Wednesday, August 31, 2011

राज में बहुत पोल है तो तुम भी किसी पोल में घुस जाओ

ल आंदोलन के बाद के पहले दिन का उल्लेख आधा ही कर पाया। राजस्थान में अदालतों में दोपहर का भोजनावकाश 1.30 से 2.00 बजे तक का होता है। लेकिन हाथ में काम को तुरंत तो छोड़ा नहीं जा सकता। इस लिए कभी कभी अदालत से मुक्त होने में 1.45 तक का समय हो जाता है। जब अदालत देर से उठती है तो फिर 2.00 बजे फिर से बैठ नहीं पाती। अक्सर जज को अदालत में आने में ढाई बज जाते हैं। हम लोग भी दोपहर की चाय पर पोने दो बैठते हैं तो फिर उठने तक सवा दो हो जाते  हैं और अदालत तक पहुँचने में हमें भी ढाई बज जाते हैं। अदालत में काम ढाई बजे ही आरंभ हो पाता है। कल भी यही हुआ मुझे एक अदालत से निकलते निकलते 1.40 बज गए। परिसर के मुख्य द्वार पर एक नेताजी उर्फ सेवानिवृत्त सरकार समर्थक कर्मचारी यूनियन के नेता मिल गए। सारे जीवन कर्मचारियों से पैसा खर्च कराते और उन के छोटे मोटे काम कराते रहे।
मुझे देखते ही नेताजी ने जोरदार नमस्ते किया। मैं ने भी उन्हें जवाब दिया। वे किसी के साथ भ्रष्टाचार की समस्या पर बात कर रहे थे। बिलकुल सरकारी पार्टी के सांसदों जैसी भाषा बोल रहे थे। कह रहे थे "साहब भ्रष्टाचार मिट सकता है क्या?  दो चार दिन गुब्बारा फूला रहेगा, फिर इस की हवा निकल जाएगी। गुब्बारे में फिर से हवा भरी जाएगी तो फिर निकल जाएगी। कब तक हवा भरते रहेंगे? एक दिन गुब्बारा बेकार हो जाएगा।" मैं ने उन्हें तसल्ली से सुना। फिर उन्हें एक किस्सा सुनाने लगा, जिसे मैं ने पैंतीस बरस पहले पढ़ा था। बताया जाता है कि यह सच्चा किस्सा है। होगा तो ग्वालियर से संबंधित कोई न कोई ब्लागर इस की ताईद भी कर देंगे। अब आप को भी वह किस्सा संक्षेप में बता ही देता हूँ।

हुआ यूँ कि ग्वालियर राज्य का एक ब्राह्मण युवक  राज दरबार में अच्छा पद प्राप्त करने की इच्छा लिए काशी से विद्या अध्ययन कर लौटा। राजा के दरबार में पहुँचना आसान न था। वहाँ हर किसी की पहुँच न थी। युवक ने किसी तरह जुगाड़ किया और राजा के सामने उपस्थित हो गया। राजा को उसने अपना परिचय दिया और कहा कि आप तो विद्वानों की पहचान रखते हैं इस लिए वह उपस्थित हुआ है कि उसे उस की योग्यता के अनुरूप दरबार में कोई काम मिल जाएगा। लेकिन राजा ने उस से पूछा कि वह दरबार तक कैसे पहुँचा? यहाँ तो हर कोई पहुँच नहीं सकता। युवक ने उसे बताया कि आप के राज में बड़ी पोल (छिद्र) है। राजा ने उसे कहा कि वह भी किसी पोल में घुस ले। युवक ने राजा को कहा कि आप के राज में वह आप की आज्ञा के बिना किसी पोल में कैसे घुस सकता है? उसे राजाज्ञा दे दी जाए। राजा ने आदेश लिखवाया "युवक कहता है कि ग्वालियर के राज में बड़ी पोल है, इस लिए उसे आज्ञा दी जाती है कि वह किसी पोल में घुस जाए।" राजाज्ञा पर राजा की मुहर अंकित कर दी गई, युवक उसे ले कर दरबार से चला आया। 

युवक ने ग्वालियर पहुँचने वाले मार्गों में से एक पर नगर के बाहर उस ने एक पेड़ पर रस्सी बांधी और सड़क के दूसरी ओर रस्सी का दूसरा सिरा पकड़ कर बैठ गया। कोई भी वाहन आता तो वह रोक लेता और राजाज्ञा होने की बात कह कर उस से महसूल वसूल करता। कुछ दिनों में उस के पास पैसा इकट्ठा हो गया। उस ने कुछ कर्मचारी रख लिए। उन से काम कराने लगा, खुद निगरानी रखता। कोई छह माह बाद उस ने कर्मचारियों से कहा कि अब राजा ग्वालियर से बाहर जाएँ और जब वापस आएँ तो उनका वाहन रोक दिया जाए। कर्मचारियों ने एक दिन राजा का वाहन रोक दिया। राजा को आश्चर्य हुआ कि उस का वाहन कौन रोक सकता है। उसने अपने अंगरक्षकों से पूछताछ करने को कहा। अंगरक्षकों ने पूछताछ करने पर बताया कि एक पंडित है जो कहता है कि यहाँ राजाज्ञा से हर वाहन पर महसूल लगता है राजा को भी देना होगा। राजा ने महसूल दे कर वाहन को नगर प्रवेश कराने का आदेश दिया और कहा कि पंडित को दरबार में हाजिर किया जाए।

गले दिन पंडित दरबार में हाजिर हुआ तो उस से पूछा गया कि वह महसूल किस हक से वसूल करता है। तो उस ने कहा कि वह राजाज्ञा से करता है। राजा ने राजाज्ञा बताने को कहा तो पंडित ने वही आदेश सामने कर दिया जिस में किसी भी पोल में घुसने का आदेश दिया गया था। राजा ने स्वीकार किया कि उस के राज में पोल है। राजा ने राजस्व विभाग में एक नगर प्रवेश राजस्व का विभाग स्थापित कर दिया और पंडित को उस का मुखिया नियुक्त किया। अब ग्वालियर प्रवेश के सभी मार्गों पर चुंगी नाके स्थापित कर दिए गए और नगर प्रवेश शुल्क वसूल किया जाने लगा। 

मैं ने उक्त किस्सा नेताजी को सुना कर कहा कि भ्रष्टाचार भी इसी तरह की पोल में घुस जाने की राजाज्ञाओं से चलता है। यदि उसे मिटाना है तो राजा पर चोट करनी होगी। नेता जी ने तुरंत हाँ भर दी। कहने लगे -वही तो मैं कह रहा हूँ कि भ्रष्टाचार ऐसे नहीं मिटेगा, उस के लिए तो पूरी व्यवस्था ही बदलनी होगी। मैं ने घड़ी देखी तो दो बजने को थे। यदि मैं दो बजने तक चाय पर नहीं पहुँचा तो साथी मुझ पर दंड कर सकते थे। मैं ने नेताजी को अलविदा कहा और तेजी से केंटीन की ओर कदम बढ़ा दिए।
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