Sunday, April 24, 2011

इन्द्रगढ़ और बीजासन माता मंदिर

डूंगरली, गैंता, लाखेरी, इंद्रगढ़, कमलेश्वर महादेव और श्योपुर को
एक साथ दिखाता मानचित्र 
सुबह छह बजे पत्नी शोभा ने जगाया तो कॉफी हाजिर थी। तैयार होने में फुर्ती की तब भी घर से निकलते निकलते घड़ी की सुइयाँ आठ से ऊपर निकल चुकी थीं। डेढ़ किलोमीटर दूर चंम्बल पुल पार कर पेट्रोल पम्प से पेट्रोल लिया। तब तक शोभा अपनी छोटी बहिन से बात कर चुकी थी। उस का कस्बा केशवराय पाटन कोटा से 20 कि.मी. की दूरी पर था। उस से पूछा गया कि वह भी साथ चल रही है क्या। पर वह रामनवमी का दिन था और उसे कन्याओं को भोजन कराना था वह हमारे साथ नहीं चल सकती थी। यूँ वह साथ हो जाती तो कार में एक यात्री क्षमता से अधिक हो जाता। पेट्रोल पंप छोड़ा तो सवा आठ बज चुके थे।  इंद्रगढ़ तक की हमारी यह यात्रा कुल 90 किलोमीटर की थी। सड़क काफी अच्छी थी। कोटा-लालसोट हाई-वे अभी कुछ बरस पहले ही बना है। बीच-बीच में कुछ व्यवधान अवश्य थे, लेकिन कार की गति 80-90 बनी हुई थी। हमने केशवराय पाटन को पीछे छोड़ा, फिर आया लबान गाँव और स्टेशन। यहाँ से हमारा गाँव गैंता सिर्फ नौ किलोमीटर था, बाधा थी तो केवल बीच में चंबल नदी जिस पर बरसों से पुल प्रस्तावित है। लेकिन घड़ियाल अभयारण्य होने से सर्वोच्च न्यायालय की अनुमति के लिए रुका हुआ था। पिछले सप्ताह ही सर्वोच्च न्यायालय ने इस पुल को बनाने की अनुमति प्रदान कर दी है। इस पुल के बनने के बाद झालावाड़ और बाराँ सड़क मार्ग से लालसोट, मथुरा और दिल्ली से जु़ड़ जाएंगे। हो सकता है नदी किनारे बसे गैंता को इस से पुनर्जीवन प्राप्त हो जाए।  लबान से कोई सात किलोमीटर पर सीमेंट उत्पादक नगर लाखेरी था। यहाँ आते ही मुझे अपने एक पुराने मुवक्किल ईश्वरीप्रसाद का स्मरण हुआ। मैं ने उसे फोन लगाया तो पता लगा कि वह इंद्रगढ़ से सवाई माधोपुर जाने वाले मार्ग पर इंद्रगढ़ से तीन किलोमीटर दूर किसी मंदिर में अखंड रामायण के आयोजन में व्यस्त है। हम बिना रुके इंद्रगढ़ पहुँचे तो साढ़े नौ बज चुके थे। 

इंद्रगढ़ किला
इंद्रगढ़ का राजप्रासाद
इंद्रगढ़ को बूंदी के राजकुमार इंद्रसाल सिंह ने 1605 में बसाया था। यह पहाड़ी की तलहटी में बसा छोटा सा कस्बा है। जिस की आबादी 2001 की जनगणना के अनुसार 5000 से कुछ ही अधिक थी और अभी भी 6000 के ऊपर नहीं निकली है। पहाड़ी पर छोटा किन्तु सुंदर सा किला और राजप्रासाद है जो दूर से ही दिखाई देता है। राजस्थान में अभी भी यह स्थिति है कि 15000 से अधिक आबादी के अनेक कस्बों में नगरपालिका नहीं है। लेकिन यहाँ आजादी के पहले से नगरपालिका स्थापित थी जिसे यहाँ के राजा ने स्थापित किया था। जब यह स्वतंत्र राज्य राजस्थान में विलीन हुआ तो विलीनीकरण की एक शर्त यह भी थी कि यहाँ की नगरपालिका सदैव बनी रहेगी, इसे ग्राम पंचायत में परिवर्तित नहीं किया जाएगा। इसी कारण आज तक आबादी कम होने पर भी यहाँ नगरपालिका है। इसी कारण इस नगर का स्वरूप भी पूर्ववत  बना हुआ है। हमने इंद्रगढ़ कस्बे को एक तरफ छोड़ा और वहाँ से तीन किलोमीटर दूर बीजासन माता मंदिर पहुँचे। 

मेला और पहाड़ी जिस की चोटी पर बीजासन माता मंदिर स्थित है 
मंदिर एक पहाड़ी पर ऊँचाई पर स्थित है जिस के लिए लगभग साढ़े सात सौ सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। चढ़ाई आरंभ होने के कोई आधा किलोमीटर दूरी पर ही हमें कार छोड़नी पड़ी, आगे नवरात्र पर लगने वाला मेला चल रहा था। सड़क के दोनों ओर दुकानें सजी हुई थीं। इन में ग्रामीणों की आवश्यकताओं की वस्तुओं के अलावा खाने-पीने के सामान और माताजी की पूजा अर्चना के सामान की दुकानें थीं। दुकानदार बुला-बुला कर पूजा का सामान खरीदने का आग्रह कर रहे थे। इस मामले में शोभा चतुर थी। सब सामान कोटा से ही तैयार कर ले चली थी। मेला पार कर के हम उस स्थान पर पहुँचे जहाँ से सीढ़ियाँ आरंभ होती थीं। हमें आरंभ में कम ऊँचाई की चौड़ी सीढ़ियाँ मिलीं। लेकिन जैसे जैसे सीढ़ियाँ चढ़ते गए सीढ़ियों की ऊँचाई बढ़ती गई, और चौड़ाई घटती गई। दर्शनार्थियों की संख्या कम न थी। लगातार पीछे से लोग आते जा रहे थे। इस कारण बीच में रुकना संभव नहीं था। फिर भी किसी चौड़ी सीढ़ी पर एक मिनट साँस लेते और ऊपर चढ़ते जाते। सीढ़ियों पर हमें गेहूँ के दाने बिखरे मिले जिन्हें कुछ लोग लगातार समेट कर अपने झोलों में भरते भी जाते थे।दर्शनार्थी फिर से गेंहूँ के दाने सीढ़ियों पर बिखेर देते थे। मुझे यह कुछ अच्छा नहीं लगा। अधिकतर दर्शनार्थी अपने जूते चप्पल मेले में उतार आए थे और नंगे पैर चढ़ रहे थे। गेहूँ के दानों पर कोई फिसल भी सकता था। हम ने अपने जूते-चप्पल नहीं उतारे थे। जब मंदिर तक पहुँचने में केवल दस-बारह सीढ़ियाँ रह गईं और आने-जाने की सीढ़ियाँ अलग हुई तो हम ने अपने जूते चप्पल वहीं एक चट्टान पर खोल दिए। 
मंदिर में बीजासन माता की प्रतिमा
कुछ ही देर में हम मंदिर में थे। मंदिर दो स्तरीय था। निचले स्तर पर एक कमरे जैसा स्थान था जहाँ एक नाई बैठा कुछ भक्तों का मुण्डन कर रहा था।  पास ही एक युवक और एक महिला सिर हिला रहे थे, जैसे किसी की आत्मा उन में प्रवेश कर गई हो।  पर लोग उन की तरफ केवल एक निगाह डाल कर आगे बढ़ जाते थे। वहाँ रुकने का स्थान न था। दर्शनार्थियों का प्रवाह ऐसा था कि एक मिनट में दर्शन करें और आगे चल दें। रुकने पर मार्ग रुक जाने की संभावना थी। मंदिर के स्वयंसेवक और तैनात पुलिसकर्मी  लोगों को लगातार आगे बढ़ते रहने का निर्देश बार-बार दे रहे थे। हम लोग कुल दो मिनट मंदिर में रुके, दर्शन किए और आगे बढ़ गए। माताजी की प्रतिमा सुंदर और आकर्षक थी। लेकिन वहाँ लोग गेहूँ के इतने दाने बिखेर रहे थे कि पावों के नीचे गेहूँ ही गेहूँ महसूस हो रहा था। हालांकि लगातार लोग उन दानों को समेटते भी जाते थे। मैं सोच रहा था कि इन गेहूँ के दानों का क्या महत्व रहा होगा? (कोई पाठक बताएगा?) 

पहाड़ी के नीचे के मंदिर में बीजासन माता मंदिर
जैसे ही हम मंदिर के बाहर निकले मेरे मोबाइल की घंटी बज उठी। ईश्वरी प्रसाद का फोन था। उस ने बताया कि वह मंदिर वाली सडक जहाँ हाई-वे से मिलती है वहाँ हमारा इंतजार कर रहा है। वहाँ लाल झंड़ा लगी जीप खड़ी है वह उसी की है। मैंने उसे कहा हम आधे घंटे में उस तक पहुँचते हैं। मंदिर से नीचे उतरने में हमें अधिक समय न लगा। जैसे ही सीढि़याँ समाप्त हुई हम ने राहत की साँस ली। बच्चों ने झोले में से पानी की बोतल निकाली, हम चारों ने पानी पिया। नीचे पहाड़ी की तलहटी में माताजी का एक और मंदिर बना हुआ था। यात्रियों के साथ कुछ वृद्ध लोग भी होते हैं जो पहाड़ी नहीं चढ़ सकते, वे यहीं दर्शन कर कुछ देर विश्राम करते हैं और अपने सहयात्रियों के पहाड़ी से लौटने पर उन के साथ हो लेते हैं। हमने यहाँ भी दर्शन किए। लोग यहाँ भी गेहूँ के दाने इस तरह उछाल रहे थे कि वे मंदिर के छज्जों पर गिरें। लेकिन छज्जों से गेहूँ के दाने नीचे मंदिर के प्रवेश द्वार पर ही आ गिरते थे। वहाँ भी उन्हें समेटने के काम में कुछ लोग लगे थे। हम ने कार संभाली। हाई-वे पर पहुँचते ही हमें लाल झंडे वाली जीप मिल गई। ईश्वरी प्रसाद वहाँ न दिखे।  जैसे ही जीप के पास जा कर मैंने कार रोकी। एक आदमी जीप से उतरा और कहने लगा मैं बाबा को बुलाता हूँ। एक मिनट में ही ईश्वरी प्रसाद वहाँ हाजिर था, बिलकुल बाबा बना हुआ। सर के बाल जटा में तब्दील हो चुके थे। बदन पर एक बंडी थी और पैरों में लाल धोती लपेट रखी थी। वह मुझे बता रहा था कि वह जिस मंदिर पर 108 रामायण पाठ करवा रहा है उस से सौ मीटर पहले टोल प्लाजा है। यदि वह नहीं आता तो टोल वाले कम से कम पचास रुपए की रसीद बना देते। इसलिए खुद लेने आया है। हम उस की जीप के पीछे-पीछे चल पड़े। ...

कुछ और चित्र 

मेला और पहाड़ी पर बीजासन माता मंदिर

मंदिर के लिए आरंभिक सीढ़ियाँ
सीढ़ियों की उँचाई अब बढ़ चली
सीढ़ियों की चढ़ाई के बाद मंदिर प्रवेश के कुछ पहले
विश्राम करते माँ-बेटे
और उतरते हुए 
मंदिर से नीचे मैदान का दृश्य
मंदिर के ठीक बाहर तैनात सिपाही
इन चित्रों पर क्लिक कर के आप बड़े आकार में देख सकते हैं।
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