Thursday, June 30, 2011

बटुए में, सपनों की रानी

हाय!
क्या जमाना था वह भी? चवन्नी चवन्नी नहीं महारानी विक्टोरिया और मधुबाला की तरह हुआ करती थी। जिसे दूर से देखा जा सकता था। तब तक चूड़ी बाजे में वह गाना भी नहीं बजा था ... मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू ... चली आ .... तू चली आ ... वरना हम मन ही मन अक्सर उसे ही गा रहे होते।


दादाजी, हमें दो पैसे देते थे। कभी दो बड़े बड़े तांबे के पैसे, कभी एक बड़ा पैसा और एक छेद वाला पहिए जैसा। एक पैसे के मोटे सेव और एक पैसे का कलाकंद उस छोटे से पेट के लिए पर्याप्त से अधिक ही होता था। तब तक स्कूल के दर्शन भी नहीं किए थे। लेकिन बालपोथी के चित्र देख-देख अक्षर पढ़ना सीख लिए थे, फिर मात्राएँ भी आने लगी थीं। बारह खड़ी बोलने में मजा आता था। कक्का किक्की कुक्कू केकै कोकौ कंकः .... कन्दोई की दुकान से अखबार के टुकड़ों में सेव-कलाकंद ले कर आते और घर के किसी एकांत कोने में बैठ कर नाश्ते का आनंद लेते हुए अखबार पढने की कोशिश करते।

सुनते थे कि पैसे की भी पाइयाँ होती थीं, तब बंद हो चुकी थीं। बिलकुल अभी आज से बंद होने वाली चवन्नी जैसी। पर कभी कभी दादा जी के पास देखने को मिल जाती थीं। एक किस्सा सुनाया जाता था कि अंग्रेज अफसर को गाँव में रुकना पड़ गया सोने के लिए उस ने किसी किसान से चारपाई का इंतजाम करने को कहा। बेचारा पूरे गाँव में मारा मारा फिरा और घंटे भर बाद आकर कहा म्हारा! तीन ही मिली। अंग्रेज को समझाने में पसीने छूट गए कि उसे चारपाई चाहिए चार पाई नहीं। किसान समझा तो बोला। तो म्हारा फैली ख्हता नै कै खाट छाईजे। वा तो म्हारा घरणे ई चार-चार छै।
शहर में सिनेमा घर तो था नहीं। दिन भर मैदान खेलने के काम आता था और रात में चारों और परदों की दीवार बना दी जाती थी, उसी में सिनेमा दिखाया जाता था। उसे फट्टा टाकिज कहा करते थे। उस में हमें पहली बार जब सिनेमा देखने का मौका मिला तो टिकट चवन्नी का था। 
फिर बड़ा पैसा, छेद वाला पैसा बंद हुआ। एक नया पैसा आ गया। अम्माँ के माथे की बिंदी जितना बड़ा और वैसा ही गोल तांबे का। इकन्नी चार पुराने पैसों के बजाए नए छह पैसों की हो गई चवन्नी पच्चीस की और रूपया 100 पैसे का। ये फायदा होने  लगा कि चवन्नी के खुट्टे लो तो चार आने के अलावा एक पैसा बच जाता। सारा हिसाब गड़बड़ा गया। फिर इकन्नी भी बंद हो गई। पच्चीस पैसे वाली चवन्नी चलती रही। वह चवन्नी नहीं थी चौथाई रुपया था, या फिर पच्चीस पैसे का सिक्का, पर उस ने चवन्नी का नाम चुरा लिया था। उस नाम को आज तक धरे रही। आज उस का भी आखिरी समय आ ही गया। 
धर हाडौ़ती में तो चवन्नी क्या अठन्नी भी सालों से बंद है। बेटी मुम्बई पढ़ने लगी तो वहाँ चवन्नी चलती दिखाई दी थी। जब भी मुम्बई जाता एक-दो चवन्नियाँ जेब में चली आतीं। पिछले पाँच बरस से मुम्बई नहीं गया हूँ, लेकिन वहाँ से आई एक चवन्नी मेरे बटुए में अभी तक पड़ी है। उसे देखता हूँ, उसे कहता हूँ। आज से तेरी भी बाजार से छुट्टी। मैं उसे बटुए से निकाल कर श्रीमती जी को पकड़ा रहा हूँ। कुछ पुराने चाँदी के सिक्के हैं जो एक कपड़े के खूबसूरत बटुए में रखे हैं, जिन्हें वे दीवाली के दिन निकाल कर धो-पोंछ कर रख देती हैं पूजा में। कहता हूँ -इस चवन्नी को भी वहीं रख दो। देखा करेंगे दीवाली के दीवाली।

Tuesday, June 28, 2011

"शाबास बेटी, तुमने ठीक किया"

निशा, शायद यही नाम है, उस का। उस का नाम रजनी या सविता भी हो सकता है। पर नाम से क्या फर्क पड़ता है? नाम खुद का दिया तो होता नहीं, वह हमेशा नाम कोई और ही रखता है जो कुछ भी रखा जा सकता है। चलो उस लड़की का नाम हम सविता रख देते हैं।

ह ग्यारह वर्ष से जीएनएम  यानी सामान्य नर्सिंग और दाई का काम कर रही है। ग्यारह साल कम नहीं होते एक ही काम करते हुए। इतना अनुभव हो जाता है कि कोई भी अधिक जटिलता के काम कर सकता है। वह भी चाहती है कि उसे भी अधिक जटिल काम मिलें, नौकरी में उस की पदोन्नति हो। पर इस के लिए जरूरी है कि वह कुछ परीक्षाएँ और उत्तीर्ण करे। उस ने प्रशिक्षण  में दाखिला ले लिया। साल भर पढ़ाई की। जब परीक्षा हुई तो परीक्षक की निगाहें उस पर गड़ गईं। उस के काम में कोई कमी नहीं लेकिन फिर भी ... परीक्षक ने कहा पास नहीं हो सकोगी। होना चाहती हो तो कुछ देना पड़ेगा। उसे अजीब सा लगा, उस ने कोई उत्तर नहीं दिया। परिणाम आया तो वह अनुत्तीर्ण हो गई। फिर एक साल पढ़ाई, फिर परीक्षा और परिणाम की प्रतीक्षा ...

इस बार वही परीक्षक ट्रेनिंग सेंटर के आचार्य की पीठ पर विराजमान था, कामचलाऊ ही सही, पर पीठ तो आचार्य की थी। उस ने सविता को देखा तो पूछा
-तुम पिछले साल उत्तीर्ण नहीं हुई? उस ने उत्तर दिया
-कहाँ सर? आप ने मदद ही नहीं की।
-मैं ने तो तुम्हें उपाय बताया था।
-नहीं सर! वह मैं नहीं कर सकती। हाँ कुछ धन दे सकती हूँ।
-सोच लो, धन से काम न चलेगा।
-सोचूंगी।
 कह कर वह चली आई। सोचती रही क्या किया जाए। आखिर उस ने सोच ही लिया। वह फिर आचार्य के पास पहुँची, कहा
-सर ठीक है जो आप कहते हैं मैं उस के लिए तैयार हूँ। पर मेरी दो साथिनें और हैं, उन की भी मदद करनी होगी। वे दो दो हजार देने को तैयार हैं। आचार्य तैयार हो गए। सविता को चौराहे पर मिलने के लिए कहा।
सविता चौराहे तक पहुँची ही थी कि स्कूटर का हॉर्न बजा। आचार्य मुस्कुराते हुए स्कूटर लिए खड़े थे। वह पीछे बैठ गई। स्कूटर नगर के बाहर की एक बस्ती की ओर मुड़ा तो सविता पूछ बैठी।
-इधर कहाँ? सर!
-वह तुम्हारी अधीक्षिका थी न? वह आज कल दूसरे शहर में तैनात है उस के घर की चाबियाँ मेरे पास हैं, वहीं जा रहे हैं। क्या तुम्हें वहाँ कोई आपत्ति तो नहीं?
-ठीक है सर! वहाँ मुझे कोई जानता भी नहीं।

कुछ देर में स्कूटर घर के सामने रुका। आचार्य ने ताला खोला अंदर प्रवेश किया। कमरा खोल कर सविता को बिठाया। सविता ने अपने ब्लाउज से पर्स निकाल कर चार हजार आचार्य को पकड़ा दिए।
-तुम बैठो! तुम बाहर का दरवाजा खुला छोड़ आई हो, मैं बंद कर आता हूँ।
आचार्य कमरे से निकल गया। सविता के पूरे शरीर में कँपकँपी सी आ गई। उसे लगा जैसे कुछ ही देर में उसे बुखार आ जाएगा। लेकिन तभी ..
आचार्य मुख्य द्वार बंद कर रहा था कि कुछ लोगों ने बाहर से दरवाजे को धक्का दिया। वह हड़बड़ा गया। उसे दो लोगों ने पकड़ लिया। अंदर कमरे में जहाँ सविता थी ले आए। इतने सारे लोगों को देख सविता की कँपकँपी बन्द हुई। आचार्य के पास से नोट बरामद कर लिए गए। उन्हें धोया तो रंग छूटने लगा। आचार्य के हाथों में भी रंग था।

विता को फिर से कँपकँपी छूटने लगी थी। वह सोच रही थी, जब उस के पति और ससुराल वालों को पता लगेगा तो क्या सोचेंगे?  उन का व्यवहार उस के प्रति बदल तो नहीं जाएगा? उस के और रिश्तेदार क्या कहेंगे? क्या उस का जीवन बदल तो नहीं जाएगा? और उस के परीक्षा परिणाम का क्या होगा? सोचते सोचते अचानक उस ने दृढ़ता धारण कर ली। अब कोई कुछ भी सोचे, कुछ भी परिणाम हो। उस ने वही किया जो उचित था और उसे करना चाहिए था। वह सारे परिणामों का मुकाबला करेगी। कम से कम कोई तो होगा जो यह कहेगा "शाबास बेटी, तुमने ठीक किया"।

चार्य जी, जेल में हैं। पुलिस ने उन की जमानत नहीं ली। अदालत  भी कम से कम कुछ दिन उन की जमानत नहीं लेगी। अच्छा तो तब हो जब उन की जमानत तब तक न ली जाए जब तक मुकदमे का निर्णय न हो जाए।
(कल सीकर में घटी घटना पर आधारित)

Monday, June 27, 2011

वर्षा से हरियाई हाड़ौती

मेरा अपना हाड़ौती अंचल मनोरम है। बरसात में तो इस की छटा निराली होती है। कुछ दिन पूर्व एक समारोह में हाड़ौती के वरिष्ठ कवि, गीतकार रघुराज सिंह हाड़ा से भेंट हुई, मुझे उन्हें बस तक पहुँचाने का सुअवसर मिला। मार्ग में वार्तालाप के दौरान वे कहने लगे हाड़ौती शब्द हाड़ा राजपूतों के जन्म से पुराना है। वे वास्तव में चौहानवंशी हैं। हाड़ौती में बसी उन के वंशज हाड़ा कहलाए। इस तरह हाड़ा शब्द राष्ट्रीयता सूचक है। वे बताने लगे कि हाड़ौती शब्द की उत्पत्ति सरस्वती से हुई। स का उच्चारण ह होने पर सरस्वती हरह्वती हो जाती है। जो बोलने के लिहाज से हरवती और बाद में हरौती और फिर हाड़ौती हो जाता है। आर्य वंशज जब उत्तरी हमलों के दबाव से पंजाब से दक्षिण में खिसकने लगे तो मार्ग में राजस्थान का रेगिस्तान पड़ा और उस के बाद यह हाडौती अंचल। यहाँ उन्हें पारियात्र पर्वत से निकली चर्मणवती, सिंध, परवन, पारवती (देवी) और उन की सहायक नदियाँ दिखाई दीं, पर्वत और मैदान दोनों का समिश्रण देखने को मिला और उन्हों ने इसे सरस्वती का अंचल मान कर इसे उसी के नाम पर हाडौ़ती नाम दिया। हाडौती शब्द की उत्पत्ति का यह स्वरूप कितना सही है, मैं नहीं जानता, किन्तु तर्क संगत प्रतीत होता है। इस संबंध में शब्दों के यात्री अजित वडनेरकर या अन्य विद्वान अधिक प्रकाश डाल सकते हैं। 

पिछले सोमवार से वर्षा ने इस हाडौ़ती अंचल में प्रवेश किया। बुध से शुक्र तक खूब मेघ खूब बरसे। अनेक वर्षों बाद आषाढ़ मास के पूर्वार्ध में इतनी वर्षा हुई कि सभी नदियाँ किनारों से ऊपर बहने लगीं। सारे प्रकृति हरिया गई। फिर वर्षा ने कुछ अवकाश लिया, पर मौसम अभी शीतल और नम बना हुआ है। मेघों ने सूर्य को ढका हुआ है। मंद मंद शीतल पवन बहती रहती है। आज सुबह मैं अदालत के लिए निकला तो मार्ग में दोनो और के सारे वृक्ष हरिया गए थे। पिछले सोमवार से पहले दिखाई देने वाला पीला रंग कनेर के पुष्पों और अमलतास के बचे खुचे पुष्पगुच्छों तक सीमित हो चुका था। प्रथम वर्षा कितनी जीवनदायिनी हो सकती है हरियाई प्रकृति से पता लगता है। लोग शनि-रवि को लोग नगर त्याग कर आस-पास बह निकली जलधाराओं के किनारे जा पहुँचे। वहीं उन्हों ने भोजन बना कर आमोद के साथ इस प्रकृति उत्सव का आरंभ कर डाला। यह प्रकृति उत्सव अभी दो माह भादौं के उत्तरार्ध तक चलना है। इस बीच कुछ वृद्ध वृक्ष धराशाई हो गए, आषाढ़ के उत्तरार्ध से वर्षारंभ मानने से चल रहे विवाह समारोहों में बाधा पड़ी, बस पुलिया से नाले में खिसक गई और एक नई दुलहिन को नदी पार कराने को जो व्यवस्था करनी पड़ी आप इन चित्रों में देख सकते हैं -

अचानक तेज वर्षा में यातायात

वर्षा के थपेड़े से गिरा एक बुजुर्ग वृक्ष
चालक ध्यान नहीं रख पाया बस का पहिया पुलिया से नीचे चला गया, बचे 60 यात्री

हवा भरी ट्यूब, उस पर चारपाई, चारपाई पर नई ब्याही दुलहिन और उस के कपड़ों की गठरी को पार कराई गई नदी
 

Sunday, June 26, 2011

न्यायदान और विधिक सुधारों के लिए राष्ट्रीय मिशन

राजस्थान में गर्मी के मौसम में अप्रेल के तीसरे सप्ताह से जून के आखिरी सप्ताह तक उच्च न्यायालय व अधीनस्थ न्यायालयों का समय सुबह 7 बजे से 12 बजे तक का हो जाता है और जून के प्रथम से चौथे सप्ताह तक दीवानी न्यायालय में अवकाश हो जाता है। इस से यह सोचना कि कुछ न्यायालयों में ताला पड़ा रहता होगा गलत है। हमारे यहाँ ऐसा कोई न्यायालय है ही नहीं जो केवल दीवानी न्यायालय का काम देखता हो। सभी न्यायालयों को दीवानी और अपराधिक दोनों प्रकार का काम करना होता है। जैसे कनिष्ठ खंड सिविल न्यायाधीश के न्यायालय को प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट की शक्तियाँ भी होती हैं। इस तरह अपराधिक मुकदमों की सुनवाई इन अवकाशों में होती रहती है। इस के अतिरिक्त सभी दीवानी काम करने वाले विशेष न्यायालय जैसे मोटरवाहन दुर्घटना दावा अधिकरण, श्रम न्यायालय, परिवार न्यायालय और सभी राजस्व न्यायालय चलते रहते हैं। वकीलों को नित्य ही अदालत जाना पड़ता है। 

लेकिन मेरे जैसे वकीलों को जिन के पास प्रमुखतः दीवानी मुकदमों का काम होता है, एक विश्राम मिल जाता है। हम चाहें तो इन दिनों बेफिक्र हो कर यात्रा पर जा सकते हैं। क्यों कि अवकाश होने से बाहर जाने वाले वकीलों को न्यायालय सहयोग करता है। अधीनस्थ भारतीय न्यायालयों के लिए इस तरह का सहयोग करना आसान है। उन की दैनिक सूची में 80 से सौ सवा सौ तक मुकदमे प्रतिदिन रहते हैं। वास्तविक काम सिर्फ 20-30 मुकदमों में हो पाता है। शेष मुकदमों में तो उन्हें पेशी ही बदलनी होती है। सुबह सुबह ही पेशकार को पता लग जाता है कि कौन कौन वकील आज नहीं है, वह उन के मुकदमों की पत्रावलियाँ अलग निकाल लेता है और न्यायाधीश की सहमति ले कर उन में अगली पेशी दे देता है।

ब सुबह की अदालतें और दीवानी अदालतों के अवकाश समाप्त होने को हैं। अगले बुध से न्यायालय सुबह 10 से 5 बजे तक के हो जाएंगे और दीवानी अदालतें भी आरंभ हो जाएंगी। मैं ने आज ही अपने कार्यालय को संभाला। अवकाश के दिनों में जिस तरह मैं काम करता रहा उस तरह से बहुत सी पत्रावलियाँ सही स्थान पर नहीं थीं। उन्हें सही किया और कामों की सूची बना ली। आम तौर पर वकीलों को इस काम के लिए बदनाम किया जाता है कि वे मुकदमों में पेशियों पर पेशियाँ ले कर मुकदमों को लंबा करते रहते हैं और यह मुकदमों में देरी का सब से बड़ा कारण है। लेकिन ऐसा नहीं है। मुकदमे तो इसलिए लंबे होते हैं कि अदालतें कम हैं, वे क्षमता से तीन-चार गुना काम प्रतिदिन रखती हैं, जिन में से तीन चौथाई से दो तिहाई में तो उन्हें पेशी ही बदलनी होती है। इस का नतीजा यह है कि वकील की डायरी में भी प्रतिदिन उस की क्षमता से तीन-चार गुना काम होता है। यदि वह अपनी क्षमता के अनुसार ही काम रखे तो उस में से तीन चौथाई में केवल पेशी बदल दी जाए तो उस के पास दिन का चौथाई काम ही रह जाए। 
स मामले में एक उदाहरण मेरे पास है। पिछले दो वर्ष से मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण में किसी मुकदमे में पेशी एक माह से अधिक की नहीं दी जाती थी। अदालत लगभग तीस मुकदमे ही अपने पास रखती थी और चाहती थी कि हर मुकदमे में काम हो। यह अदालत अक्सर दो से तीन वर्ष में मुकदमों का निर्णय कर भी रही थी। लेकिन फास्ट ट्रेक अदालतों के समाप्त होने से मोटरयान अधिनियम की एक सहायक अदालत समाप्त हो गई। उस में लंबित सारे मुकदमे इसी अदालत के पास आ गए। अब वहाँ प्रतिदिन 60-70 मुकदमों की सूची बनने लगी है। वही दो तिहाई मामलों में पेशी ही बदलती है। पेशी भी अब दो-तीन माह से कम की नहीं लगाई जा रही है। भारत की न्याय व्यवस्था में सुधार के लिए यह आवश्यक है कि यहाँ अधीनस्थ न्यायालयों की संख्या में तुरंत वृद्धि की जाए। फिलहाल अमरीका की तुलना में भारत में केवल 15 प्रतिशत न्यायालय हैं और ब्रिटेन की तुलना में 25 प्रतिशत। न्याय नहीं के बराबर हो तो एक न्यायपूर्ण समाज की कल्पना करना फिजूल है। जहाँ तक मेरा प्रश्न है मेरा प्रयत्न रहता है कि मेरे कारण किसी मुकदमे में पेशी न बदले। मेरी यह कोशिश जारी रहेगी।

भारत सरकार के मंत्रीमंडल ने इसी माह 'न्यायदान और विधिक सुधारों के लिए राष्ट्रीय मिशन' (“National Mission for Justice Delivery and Legal Reforms) का कार्यक्रम हाथ में लेना तय किया है जिस में पाँच वर्षों में 5510 करोड़ रुपयों का खर्च आएगा। इसमें से 75 प्रतिशत का वहन केन्द्र करेगा और शेष का संबंधित राज्य। पूर्वोत्तर राज्यों के मामलों में केन्द्र 90 प्रतिशत खर्च उठाएगा। इस योजना के अंतर्गत नीतिगत और विधि संबंधी परिवर्तन, प्रक्रिया में परिवर्तन, मानव संसाधन विकास, सूचना तकनीक का उपयोग और अधीनस्थ न्यायालयों के भौतिक मूलढांचे का विकास सम्मिलित होंगे। कहा यह गया है कि वर्तमान में मुकदमों के निस्तारण में औसतन 15 वर्ष का समय लगता है इसे 3 वर्ष तक ले आया जाएगा। यदि ऐसा होता है तो न्याय व्यवस्था में तेजी से सुधार देखने को मिलेंगे। लेकिन बिना अधीनस्थ न्यायालयों की संख्या में वृद्धि किए यह असंभव है जिस के लिए कुछ भी स्पष्ट रूप से इस कार्यक्रम में नहीं कहा गया है।

Saturday, June 25, 2011

एक और असहाय औरत

सा नहीं है कि ब्लाग जगत में वृद्धजनों की उपेक्षा और उन की समस्याओं पर विचार न हुआ हो। पहले भी समय समय पर विचार होता रहा है। हो सकता है कोई ब्लाग भी केवल वृद्धजनों पर बना हुआ हो।  लेकिन अनवरत की पोस्ट मेरा सिर शर्म से झुका हुआ है और कैसी होगी, नई आजादी? के बाद इस विषय पर अनेक ब्लागों पर पोस्टें लिखी गई और एक बहस इस बात पर छिड़ गई कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है। इस के पीछे क्या कारण हैं। हम इस विषय पर अपने विचार प्रकट कर सकते हैं। लेकिन वे एकांगी ही होंगे। क्यों कि हम अपनी अपनी दृष्टि से उन पर विचार करेंगे। वास्तविकता तो यह है कि भारत एक विशाल देश है और इस देश में अनेक वर्ग हैं। हर वर्ग में इस समस्या के अनेक रूप हैं। लेकिन हर जगह पर कमोबेश हमें वृद्धजनों की उपेक्षा दिखाई पड़ती है। वास्तव में इस समस्या पर समाजशास्त्रीय शोध होना चाहिए। शोध में आए निष्कर्षों पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उस पर विचार करते हुए समस्या की जड़ों को खोजने का प्रयत्न होना चाहिए। इस दिशा में हो सकता है कुछ शोध हो भी रहे हों। यदि हम समस्या की जड़ों तक पहुँचें तो फिर उन्हें नष्ट करने का सामाजिक प्रयास किया जा सकता है। 

क्त दोनों पोस्टों में जिस घटना का उल्लेख किया गया है वह एक सामान्य निम्न मध्यवर्गीय परिवार के बीच घटित हुई थी। लेकिन इसी नगर में तीन दिन बाद ही एक दूसरी घटना सामने आई जो इस समस्या का दूसरा पहलू दिखा रहा है। आप को उस की बानगी दिखाए देते हैं ...

हुआ यूँ कि प्रभात  मजदूर वर्ग से है। उस ने कड़ी मेहनत से कमाई की और किसी तरह बचत करते हुए    यहाँ छावनी इलाके में एक दो मंजिला मकान बना लिया। भूतल के चार कमरों में किराएदार रखे हुए हैं और प्रथम तल उस के स्वयं के पास है। उस के तीन बेटियाँ और एक बेटा राजेश है। सभी बेटियाँ शादीशुदा हैं और भोपाल में रहती हैं। प्रभात भी अक्सर अपनी बेटियों के पास ही रहता है। कभी कभी कुछ समय के लिए कोटा आ कर रहता है। किराएदारों से किराया वसूलता है और वापस भोपाल चला जाता है। राजेश को शराब की लत लग गई। पिता ने उसे घर से निकाल दिया। राजेश उदयपुर जा कर मजदूरी करने लगा। वहाँ उसे शराब पीने से रोकने वाला कोई नहीं था। वह अधिक पीने लगा। धीरे-धीरे शराब ने उस के शरीर को इतना जर्जर कर दिया कि वह बीमार रहने लगा और आखिर डाक्टरों ने उसे जवाब दे दिया। इस बीच उस की पिता से बात हुई होगी तो पिता ने उसे कह दिया कि वह कोटा आ कर क्यों नहीं रहता है। हो सकता है उस ने पिता को शराब के कारण हुई अपनी असाध्य बीमारी के बारे में न बताया हो। 

चानक 13 वर्ष बाद राजेश अपनी पत्नी चंद्रिका के साथ कोटा पहुँच गया। उन के कोई संतान नहीं है। पिता ने बेटे-बहू को आया देख कर उन्हें घर में घुसने नहीं दिया और खुद मकान के ताला लगा कर कहीं निकल गया। हो सकता है वह बेटियों के पास भोपाल चला गया हो। दो दिन तक राजेश-चंद्रिका घर के बाहर ही बैठे रहे। इस बीच लगातार बारिश होती रही। दोनों ने सामने के मकान के छज्जे के नीचे पट्टी पर सोकर उन्हों ने रात गुजारी। सुबह जब तेज बारिश में दरवाजे के बाहर लोगों ने उन्हें बैठे देख पूछताछ की। उन्होंने लोगों सारा घटनाक्रम बताया दिया। उनका कहना था कि पिता जब तक मकान में घुसने नहीं देंगे, तब तक वो यहीं बैठे रहेंगे। इस पर लोगों ने पुलिस को सूचना दी। पुलिस बेटे-बहू को समझा कर थाने लेकर गई। वहां बेटे ने पिता के खिलाफ पुलिस को शिकायत दी है। पुलिस मामले की जांच कर रही है। फिलहाल पिता वापस नहीं लौटे है। पिता की तलाश जारी है। 

ह परिवार पहले वाले परिवार से भिन्न है। यहाँ बेटे को इकलौता होते हुए भी पिता ने घर से निकाल दिया। बेटा भी ऐसा गया कि उस ने 13 वर्ष तक घर का मुहँ नहीं देखा। शराब ने उस के शरीर को जब जर्जर कर दिया और डाक्टरों ने उसे जवाब दे दिया। उसे लगने लगा कि अब वह जीवित नहीं रहेगा तो अपनी पत्नी को ले कर अपने पिता के पास आ गया। उस की मंशा शायद यह रही हो कि अब उस की हालत देख कर उस के पिता उस पर रहम करेंगे और उस का इलाज ही करा देंगे। यदि इलाज न हो सका तो कम से कम उस के मरने के बाद उस की पत्नी को रहने का ठिकाना तो मिल ही जाएगा। यहाँ यह लग सकता है कि बेटा जब कुपथ पर चला गया तो घर से उसका निष्कासन करना सही था। लेकिन आज जब बेटा बीमारी से मरने बैठा है तो उसे घर में न घुसने देना कितना उचित है? एक पुत्र अपने पिता के संरक्षण में कुपथ पर कैसे चला गया?  पिता सिर्फ अपनी कमाई को जोड़ कर घर बनाता रहा और पुत्र पर कोई ध्यान नहीं दिया और वह कुपथ पर गया तो उसे सुधारने का प्रयत्न किए बिना उस का घर से निष्कासन कर देना क्या उचित कहा जा सकता है? बेटे ने 13 वर्ष कैसे गुजारे किसी को पता नहीं। बेटे का विवाह बेटे ने स्वयं किया है या उस के पिता ने उस का विवाह निष्कासन के पहले कर दिया था, यह पता नहीं है। 

र इस सब में बेटे की पत्नी का क्या कसूर है? उस के पास तो इस के सिवा कोई सहारा नहीं है कि वह मजदूरी करे और अपना जीवन यापन करे। कम से कम कानून उसे अपने पति के पिता से कोई मदद प्राप्त करने का अधिकार प्रदान नहीं करता। चूंकि वह अपने ससुर के साथ नहीं रही है। इस कारण से घरेलू हिंसा कानून भी उस की कोई मदद नहीं कर सकता। आखिर परिवार का क्या अर्थ रह गया है?

Friday, June 24, 2011

प्रयास

मित्रों, 




ब्लाग कचहरी

एक नया प्रयास है,


ऊपर चित्र पर क्लिक कर देखें 

और बताएँ, कैसा है?

Thursday, June 23, 2011

कैसी होगी, नई आजादी?

पिछली पोस्ट मेरा सिर शर्म से झुका हुआ है पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ आशा के अनुरूप सकारात्मक रहीं। एक तथ्य बहुमत से सामने आया कि इस तरह की यह अकेली नहीं है और समाज में ऐसा बहुत देखने में आ रहा है। जिस से हम इस परिणाम पर पहुँच सकते हैं कि यह गड़बड़ केवल किसी व्यक्ति-विशेष के चरित्र की नहीं, अपितु सामाजिक है। समाज में कोई कमी पैदा हुई है, कोई रोग लगा है, सामाजिक तंत्र का कोई भाग ठीक से काम नहीं कर रहा है या फिर बेकार हो गया है। यह भी हो सकता है कि समाज को कोई असाध्य रोग हुआ हो। निश्चित रूप से इस बात की सामाजिक रूप से पड़ताल होनी चाहिए। ग़ालिब का ये शैर मौजूँ है ...

दिल-ए नादां तुझे हुआ क्या है
आखिर इस दर्द की दवा क्या है


... तो दर्द की दवा तो खोजनी ही होगी। पर दवा मिलेगी तब जब पहले यह पता लगे कि बीमारी क्या है? उस की जड़ कहाँ है? और जड़ को दुरुस्त किया जा सकता है, या नहीं? यदि नहीं किया जा सकता है तो ट्रांसप्लांट कैसे किया जा सकता है?

लिए वापस उसी खबर पर चलते हैं, जहाँ से पिछला आलेख आरंभ हुआ था। श्रीमती प्रेमलता, जी हाँ, यही नाम था उस बदनसीब महिला का जिसे उस की ही संतान ने कैद की सज़ा बख़्शी थी। तो प्रेमलता की बेटी सीमा और दामाद जो ब्यावर में निवास करते हैं खबर सुन कर मंगलवार कोटा पहुँचे और प्रेमलता को संभाला। बेटी सीमा ने घर व मां के हालात देखे तो उसकी रुलाई फूट पड़ी। वह देर तक मां से लिपटकर रोती रही। कुछ देर तक तो प्रेमलता  को भी कुछ समझ नहीं आया लेकिन, इसके बाद वह भी रो पड़ी। उसने बेटी को सारे हालात बताए। मां-बेटी के इस हाल पर पड़ौसी भी खुद के आंसू नहीं रोक सके। बाद में पड़ोसियों ने उनको ढांढस बंधाया और चाय-नाश्ता कराया। चित्र इस बात का गवाह है, (यह हो सकता है कि खबरी छायाकार ने इस पोज को बनाने का सुझाव दिया हो, जिस से वह इमोशनल लगे) ख़ैर, प्रेमलता को किसी रिश्तेदार ने संभाला तो। बुधवार को बेटी और दामाद प्रेमलता को ले कर अदालत पहुँचे, एक वकील के मार्फत उन्हों ने घरेलू हिंसा की सुनवाई करने वाली अदालत में बेटे-बहू के विरुद्ध प्रेमलता की अर्जी पेश करवाई। इस अर्जी में कहा गया है  ...

1. सम्भवत: बेटे-बहू ने मकान की फर्जी वसीयत बना ली है तो उसे उसका हिस्सा दिलाया जाए;
2. लॉकर में जेवर रखे हैं, लॉकर की चाबी दिलाई जाए;
3. खाली चेकों पर हस्ताक्षर करवा रखें हो तो उन्हें निरस्त समझा जाए; और
4. पेंशन लेने में बेटा किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं करे।

  
दालत ने अगले सोमवार तक के लिए प्रेमलता को बेटी-दामाद के सुपूर्द कर दिया। बेटे के नाम नोटिस जारी किया गया कि वह भी सोमवार को अदालत में आ कर अपना पक्ष प्रस्तुत करे। मकान को बंद कर पुलिस ने चाबी बेटे के एक रिश्तेदार के सुपुर्द कर दी। शाम को प्रेमलता अपनी बेटी-दामाद के साथ ब्यावर चली गईं। बेटे-बहू का पता लगा है कि वे शिरड़ी में साईं के दर्शन कर रहे थे और अब खबर मिलने पर घर के लिए रवाना हो चुके हैं। अखबारों के लिए प्रेमलता सुर्ख ख़बर थी। तीन दिनों तक अखबार उन्हें फोटो समेत छापते रहे। आज के अखबार में उन का कोई उल्लेख नहीं है। अब जब जब मुकदमे की पेशी होगी और कोई ख़बर निकल कर आएगी तो वे फिर छपेंगी। अखबारों को नई सुर्खियाँ मिल गई हैं। मुद्दआ तक अख़बार से गायब है। ऐसी ही कोई घटना फिर किसी प्रेमलता के साथ होगी तो वह भी सुर्ख खबर हो कर अखबारों के ज़रीए सामने आ जाएगी। 

प्रेमलता के पति बैंक मैनेजर थे, उन का देहान्त हो चुका है, लेकिन प्रेमलता को पेंशन मिलती है जो शायद बैंक में उन के खाते में जमा होती हो और जिसे उन का पुत्र उन के चैक हस्ताक्षर करवा कर बैंक से ले कर आता हो। इसलिए खाली चैकों का विवाद सामने आ गया है। पति मकान छोड़ गये हैं, हो सकता है उन्हों ने बेटे के नाम सिर्फ इसलिए वसीयत कर दी हो कि बेटी अपना हक न मांगने लगे। अब बेटी-दामाद के आने पर वह वसीयत संदेह के घेरे में आ गई है और माँ ने तो अपना हक मांग ही लिया है, जो बँटवारे के मुकदमे के बिना संभव नहीं है, वह हुआ तो बेटी भी उस में पक्षकार होगी। प्रेमलता जी के जेवर लॉकर में हैं, जिस की चाबी बेटे के पास है उसे मांगा गया है। पेंशन प्राप्त करने में बेटा बाधा है यह बात भी पता लग रही है। कुल मिला कर प्रेमलता के पास संपत्ति की कमी नहीं है। उस के बावजूद भी उन की हालत यह है। मेरा तो अभिमत यह है कि इस संपत्ति के कारण ही बेटा-बहू प्रेमलता जी पर काबिज हैं और शायद यही वह वज़ह भी जिस के कारण वे उन्हें किसी के साथ छोड़ कर जाने के ताला बंद मकान में छोड़ गए। लेकिन इस एक घटना ने उनके सारे मंसूबों पर पानी फेर दिया है।

हते हैं कि संपत्ति है तो सारे सुख हैं और वह नहीं तो सारे दुख। लेकिन यहाँ तो संपत्ति ही प्रेमलता जी के सारे दुखों का कारण बनी है। दुनिया में जितने दुख व्यक्तिगत संपत्ति के कारण देखने को मिले हैं उतने दुख अन्य किसी कारण से नहीं देखने को मिलते। मानव सभ्यता के इतिहास में जब से व्यक्तिगत संपत्ति आई है तभी से इन दुखों का अस्तित्व भी आरंभ हो गया है। लेकिन एक बडा़ सच यह भी है कि व्यक्तिगत संपत्ति के अर्जन, उस के लगातार चंद हाथों में केन्द्रित होने से उत्पन्न अंतर्विरोध और उन के हल के लिए किए गए जनसंघर्ष आदिम जीवन से आज तक की विकसित मानव सभ्यता तक के विकास का मूल कारण रहे हैं। यहाँ जितनी संपत्ति है उसे किसी न किसी तरह बेटा-बहू अपने अधिकार में बनाए रखना चाहते हैं। इतना ही नहीं वे उस के हिस्सेदारों को उन का हिस्सा तक नहीं देना चाहते। यही संघर्ष संपूर्ण समाज में व्याप्त है। 20 रुपए प्रतिदिन की कमाई को गरीबी की रेखा मानने वाले देश में जितने घोटाले सामने आ रहे हैं उन में से अधिकतर करोड़ों-अरबों के हैं। संपत्ति का यह संकेंद्रण और दूसरी और देश के करोड़ों-करोड़ लोगों के बीच बिखरी गरीबी भारत का सब से महत्वपूर्ण अंतर्विरोध  बन गई है। यह अंतर्विरोध हल होना चाहता है। जितने भी संपत्ति संकेंद्रण के केन्द्र हैं और जो भी राजनीति में उन के प्रतिनिधि हैं वे इस अंतर्विरोध को हल होने से रोकने के लिए समाज में इधर-उधर के मुद्दए उठाते रहते हैं। ताकि जनता का ध्यान भटका रहे। लेकिन अंतर्विरोध हल होना चाहता है तो वह तो हो कर रहेगा। उसे जनता सदा सर्वदा के लिए नहीं ढोती रह सकती। आज भ्रष्टाचार समाप्त करने के नारे की जो गूंज जनता के बीच सुनाई दे रही है उस से यह अंतर्विरोध हल नहीं होगा, इस का अहसास इस मुद्दए को उठाने वालों को है। इसीलिए वे नई आजादी हासिल करने की बात साथ-साथ करते चलते हैं। पर यह भी तो स्पष्ट होना चाहिए कि यह नई आजादी कैसी होगी?

चलो फिर से ग़ालिब को याद करते हैं -

हम हैं मुश्ताक़ और वह बेज़ार
या इलाही यह माजरा क्या है

Wednesday, June 22, 2011

मेरा सिर शर्म से झुका हुआ है

ज मेरा सिर शर्म से झुका हुआ है। हो भी क्यों न? मेरे ही नगर के एक ऐसे मुहल्ले से जिस में आज से तीस वर्ष पूर्व मुझे भी दो वर्ष रहना पड़ा था, समाचार मिला है कि एक बेटे-बहू मुम्बई गए और पीछे अपनी 65 वर्षीय माँ को अपने मकान में बन्द कर ताला लगा गए। तीन दिन बाद ताला लगे मकान के अन्दर से आवाजें आई और मोहल्ले वालों की कोशिश पर पता लगा कि महिला अंदर बंद है तो उन्होंने महिला से बात करने का प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली। इस पर महिला एवं बाल विकास विभाग, पुलिस और एकल नारी संगठन को सूचना दी गई। पुलिस ने दिन में महिला एवं बाल विकास विभाग की टीम के साथ पहुँच कर महिला से रोशनदान से बात करने का प्रयास किया, लेकिन वह घर से बाहर आने को राजी नहीं हुई। इस पर पुलिस लौट गई। तब कुछ लोगों ने जिला कलेक्टर को शिकायत की इस पर देर रात उन के निर्देश पर पुलिस ने घर का ताला तोड़ा गया। पुलिस ने उस से पूछताछ की, लेकिन वह घर पर ही रहना चाह रही थी। पुलिस यह जानने का प्रयास करती रही कि आखिर मामला क्या है? पुलिस ने उससे बेटे-बहू के खिलाफ शिकायत देने को भी कहा, लेकिन वह इसके लिए तैयार नहीं हुई। पड़ोसियों ने बताया कि महिला को बेटे-बहू प्रताड़ित करते हैं और इसी कारण वह सहमी हुई है और शिकायत नहीं कर रही है।
 
पुलिस व लोगों को देखकर वृद्धा की रुलाई फूट पड़ी। उसने बताया कि बेटे-बहू पांच दिन के लिए बाहर गए हैं और पांच दिन का खाना एक साथ बनाकर गए हैं। तीन दिनों में खाना पूरी तरह सूख चुका था और खाने लायक नहीं रहा था। दही भी था जो गर्मी के इस मौसम में बुरी तरह बदबू मार रहा था। पुलिस से शिकायत करने पर रुंधे गले से सिर्फ यही निकल रहा था, मैं अपनी मर्जी से रह रही हूँ। मुझे कोई गिला-शिकवा नहीं है। कलेक्टर ने बताया कि सूचना मिलते ही उन्होंने महिला एवं बाल विकास विभाग तथा पुलिस को इसकी जानकारी दी। महिला अपने बेटे-बहू के बारे में कुछ नहीं बोल रही। यदि वह किसी प्रकार की शिकायत देती है तो उनके खिलाफ कार्रवाई होगी। इस महिला के पति की चार वर्ष पूर्व मृत्यु हो चुकी है जो एक बैंक में मैनेजर थे। महिला के एक पुत्री भी है लेकिन वह अपनी माँ से मिलने यहाँ आती नहीं है। एक ओर संतानें इस तरह का अपराध अपने बुजुर्गों के साथ कर रहे हैं। दूसरी ओर एक माँ है जो अपनी दुर्दशा पर आँसू बहा रही है लेकिन अपनी संतानों के विरुद्ध शिकायत तक नहीं करना चाहती। यहाँ तक कि उस मकान से हटना भी नहीं चाहती। उसे पता है कि उस के इस खोटे सिक्के के अलावा उस का दुनिया में कोई नहीं। उन के विरुद्ध शिकायत कर के वह उन से शत्रुता कैसे मोल ले?
 
स घटना से अनुमान लगाया जा सकता है कि समाज में वृद्धों की स्थिति क्या है? सब से बुरी बात तो यह है कि कलेक्टर यह कह रहा है कि यदि महिला ने शिकायत की तो कार्यवाही होगी। जब सारी घटना सामने है। एक महिला के साथ उस के ही बेटे-बहु ने निर्दयता पूर्वक क्रूर व्यवहार किया है और वह घरेलू हिंसा का शिकार हुई है। जिस के प्रत्यक्ष सबूत सब के सामने हैं, इस पर भी पुलिस और प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा इस बात की प्रतीक्षा कर रहा है कि वह महिला शिकायत देगी तब वे कार्यवाही करेंगे। इस से स्पष्ट है कि हमारी सरकार, पुलिस और प्रशासन जो उस के अंग हैं। इस हिंसा और अपराध को एक व्यक्ति के प्रति अपराध मान कर चलते हैं और बिना शिकायत किए अपराधियों के प्रति कार्यवाही नहीं करना चाहते। जब कि यह भा.दंड संहिता की धारा 340 में परिभाषित सदोष परिरोध का अपराध है। तीन दिनों या उस से अधिक के सदोष परिरोध के लिए दो वर्ष तक की कैद का दंड दिया जा सकता है। दंड प्रक्रिया संहिता के अनुसार यह संज्ञेय अपराध है जिस में पुलिस बिना शिकायत के कार्यवाही कर सकती है। घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम की धारा 12 के अंतर्गत यह उपबंध है कि हिंसा की ऐसी घटना पाए जाने पर संरक्षा अधिकारी इस तरह का आवेदन न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर महिला को राहत दिला सकता है। लेकिन इन बातों की ओर न पुलिस का और न ही प्रशासन का ध्यान है। इस से पुलिस व प्रशासन की संवेदनहीनता अनुमान की जा सकती है। 

ब से बड़ी बात तो यह है कि बच्चों, बुजुर्गों और असहाय संबंधियों के प्रति इस तरह का अमानवीय और क्रूरतापूर्ण व्यवहार को अभी तक दंडनीय, संज्ञेय और अजमानतीय अपराध नहीं बनाया गया है। जिस से लोग इस तरह का व्यवहार करने से बचें और करें तो सजा भुगतें। इस तरह के उपेक्षित और असहाय लोगों के लिए सरकार और समाज द्वारा कोई वैकल्पिक साधन भी नहीं उपलब्ध कराए गए हैं कि वे अपने संबंधियों की क्रूरतापूर्ण व्यवहार की शिकायत करने पर उन से पृथक रह सकें। आखिर हमारा समाज कहाँ जा रहा है? क्या समाज को इस दिशा में जाने से रोकने के समुचित प्रयास किए जा रहे हैं और क्या हमारी सरकारें और राजनेता वास्तव में इन समस्याओं पर गंभीरता से सोचते भी हैं?

Sunday, June 19, 2011

शहीद भगत सिंह दोजख में?

ज तक हम इस बात का निर्णय नहीं कर पाए कि जब इंसान पैदा होता है तो वह नास्तिक होता है या आस्तिक?  मेरे विचार से इस दुनिया के तमाम इंसानों का बड़ा हिस्सा आज आस्तिक है। अर्थात किसी न किसी रुप में वह ईश्वर, अल्लाह या गोड में विश्वास करता है। एक ऐसी शक्ति में, जिस ने इस दुनिया को बनाया है और कहीं बैठा इस दुनिया का संचालन करता है। बहुत कम और इने-गिने लोग इस दुनिया में नास्तिक होंगे जो यह विश्वास नहीं करते। फिर भी कुछ आस्तिकों को इस बात का भय लगा रहता है कि कहीं ऐसा न हो कि लोग नास्तिक होते जाएँ और इस दुनिया में आस्तिक कम रह जाएँ। वे हमेशा कुछ न कुछ ऐसा अवश्य करते हैं जिस से वे ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करते रहें। दुनिया में जिन लोगों की रोजी-रोटी ईश्वर के अस्तित्व से ही जुड़ी हुई है, उन लोगों की बात तो समझ में आती है कि वे उस के होने की बात का प्रचार करते रहते हैं। क्यों कि यदि लोग ईश्वर में विश्वास करना बंद कर दें तो दुनिया भर के पंडे, पुजारियों, मुल्लाओं, काज़ियों, पादरियों आदि का तो अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाए। इस के अलावा भी दुनिया भर में लाखों-करोडों संगठन इस बात के लिए ही बने हैं कि वे ईश्वर के होने को लगातार सिद्ध करते रहें। दुनिया भर की किताबों की यदि श्रेणियाँ बनाई जाएँ तो शायद सब से अधिक पुस्तकें इसी श्रेणी की मिलेंगी जो किसी न किसी तरह से ईश्वर के अस्तित्व को बचाने में लगी रहती हैं। बहुत से संगठन तो ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध करने के लिए मरने मारने को तैयार रहते हैं। इतना धन, इतनी श्रमशक्ति ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध करने में लगातार खर्च की जाती है कि यदि उसे मानव कल्याण में लगा दिया जाए तो शायद यह दुनिया ही स्वर्ग बन जाए। इतना होने पर भी न जाने क्यों इस बात का भय लोगों को बना रहता है कि कहीं ऐसा न हो कि लोग ईश्वर को मानने से मना कर दें? ये सारे तथ्य किसी भी विचारवान आस्तिक इंसान को यह सोचने को बाध्य कर देते हैं कि वाकई ईश्वर है भी या नहीं?

ज एकाधिक ब्लागों पर इसी तरह की चर्चा की गई। एक स्थान पर यह लिखा था कि इतनी बड़ी दुनिया है तो अवश्य ही उसे बनाने और चलाने वाला कोई होगा। मैं ने उस पर ध्यान नहीं दिया और आगे बढ़ गया। यह तर्क इतनी बार दिया जा चुका है कि पहली नजर में ही सब से लचर लगता है। वस्तुतः यह तर्क है ही नहीं। यह तर्क  सब से पहले तो इस मान्यता पर आधारित है कि कुछ भी, कोई भी चीज किसी के बनाने से ही अस्तित्व में आती है और किसी न किसी के चलाने से चलती है। इस मान्यता का अपने आप में कोई सिर पैर नहीं है। दुनिया में बहुत से चीजें हैं जो न किसी के बनाने से बनती हैं और न किसी के चलाने से चलती हैं। वे अपने आप से अस्तित्व में हैं और अपने आप चलती हैं। किसी स्थान को बिलकुल निर्जन छोड़ दें वह कुछ ही वर्षों में या तो जंगल में तब्दील हो जाता है, या फिर मरुस्थल में। उन्हें कोई नहीं बनाता। इस प्रश्न का उत्तर विज्ञान अवश्य देता है कि कोई निर्जन स्थल जंगल  या मरुस्थल में क्यों बदल जाता है।  लेकिन फिर भी लोग इसे ईश्वर का कोप या मेहरबानी सिद्ध करने में जुटे रहते हैं। 

दि यह मान भी लिया जाए कि कुछ भी किसी के बनाए बिना अस्तित्व में नहीं आता और किसी के चलाए बिना नहीं चलता। इस आधार पर हम यह मान लें कि जितनी भी जीवित या निर्जीव वस्तुएँ इस दुनिया में अस्तित्व में हैं उन्हें बनाने और चलाने वाला कोई ईश्वर है तो फिर यह प्रश्न हमारे सामने आ कर खड़ा हो जाएगा कि फिर ईश्वर को किसने बनाया। हमें अपने उसी लचर तर्क के आधार पर यह मानने को बाध्य होना पड़ेगा कि उसे फिर किसी उस से बड़े ईश्वर ने बनाया होगा और अंत में हमें यह बात माननी होगी कि कोई चीज ऐसी है जो बिना किसी के बनाए भी अस्तित्व में है और स्वतः चलायमान है। यदि हमें अंत में जा कर यह मानना ही था कि कोई चीज ऐसी है जो बिना किसी के बनाए भी अस्तित्व में है और स्वतः चलायमान है तो फिर इतनी कवायद और कसरत करने तथा कल्पना करने की आवश्यकता क्या है कि इस विश्व को बनाने वाला और चलाने वाला कोई है। हम इस विश्व को ही बिना किसी के बनाए भी अस्तित्व में होना और स्वतः चलायमान होना क्यों नहीं मान लेते? इस तरह इस तर्क का दम अपने ही कर्म से टूट जाता है।

क मित्र ने ईश्वर को अपने लाभ हानि से जोड़ दिया है कि ईश्वर को मानने में फायदा ही फायदा है और न मानने में नुकसान ही नुकसान। वे लिखते हैं ...

मान लो यदि कोई खुदा नहीं तो यह इंसान जिसने  अल्लाह के बताए  रास्ते पे चलते हुई ज़िंदगी गुजारी उसका क्या नुकसान हुआ?  यही कि जीवन मैं थोडा सा कष्ट सहा और शराब नहीं पी,  बलात्कार नहीं किया, झूट नहीं बोला, गरीबों कि मदद कि , नमाजें पढी ,रोज़ा रखा इत्यादि और जिसने  इश्वर  को नहीं माना उसने क्या पाया ? यही कि नमाज़ नहीं पढनी पडी, दुनिया मैं जिस चीज़ का मज़ा चाहा लेता रहा,जैसे दिल चाहा जीता रहा. बाकी दोनों को मरना था सो मर गए. सब ख़त्म. 
अब मान लो कि अल्लाह , इश्वेर है और दोनों के मरने पे हिसाब किताब हुआ तो जिसने अल्लाह के होने से इनकार  किया था उसका क्या होगा? नरक मिलेगा और वो भी ऐसी सजा कि जिस से बचना संभव ना होगा और यह सजा दुनिया मैं नमाज़, रोज़ा, और सत्य बोलने से अधिक कष्ट दायक  होगी. अक्लमंद इंसान के लिए अल्लाह के वजूद को मान ने कि बहुत सी दलीलें हैं और अगर कोई फाएदे और नुकसान कि ही बोली समझता है तो अल्लाह  को मानने मैं ही फ़ाएदा नजर आता है. 

यानी मनुष्य सच की खोज छोड़ दे और अपने लाभ और हानि से इस बात को तय करे कि ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं? गोया ईश्वर न हुआ कोई दुनियावी सौदा हो गया। सभी भारतवासियों के दिलों में सम्मान पाने वाले क्रांतिकारी शहीद भगतसिंह ने फाँसी की सजा होने के बाद भी यह घोषणा की कि वे नास्तिक हैं  और यह भी बताया कि वे नास्तिक क्यों हैं? उन का यह आलेख यहाँ क्लिक कर के पढ़ा जा सकता है। 

ब हम इन मित्र की बात को सही मान लें तो हमें यह भी मानना पड़ेगा कि शहीद भगतसिंह मरने के बाद दोजख (नर्क) में भेजे गए होंगे और वहाँ अवश्य ही उन्हें यातनाएँ दी जा रही होंगीं। क्या आप इस तथ्य को स्वीकार कर पाएंगे? 

Friday, June 17, 2011

ख़ौफ तारी था उसका


'कविता'

ख़ौफ तारी था उसका 
  •  दिनेशराय द्विवेदी

उस के नाम से डरा कर, माताएँ
सुलाती थीं अपने बच्चों को

उस के शहर का रुख़ करने की खबर से
खड़े हो जाते थे रोंगटे
शहरवासियों के

उसे देखा जाता था
सिर्फ चित्रों, और वीडियो में
सुनी जा सकती थी उस की आवाज
सिर्फ रिकॉर्ड की हुई।

ख़ौफ तारी था उस का
सारे जहाँ में
जहाँ जहाँ बस्तियाँ थीं
जहाँ जहाँ इन्सान थे

कुछ भी कर सकता था वह
कोई भी हो सकता था
उस का निशाना, बस शर्त इतनी थी
कि इन्सानों पर ख़ौफ तारी रहे

तलाश जारी थी उस की
सारी जहाँ में
जंगलों में, वीरान पहाड़ियों में
हर उस जगह, जहाँ छुप सकता था
इन्सान की निगाहों से बचाकर खुद को

बरसों की तलाश के बाद मिला
इंसानों की एक बस्ती में
एक बंद घर में सुरक्षा की दीवारों के बीच
जवान बीबी के साथ

डरता हुआ अपने ही बुढ़ापे से
जवानी बरकरार रखने वाली
दवाइयों की खेप के बीच
अपनी ही तस्वीरें देखते हुए

मिनटों में हो गया तमाम
कहते हैं ... ठेला था जिन्होंने
उसे इस रास्ते पर
उन्होंने ही ठेल दिया उसे
समंदर की गहराइयों में

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Wednesday, June 15, 2011

'हाँ' या 'ना' ... ? ... ? ... ?

जनता! 
ओ, जनता!!
तुम तो जानती ही हो, ये जनतंत्र है। हम हर पाँच बरस में तुम्हारे पास आते हैं। तुम्हारे लिए पलक पाँवड़े बिछाते हैं। घर-घर जाते हैं, हाथ जोड़ते हैं, पाँव पड़ते हैं। किसी को दो रुपए किलो चावल दिलाते हैं। किसी को बिजली मुफ्त में। फिर भी कसर रह जाती है तो दारू की थैलियाँ बँटवाते हैं। कहीं कहीं तो नोट तक बाँट देते हैं। फिर वोट पड़ता है तो चुनाव आयोग की सारी पाबन्दियों के बाद भी तुम्हारे घर मोटर कार, जीप वगैरा भेज कर वोट के लिए ढो कर लाते हैं। घर से तुम्हें उठाने से ले कर वापस पहुँचाने तक का नाश्ते पानी का सारा जिम्मा उठाते हैं। भला ऐसा किसी और तंत्र में हो सकता था? इसी को जनतंत्र कहते हैं। इस से बड़ा और भला कोई जनतंत्र हो सकता है?
तुम तो अच्छी तरह जानती ही हो कि हम तुम्हारी चिरौरी करने के लिए क्या क्या नहीं करते? कुछ गलत लोग हैं जो तुम्हें बरगलाते हैं। वे किसी भी तरह तुम्हें चैन से नहीं जीने देना चाहते। हम जानते हैं कि तुम हमें ही चाहती हो। इस लिए वे तुम्हें वोट भी नहीं देने देना चाहते। इसी लिए जहाँ जहाँ वे ऐसा करने की नीयत रखते हैं, वहाँ वहाँ हम वोट की पेटी ले कर भाग निकलते थे और जहाँ जहाँ तुम ठप्पा मारना चाहती थी वहाँ तुम्हारी तरफ से हम ही ठप्पा मार कर पेटी वापस कर देते थे। कई जगह तो हम उन्हें वोट के तबेले तक पहुँचने ही नहीं देते। वे पहुँच जाते तो तुम्हें परेशान करते। हम ने तुम्हारी परेशानी दूर करने के लिए  क्या क्या इंतजाम नहीं किए? अब तुम्हें क्या बताना? तुम तो खुद ही सब जानती हो। 

ब देखो ना! ये लोग कितने बेहया हैं? तुमने हमें जिताया, जीतने वाले कम पड़े तो हमने कुछ और लोगों को पटाया। पर राज बनाया। हमने तुमसे वादा किया था कि पूरे पाँच साल टिकेंगे। तुमने रोशनी मांगी थी हम ने परमाणु समझौता कर के एटमी बिजली के कारखाने बनाने के लिए अपनी और देश की नाक कटवा कर भी समझौता किया। आखिर क्यों न करते? हमने रोशनी का वायदा जो किया था। वो बाईँ बाजू वाले बहुत पीछे पड़े। उन्हों ने तमाम घोड़े खोल लिए, दाएँ बाजू वालों से मिल गए, हमारे खिलाफ वोट दिया। लेकिन क्या हुआ? हम ने फिर भी अपने लिए वोट कबाड़ ही लिए। हमें कुछ भी करना पड़ा। पर तुम से किया वायदा निभाया। इस से बढ़िया और कौन हो सकता है? जो हर हाल में वायदा निभाए। 

ये कुछ नए लोग उग आए हैं। हमने बड़ी मुश्किल से तो एक महात्मा से निजात पायी थी। ये एक सफेद कुर्ता-धोती पहने एक और न जाने कहाँ से पैदा हो गया? तुम्हें बरगलाने को। बाप-बेटा वकील उन के साथ लग गए। एक पुलिस अधिकारिणी और कुछ और लोग साथ लग लिए। अब ये आठ दस लोग कर क्या सकते हैं। भूख हड़ताल कर के तुम्हें बरगलाना चाहते हैं। पहली बार तुम समझ नहीं पायी थी इन की हरकतें। वो इंटरनेट और मीडिया के चकमे में आ कर उन्हें महात्मा की टोली समझ कर उन के साथ लग गई थी।  हमें मजबूरी में मानना पड़ा कि जैसा वे कहते हैं वैसा कानून बनवा देंगे। देखो हमने वायदा निभाया, उन के साथ बैठकें करीं कि ना करीं। नहीं तो ऐसा कोई करता है। कोई तु्म्हारा चुना हुआ, कभी तु्म्हारे अलावा किसी के सामने घुटने टेकता है? हमने भी नहीं टेके। हम टिका देते तो अपमान होता, वह भी तुम्हारा। हम उसे कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं। तुम चक्कर में मत आना इन के। ये तुम्हें कहीं का नहीं रखेंगे। हम ने भी कह दिया है कि हम तुम्हारे द्वारा चुनी हुई संसद और उस के द्वारा चुने हुए परधान मंत्री को और अदालतों के हाकमों को इस से अलग रखेंगे। अब हमने कह दिया तो कह दिया। अब झुकेंगे तो तुम्हारा अपमान हो जाएगा। तुमने हमें चुन कर जो भेजा है। हम ये कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं?

क वो, केसरिया लंगोटी-अंगोछा पहने कसरतें सिखाता सिखाता तुम्हें सिखाने निकल गया। जैसे पहले के जमाने में जवानी बरकरार रखने की दवाएँ सड़क किनारे मजमा लगा कर बेचा करते थे। ऐसे मजमा लगाया। कुछ लोग उस के दवा ऐजेंट क्या बन गए कि सोचने लगा देश की हालत बदल देगा। आखिर हमारे होते वह ऐसा कैसे कर लेता। हमने क्या निपटाया उसे। दुनिया को मजबूत बनाने की नसीहत देने वाला बहुत कमजोर निकला। पहले तो इधर उधर से खबरें भेज कर उसे डराया, चिट्ठी लिखाई, तुम्हें बताई तो डर गया। जरा सी पुलिस देखी कि डर कर मंच से कूद कर भागा। कैसे भेस बदला? अब क्या बताएँ अपने मुख से बताते शर्म आती है। तुम्हें तो सब पता ही है। तुम ने तो सब लाइव देखा ही है। अब देखो आठ दिन में ही टें बोल गया। अस्पताल से छूटा तो लगता था बरसों से बीमार है। देखा हमने जोगी का जोग निकाल दिया। 

ब उस का जोग निकाला है, तो इस का भी निकाल देंगे। पहले तो हम समझते थे जोगी का हाल देख महात्मा मैदान छोड़ भागेगा। उस ने नाटक तो किया, पर भागा नहीं। फिर डट गया। पर डटने से क्या होता है? हम कोई ऐसे ही तो उस की बात नही मान लेंगे? हम भी उसे तपाएंगे। उसे माननी पड़ेगी हमारी बातें। हम ने उस की दुकान पर तलाशी लेने भेज दिया है अपनी टीम को। वैसे तो हमारे कानून ऐसे हैं कि कोई उन की कमी पूरी कर ही नहीं सकता। हम चाहें तो हर किसी को फँसा लें। लेकिन वहाँ अगर कुछ न भी मिला तो हमारी टीम वाले क्या कम हैं कुछ तो हेराफेरी कर के कुछ न कुछ तो निकाल ही देंगे। 

ये भी कोई बात हुई कि प्रधानमंत्री को भी दायरे में लाओ। हम ले भी आएँ। पर जिसे तुमने ही दायरे से बाहर कर दिया हो, उसे दायरे में कैसे ले आएँ। मान ली बात  कि सारी जमात को ट्रेन में टिकट ले कर सफर करना चाहिए।  पर कम से कम एक तो बिना टिकट होना ही चाहिए। ये क्या ट्रेन चलाने वाले ड्राइवर को भी टिकट लेना पड़ेगा क्या? हम ने उन से कह दिया है, या तो हमारी बात माननी पड़ेगी नहीं तो हम तुम्हारे-हमारे दोनो के फोटो मंत्रालय को भेज देंगे। मंत्रालय खुद फैसला कर लेगा। मंत्रालय में कोई और थोड़े ही बैठा है? वहाँ भी हम ही तो हैं। वह तो वैसा ही करेगा जैसा हम चाहेंगे। तो जनता देख लो। ये लोग तु्म्हारे नाम पर तुम्हारी पग़ड़ी उछालना चाहते हैं। पर हम ऐसा नहीं होने देंगे। पक्का वादा है तुमसे, हम मरते मर जाएंगे पर ऐसा नहीं होने देंगे। हम डरते हैं तो तुमसे ही डरते हैं, वो भी पाँच बरस में एक बार। अब बार बार डरना पड़े तो जनतंत्र कैसे चला पाएँगे? ये समझते ही नहीं पाँच बरस से पहले ही हमें वापस बुलाने का अधिकार चाहते हैं। पर ऐसा हम कैसे होने दे सकते हैं। हम तो पाँच बरस में एक बार तुम्हें कष्ट देते हैं वही बहुत है। हमारा बस चले तो जीते जी तुम्हें कष्ट दें ही नहीं। एक बार पूछ लिया वही क्या बहुत नहीं है, जीवन भर के लिए? अच्छा तो अब चलते हैं। फिर मिलेंगे। तुम तो तान खूँटी सोओ, आराम करो। ऐसे वैसों की सुनने की जरूरत ही नहीं है। 


(अब तुम्हें कैसे बताऊँ कि हमारी जान निकली जा रही है, कि ये सफेद टोपी वाला बुड्ढा ये न कह दे कि मतभेद के मुद्दों पर जनता से 'हाँ' या 'ना' में चुनाव [रेफरेंडम] करा लिया जाए)

शिवराम की कविता ... जब 'मैं' मरता है

शिवराम केवल सखा न थे। वे मेरे जैसे बहुत से लोगों के पथ प्रदर्शक, दिग्दर्शक भी थे। जब भी कोई ऐसा लमहा आता है, जब मन उद्विग्न होता है, कहीं असमंजस होता है। तब मैं उन की रचनाएँ पढ़ता हूँ। मुझे वहाँ राह दिखाई देती है। असमंजस का अंधेरा छँट जाता है। आज भी कुछ ऐसा ही हुआ। मैं ने उन की एक किताब उठाई और कविताएँ पढ़ने लगा। देखिए कैसे उन्हों ने अहम् के मरने को अभिव्यक्त किया है - 



'कविता'
जब 'मैं' मरता है*
  • शिवराम

हमें मारेंगी
हमारी अनियंत्रित महत्वाकांक्षाएँ

पहले वे छीनेंगी
हमसे हमारे सब
फिर हम से 
हमें ही छीन लेंगी

बचेंगे सिर्फ मैं, मैं और मैं
'मैं' चाहे कितना ही अनोखा हो
कुल मिला कर होता है एक गुब्बारा
जैसे-जैसे फूलता जाता है
तनता जाता है
एक अवस्था में पहुँच कर 
फूट जाता है

रबर की चिंदियों की तरह
बिखर जाएंगे एक दिन
जो न उगती हैं न विकसती हैं
मिट्टी में मिल जाती हैं 
धीरे-धीरे

बच्चे रोते हैं
जब फूटता है उन का गुब्बारा
जब 'मैं' मरता है, कोई नहीं रोता
हँसते हैं लोग, हँसता है जमाना


*शिवराम के कविता संग्रह 'माटी मुळकेगी एक दिन' से

Saturday, June 11, 2011

अब तो अंगोछा मेरा है

दालतों में अपने काम निपटा कर अपनी बैठक पर पहुँचा तो वहाँ एक जवान आदमी मेरे सहायक से बात कर रहा था। पैंट शर्ट पहनी हुई थी उस ने लेकिन गले में एक केसरिया रंग का गमछा डाल रखा था। वह सहायक से बात करने के बीच में कभी कभी उस से अपना पसीना पोंछ लेता था। केसरिया रंग के गमछे से पसीना पोंछना मुझे अजीब सा लगा। उधर बाहर सड़क पर पिछले चार दिनों से एक टेंट में बाबा रामदेव के अनुयायियों ने धरना लगा रखा है। वहाँ की दिनचर्या नियमित हो चली है। रात को तो इस टेंट में केवल तीन-चार लोग रह जाते हैं। उन का यहाँ रहना जरूरी भी है। वर्ना टेंट में जो कुछ मूल्यवान सामग्री मौजूद है उस की रक्षा कैसे हो? सुबह नौ बजे से लोगों की संख्या बढ़ने लगती है। दस बजे तक वे दस पन्द्रह हो जाते हैं। फिर टेंट में ही यज्ञ आरंभ हो जाता है। लाउडस्पीकर से मंत्रपाठ की आवाज गूंजने लगती है। इस आवाज से दर्शक आकर्षित होने लगते हैं। सड़क के एक ओर अदालतें हैं और दूसरी ओर कलेक्ट्री, दिन भर लोगों की आवाजाही बनी रहती है। टेंट में आठ-दस कूलर लगे हैं इस लिए गर्मी से बचने को न्यायार्थी भी वहाँ जा बैठते हैं।  इस से दिन भर वहाँ बीस से पचास तक दर्शक  बने रहते हैं।
कोई आधे घंटे में यज्ञ संपूर्ण हो जाता है। इसे उन्हों ने सद्बुद्धि यज्ञ का नाम दिया है। यह किस की सद्बुद्धि के लिए है, यजमान की या किसी और की, यह स्पष्ट नहीं है। हाँ आज अखबार में यह खबर अवश्य है -"बाबा रामदेव व आचार्य बालकृष्ण के स्वास्थ्य लाभ की कामना के साथ सद्बुद्धि यज्ञ" यहाँ अखबार की मंशा का भी पता नहीं लग रहा है। खैर जिसे भी जरूरत हो उसे सद्बुद्धि आ जाए तो ठीक ही है। यज्ञ संपूर्ण होते ही कुछ लोगों के ललाट पर तिलक लगा कर मालाएँ पहना कर मंच पर बैठा दिया जाता है। ये लोग क्रमिक अनशन पर बैठते हैं। शाम को पांच बजे उन का अनशन समाप्त हो जाता है। लोग बिछड़ने लगते हैं। छह बजे तक वही चार-पाँच लोग टेंट में रह जाते हैं। दिन में कोई न कोई भाषण करता रहता है। इस से बहुत लोगों की भाषण-कब्ज को सकून मिलता है। भाषण दे कर टेंट से बाहर आते ही उन का मुखमंडल खिल उठता है और वे पूरे दिन प्रसन्न रहते हैं और अगले दिन सुबह अखबार में अपना नाम और चित्र तलाशते दिखाई देते हैं।   

सुबह दस बजे की चाय पी कर हम लौट रहे थे तो टेंट पर निगाह पड़ी। रात को तेज हवा, आंधी के साथ आधे घंटे बरसात हुई थी। कल तक तना हुआ टेंट आज सब तरफ से झूल रहा था। लगता है यदि किसी ने उसे ठीक से हिला दिया तो गिर पड़ेगा। सुबह का यज्ञ संपन्न हो चुका था। शाम तक के लिए लोग अनशन पर बिठा दिए गए थे। किसी तेजस्वी वक्ता का भाषण चल रहा था। किसी ने टेंट को तानने की कोशिश नहीं की थी, टेंट सप्लायर की प्रतीक्षा में। तभी एकनिष्ठता से संघ और भाजपा के समर्थक हमारे चाय मित्र ने हवा में सवाल उछाल दिया -आखिर ये नाटक कब तक चलता रहेगा?  मैं ने मजाक में कहा था -शायद नागपुर से फरमान जारी होने तक। उस ने मेरे इस जवाब पर त्यौरियाँ नहीं चढ़ाई, बल्कि कहा कि बात तो सही है। वह शायद संघ के पुराने अनुयायियों के स्थान पर नए-नए लोगों को इस तरह के आयोजनों में तरजीह पाने से चिंतित था।

मैं ने सहायक से बात कर रहे उस के मुवक्किल से पूछा -ये केसरिया अंगोछा किस का है, बजरंग दल या शिवसेना का?  वह हँस पड़ा, बोला- अब तो ये मेरा है, और पसीना पोंछने के काम आता है। मैं ने फिर सवाल किया -कोई और रंग का नहीं मिला? उस का कहना था कि उस के पैसे लगते, यह तो ऐसे ही एक जलूस में शामिल होने के पहले पहचान के तौर पर गले में लटकाए रखने के लिए आयोजकों ने दिया था। जलसे के बाद वापस लिया नहीं। अब इस का उपयोग पसीना पोंछने के लिए होता है? उस के उत्तर पर मुझ से भी मुस्काए बिना नहीं रहा गया। मैं ने इतना ही कहा कि ये केसरिया अंगोछा भ्रम पैदा करता है, पता ही नहीं लगता कि कौन सी सेना है, बजरंगी या बालासाहबी। अब तो संकट और बढ़ने वाला है बाबा ने सेना बनाने की ठान ली है, वहाँ भी ये ही अंगोछे नजर आने वाले हैं।

Friday, June 10, 2011

उत्तमार्ध को जन्मदिन की बधाई और शुभकामनाएँ!!!

३६ वर्ष का साथ कम नहीं होता, आपसी समझ विकसित करने के लिए। लेकिन पता नहीं क्यों? जैसे जैसे समय गुजरता जाता है, वैसे वैसे मतभेद के मुद्दे बदलते रहते हैं। साथ का ये ३६वाँ वर्ष तो बिलकुल वैसा ही था जैसे इन अंकों की शक्ल है। मतभेदों की चरम सीमा थी वह। शायद इन अंकों का ही प्रताप रहा हो। पर आपसी समझ भी ऐसी कि मतभेदों के बावजूद साथ गहरा होता गया।  जैसे ही अंक बदल कर ३७ हुआ कि मतभेद न्यूनतम स्तर पर आ गए। हालांकि अब ऐसा भी नहीं कि बरतन खड़कते न हों और आवाजें न होती हों। वे होती हैं, लेकिन शायद उतना होना यह सबूत पैदा करने के लिए भी जरूरी है कि हमारे बीच पति-पत्नी का वैधानिक रिश्ता कायम है।

मैं अपने बहुत खुशकिस्मत हूँ कि मुझे ऐसी जीवनसाथी मिली। न पहले की कोई जान पहचान, न देखा-दाखी। बस एक दूसरे के परिजनों ने तय किया और हमें बांध दिया गया, ऐसी मजबूत डोर से जो जीवन भर साथ निभाएगी। वह आज का वक्त होता तो ये बांधा जाना कानून की निगाह में अपराध होता। मैं बीस का भी नहीं और शोभा, सत्रह की हुई ही थी। पर तब यह सब अपराध नहीं था। मेरी तो बी.एससी. की परीक्षा हुई थी, एक प्रायोगिक परीक्षा शेष भी थी। समझता था, कि यह जल्दी सही नहीं, उसे टालने का अपनी बिसात भर प्रयत्न भी किया था, लेकिन तब कहाँ चल सकती थी, न चली। इतना संकोच था कि अपने सहपाठियों तक को बताया नहीं, बुलाया भी नहीं। केवल घनिष्ट मित्र ही साथ थे। बारात जैसे ट्रेन से वापस उतरी तो एक दम उस से अलग बुक स्टॉल पर जा खड़ा हुआ, पत्रिकाएँ देखने लगा। एक सहपाठी ने ट्रेन से उतरते देख पूछ भी लिया -कहाँ से आ रहे हो? मैं ने तपाक से उत्तर दिया था -बारात में गया था। उस ने घूंघट में दुल्हन को उतरते देखा तो फिर पूछा ये दुल्हन उसी बारात की दिखती है शायद। मैं ने उत्तर में हाँ कहा। सहपाठी जल्दी में था, सरक लिया और मुझे साँस में साँस आई। उस कॉलेज का अंतिम वर्ष था, उस से कई महिनों बाद मुलाकात हुई तो कहने लगा -शादी के मामले में भी हमें उल्लू बना दिया। 

दुल्हन का घूंघट मुझे कभी नहीं भाया। सप्ताह भर बाद ही जब हम बैलगाड़ी की सवारी करते हुए गाँव जा रहे थे, साथ में अम्मा भी थी, शोभा घूंघट लिए बैठी थी। मैं ने माँ से सवाल किया। जब मैं इस के साथ अकेला होता हूँ तो यह घूंघट में नहीं होती जब तुम्हारे साथ होती है तब भी नहीं। लेकिन जब हम दोनों सामने होते हैं तो घूंघट डाल लेती है और बोलती भी नहीं, क्यों? इस का कोई जवाब अम्मां के पास नहीं था। कम से कम अम्मां के सामने तो घूंघट से निजात मिली। परिवार में बाद में आने वाली बहुओं के लिए आसानी हो गई।

शादी के बाद शुरु हुआ प्रेम पनपने का सिलसिला। मैं कानून की पढ़ाई के लिए अक्सर शहर के बाहर रहता और शोभा वर्ष में कम से कम आधे समय अपने मायके में। मोबाइल तो मोबाइल टेलीफोन तक की सुविधा नहीं थी। बस डाक विभाग का सहारा था। हर सप्ताह कम से कम एक पत्र का आदान प्रदान अनिवार्य था। यूँ तीन-चार भी हुए कई सप्ताहों में। यूँ ही प्रेम गहराता गया और ऐसा रंग चढ़ा की कहा जा सकता है, चढ़े न दूजो रंग। कानून की पढ़ाई पूरी हुई। एक वर्ष बाद ही वकालत के लिए गृह नगर छो़ड़ कर तब के जिला मुख्यालय आ गया। वकालत में स्थापित होने के संघर्ष का दौर। आमदनी में खर्च चलाने की विवशता। फिर बच्चे हुए, घर में चहल पहल ह गई, रहने के मकान भी बना। बच्चे बड़े हुए तो अध्ययन के लिए बाहर चले गए। अध्ययन पूरा हुआ तो रोजगार ने उन्हें घर न टिकने दिया। एक उत्तर में तो दूसरे को दक्षिण जाना पड़ा। वे आते हैं तो बरसात की बदली की तरह। हमारे जीवन में कुछ नमी बढ़ा जाते हैं और चल देते हैं। साथ फिर हम दोनों ही रह जाते हैं। इस बीच कोई समय ऐसा नहीं था जब  बावजूद तमाम मतभेदों के हम दोनों मुसीबत और उल्लास के मौके पर साथ नहीं रहे हों। हमारे बीच मतभेद अब भी हैं, उन में से कुछ ऐसे भी हैं जो जीवन भर न सुलझाए जा सकेंगे, लेकिन साथ तब भी बना रहेगा। शायद यही सहअस्तित्व का सब से अनुपम उदाहरण है।  अब तो लगता ही नहीं हैं कि हम दो अलग-अलग अस्तित्व हैं। लगता है दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे हैं, दोनों मिल कर ही एक हैं।    

प सोच रहे होंगे कि आज ऐसा क्या है जो मैं अपनी उत्तमार्ध शोभा का उल्लेख इस तरह कर रहा हूँ? ... तो बता ही देता हूँ। आज उस का जन्मदिन है। उसे जन्म दिन की बधाई और असंख्य शुभकामनाएँ!!! हमारा साथ ऐसा ही बना रहे।