Thursday, May 31, 2012

जनतंत्र का अव्वल नियम

ज कल हर कोई डेमोक्रेसी, मतलब जनतंत्र के हाथ धो कर पीछे पड़ा रहता है। जैसे जनतंत्र न हुआ एवरेस्ट की चुटिया हो गया, जिस पर चढ़ना बहुत ही टेड़ी खीर हो। नए नए मिनिस्टर बने हमारे मोहल्ले के छन्नू नेता ही देख लें। वे जनतंत्र को समझें या न समझें पर पूरा भाषण पेल सकते हैं। कोई उन से पूछ कर देखे कि आप जानते भी हैं डेमोक्रेसी कौन चिड़िया का नाम है? उन में तुरंत लक्ष्मण की आत्मा आ जाती है। सवाल पूछने वाला परशुराम लगने लगता है। हम को क्या समझा है? ‘बहु धनुहीं तोरीं लरिकाई’। हमने बचपन से कोई खोर थोड़े ही पीसी है। तावड़े में बाल धोले थोड़े ही किए हैं। पहली किलास से मानीटर रहे और तीसरी तक पहुँचते पहुँचते बालसभा के मंत्री हो गए। फिर तो मुड़ कर देखा ही नहीं। जनतंत्र की नब्ज नब्ज पहिचानते हैं। पिराईमरी में बच्चों को पानी बतासे और नारंगी की खट्टी मीठी गोलियाँ खिलाते थे। जो काबू नहीं आता था उस की नाक तोड़ देते थे। बस वही फारमूला वही है। पानी बतासे और नारंगी की गोलियाँ बदल गई हैं। कैसे भी हो कमान अपने हाथ रहनी चाहिए। डेमोकिरेसी कोई आज से है क्या हमारे मुलक में? भगवान बुद्ध से भी पहले गणतंत्र होते थे। हमारे देश की तो नस नस में जनतंत्र व्याप्त है।

अंग्रेजों ने भारत छोड़ा, अपना संविधान बना, तब से डेमोक्रेसी बहुत आसान हो गई है। बस चुनाव जीतो, फिर जैसे तैसे जीते हुओं को पटाकर रखो। फिर गद्दी अपनी। गद्दी अपने पास हो तो डेमोक्रेसी क्या खा कर चलने से मना करेगी? वायरस पार्टी को देख लो कब से एक नेता के बल पर चल रही है। नेता मर जाए तो नेता चुनने का ज्यादा कुछ चक्कर ही नहीं । नेता के खानदान में जो भी मिले उसे पकड़ कर माला पहना देते हैं। कोई न भी मिले तो नेताजी के घर के अनावर-जनावर तक से काम चला लेते हैं। बड़े ठाठ से राज चल रहा है। कभी राज से बाहर हो भी गए तो भी कुछ फर्क नहीं पड़ता। जैसे तैसे वापस लौट ही आते हैं। अब तो फिक्र करना ही बंद कर दिया है। सामने मैदान में कोई दमदार हो तो फिक्र हो।

हुत तो हैं मैदान में। ततैया पार्टी है, बर्र पार्टी है, कछुआ और खरगोश पार्टियाँ हैं, और क्या चाहिए? मच्छर, मक्खी पार्टियों को जश्न में अपनी टेबल पर बिठा कर खिलाने-पिलाने से जनतंत्र में गद्दी पक्की नहीं होने वाली। बहुत कुछ करना पड़ेगा। फिर बैक्टीरिया पार्टी से कैसे निपटोगे? देखा नहीं? तीन तीन प्रान्तों में भरपूर विकास के साथ पुख्तगी से जनतंत्र चला रहे हैं। कुछ दिन पहले तक लोग भले ही कहते हों, डेमोक्रेसी को हाँकने एक नेता तक नहीं है बैक्टीरिया पार्टी के पास। एक वेटिंग में चल रहा था. वह भी बूढ़ा हो चला है शेष जो हैं उन में किसी के पास लियाकत ही नहीं। अब कोई कह के देखे? आज बैक्टीरिया पार्टी का बच्चा बच्चा छाती ठोक कर कहता है, हमारे पास भी नेता है। अरब सागर के किनारे खड़ा हो कर हूँकार भरता है तो जमना का किनारा दहल जाता है। देखा नहीं कल टी.वी. पर, कैसे हूँकार भर रहा था? हफ्ते भर में पार्टी की बिसात बदल के रख दी। इसे कहते हैं, जनतंत्र का चलना और चलाना। लोग बेफालतू बकते रहते हैं। जनतंत्र कोई संविधान से चलता है। वह चलता है, तिकड़म से। संविधान तो बजाने का झुनझुना है, जब देखो कि झुनझुना किसी के आड़े आ रहा है तो उसे बदलवा डालो। रास्ता खुल जाता है, परंपरा पड़ जाती है। जब अपने आड़े आएगा तो परंपरा अपने काम आएगी। वोट की कीमत पहचानो। जब मौका आए तो पूरा ब्लेकमेल करो, विरोधियों को घर से बेदखल करवाओ। फिर खेलो खेल औरंगाबादी, अहमदाबादी। औरंगजेब से सीखो। बादशाह बनना कोई बच्चों का खेल नहीं। ये जनतंत्र का अव्वल नियम है। जो मुकाबले पर आए उसे कैद कर लो या कलम कर दो। ऐसा तुम न करोगे तो वे तुम्हें कलम कर देंगे, फिर चला लिया जंनतंत्र।
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