Wednesday, July 25, 2012

चांदनी की अभिलाषा भारतीय हॉकी से - बीजी जोशी


लंदन ओलिंपिक आरंभ होना ही चाहता है।  बरसों तक भारतीय जिस एक स्वर्ण से आश्वस्त रहे वह हॉकी से आता था।  आज भी हर भारतीय के मन में एक हूक उठती है कि चाहे कुछ भी हो एक पदक तो हॉकी से आना ही चाहिए।  हॉकी और भारत दोनों एक दूसरे के पर्याय हो चुके थे।  लेकिन इसी पदक ने भारत को अनेक मुकाबलों में तरसाया है।  इस बार हॉकी का कोई पदक भारत ला पाता है या नहीं यह भविष्य के गर्भ में है।  लेकिन लंदन ओलिंपिक के दौरान हाँकी के खेल पर अनवरत की तीखी नजर रहेगी।  बीजी जोशी जो दुनिया भर में एक मात्र ऐसे हॉकी स्क्राइब हैं जिन से हॉकी के इतिहास से संबंधित कोई भी प्रश्न पूछा जा सकता है, उत्तर आप को तुरंत हाजिर मिलेगा।  जिस किसी अंतर्राष्ट्रीय हॉकी मुकाबले के दौरान वे उपस्थित रहते हैं, हॉकी के जानकारों से ले कर खिलाडी तक मनचाहा रिकार्ड उन से पूछ लेना चाहते हैं।  अनवरत के लिए बीजी जोशी लंदन ओलिंपिक की हॉकी पर निगाह रख रहे हैं।   इस क्रम ओलिंपिक हॉकी में भाग ले रही सभी टीमों के संदर्भ में भारतीय टीम का एक पूर्व मूल्यांकन प्रस्तुत करता यह आलेख आप पसंद करेंगे।   लंदन में जब तक हॉकी के मुकाबले आरम्भ हों हम बीजी जोशी के सौजन्य से कुछ न कुछ आँकड़े आप के सामने प्रस्तुत करते रहेंगे।

लंपिक हॉकी में सर्वकालिक 8 स्वर्ण पदक के गौरव- वैभव से हम भारतीयों के लिये ओलिंपिक स्वप्निल-स्वर्णिम सपनों का स्त्रोत बना है। वर्षो की साधना, अभ्यास, मेहनत और तपस्या से विजयी मंच पर सोने के तमगे से सुशोभित गले को देखने का सुकून स्वर्ग से भी सुखद लगता है। प्रतिदिन प्रार्थना, आराधना, अरदास और दुआ करने वाले हिन्दुस्तानी अधिवर्ष में अंजुलि पसार खिलाडियों के लिए अमृत मांगते हैं। ताकि सुधा पान कर एथलीट कौशल की खूबियों में हिमालयी ऊचांईयां छू कर जीत की आभा से विरोधियों को धराशयी कर सकें।


कौशल के नियाग्रा में विपक्षियों को ठग कर मिली अद्भुत विस्मयकारी अचरज भरी जीत पर गर्व से ऊँचा सिर अपने जीवन को धन्य मानता है। हॉकी कभी भारत-पाकिस्तान की बपौती रही है। एमस्टरडम (1928) से म्यूनिख (1972) तक लगातार 44 साल उपमहाद्वीपीय माटी की सौगंध ही ओलंपिक प्रागंण में महकी। मांट्रियल (1976) में एस्ट्रोटर्फ का आगमन, 1998 से नो ऑफ साइड रूल, 2002 से हॉकी ब्लेड (अर्धचंद्राकार) की दोनो सतह प्लेइंग सरफेस मानने तथा 2003 से पेनल्टी कार्नर पर गेंद को डेडस्टॉप नहीं करने (आक्रामक को अतिरिक्त क्षण मिल गए) के परिवर्तित नियमों से कलाईयों की कलाबाजी ज्यादा सार्थक नहीं रही है। अब डिफेंस पर अधिक भार पडा है। कमजोर रक्षक वाली टीम का टेनिस स्कोर (6 गोल ) से हारना अजूबा नहीं रहा है। हर ओलंपिक में नया मेजबान शहर नई तरह की सतह हॉकी खेल के लिए बिछाता है। लदंन में नीली टर्फ पर पीली गेंद से हॉकी खेली जाएगी। दृश्यता बढाने हेतु टर्फ की बाउंड्री गुलाबी रंग की है। नवीन सतह पर गेंद उछलती है। शौर्य व धैर्य से गेंद पर बाज समान पैनी निगाहें रख सही टेकल कर ही मंडराते खतरे से पार पाना होता है। डिफेडंर संदीप सिंह व रघुनाथ की उक्त विधा में कमियां अक्सर आक्रमक टीम को गोल का प्रसाद भेंट कर ही देती है।

भा
रतीय टीम के आस्ट्रेलियाई कोच माइकल नोब्स नें हमेशा गुणवान खिलाडियों को प्राथमिकता दी है। कमजोर रक्षण से वाक़िफ नाब्स ने होनहार इग्नैश टिर्की को रक्षा का आधार स्तंभ बनाया है। योरपीय टीमों की तरह इग्नैश स्वीपर बेक पोजिशन पर खेलेंगे। कुआलालंपुर एशिया कप ( अक्टूबर 2003) में इग्नैश ने बिरजू महाराज की नाचरंग स्थिति के अनुरूप लयताल से विजयी डग भरते हुए विरोधियों को छकाकर पौरुष भरे खेल में, खुली आंखे रख, इन्द्रधनुषी चाप से पाकिस्तान पर विजयी गोल मार कर तब पहली बार एशिया कप जितवाकर दीवाली मनवाई थी। अब इग्नैश को रक्षण में भी जिब्राल्टर की चट्टान बनना होगा ।

भारतीय हॉकी टीम

तीसवें ओलिंपिक में भारतीयों को कठिन पूल मिला है। ‘‘ब‘‘ ग्रुप में भारत को ओलिंपिक चैंपियन जर्मनी, योरपीय दिग्गज हॉलैंड, बेल्जियम, एशियाई महारथी कोरिया व डाउनअंडर की उभरती टीम न्यूजीलैंड से जूझना है। पड़ौसी पाकिस्तान पूल ‘‘अ‘‘ में विश्व कप चैंपियन आस्ट्रेलिया, मेजबान ब्रिटेन, स्पेन, अर्जेन्टीना, दक्षिण अफ्रीका से भिडेगा ।

दुर्भाग्य से जर्मनी और हॉलेंड के विरूद्ध भारतीय प्रदर्शन निराशाजनक है। हॉलैंड के खिलाफ 93 में से 30 तथा जर्मनी के विरूद्ध 85 में 17 मैचों में ही भारतीय टीम फतह हासिल कर पायी है। हॉलैंड के विरूद्ध पिछले 10 मुकाबलो में भारत जीता ही नहीं है। 16 वर्ष पूर्व अजलानशाह कप में प्रयोगात्मक डच टीम को ही भारतीय हरा पाए थे। पेनल्टीकार्नर विशेषज्ञ राबर्ट हॉर्स्ट तथा दुनिया में सर्वाधिक 450 अंतरराष्ट्रीय मैचों के अनुभवी टयून डिनायर की टीम को हराना किसी भी टीम के लिए दिवास्वप्न है। खेल की गति को कम कर गेंद नियंत्रण अपने ही पास रखकर मिले हुए मौकों का सौ फीसदी उपयोग ही भारतीय जीत का अस्त्र बनेगा। चुस्त-दुरूस्त लंबे कद के जर्मन खिलाडियों के सामने भारतीय पिद्दी से लगते हैं। पर खेल में कद-काठी नहीं सूझ-बूझ कौशल जीत दिलाता है। बर्लिन ओलिपिक (1936) हॉकी फाइनल में 15 अगस्त के दिन भारतीयों ने जर्मनी को 8-1 से रौंदा था। जर्मन अखबारों ने भारतीय जीत पर लिखा था ‘वे दिव्य नीले कुरते पहने खिलाडी छुई-मुई से दिखाई पडते हैं, पर उनका खेल फौलादी है। उनकी आज्ञाओ को शिरोधार्य कर जहां वे चाहते है, गेंद वहां इठलाती हुई पहॅुचती है। गति के नियम तथा ज्यामितीय सिद्धांतों से परे गेंद भारतीय इशारों पर नाचती रही और जर्मन चूर चूर हो गए। ‘पर ध्यानचंद के वंशजो में अब वह प्रतिभा नहीं रही। ग्वालियर के शिवेन्द्र सिंह (164 मैंच,72 गोल), झाँसी के तुषार खंडकर (225 मैच, 65 गोल) व सुनील (100 मैंच, 30 गोल) ने गोल भेदने में अर्जुन समान लक्ष्य बनाए रखा तो बर्लिन दीवार को फांदना मुश्किल नहीं होगा। हालाँकि जर्मनी टर्फ हॉकी की सबसे सफलतम टीम है।

पने पूर्वज माओरी आदिवासियों के नृत्य (हाँका डांस) कर मैदान में उतर कर उर्जा पाने वाली न्यूजीलैंड टीम उन्नति पर है। गोली क्यले पॉटिफिक्स समकालीन हॉकी में श्रेष्ठतम हैं। सोल (1988) में ब्रिटेन को स्वर्ण पदक जितवाने वाले गोली इयान टेलर कहते है कि सर्वश्रेष्ठ गोली 1-4 से हारने वाला मैच 1-0 से जीता देता है। कुछ ऐसा ही आलम पांटिफिक्स का रहा तो किवी टीम 36 वर्षो बाद ओलिंपिक सेमीफाइनल में दहाडेगी। अजलानशाह कप-2012 जीत कर उन्होंने अपने इरादे बता दिए हैं। 2002 में विश्व कप फुटबाल की मेजबानी कर कोरिया-जापान ने किशोरों का ध्यान हॉकी से हटा कर फुटबॅाल पर ला दिया है। नई प्रतिभाएँ कोरियाई हॉकी में नहीं आने से कोरिया टॉप फोर में नहीं है। हालाँकि उनका विध्वसंक शैली भरा खेल किसी भी टीम को झकझोरता रहा है। 1956-76 तक बेल्जियम का ग्राफ हॉकी में विश्वस्तरीय था। तब पाँच खिलाडियों ने 4-4 मर्तबा ओलंपिक खेल कर रिकार्ड रचा है। लंदन में उनके लिए बीजिंग (2008) समान 9वीं पोजिशन भी सार्थक होगी।

पूल ‘‘अ‘‘ में पाकिस्तान के लिए पदक की मंजिल कोसों दूर है। स्पेन, अर्जेन्टीना, ब्रिटेन तथा आस्ट्रेलिया में से कोई दो टीमें सेमीफाइनल में खेलेगी। अंतरराष्ट्रीय हॉकी महासंघ व्दारा निंबस स्पोटर्स द्वारा प्रायोजित वर्ल्ड सीरीज हॉकी को अनाधिकृत घोषित करने से टीम की तैयारियों को झटका लगा है। पाकिस्तान के लिए विश्व कप (2012) व अजलानशाह कप (2012) की तरह वुडन स्पून (अंतिम पायदान) से बचना टेड़ी खीर होगा । लंदन टेस्ट इवेंट (मई 2012) की विजेता जर्मनी को पाकिस्तान ने हाल ही में टेस्ट मैच में 4-3 से हराया था। दुनिया में सर्वाधिक गोल मारने वाले सोहेल अब्बास ने चारों पेनल्टीकार्नर गोल में बदल कर यह करिश्मा रचा था। सोहेल के ऐसे ही कारनामे पाकिस्तानी टीम को सुकून बक्ख्शेंगे।

बीजी जोशी
भारतीय कोच ने टॉप सिक्स में आने का लक्ष्य रखा है। गोल में दार्जिलिंग के भरत क्षैत्री व केरल के श्रीजैश की कुशल नटबाजी, डिफेंस में इग्नैश तथा वीरेन्द्र लाकडा की दृढ़ता, मिडफील्ड में मनप्रीत, सरदारा सिंह व गुरबाज की रचनात्मकता, फारवर्डस् में सुनील, शिवेन्द्र, तुषार तथा उथप्पा की उत्पादकता तथा पेनल्टीकार्नर में संदीप, रघुनाथ की गोल रूपी संजीवनी भारतीयों को पदक दिला सकती है। अजलानशाह कप में पाकिस्तान, कोरिया, ब्रिटेन के विरूद्ध जुगनु सी चमक ने ही भारतीयों को कांस्य पदक जितवाया। कुछ कर गुजरने की तमन्ना से अथाह खेल कौशल में डूब कर भारतीयों ने चांदनी बिखेरी तो ओलिंपिक विजय मंच पर तिरंगा फहराना दुर्लभ नहीं है।
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