Wednesday, February 8, 2012

विश्वसनीय सरकारें अभी भारत के भविष्य में दूर दूर तक बदा नहीं हैं।

सोमवार सुबह 5.55 की ट्रेन से बेटी पूर्वा को जाना था। अलार्म बजा तो हम तीनों की नींद छूट गई। पूर्वा अपनी तैयारी करने लगी और उस की माँ उस के लिए नाश्ता बनाने में जुट गई। मैं फिर से सो गया। मुझे फिर पाँच बजे जगाया गया, कॉफी का प्याला सामने था। मैं ने उसे पिया और फिर मैं भी तैयार हो गया। साढ़े पाँच हम घर से निकले। पत्नी जी ने दूध लाने की बाल्टी भी साथ रख ली। पूर्वा की ट्रेन को रवाना कर हम छह बजे स्टेशन से चले और सीधे दूध वाले के यहाँ। वहाँ अंधेरा छाया हुआ था। रोड लाइटस् बंद हो चुकी थीं और अभी सुबह होनी शेष थी। हम ने दूध वाले के यहाँ कोई हलचल न देख सोचा अभी वह सो कर उठा ही नहीं है। हम अपनी कार में ही बैठे रहे। कुछ देर बाद दूध वाले के डेरे में कुछ रोशनी दिखाई दी। शायद चूल्हा सुलगाया गया था। हम उस के डेरे की ओर बढ़े तो दिखाई दिया कि वह कुछ दूध निकाल भी चुका था। उस ने बताया कि दो एक ग्राहक दूध ले कर जा भी चुके हैं। उस के यहाँ सामने दुहा दूध लेने वाले आते हैं इसलिए वह ग्राहक आने पर ही दूध निकालता है। वह इधर उधऱ के काम करता रहा। कुछ देर में एक ग्राहक और आया तब उस ने एक भैंस दुहना आरंभ किया। 

म दूध लेकर घर पहुंचे तो शरीर में थकान थी।  हुआ यूँ था कि मैं ने सुबह स्टेशन जाने के पहले पैर पर चोट के स्थान पर मल्हम लगा कर पट्टी कर ली थी। कुछ अधिक कस गई तो पैर दर्द करने लगा था। मैं फिर से बिस्तर पर लेट लिया। नौ बजे उठ कर निपटना आरंभ किया और ग्यारह बजे अदालत के लिए निकल पड़ा।  घुटने के एमसीएल की चोट में दर्द निवारक के सिवा कोई दवा नहीं होती है। असली दवा तो विश्राम है जो उस दिन कम मिला था। जल्दी में दवा लेना भूल गया। तो दर्द दिन में बढ़ता रहा। शाम को आया तो बहुत पीड़ा थी। मैं ने तुरन्त दर्द निवारक ली और लेट गया। कुछ देर बाद दर्द से छुटकारा मिला। रात को अचानक गैस सिलेंडर की गैस दगा दे गई। अपने एक कनिष्ठ को कहा तो उस ने गैस की व्यवस्था की। उस के बाद काम करने का मन न किया। ब्लाग अनवरत पर लिखने का मन होते हुए भी कुछ न लिखा और  तीसरा खंबा पर भी। जल्दी ही सोने चला गया। इस तरह रात को पूरे आठ घंटों का विश्राम मिल गया। सुबह उठा और पैर जमीन पर रखे तो एक दम ठीक थे। ऐसा लगा चोट पूरी तरह दुरुस्त हो गयी थी। अखबार में खबर थी दैनिक बिजली कटौती ग्यारह से एक के स्थान पर आज से आठ से दस बजे तक होगी। आठ बजने ही वाले थे। कुछ देर में बिजली चली गयी। अब काम तो हो नहीं सकता था। इसलिए आराम से निबटते रहे। आज दर्द नहीं था तो दर्द निवारक नहीं लिया बल्कि साथ रख लिया कि दर्द होने लगा तो अदालत में ही ले लिया जाएगा। अदालत में कुछ चलना फिरना हुआ तो हलका दर्द होने लगा। लेकिन मेरी चाल अन्य दिनों की अपेक्षा ठीक थी। फिर भी मैं ने दर्द निवारक ले ही ली। 

दालत से लौट कर कुछ विश्राम किया तो दर्द बिलकुल नहीं रहा। अभी भी नहीं है। इस से यह स्पष्ट हुआ कि चोट अब ठीक हो रही है। यदि वास्तव में कुछ दिन पैर को अधिक आराम दिया जाए घुटने पर कम से कम जोर डाला जाए तो बिलकुल ठीक हो लेगी। मेरी कोशिश यही रहेगी जिस से मैं जल्दी से जल्दी सामान्य हो सकूँ। 

शाम को खबर थी कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह पूछे जाने पर कि क्या वह सेना प्रमुख वी.के.,सिंह की उम्र संबंधी याचिका को निरस्त करने का आदेश वापस लेगी क्यों कि वह आदेश नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत लगता है,  सरकार ने तय किया है कि वह अपने आदेश को वापस नहीं लेगी और सेना प्रमुख की उम्र का विवाद न्यायालय को तय करने देगी। मुझे सरकार का यह रवैया ठीक नहीं लगा अपितु इस में सरकार के अहंकार की झलक दिखाई दी। आखिर जो निर्णय सरकार स्वयं कर सकती है उन्हें वह न्यायालयों पर क्यों छोड़ देती है। आखिर कानून और तथ्यों की रोशनी में जो निर्णय न्यायालय कर सकते हैं उन निर्णयों को सरकार क्यों नहीं कर सकती? भारत के न्यायालयों की सब से बड़ी पक्षकार सरकारें ही हैं। यदि सरकार स्वयं कानून के अनुसार तथ्यों के आधार पर उचित और न्यायपूर्ण निर्णय करने लगे तो अदालतों में काम का बोझ एकदम चौथाई कम हो सकता है। यदि वैसी स्थिति में भी सरकार के निर्णय को कोई चुनौती देता है तो न्यायालय तथ्यों और कानून की प्रारंभिक जाँच के आधार पर वैसी याचिकाओँ का निपटारा कर सकता है जिस में न्यायालयों का बहुत समय बच सकता है और सरकार भी अधिक विश्वसनीय हो सकती है। लेकिन लगता है वैसी सरकारें बनना अभी भारत के भविष्य में दूर दूर तक बदा नहीं हैं।
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