Saturday, November 5, 2011

अमंरीकी इंडियन कबीले : बेहतर जीवन की ओर-11

म ने देखा की गोत्र अमरीकी इंडियन जनों में समाज की इकाई के रूप में था। उन से मिल कर बिरादरी बनती थी और अनेक बिरादरियाँ मिल कर एक कबीले का निर्माण करती थी। कई छोटे कबीले सीधे गोत्रों से भी मिल कर बनते थे जिन में बिरादरी जैसी बीच की कड़ी नहीं होती थी। हर कबीले का अपना अलग नाम और इलाका होता था। कबीले की बस्ती के स्थान के अलावा आसपास बहुत विस्तृत क्षेत्र शिकार और मछली पकड़ने के लिए होता था। इस के बाद बहुत विस्तृत तटस्थ भूमि होती थी जो दूसरे कबीले तक चली जाती थी। यदि दो कबीलों की भाषाएँ मिलती जुलती होती थीं तो तटस्थ भूमि  का विस्तार कम होता था। यदि दो कबीलों के बीच भाषाओं के बीच कोई संम्बन्ध नहीं होता तो यह तटस्थ भूमि अधिक विस्तृत होती थी। अस्पष्ट सीमाओं से घिरा यह इलाका कबीले का सामुहिक क्षेत्र होता था जिसे पड़ौसी कबीले भी मानते थे। यदि कोई अन्य इस सीमा में घुसता तो कबीला अपने इलाके की रक्षा करता था। सीमाओं की अस्पष्टता से कठिनाई तभी उत्पन्न होती थी जब आबादी अधिक हो जाती थी। 
र कबीले की अपनी खास बोली होती थी। सच तो यह है कि कबीला और बोली दोनों सारतः समवर्ती शब्द हैं। अमरीका में उपविभाजन से नए कबीले और नई बोलियाँ अभी दो शताब्दी पहले तक बनती रहीं। कबीलों को गोत्रों द्वारा चुने गए साखेमों और युद्धकाल के नेताओं का अभिषेक करने का अधिकार होता था। यहाँ तक वे गोत्रों की इच्छा के विरुद्ध उन्हें अपदस्थ भी कर सकता था क्यों की वे कबीले की परिषद के सदस्य होते थे। जहाँ कुछ कबीले महासंघ बना लेते थे यह अधिकार कबीलों के प्रतिनिधियों की संघीय परिषद को सौंप दिया जाता था।  हर कबीले की समान धारणाएँ (पौराणिक गाथाएँ) होती थीं। उन्हों ने अपनी धारणाओं को तरह तरह के देवी-देवताओं और भूत-प्रेतों का रुप दिया हुआ था लेकिन उन्हें कोई आकार देकर मूर्तियाँ नहीं बनाई थीं। यह प्रकृति तथा महाभूतों की पूजा थी जो धीरे-धीरे बहुदेववाद का रूप धारण कर रही थी। उन के नियमित त्यौहार थे जिनमें खासकर नृत्यों और खेलों के माध्यम से पूजा की जाती थी। 
र कबीले की एक कबायली परिषद होती थी। जो कबीलों के आम निर्णय करती थी। इस में सभी गोत्रों के साखेम और युद्धकाल के नेता सम्मिलित होते थे। परिषद की बैठक खुले रूप में होती थी। बीच में परिषद बैठती और आस-पास कबीले के बाकी सदस्य बैठा करते थे। सभी को बहस में हिस्सा लेने और अपनी राय प्रकट करने का अधिकार होता था। फैसला परिषद करती थी। इरोक्वा लोगों में परिषद को अपना फैसला एक मत  से करना होता था।  दूसरे कबीलों के साथ संबंध रखने का काम कबायली परिषद करती थी। वह दूसरे कबीलों के दूतों का स्वागत करती थी और उन के पास अपने दूत भेजती थी। वह युद्ध की घोषणा और शांति-संधि करती थी। युद्ध छिड़ जाने पर लड़ने के लिए आम तौर पर वे ही भेजे जाते थे जो स्वेच्छा से तैयार होते थे।  एक कबीलों की उन कबीलों से युद्ध की स्थिति होती थी जिन से कोई शांति संधि नहीं होती थी। ऐसे शत्रुओं के खिलाफ कुछ विशिष्ठ योद्धा सैनिक अभियान संगठित करते थे।  युद्ध नृत्य आयोजित होता था, जो कोई नृत्य में शामिल हो जाता था समझा जाता था कि वह युद्ध में जाने को तैयार है। तुरंत टुकड़ी तैयार कर अभिायान के लिए भेजी जाती थी। कबायली इलाके पर कोई हमला होता था तो स्वयं सेवक ही उस की रक्षा करते थे। ऐसे दस्तों के कूच करने और लौटने पर उत्सव आयोजित किए जाते थे। ऐसे अभियानों के लिए परिषद की इजाजत लेना जरूरी नहीं था और परिषद उस की इजाजत देती भी नहीं थी। 
कुछ कबीलों में एक प्रधान मुखिया भी होता था। लेकिन उसे बहुत कम अधिकार प्राप्त थे। वह साखेमों में से एक होता था। जब कोई तुरंत निर्णय करने वाली समस्या उठ खड़ी होती थी तो प्रधान मुखिया फैसला कर देता था जो कबायली परिषद द्वारा अंतिम फैसला करने तक लागू रहता था। अमरीकी इंडियन कभी कबायली व्यवस्था से आगे नहीं बढ़ सके। थोड़े थोड़े लोगों के अनेक कबीले जिन के बीच बड़े बड़े सीमान्त प्रदेश होते थे एक दूसरे से कटे हुए रहते थे। उन में सदा लड़ाइयाँ चलती रहती थीं। जिस का परिणाम यह था कि थोड़े से लोग बहुत विशाल इलाके में फैले हुए थे। कहीं कोई अस्थाई संकट आ जाता था तो रक्त-संबंधी कबीलों में सहयोग हो जाता था पर संकट दूर होते ही यह मोर्चा फिर से बिखर जाता था। कुछ खास इलाकों में कबीलों ने स्थाई संघ बना कर अपनी एकता कायम कर ली। (क्रमशः)
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