Thursday, May 12, 2011

शिवराम की कविता 'नन्हें'

ल कामरेड पाण्डे के सब से छोटे बेटे की शादी थी, आज रिसेप्शन। मैं बारात में जाना चाहता था। लेकिन कल महेन्द्र के मुकदमे में बहस करनी थी, मैं न जा सका। आज रिसेप्शन में भी बहुत देरी से, रात दस बजे पहुँचा। सभी साथी थे वहाँ। नहीं थे, तो शिवराम!  लेकिन उन का उल्लेख वहाँ जरूर था। सब कुछ था, लेकिन अधूरा था। शिवराम हमारे व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन के, संकल्पों के और मंजिल तक की यात्रा के अभिन्न हिस्सा थे। वहाँ से लौटा हूँ। उन की एक कविता याद आती है। मैं उन की किताबें टटोलता हूँ। उन के कविता संग्रह 'माटी मुळकेगी एक दिन' में वह कविता मिल जाती है। आप भी पढ़िए,  उसे ...

नन्हें
  • शिवराम

उस ने अंगोछे में बांध ली हैं 
चार रोटियाँ, चटनी, लाल मिर्च की
और हल्के गुलाबी छिलके वाला एक प्याज

काँख में दबा पोटली 
वह चल दिया है काम की तलाश में
सांझ गए लौटेगा
और सारी कमाई 
बूढ़ी दादी की हथेली पर रख देगा
कहेगा - कल भाजी बनाना

इस से पहले सीने से लगाए उसे
गला भर आएगा दादी का
बेटे-बहू की शक्लें उतर आएंगी आँखों में
आँखों से छलके आँसुओं में

वह पोंछेगा दादी के आँसू
मुस्कुराएगा

रात को बहुत गहरी नींद आएगी उसे

कल सुबह जागने के पहले 
नन्हें सपने में देखेगा
नेकर-कमीज पहने
पीठ पर बस्ता लटकाए
वह स्कूल जा रहा है 
वह टाटा कर रहा है और
दादी पास खड़ी निहार रही है

कल सुबह जागने के ठीक पहले 
नन्हें जाएगा स्कूल


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