Wednesday, June 15, 2011

'हाँ' या 'ना' ... ? ... ? ... ?

जनता! 
ओ, जनता!!
तुम तो जानती ही हो, ये जनतंत्र है। हम हर पाँच बरस में तुम्हारे पास आते हैं। तुम्हारे लिए पलक पाँवड़े बिछाते हैं। घर-घर जाते हैं, हाथ जोड़ते हैं, पाँव पड़ते हैं। किसी को दो रुपए किलो चावल दिलाते हैं। किसी को बिजली मुफ्त में। फिर भी कसर रह जाती है तो दारू की थैलियाँ बँटवाते हैं। कहीं कहीं तो नोट तक बाँट देते हैं। फिर वोट पड़ता है तो चुनाव आयोग की सारी पाबन्दियों के बाद भी तुम्हारे घर मोटर कार, जीप वगैरा भेज कर वोट के लिए ढो कर लाते हैं। घर से तुम्हें उठाने से ले कर वापस पहुँचाने तक का नाश्ते पानी का सारा जिम्मा उठाते हैं। भला ऐसा किसी और तंत्र में हो सकता था? इसी को जनतंत्र कहते हैं। इस से बड़ा और भला कोई जनतंत्र हो सकता है?
तुम तो अच्छी तरह जानती ही हो कि हम तुम्हारी चिरौरी करने के लिए क्या क्या नहीं करते? कुछ गलत लोग हैं जो तुम्हें बरगलाते हैं। वे किसी भी तरह तुम्हें चैन से नहीं जीने देना चाहते। हम जानते हैं कि तुम हमें ही चाहती हो। इस लिए वे तुम्हें वोट भी नहीं देने देना चाहते। इसी लिए जहाँ जहाँ वे ऐसा करने की नीयत रखते हैं, वहाँ वहाँ हम वोट की पेटी ले कर भाग निकलते थे और जहाँ जहाँ तुम ठप्पा मारना चाहती थी वहाँ तुम्हारी तरफ से हम ही ठप्पा मार कर पेटी वापस कर देते थे। कई जगह तो हम उन्हें वोट के तबेले तक पहुँचने ही नहीं देते। वे पहुँच जाते तो तुम्हें परेशान करते। हम ने तुम्हारी परेशानी दूर करने के लिए  क्या क्या इंतजाम नहीं किए? अब तुम्हें क्या बताना? तुम तो खुद ही सब जानती हो। 

ब देखो ना! ये लोग कितने बेहया हैं? तुमने हमें जिताया, जीतने वाले कम पड़े तो हमने कुछ और लोगों को पटाया। पर राज बनाया। हमने तुमसे वादा किया था कि पूरे पाँच साल टिकेंगे। तुमने रोशनी मांगी थी हम ने परमाणु समझौता कर के एटमी बिजली के कारखाने बनाने के लिए अपनी और देश की नाक कटवा कर भी समझौता किया। आखिर क्यों न करते? हमने रोशनी का वायदा जो किया था। वो बाईँ बाजू वाले बहुत पीछे पड़े। उन्हों ने तमाम घोड़े खोल लिए, दाएँ बाजू वालों से मिल गए, हमारे खिलाफ वोट दिया। लेकिन क्या हुआ? हम ने फिर भी अपने लिए वोट कबाड़ ही लिए। हमें कुछ भी करना पड़ा। पर तुम से किया वायदा निभाया। इस से बढ़िया और कौन हो सकता है? जो हर हाल में वायदा निभाए। 

ये कुछ नए लोग उग आए हैं। हमने बड़ी मुश्किल से तो एक महात्मा से निजात पायी थी। ये एक सफेद कुर्ता-धोती पहने एक और न जाने कहाँ से पैदा हो गया? तुम्हें बरगलाने को। बाप-बेटा वकील उन के साथ लग गए। एक पुलिस अधिकारिणी और कुछ और लोग साथ लग लिए। अब ये आठ दस लोग कर क्या सकते हैं। भूख हड़ताल कर के तुम्हें बरगलाना चाहते हैं। पहली बार तुम समझ नहीं पायी थी इन की हरकतें। वो इंटरनेट और मीडिया के चकमे में आ कर उन्हें महात्मा की टोली समझ कर उन के साथ लग गई थी।  हमें मजबूरी में मानना पड़ा कि जैसा वे कहते हैं वैसा कानून बनवा देंगे। देखो हमने वायदा निभाया, उन के साथ बैठकें करीं कि ना करीं। नहीं तो ऐसा कोई करता है। कोई तु्म्हारा चुना हुआ, कभी तु्म्हारे अलावा किसी के सामने घुटने टेकता है? हमने भी नहीं टेके। हम टिका देते तो अपमान होता, वह भी तुम्हारा। हम उसे कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं। तुम चक्कर में मत आना इन के। ये तुम्हें कहीं का नहीं रखेंगे। हम ने भी कह दिया है कि हम तुम्हारे द्वारा चुनी हुई संसद और उस के द्वारा चुने हुए परधान मंत्री को और अदालतों के हाकमों को इस से अलग रखेंगे। अब हमने कह दिया तो कह दिया। अब झुकेंगे तो तुम्हारा अपमान हो जाएगा। तुमने हमें चुन कर जो भेजा है। हम ये कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं?

क वो, केसरिया लंगोटी-अंगोछा पहने कसरतें सिखाता सिखाता तुम्हें सिखाने निकल गया। जैसे पहले के जमाने में जवानी बरकरार रखने की दवाएँ सड़क किनारे मजमा लगा कर बेचा करते थे। ऐसे मजमा लगाया। कुछ लोग उस के दवा ऐजेंट क्या बन गए कि सोचने लगा देश की हालत बदल देगा। आखिर हमारे होते वह ऐसा कैसे कर लेता। हमने क्या निपटाया उसे। दुनिया को मजबूत बनाने की नसीहत देने वाला बहुत कमजोर निकला। पहले तो इधर उधर से खबरें भेज कर उसे डराया, चिट्ठी लिखाई, तुम्हें बताई तो डर गया। जरा सी पुलिस देखी कि डर कर मंच से कूद कर भागा। कैसे भेस बदला? अब क्या बताएँ अपने मुख से बताते शर्म आती है। तुम्हें तो सब पता ही है। तुम ने तो सब लाइव देखा ही है। अब देखो आठ दिन में ही टें बोल गया। अस्पताल से छूटा तो लगता था बरसों से बीमार है। देखा हमने जोगी का जोग निकाल दिया। 

ब उस का जोग निकाला है, तो इस का भी निकाल देंगे। पहले तो हम समझते थे जोगी का हाल देख महात्मा मैदान छोड़ भागेगा। उस ने नाटक तो किया, पर भागा नहीं। फिर डट गया। पर डटने से क्या होता है? हम कोई ऐसे ही तो उस की बात नही मान लेंगे? हम भी उसे तपाएंगे। उसे माननी पड़ेगी हमारी बातें। हम ने उस की दुकान पर तलाशी लेने भेज दिया है अपनी टीम को। वैसे तो हमारे कानून ऐसे हैं कि कोई उन की कमी पूरी कर ही नहीं सकता। हम चाहें तो हर किसी को फँसा लें। लेकिन वहाँ अगर कुछ न भी मिला तो हमारी टीम वाले क्या कम हैं कुछ तो हेराफेरी कर के कुछ न कुछ तो निकाल ही देंगे। 

ये भी कोई बात हुई कि प्रधानमंत्री को भी दायरे में लाओ। हम ले भी आएँ। पर जिसे तुमने ही दायरे से बाहर कर दिया हो, उसे दायरे में कैसे ले आएँ। मान ली बात  कि सारी जमात को ट्रेन में टिकट ले कर सफर करना चाहिए।  पर कम से कम एक तो बिना टिकट होना ही चाहिए। ये क्या ट्रेन चलाने वाले ड्राइवर को भी टिकट लेना पड़ेगा क्या? हम ने उन से कह दिया है, या तो हमारी बात माननी पड़ेगी नहीं तो हम तुम्हारे-हमारे दोनो के फोटो मंत्रालय को भेज देंगे। मंत्रालय खुद फैसला कर लेगा। मंत्रालय में कोई और थोड़े ही बैठा है? वहाँ भी हम ही तो हैं। वह तो वैसा ही करेगा जैसा हम चाहेंगे। तो जनता देख लो। ये लोग तु्म्हारे नाम पर तुम्हारी पग़ड़ी उछालना चाहते हैं। पर हम ऐसा नहीं होने देंगे। पक्का वादा है तुमसे, हम मरते मर जाएंगे पर ऐसा नहीं होने देंगे। हम डरते हैं तो तुमसे ही डरते हैं, वो भी पाँच बरस में एक बार। अब बार बार डरना पड़े तो जनतंत्र कैसे चला पाएँगे? ये समझते ही नहीं पाँच बरस से पहले ही हमें वापस बुलाने का अधिकार चाहते हैं। पर ऐसा हम कैसे होने दे सकते हैं। हम तो पाँच बरस में एक बार तुम्हें कष्ट देते हैं वही बहुत है। हमारा बस चले तो जीते जी तुम्हें कष्ट दें ही नहीं। एक बार पूछ लिया वही क्या बहुत नहीं है, जीवन भर के लिए? अच्छा तो अब चलते हैं। फिर मिलेंगे। तुम तो तान खूँटी सोओ, आराम करो। ऐसे वैसों की सुनने की जरूरत ही नहीं है। 


(अब तुम्हें कैसे बताऊँ कि हमारी जान निकली जा रही है, कि ये सफेद टोपी वाला बुड्ढा ये न कह दे कि मतभेद के मुद्दों पर जनता से 'हाँ' या 'ना' में चुनाव [रेफरेंडम] करा लिया जाए)

18 comments:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

क्या यह अच्छा नहीं कि देश के बड़े मुद्दों पर जनमत संग्रह की व्यवस्था की जाये.

डा० अमर कुमार said...

.हुकुम .. आपने अच्छे अच्छों की सरका दी... हमको पैर की जुत्ती बना कर रखी । दुहाई मालक की... जो सरकार, आप हमारे दरवज़्ज़े तलक वोट खातिर पधारते हो.. यही आपका घणा ऎहसान है ! हुकुम सा.. ऎसे ना बेरो...
इस बेला हमसे हाँ णाँ कुछ भी बोला ना जावेगा । घणी मुश्किल खड़ी कर दी, हाँ बोलूँ तो बाप मारेगा, जो ना बोलूँ तो माँ मारेगी । हुकुम हमने सिद्धे देश निकाला ही दे दो ।

@ भारतीय नागरिक - Indian Citizen
इसके लिये देश को पूरी तरह शिक्षित होना पड़ेगा... अधिकाँश को तो अभी भी सँसदीय व्यवस्था का मूल ढाँचा स्पष्ट नहीं है ।

Sunil Kumar said...

बहुत अच्छी तरह से आपने जनता को समझाया अब बेचारी जनता जिसके पास और कोई चारा ही नहीं है आपकी बात समझने के ! मज़ा आ गया पोस्ट पढ़ कर , बधाई

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है .....


कुछ चिट्ठे ...आपकी नज़र ..हाँ या ना ...? ?

वाणी गीत said...

कोशिश कर रहे हैं समझने की ...

अमर जी ने सही कहा , जनमत को जाने के लिए जिस भयमुक्त और शिक्षित वातावरण की आवश्यकता है , वह अभी देश में नहीं है ...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सटीक व्यंग है ... सबसे बड़ी कमी है जानकारी के अभाव की ..

कुश्वंश said...

दिनेश जी आपकी लेखनी की धार का सदा से ही कायल , जन मानस में उठने वाली अभिव्यक्तियों को शब्द दिए है आपने ऐसे ही जागरण की जरूरत है देश को दुआ करे अलख जगे और उनमे एक मशाल आपकी भी हो

प्रवीण पाण्डेय said...

लुका छिपी का लोकतन्त्र।

Chandra Bhushan Mishra 'Ghafil' said...

अच्छा व्यंग्य

सतीश सक्सेना said...

सटीक मार है भाई जी ! शुभकामनायें आपको !!

सञ्जय झा said...

hamare liye gyanvardhak post........

pranam

prerna argal said...

bahut alag dhang se likha satic byang.bemisaal prastuti.badhaai.





please visit my blog.thanks.

निर्मला कपिला said...

अपने तो सबका अनुलोम वोलोम कर दिया1 बहुत खूब्\

anu said...

सटीक वर्णन ! शुभकामनायें आपको !!

निवेदिता said...

जनतन्त्र तो तभी सफ़ल होगा जब जन-जन जागरूक हो कर सवाल कर सके .... अच्छी खबर ली है सब की .......

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...

सात दशक से जनता इन्हीं भुलावों में जीती आ रही है और राजनीति जीती जा रही है:)

M VERMA said...

बेहतरीन व्यंग्य ..
सामयिक और चुटीला

Ratan Singh Shekhawat said...

बढ़िया व्यंग्य | एकदम सटीक |

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