Wednesday, May 1, 2013

हम लाल झण्डे के सिपाही हैं ...

मई दिवस 2013 पर गुनगुनाइए साथी महेन्द्र नेह का यह अमर गीत ...



हम लाल झण्डे के सिपाही हैं ... 
                              - महेन्द्र नेह


म करवट लेते वक्त की जिन्दा गवाही हैं
हम लाल झण्डे के सिपाही हैं ...

म झुक नहीं सकते किसी तूफान के आगे
हम रुक नहीं सकते किसी चट्टान के आगे
कुर्बानियों की राह के जाँबाज राही हैं
हम लाल झण्डे के सिपाही हैं ...

म को नहीं स्वीकार ये धोखे की तकरीरें
हम को नहीं मंजूर ये पाँवों की जंजीरें
हम लूट के ज़ालिम ठिकानों की तबाही हैं
हम लाल झण्डे के सिपाही हैं ...

म ने बहुत से जार, कर बेजार छोड़े हैं
हम ने अनेकों हिटलरों के दाँत तोड़े हैं
हम शाहों को मिट्टी चटाती लोकशाही हैं
हम लाल झण्डे के सिपाही हैं ...

ह धार हँसिए की हमे बढ़ना सिखाती है
हम को हथौड़े की पकड़ बढ़ना सिखाती है
हम हर अंधेरे के मुकाबिल कार्यवाही हैं
हम लाल झण्डे के सिपाही हैं ...


5 comments:

सतीश सक्सेना said...

यही हैं जिनकी शक्ति से हमें आराम मिलता है ...

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

लेकिन भारत में इनके नेतॄत्वकर्ता! नमन शहीदों को..

कालीपद प्रसाद said...

आपकी कविता बहुत अच्छी है ,दिल में जोश भरती है
समझ नहीं आता लाल झंडा हिन्दुस्तान में कमजोर क्यों है

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ताऊ रामपुरिया said...

नेह जी की रचनाएं बहुत ही धारदार होती हैं. बहुत सटीक रचना.

रामराम.

दिनेशराय द्विवेदी said...

@ भारतीय नागरिक - Indian Citizen, कालीपद प्रसाद
अनेक तथ्य हैं। उजरती मजदूरों का एक हो कर ताकत बनना तो अवश्यंभावी है। लेकिन वह वर्तमान पूंजीवाद की मृत्यु भी है। पूंजीवाद अमर नहीं लेकिन जीवित तो सदैव ही अमर होना चाहता है, न भी हो सके तो कम से कम अपनी मृत्यु को टालने का लगातार प्रयत्न करता रहता है। वह सत्तासीन है और सभी साधनों का स्वामी भी। जहाँ भी मजदूर एक होना चाहता है वहीं उन में सायास मतभेद उत्पन्न करना उन के संगठनो को तोड़ना उस का एक प्रमुख उद्योग है। इन सब का मुकाबला करते हुए मजदूर एकता दुनिया भर में आगे बढ़ रही है। कभी वह मात्रात्मक रूप में बढ़ती हुई दिखाई देती है कभी घटती हुई भी। लेकिन वह लगातार बढ़ रही है। अनुभवों के स्तर पर भी और समझ के स्तर पर भी। इस कारण इन की पाँतों में सभी तरह के लोग दिखाई देते हैं। इन पाँतों में ईमानदार और संघर्षशील लोग हैं तो जासूसों और गद्दारों के घुस पड़ने की घटनाएँ भी कम नहीं हैं। लेकिन कारवाँ ऐसे ही आगे बढ़ते हैं। जो आगे बढ़ रहा है वही विजयी होगा। पूंजीवाद तो पतनशील है उसे तो एक दिन नष्ट होना है।