@import url('https://fonts.googleapis.com/css2?family=Yatra+Oney=swap'); अनवरत: रविन्द्रनाथ टैगोर
रविन्द्रनाथ टैगोर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
रविन्द्रनाथ टैगोर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 1 जनवरी 2011

साहित्य की साधना : निखिल विश्व के साथ ऐकत्व अनुभव करने की साधना

नुष्य एक सामाजिक प्राणी है, इसलिए वह जिस प्रकार अपने क्रियाकलाप में सामाजिक बना रहता है, उसी प्रकार विकार में भी। उस के इस सामाजिकपन का ही परिणाम है कि वह -
  1. अपने आप को नाना रूपों में अभिव्यक्त करना चाहता है,
  2. अन्य लोगों के करने-धरने में रस लेता है,
  3. अपने इर्द-गिर्द की वास्तविक दुनिया को समझना चाहता है, तथा
  4. कल्पना द्वारा एक ऐसी दुनिया का निर्माण करने में रस पाता है जो वास्तविक दुनिया  के दोषों से रहित हो। 
ये ही चार मूल मनोभाव हैं जो मनुष्य को साहित्य की तथा अन्य अनेक प्रकार की रचनाओं के लिए उद्योगी बनाए रखते हैं। इस का अर्थ यह हुआ कि मनुष्य के जीवन में ही वे उपादान मौजूद हैं जो उसे साहित्य की सृष्टि के लिए प्रेरित करते हैं; साथ ही इन्हीं मूल मनोभावों का यह परिणाम है कि वह दूसरों की रचना देखने, सुनने और समझने में रस पाता है। वस्तुतः हम ऊपर से कितने ही खंड रूप और ससीम क्यों न हों, भीतर से निखिल जगत के साथ 'एक' हैं। साहित्य हमें प्राणीमात्र के साथ एक प्रकार की आत्मीयता का अनुभव कराता है। वस्तुतः हम अपनी उसी 'एकता' का अनुभव करते हैं।                                                                   -आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी  


इसी संदर्भ में गुरुदेव रविन्द्रनाथ कहते हैं-
... मैं जब रुपया कमाना चाहता हूँ तो मेरा रुपया कमाने की नाना भाँति की चेष्टाओं और चिंताओं के भीतर भी एकता वर्तमान रहती है। विचित्र प्रयास के भीतर केवल एक ही लक्ष्य की एकता अर्थकामी को आनन्द देती है। किन्तु यह एक्य अपने उद्देश्य में ही खंडित है, निखिल सृष्टि-लीला से युक्त नहीं है। पैसे का लोभी विश्व को टुकड़े-टुकड़े कर के -झपट्टा मार कर -अपनी धनराशियों को इकट्ठा करता है। लोभी के हाथ में कामना की वह लालटेन होती है जो केवल एक विशेष संकीर्ण स्थान पर अपने समस्त प्रकाश को 'संहत' करती है। बाकी सभी स्थानों से उस का सामंजस्य गहरे अन्धकार के रूप में घनीभूत हो उठता है। अतएव लोभ के इस संकीर्ण ऐक्य के साथ सृष्टि के ऐक्य का, रस-साहित्य, और ललित कला के ऐक्य का संपूर्ण प्रभेद है। निखिल को छिन्न करने से लोभ होता है और निखिल को एक करने से रस होता है। लखपति महाजन रुपए की थैली ले कर 'भेद' की घोषणा करता है, गुलाब 'निखिल' का दूत है, वह 'एक' की वार्ता को ले कर फूटता है। जो 'एक' असीम है, वही गुलाब के नन्हे हृदय को परिपूर्ण कर के विराजता है। कीट्स अपनी कविता में 'निखिल-एक' के साथ एक छोटे से ग्रीक पात्र की एकता की बात बता गए हैं; कह गए हैं कि 'हे नीरव मूर्ति ! तुम हमारे मन को व्याकुल कर के समस्त चिंताओं को बाहर ले जाते हो, जैसा कि असीम ले जाया करता है।' क्यों कि अखंड 'एक' ही मूर्ति, किसी आकार में भी क्यों न रहे, 'असीम' को ही प्रकाशित करती है; इसीलिए अनिर्वचनीय है। मन और वाक्य उस का  कूल-किनारा न पा कर लौट आया करते हैं। [ विश्वभारती पत्रिका चैत्र -1999, पृ.110-111]

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी पुनः कहते हैं -
साहित्य की साधना निखिल विश्व के साथ एकत्व अनुभव करने की साधना है, इस से वह किसी अंश में कम नहीं है। जो साहित्य नामधारी वस्तु लोभ और घृणा पर आधारित है, वह साहित्य कहलाने के योग्य नहीं है। वह हमें विशुद्ध आनंद नहीं दे सकता। 
हार, निद्रा, भय आदि मनोभाव समस्त प्राणियों में समान हैं। मनुष्य जब इन की पूर्ति करता रहता है तो वह अपने उस छोटे प्रयोजन में उलझा रहता है जो पशुओं के समान ही है। बहुत प्राचीन काल से पशु-सामान्य प्रवृत्तियों को मनुष्य ने तिरस्कार के साथ देखा है। वह इन तुच्छताओं से ऊपर उठ सका है, यही उस की विशेषता है। जो बातें हमें जिन तुच्छताओं का दास बना देती हैं; या तुच्छताओं को ही मनुष्य का असली रूप बताती हैं, वे मनुष्य के चित्त से उस के महत्व को, उस के वैशिष्ट्य को और उस के वास्तविक रूप को हटा देती हैं। वे लोभ और मोह का पाठ पढ़ाती हैं। साहित्य वे नहीं हो सकतीं, क्यों कि उन की शिक्षा से मनुष्य खंड की साधना करता है, विभेद और तुच्छता को बड़ा समझने लगता है और सारे विश्व के साथ एकत्व की अनुभूति से विरत हो जाता  है।  
...... सभी उद्धरण आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की पुस्तक साहित्य का साथी से

तो नये वर्ष में हम संकल्प लें,  कि हम मनुष्य हो कर मनुष्यता की ओर बढ़ेंगे, अपनी पशुता को सीमित करेंगे। सारे विश्व के ऐकत्व की ओर अपने कदम बढ़ाएंगे। 

कत्व के इसी नए संकल्प के साथ, नव-वर्ष सभी के लिए मंगलकारी हो!!!