Thursday, October 6, 2011

मातृवंश से पितृसत्ता की ओर : बेहतर जीवन की तलाश-4


नुष्य जीवन का आरंभ समूह में ही हुआ था। उस के बिना उस का जीवन संभव नहीं था। लेकिन एक प्रश्न हमारे सामने आता है कि पशु अवस्था से मानव अवस्था में संक्रमण के समय इस समूह का संस्थागत रूप क्या रहा होगा? इस के लिए गोरिल्ला और चिम्पाजी जैसे वानरों के जीवन की ओर संकेत किया जाता है। लेकिन जैसी परिस्थितियों में ये वानर रहते हैं उन परिस्थितियों से तो मनुष्य रूप में संक्रमण संभव नहीं हो सकता था। ये वानर तो विकास के मुख्य क्रम से अलग हो कर लुप्त हो जाने की पतनोन्मुख अवस्था में हैं। इस कारण आदिम मानवों तथा इन वानरों में समानता तलाशना उचित नहीं है। केवल बड़े सामुहिक यूथों में रहते हुए ही मानवावस्था में संक्रमण संभव था। इन यूथों की सब से बड़ी शर्त यही थी कि वयस्क नरों के बीच पारस्परिक सहनशीलता हो और वे ईर्ष्या की भावना से मुक्त हों। मानव परिवार का जो सब से पुराना आदिम रूप, जिसके इतिहास में अकाट्य प्रमाण मिलते हैं वह यूथ-विवाह का रूप है। जिस में दस के सभी पुरुषों का पूरे दल की सभी स्त्रियों के साथ संबन्ध होता है, और जिस में ईर्ष्या की भावना लगभग नहीं होती।

मानव परिवार का यह रूप जांगल युग की उच्चतर अवस्था और बर्बर युग की आरंभिक अवस्था तक अनेक रूपों में विकसित होता रहा जिस में हमें, रक्तसंबंध परिवार, युग्म परिवार, सहभागी परिवार आदि रूप देखने को मिलते हैं। इन तमाम विभिन्न रूपों के होते हुए भी सामुदायिक कुटुम्ब बना रहा जिस में नारी का प्राधान्य था। सगे पिता का पता न हो सकने के कारण सगी माता की एकान्तिक मान्यता थी। जिस का अर्थ था स्त्रियों अर्थात माताओं का प्रबल सम्मान। इन सामुदायिक कुटुम्बों में अधिकतर स्त्रियाँ, यहाँ तक कि सभी स्त्रियाँ एक ही गोत्र की होती थीं और पुरुष दूसरे गोत्रों से आते थे। इस तरह के कुटुम्बों को मातृसत्तात्मक कहा और समझा जा सकता है, लेकिन तब तक वहाँ सत्ता जैसी चीज उत्पन्न ही नहीं हो सकी थी, सत्ता के लिए संपत्ति का होना जरूरी था। उस समय तक कुटुम्बों के पास जो वस्तुएँ थीं भी जिन्हें सम्पत्ति समझा जा सकता था, वे भी सत्ता की उत्पत्ति के लिए अपर्याप्त थीं। इस रूप में हम कह सकते हैं कि कुटुम्बों में स्त्री-प्राधान्य था लेकिन उस में मातृसत्ता जैसी कोई अवस्था नहीं थी। समाज का हर सदस्य यथाशक्ति समूह के लिए काम करता था और आवश्यकतानुसार अपना भाग प्राप्त करता था।

शुपालन और पशुप्रजनन ने संपदा का एक नया स्रोत उत्पन्न किया था जिस की उस से पहले के मानव ने कल्पना भी नहीं की थी। बर्बर युग की निम्न अवस्था तक मकान, वस्त्र, कुघड़ आभूषण, आहार उपलब्ध करने के लिए जरूरी औजार, नाव, हथियार और बहुत मामूली बर्तन-भांडे मात्र ही स्थायी संपत्ति थे। आहार नित्य ही प्राप्त करना पड़ता था। लेकिन पशुपालन ने घोड़े, ऊँट, गाय-बैल, भेड़-बकरियाँ और सुअरों के रेवड़ आदि नयी संपदा के रूप में मनुष्य को प्रदान किए थे। भारत में पंजाब और गंगा के क्षेत्रों में आर्यों तथा फरात और दजला के क्षेत्र में सामी लोगों की यह संपदा नदियों के पानी और हरे-भरे मैदानों के कारण दिन दूनी और रात चौगुनी दर से बढ़ रही थी। लोगों को दूध और मांस के रूप में अधिक स्वास्थ्यकर भोजन मिलने लगा था। आहार के पुराने तरीके पीछे छूट रहे थे। भोजन का प्राचीन तरीका शिकार अब शौक बन कर रह गया था। प्रश्न उठता है कि पशुओं के रूप में प्राप्त इस नयी संपदा पर किस का अधिकार था? निस्संदेह यह अधिकार संपूर्ण समूह (गोत्र) का था। लेकिन प्रामाणिक इतिहास के प्रारंभ में ही हम यह पाते हैं कि पशुओं के रेवड़ से लेकर मानव पशु (दास) तक मुखियाओं की अलग संपदा होते थे। कारण कि अब दास उत्पन्न हो चुके थे।

शुपालन के साथ ही धातुओं का प्रयोग होने लगा था और अंत में खेती होने लगी तब स्थिति परिवर्तित हो गयी। गोत्र आरंभ में मातृवंश थे और गोत्र में किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाने पर संपत्ति का गोत्र में रहना आवश्यक था। आरंभिक संपत्तियाँ साधारण थीं और वे किसी निकट के संबन्धियों को प्राप्त होती थीं। लेकिन मृत पुरुष के बच्चे उस के स्वयं के गोत्र के न हो कर उस की पत्नी के गोत्र के होते थे। पिता की संपत्ति उस के अपने बच्चों को नहीं मिल सकती थी। वह भाइयों, बहनों और बहनों के बच्चों या मौसियों के वंशजों को मिल जाती थी। लेकिन पुरुष के अपने बच्चे उस के उत्तराधिकार से वंचित थे। लेकिन जैसे जैसे संपत्ति बढ़ती गई नारी के स्थान पर पुरुष का महत्व बढ़ता गया। पुरुष के मन में यह इच्छा जोर पकड़ने लगी कि अपनी मजबूत स्थिति का लाभ उठा कर पुरानी प्रथा को उलट दिया जाए। जिससे उस के अपने बच्चे उस की संपत्ति प्राप्त कर सकें। ऐसा किया भी गया। लेकिन इस में अधिक कठिनाई भी नहीं थी क्यों कि जैसा चला आ रहा था उस में बहुत बड़े परिवर्तन की जरूरत नहीं थी। केवल इतना फैसला भर पर्याप्त था कि पुरुष सदस्यों के वंशज गोत्र में रहेंगे और स्त्रियों के वंशज गोत्र से अलग किए जाएंगे वे उन के पिताओं के गोत्र में सम्मिलित किए जाएंगे। इस तरह चुपचाप एक क्रांति संपन्न हुई और मातृ वंशानुक्रम तथा दायाधिकार की प्रथा उलट गयी। हम इस क्रांति के बारे में कुछ भी नहीं जानते लेकिन वास्तव में यह हुई थी। क्यों कि मातृवंशानुक्रम के अनेक अवशेष मिले हैं। उत्तर भारत के परिवारों में नवरात्र की अष्टमी के दिन कुल देवी की पूजा आवश्यक मानी जाती है। यदि परिवार आरंभ से पितृवंशानुक्रम में होते तो यह कुल देवी कहाँ से उत्पन्न हुई थी और उस के साथ कोई कुल देवता क्यों नहीं है? केरल प्रान्त में अभी भी मातृवंशीय परिवार मौजूद हैं।

ह क्रांति मनुष्य को उत्पादन का नया साधन पशुपालन मिल जाने और संपत्ति के पैदा होने का सीधा परिणाम थी। इस ने परिवार में संबन्धों को तथा मनुष्य समाज के संस्थागत रूप को बदल दिया था। मातृवंशानुक्रम का विनाश हो चुका था। अब घर के अंदर भी पुरुष ने अपना कब्जा जमा लिया था। स्त्री पदच्युत कर दी गई थी, उसे जकड़ दिया गया था। वह पुरुष की वासना की दासी, संतान उत्पन्न करने वाला यंत्र मात्र रह गयी थी। जो नया कुटुंब इस तरह स्थापित हुआ था वह बहुत कुछ भारतीय संयुक्त हिन्दू परिवार की तरह था जिस में एक पुरुष के कई पीढ़ियों के वंशज और उन की पत्नियाँ सम्मिलित होती थीं। सब साथ साथ रहते, खेतों को जोतते, समान भंडार से भोजन व वस्त्र प्राप्त करते और प्रयोग के बाद जो वस्तुएँ बच रहती वे परिवार की सामुहिक संपत्ति हो जाती थीं। प्रबंध सब एक मुखिया के हाथ में रहता। लगभग सभी अंतिम निर्णय वही करता था। हालांकि सभी की सलाह अवश्य प्राप्त की जाती थी।
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