थिति है। इससे कैसे निपटा जा सकता है , इस पर विमर्श आवश्यक हो गया है। सभी हिन्दी ब्लोग्गेर्स को इस पर विचार करना पड़ेगा।

१, मार्च २००८,

भड़ास को किसी ने नहीं हटाया

भड़ास को की सी ने नहीं हटाया। न ब्लॉगर ने और न ही चिट्ठा संकलकों ने।

इसमें कोई भी बात बुरी नहीं। सबके अपने अपने पाठक हैं। मगर ख़ुद ही अपने चिट्ठे पर उसे हटाने का नाटक भी खूब रहा। हम गच्चा खा गए। कोई बात नहीं मधु मास चल रहा है और कुछ लोग मदन मस्ती पर उतर आये हैं। उन्हें अपना काम करने दीजिये। बाकी लोग अपना काम करें।

मंगलवार, 26 फ़रवरी 2008

आफ्टर लंच आन्ट्रॅप्रॅनर (Entrepreneur)

एक ही कैन्टीन हुआ करता था, अदालत परिसर के मेन गेट के पास के कोने में। टीन की दीवारें और टीन की ही छत। अदालत का विस्तार हुआ तो साथ ही सौंदर्यीकरण भी। कैन्टीन को आगे से हटा कर पीछे स्थान दिया गया। टीन टप्पर हटा कर पीछे लग गए। कैन्टीन के मालिक की मृत्यु हो गई। सब से बड़ा पुत्र नाबालिग ही था पर उस ने केन्टीन और परिवार चलाने की जिम्मेदारी संभाली। छोटे भाई धीरे-धीरे बड़े हो गए सब की शादियाँ हुईं। एक केन्टीन में ही पार्टीशन हो कर तीन हिस्से हो गए। आपस में ही व्यापारिक कम्पीटीशन होने लगा।

केन्टीन के इस बंटवारे से दुखी बड़ा पुत्र नशे की लत का शिकार हो गय़ा। वह विक्रय के लिए सर्वोत्तम माल तैयार करने और ग्राहकों को खींचने में सक्षम। लेकिन व्यापार में अक्षम। दिन भर सर्वाधिक बिक्री होने के बाद भी उस के हाथ गिनती के ही रुपए लगें। नौकर बीच में ही ग्राहकों से रुपया मार लें। पता लग जाने पर वह नौकरों से युद्ध पर उतर आए और धन्धे के औजार करछी-लोटा ही हथियार बन जाऐं। दूसरे दिन फिर सब कुछ सामान्य। कभी अति हो जाए तो लंच ऑवर के पहले नौकर काम छोड़ कर कोने में खड़े हड़ताली नजर आएं। रोज के लंच के ग्राहक समझौता करा कर अपनी चाय की जुगत करें। केन्टीन की चाय ऐसी कि ग्राहक को दूसरे की चाय ही पसंद न आए। आखिर उस की केन्टीन सिर्फ चाय-कॉफी की दुकान भर रह गई। कभी भाइयों से झगड़ा हो जाए और उन पर खार आए तो। चाय के साथ कचौड़ी, समौसे, सेव, लड्डू भी मिलने लगें और दुकान कुछ दिनों के लिए फिर कैंटीन नजर आने लगी।

कभी वह नौकरों से और कभी नौकर उस से परेशान। रोज रणभेरी बजती लेकिन युद्ध नहीं होता दोनों पक्ष एक दूसरे की जरुरत हैं। ग्राहक भी ऐसे ही हो गए हैं। बाईस की जगह बीस रुपए ही दे कर चल देते। वह भी उस्ताद कि उन्नीस की जगह बीस ही मार लेता। फिर भी हिसाब में ग्राहक ही लाभ में रहता।

कुछ सप्ताहों से एक परिवर्तन देखने को मिला। वह ग्राहकों से उलझने लगा। पूरे बाईस लेने लगा। कभी कभी एक चाय की संख्या बढ़ा कर पच्चीस भी वसूलने की फिराक में रहता। दुकान से भी पाँच के बजाय तीन, साढ़े तीन बजे ही खिसकने लगा। बाद में नौकर ही दुकान चलाते नजर आते। जब तक वह रहता सब नौकर कामचोर नजर आते। उस के जाते ही वे ऐसी दुकानदारी करते जैसे उन से अच्छा संचालक कोई नहीं।

आज जब शाम साढ़े तीन बजे उस के यहाँ चाय के लिए पहुँचे तो वह नहीं था। मैं ने उस के सब से पुराने नौकर से इशारे में पूछा तो उस ने इशारे में ही बताया कि वह जा चुका है। सीनियर नौकर जूनियरों पर मालिक की तरह हुक्म चला रहा था। बाकी दोनों नौकर दौड़-दौड़ कर हुक्म बजा रहे थे। ग्राहकों को भी शानदार सेवाएं मिल रही थीं और चाय की क्वालिटी भी उत्तम थी। मैं ने सीनियर को बुला कर बात की।

सीनियर ने बताया कि उनका मालिक तो तीन बजे बाद ही तब तक हो चुका कैश कलेक्शन ले कर जा चुका है। दूध, चाय, शक्कर, कॉफी आदि सब कुछ की कीमत अलग निकाल कर अपना मुनाफा ले कर जा चुका है। कुछ दूध, चाय, शक्कर, कॉफी छोड़ गया है। इन से माल बना कर बेचकर हम तीनों नौकरों को अपनी तनख्वाह निकालनी है। ज्यादा कमा लिया तो हम बाँट लेंगे।

कितना ज्यादा कमा लोगे? मैं ने पूछा। तो उस ने बताया कि तीनों पचास पचास रुपया तो बेशी कर ही लेंगे।

इस तरह चल रहा था उनका आफ्टर लंच आन्ट्रॅप्रॅनर (Entrepreneur)

सोमवार, 25 फ़रवरी 2008

कॉपीराइट को न जानना आप को कैद की सजा तक पहुँचा सकता है

इन दिनों हिन्दी ब्लॉगिंग में कॉपीराइट का चर्चा रहा। एक-दो चिट्ठाकार साथियों से बातचीत से ऐसा अनुभव हुआ कि अधिकांश चिट्ठाकारों को कॉपीराइट कानून के सम्बन्ध में प्रारंभिक जानकारी भी नहीं है। कोई भी मामला अदालत के सामने आने पर कानून हमेशा यह मानता है कि प्रत्येक कानून का सभी नागरिकों को ज्ञान है। यदि आप किसी कानून के उल्लंघन के बारे में अदालत के समक्ष यह दलील दें कि आप तो उस से अनभिज्ञ थे और अनजाने में आप उस का उल्लंघन कर के कोई अपराध कर बैठे हैं तो अदालत आप की इस दलील पर कोई ध्यान नहीं देगी और आप को अनजाने में किए गए अपराध की सजा भुगतनी पड़ेगी। हाँ, अदालत सजा देते समय उस की मात्रा और प्रकार के बारे में विचार करते समय इस तथ्य को जरुर ध्यान में रखेगी कि आप ने यह अपराध पहली बार किया है या फिर दोहराया है। पहली बार में सजा मामूली चेतावनी या अर्थदण्ड होगी तो दूसरी बार में जेल जाने का अवसर आना अवश्यंभावी है।
आप की जानकारी के लिए इतना बता दूँ कि किसी भी कॉपीराइट के उल्लंघन पर कम से कम छह माह की कैद जो तीन वर्ष तक की भी हो सकती है, साथ में अर्थदण्ड भी जरुर होगा जो पचास हजार रुपयों से कम का न होगा और जो दो लाख रुपयों तक का भी हो सकता है। इस सजा को अदालत पर्याप्त और विशिष्ठ कारणों से कम कर सकती है लेकिन उसे इन पर्याप्त और विशिष्ठ कारणों का अपने निर्णय में उल्लेख करना होगा।
सभी चिट्ठाकारों को कॉपीराइट कानून की प्रारंभिक जानकारी होना आवश्यक है। इस कारण से इस कानून से सम्बन्धित प्रारंभिक जानकारी "अनवरत" के सहयोगी ब्लॉग "तीसरा खंबा" पर कुछ कड़ियों में प्रस्तुत की जा रही है जो सप्ताह में एक-या दो बार प्रकाशित की जाऐंगी।