Saturday, March 19, 2011

कल कोई नहीं जीता, मौका है, आज जीत लें

जंगल में होली
मैं ने कल की पोस्ट में उस ख्यातनाम ब्लागर का नाम पूछा था, जिस के घर से मैं दो तस्वीरें उतार लाया था और आप को दोनों तस्वीरें मिला कर दिखाई थीं। तस्वीर देख कर उड़नतश्तरी वाले समीरलाल जी ने तुरंत आरोप लगाया कि "ओह! तो आप आये थे घर पर...पता चला कि तस्वीरें खींच कर ले गये हैं. :)" अब उन के घर कौन आ कर चित्र उतार कर ले गया? यह मुझे नहीं पता। कम से कम मैं तो नहीं ही गया था। वैसे भी वे तो इन दिनों कनाडा में रह रहे हैं, अपनी बिसात कहाँ कि उड़ कर वहाँ जा सकें। हमारे पास उन की तरह उड़नतश्तरी जो नहीं है।
धिकतर टिप्पणीकर्ताओं ने तस्वीरों को पाबला जी के घर की बताया जिन में डा० अमर कुमार, योगेन्द्र पाल, निर्मला कपिला और सञ्जय झा शामिल हैं। मैं शपथपूर्वक कह सकता हूँ कि ये तस्वीरें पाबला जी के घर की नहीं हैं। उन के घर तो गए हमें दो बरस हो चुके हैं। इन में सञ्जय झा ने तो उत्तर में ई-स्वामी जी और रवि-रतलामी जी को भी शामिल कर लिया। इन के घर तो हम ने आज तक नहीं देखे हैं। ई-स्वामी जी का तो निवास का नगर भी हमें पता नहीं। रवि रतलामी जी के घर जाने का सौभाग्य अभी तक नहीं मिला। पिछली बार भोपाल गए थे तो वे पहले ही कहीं बाहर चले गए और हम उन के घर नहीं जा सके। Neeraj Rohilla जी ने तो पंकज सुबीर का घर बता डाला। ये ठीक है कि हम उन से मिल चुके हैं, उन का कंप्यूटर इन्स्टीट्यूट भी देख चुके हैं, लेकिन तीन दिन उन के शहर में रहने के बावजूद भी उन के घर नहीं जा सके। लेकिन ये तस्वीरें तो उन के घर क्या, उन के इंस्टीट्यूट के किसी कोने की भी नहीं हैं। 
ये किस का घर है? और यहाँ क्या हो रहा है?
तीश सक्सेना जी ने अनुमान लगाया कि ऐसा काम तो कोई सरदार ही कर सकता है। हम समझ नहीं पा रहे कि वे किस की तरफ इशारा कर रहे हैं? ये कबाड़ इकट्ठा करने वाले की तरफ या फिर चित्र खींचने वाले की तरफ। चित्र खींचने वाला तो यकीनन सरदार है। पर उन का इशारा कबाड़ इकट्ठा करने वाले की ओर हो तो वो यकीनन सरदार नहीं है। हमारे शहर के नौजवान वकील और साल में सर्वाधिक पोस्टें लिखने वाले हिन्दी ब्लागर akhtar khan akela, आए और ना समझा जा सकने वाला जुमला मार गए। पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने उन्हीं की तरफ इशारा कर दिया कि मेरे पडौसी तो वे ही हैं। खुशदीप सहगल सहगल आए और पूरे कबीराना अंदाज में लिख गए, "ये तो उसी ब्लॉगर का घर लगता है जिसका फ़लसफ़ा हो...  आई मौज फ़कीर की, दिया झोपड़ा फूंक..." अब खुशदीप का लिखा समझना खुद एक पहेली हो गया। सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, सञ्जय झा और रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" इसे अपना ही घर समझ बैठे। 
राज भाटिय़ा जी तो हम पर ही चढ़ बैठे, कहने लगे -अजी यह तो हमारे वकील बाबू दिनेशराय जी का ही कमरा लग रहा हे:) हमारा ईनाम भाभी जी को दे दें। अब उन्हें कौन समझाए कि जो ईनाम देना है वह तो उन्हीं के सौजन्य से दिया जाने वाला है। अब वे खुद के लिए तो अपना सौजन्य इस्तेमाल करने से रहीं। काम की बात कही प्रवीण पाण्डेय जी ने कि, "जो भी हों, असरदार तो हैं"। निश्चित रूप से जिन ख्यातनाम ब्लागर के घर की ये तस्वीर है वे असरदार तो हैं। लेकिन सटीक और सही उत्तर कोई भी नहीं दे सका।
वाकई कलम तोड़ते हुए
प इतना भी नहीं समझ पाए। अरे! एक ही तो ख्यातनाम है, हिन्दी ब्लागजगत में जो खम ठोक कर लिखता और कहता है कि "बंदा 16 साल से कलम-कंप्यूटर तोड़ रहा है"। अब भी आप न समझें हो तो मै ही बता देता हूँ, यह ख्यातनाम ब्लागर खुशदीप सहगल हैं। जो बंदा 16 बरस से कलम-कंप्यूटर तोड़ रहा हो उस के घर का ये हाल तो होना ही था। 
क टिप्पणी ऐसी भी थी, जिस ने हमें ही पशोपेश में डाल दिया। रचना कह रही थी, " invasion of privacy पर कौन सी धारा लग सकती है? कल से समीर ई-मेलकर कर के पूछ रहे हैं, दिनेश जी क्या करूँ?" अब ऐसे प्रश्न हम से तीसरा खंबा कानूनी सवाल पूछने के लिए आते हैं।  लेकिन यदि समीर जी को ही पूछना होता तो मुझ से पूछ सकते थे। वैसे इशारे में तो उन्हों ने कह ही दिया था। कुछ भी कहो समीर जी ने ये सवाल बार-बार रचना से पूछ कर जो उन्हें हलकान किया उस पर कुछ धाराएँ अवश्य लग सकती हैं। पर आज दिन में एक पुलिस वाला बता रहा था कि वे सभी धाराएँ सरकार ने होली का डांडा गाड़ दिए जाने के बाद से होली के बारहवें दिन तक के लिए सस्पेंड कर दी गई हैं। अब मैं रचना जी को बताऊँ तो क्या बताऊँ? समीर जी उन्हें सवाल पूछ कर होली की तेरहीं होने तक हलकान तो कर ही सकते हैं। वैसे भी इस एक माह बारह दिन की अवधि में सभी को अपनी निजता की सुरक्षा के लिए चैतन्य रहना चाहिए। क्यों कि सरकार और उस की पुलिस तो कुछ करने से रही। रात में ही नहीं दिन में भी हर आधे घंटे बाद तीस बार "जागते रहो" का नारा बुलंद करते रहना ही इस समस्या का तात्कालिक इलाज है। फिर निजता की सुरक्षा में कुछ सेंध लग भी जाए तो चिंता की बात कुछ नहीं इस से व्यक्ति सेलेब्रिटी हो जाता है। क्यों कि उन की निजता में सेंध लगते ही खबर पैदा होती है और कोई मुकदमा नहीं होता। बहुत सारे तो सेलेब्रिटी कहलाने के लिए अपनी निजता में सेंध लगवाने के लिए ठेके तक देते हैं। 
कौन है यह ब्लागर?
वैसे किसी की निजता में सैंध लगा कर हम ने अब तक कोई एक नहीं, बहुत से लिए हैं। एक चित्र यहाँ पेश है, आप बता सकते हों, तो बताएँ ये किस ब्लागर का चित्र है? चूँकि आज कोई ईनाम का हकदार नहीं है इसलिए कल वाला ईनाम बरकार है, यानी वही कि सही सही बताने वालों का धुलेंडी की सुबह नौ बजे खतरनाक वाला सम्मान किया जाएगा। सब से पहले सही जवाब देने वाले को उस दिन का सब से बड़ा सरदार ब्लागीर घोषित किया जाएगा। ईनाम आज जीता जा सकता है।  

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