आखिर आँख खुल ही गई। तीन दिनों से बंद थी। रात को शोभा ने मुझ से पूछा था सुबह अदालत कैसे जाओगे? तो मैं ने कहा था -सुबह अवश्य खुल जाएगी।
मैं ने कहा -मुझे लक्षण नजर आ रहे हैं कि सुबह अवश्य खुल जाएगी।
सुबह आँख कुछ प्रयास के बाद खुल रही थी। लेकिन मैं उस पर लगाए जाने वाले पेशियों के बल को शून्य कर देता तो वह फिर से बन्द हो जा रही थी। घंटे भर बाद मैं ने देखा कि वह कुछ कुछ खुल रही थी। थोड़ा प्रयास करने पर पूरी भी खुल जा रही थी।
मैं स्नानादि कर के तैयार हो गया। इस बीच मुंशी आ गया था। उस ने सारी फाइलें बस्ते में जमा ली थीं। मेरे आने के बाद वह बस्ता ले कर अदालत चला गया। मैं अभी गाड़ी ड्राइव कर ने के मूड में नहीं था। कोई उसे साफ कर देता तो शायद में उसे ले चल पड़ता। लेकिन चार दिन हो गए थे, उस की धूल तक न झड़ी थी। स्नान किया हुआ मैं, वापस धूल के कण चिपकने से डर रहा था। आखिर एक मुवक्किल का फोन आ गया। मैं ने कहा वह मुझे घर से अदालत ले चले। उस ने घंटे भर में पहुँचने का वायदा किया। मैं अखबार देखने लगा।
किस्सा 30 नवम्बर को आरंभ हुआ था। मामाजी के देहान्त के कारण गाँव गया था। अंत्येष्टी के बाद वापस लौटा तो कपाल के बाएँ भाग के मध्य़ के कुछ पीछे एक नस फड़फड़ाने लगी थी। मैं ने सोचा दिन भर अन्त्येष्टी की गतिविधियों का असर है। मैं ने सामान्य दर्द निवारक ले ली। लेकिन उस का कोई असर न हुआ था। अगले दिन सुबह नस की फड़फड़ाहट बरकरार ही नहीं थी, अपितु तीव्र हो गयी थी। मुझे कुछ अजीब सा लगा। मैं सोचने लगा कहीं यह किसी धमनी में रक्त की रुकावट तो नहीं है। शाम तक तो मैं परेशान हो गया। मैं ने अपना रक्त चाप नापा तो वह भी सामान्य से अधिक था। मैं ने सोचा अवश्य ही यह धमनी में रक्त की रुकावट है। कभी जुकाम होने से श्लेष्मा के धमनी में प्रवेश कर जाने से ऐसा हो सकता है। मेरे इस अनुमान की ताईद अन्तर्जाल की सूचनाओं ने भी की। मैं ने अगले दिन सुबह अपने एक एमआर मित्र को दी तो उस ने बताया कि यह सब रक्तचाप बढ़ने के कारण है। मैं ने रक्तचाप सामान्य करने के लिए दवा ले ली। लेकिन नस की फड़कन दूर होने का नाम न ले रही थी। ऐसा लगने लगा था कि सिर पकने लगा है। आखिर एमआर मित्र ने दो बजे अदालत पहुँचने की सूचना दी। हम दोनों एक तंत्रिका विशेषज्ञ के पास पहुँचे। उस ने देख कर तुरंत दवा लिख दी। वह रक्तचाप के लिए भी दवा लिखने वाला था लेकिन उसे बताने पर कि मैं उस के लिए होमियोपैथिक दवा प्रयोग करता हूँ जो कारगर है। उस ने उसी का प्रयोग करने की हिदायत दी और पाँच दिनों की दवा लिख दी।
डाक्टर की दवा से दर्द में कोई बड़ा आराम न हुआ। फिर भी उसे एक दिन और झेला गया। यूँ पाँच दिसम्बर आ गया। पाँच दिसम्बर की रात को दर्द के कारण सो न सका। सारी रात छटपटाता रहा। आखिर छह दिसम्बर को सुबह देखा तो पता लगा कि सिर में छाले हो रहे हैं। मैं तुरंत समझ गया कि यह हर्पीज जोस्टर है। मैं इस बीमारी को पहले देख चुका था और जानता था कि इस का कोई इलाज नहीं है। बस इस को घातक होने से रोका जा सकता है। होमियोपैथी में इसे लाक्षणिक तरीके से ट्रीट किया जा सकता है। मैं ने तुरंत होमियोपैथिक चिकित्सा करना आरंभ कर दिया। एक तंत्रिका विशेषज्ञ की दवा चल रही थी इस लिए उसे पुनः दिखाना उचित समझा। अदालत से आधे से अधिक काम निपटा कर दो बजे डाक्टर के पास पहुँचा तो वह किसी काम से गया हुआ था। मैं वापस अदालत लौट आया। शेष काम निपटा कर साढ़े तीन बजे फिर से डाक्टर के पास पहुँचा तो वह मिल गया। मेरा माथा देखते ही उस के मुहँ से सहसा निकला 'हर्पीज जोस्टर'। उस ने पुरानी सारी दवाइयाँ कैंसल कर दीं। एक दवा तंत्रिका संरक्षण के लिए, एक दर्द निवारक और एक लोशन लिख दिया। मैं ने केमिस्ट के यहाँ से तीनों दवाएँ लीं और घर चला आया।
हर्पीज जोस्टर एक वायरल रोग है। यह उसी वायरस के वजूद के कारण होती है जिस के वजूद से यानी चिकन पोक्स या छोटी चेचक (जिसे खसरा या छोटी माता भी कहते हैं) नाम की बीमारी होती है। होता यह है कि छोटी चेचक का वायरस वेरीसेला जोस्टर शरीर की किसी तत्रिका (नर्व) में अक्रिय हो कर खुद को बचा लेता है। उम्र के ढलान पर 50 वर्ष की आयु के बाद या फिर कभी भी किसी रोग के कारण शरीर की रोग प्रतिरक्षा प्रणाली के कमजोर होने पर अचानक सक्रिय हो कर पुनरुत्पादन करने लगता है। बस यहीं से उस तंत्रिका में न्युरेल्जिक दर्द आरंभ हो जाता है जो धीरे-धीरे असह्य होने लगता है। वायरस बढ़ने लगते हैं और तंत्रिका को क्षति पहुँचाने लगते हैं। फिर रोग त्वचा पर फफोलों की शक्ल में दिखाई देने लगते हैं। इन फफोलों में बेहद जलन और पीड़ा होती है। तंत्रिका शरीर में जिस दिशा की ओर बढ़ती है उसी दिशा की ओर फफोले एक कतार में निकलने लगते हैं। इसी बीच शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र सक्रिय होने लगता है और इस स्थिति में आ जाता है कि वह इन वायरसों को समाप्त कर सके। लेकिन इस में कम से कम दस दिन का समय लग जाता है। आखिर लगभग तीन सप्ताह में फफोले सूख जाते हैं। बीमारी का अंत हो जाता है। लेकिन इस बीच वायरस तंत्रिका और त्वचा को बहुत क्षति पहुँचाते हैं। अनेक बार बीमारी के क्षेत्र में वर्ष भर तक और उस के बाद भी जलन होती रहती है। इस कारण से तंत्रिका तंत्र को दुरुस्त करने के लिए वर्ष भर तक दवा लेनी पड़ सकती है। यह रोग सिर से लेकर आँख की पलक और नाक तक चेहरे के आधे भाग में, हाथ में, पैर में, पीठ पर शरीर के किसी भी अंग में यहाँ तक कि यौनांग में भी हो सकता है।
मुझे जो फफोले हुए थे धीरे धीरे आँख की भौंह तक पहुँच गए। दर्द निवारक के कारण दर्द से निजात मिली। होमियोपैथिक दवाओं ने लक्षण भेद से मुझे राहत प्रदान की और उस तंत्रिका संरक्षण वाली दवा ने तंत्रिका की क्षति को कम किया। 8 दिसंबर की शाम मुझे विश्वास था कि अब यहाँ आ कर रोग रुक जाएगा। लेकिन शुक्रवार की सुबह जब नीन्द खुली तो पाया कि बायीं आँख की पलक खुल नहीं रही है। कोशिश करने पर वह कुछ उठती पर फिर से गिर पड़ती। भौंह के नीचे नाक की जड़ के पास आलपिन के माथे जितना एक छोटा सा फफोला निकल आया था, यह उसी की कारस्तानी थी। साढ़े नौ बजे मुंशी आया तो उसी ने मना कर दिया कि मैं अदालत न जाऊँ, वह काम देख लेगा। इस स्थिति में मेरा जाना संभव भी नहीं था। मैं ने दिन भर विश्राम किया। अगले दो दिन अवकाश के थे, इन दिनों भी यही स्थिति बनी रही।
आखिर मुवक्किल आ गया। उस के साथ मैं अदालत पहुँचा। आज अदालत में अवकाश की स्थिति थी। अधिवक्ता संघ के चुनाव के पूर्व सिम्पोजियम था। एक मुकदमे में आदेश होने वाला था। उस के मुताबिक मुकदमे की आगे की कार्यवाही तय होनी थी। दो बजे तक आदेश न हुआ था। मध्यान्ह अवकाश के बाद जज के पीए ने हमें आदेश बताया जो हमारे मुताबिक था। मुवक्किल का तनाव दूर हुआ। वह आगे की कार्यवाही की तैयारी करने लगा। उसी के साथ मैं चिकित्सक के पास पहुँचा। उस ने मुझे देख संतोष व्यक्त किया। तंत्रिका संरक्षक और पन्द्रह दिन लेते रहने को कहा। दर्द निवारक दिन में तीन से दो कर दी गईं। मेरे मस्तिष्क में एक प्रश्न कुलबुला रहा था कि उस ने मुझे कोई वायरसरोधी दवा क्यों न लिखी थी जब कि अंतर्जाल पर उस का हर स्थान पर उल्लेख था। मैं ने वह प्रश्न चिकित्सक से पूछ ही लिया। उस ने बताया कि आठ सौ मिली ग्राम की कम से काम पाँच खुराक देनी पड़तीं जिन का पार्श्व प्रभाव कुछ भी हो सकता था और उस का अनुभव था कि इस वायरसरोधी दवा का बीमारी पर कोई प्रभाव पड़ता नहीं था। चिकित्सक ने बीमारी को केवल तंत्रिका संरक्षक के सहारे ठीक किया था। परिणाम से न केवल चिकित्सक, उस का रोगी और रोगी के परिजन तक संतुष्ट थे। चिकित्सक के खुल जाने पर मैं ने यह भी बताया कि। मैं ने उसी चिकित्सक के पास आने का निर्णय इस आधार पर किया था कि वह बारह वर्ष तक ग्रामीण क्षेत्र में काम कर चुका था। वहाँ प्रयोगशाला की सुविधा नहीं होती इस कारण से उस की रोग को परखने की अपनी क्षमता विकसित हो चुकी थी और वह प्रयोगशाला की जाँचों पर कम से कम निर्भर था। चिकित्सक ने मुझे बताया कि ग्रामीण क्षेत्र के बारह वर्ष के अनुभव के पूर्व वह पाँच वर्ष विदेश में भी चिकित्सा सेवाएँ दे चुका था।
शाम को मैं घर लौटा तब तक मेरी आँख की पलक पूरी उठ चुकी थी और बिना ऐच्छिक बल के आँख को पूरा खुला रखने में सक्षम थी। मैं भी प्रसन्न था कि मैं अब अपना काम कुछ तो कर सकूंगा। हालांकि जब तक बीमारी पूरी तरह ठीक नहीं हो जाती शायद पूरी क्षमता से न कर सकूँ और उसे हासिल करने में अभी दो सप्ताह और लगें।

22 comments:
हर्पीज जोस्टर -बड़ी अजीब बीमारी है -ध्यान रखिये अपना -शीघ्र पूर्ण स्वस्थ होने की शुभकमनाएं!
आपके चिकित्सक निश्चित रूप से सराहनीय हैं..
*चिकन पाक्स को चेचक नहीं बल्कि खसरा या छोटी माता कहा जाता है -चेचक स्माल पाक्स है !
उच्च रक्त दाब इतनी जटिलतायें ले आता है। आप शीघ्र स्वस्थ हों।
धन्यवाद अरविंद जी,
गलती की और ध्यान दिलाने के लिए। गलती दुरुस्त कर दी गई है।
भगवान का शुक्र है अब आप इस खराब बीमारी से बाहर निकल चुके हैं ! मुझे लगता है आपकी इच्छा शक्ति और विषय की समझ की निस्संदेह बड़ी भूमिका रही है ...
सुलभ मेडिकल चिकित्सा सिस्टम के कारण, शरीर की रोग प्रतिरोधक रक्षा प्रणाली को काम ही नहीं करने दिया जाता नतीजा बेवजह का खर्चा , तनाव और साइड एफक्ट्स ....
आपके इस लेख नें, शारीरिक रक्षा तंत्र की याद दिला दी आपने जिसे हम लोग भूले रहते हैं आशा है इस विषय पर, शीघ्र ही एक सुगम लेख आपसे पढने को मिलेगा !
शुभकामनायें आपको !
प्रवीण जी,
उच्च रक्तचाप को मौन हत्यारा कहा जाता है। वैसे मेरा अनुभव यह कह रहा है कि रक्तचाप वायरस संक्रमण के कारण बढ़ा। क्यों कि वायरस संक्रमण के पूर्व के दिनों में वह सामान्य था। हालांकि इस संबंध में मैं ने अभी चिकित्सक से इस संबंध में बात नहीं की है।
द्विवेदी सर,
पढ़ कर पहले तो हिल गया, लेकिन स्वास्थ्य में सुधार की बात सुनकर जान में जान आई...आपका हर वक्त दिमाग का काम है...उसे राहत देने के लिए बीच-बीच में वक्त ज़रूर निकाला करिए...
जय हिंद...
इस भयानक रोग का शिकार मैं भी हो चुका हूँ। हर्पीज़ वायरस ने मेरी कमर के पास बाएँ हिस्से में हमला किया था। असहनीय दर्द देने वाला यह रोग पकड़ में तब आता है जब त्वचा पर फफोले दिखायी पड़ने लगते हैं। इससे पहले तो दर्द निवारक खाने और हड्डी के डॉक्टर से दिखाने में समय नष्ट हो जाता है।
मुझे जब यह पीड़ा हुई उस समय मैं विधान सभा चुनाव (२००७) की ड्यूटी पर था और चिकित्सक की सहायता लेने में बहुत देर हो गयी थी। आज भी कमर के उस हिस्से में post-herpetic neuralgia की समस्या सिर उठाती रहती है। हमारे यहाँ इस रोग को “अधेड़ी” कहा जाता है। आपकी पोस्ट से पता लगा कि प्रायः अधेड़ उम्र में होने के कारण ही इसका यह नाम पड़ा होगा। वैसे मैं तो भरी जवानी में ही इसका शिकार हो गया था। :)
हर्पीज से बच गये। बहुत बधाई।
अपना ध्यान रखियेगा!
आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति आज के तेताला का आकर्षण बनी है
तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
अवगत कराइयेगा ।
http://tetalaa.blogspot.com/
क्या क्या नई बीमारियाँ आ गयी हैं। आशा है कि शीघ्र स्वस्थ होगें।
khuda kaa shukr hai bhaai thik to ho gye ....... akhtar khan akela kota rajasthn
यह तो बुरी खबर थी। लकिन सुधार है, यह बढिया। अचानक यह होना ठीक तो नहीं हुआ।
शीघ्र स्वस्थ हो...यही मनोकामना है...चिन्ता में डाल दिया आपने तो. फोन लगाता हूँ..
आप जल्द से जल्द पूर्ण स्वस्थ हो जायें यही प्रार्थना है। बहुत से लोग 24 दिसम्बर को आप से मिलने की बाट जोह रहे हैं।
प्रणाम
जल्द से जल्द स्वस्थ हों, यही कामना है.
आपके स्वास्थ्य में सुधार हेतु शुभकामनाऐं
गुरुवर जी, एक दुखद समाचार मिला. आप जल्द से जल्द स्वस्थ हो.
अब आराम हुआ या नहीं?..शीघ्र स्वस्थ हों..
उम्मीद है, अब तक तो ऑंख भी पूरी खुल गई होगी और आप पूर्ण स्वस्थ हो चुके होंगे।
han, seedhe-deedhe iski dava nahi hai. ise ek tarh se jhelna hi padta hai. dikkat yh hai ki bahut baar fafole theek hone ke baad bhi nerve lambe samy tak pain karti rahti hai. pichhle baras PitaJi isse buri tarh pareshan rahe. Take care
Post a Comment