Wednesday, February 2, 2011

अचार की बहार

पुराना मकान छोड़े चार माह से ऊपर हो गया। अभी जहाँ रह रहा हूँ, अपना मकान बनते ही तीन चार माह बाद उस में जाना है। जहाँ मैं अभी रह रहा हूँ वहाँ मेरी गैसे एजेंसी गैस सप्लाई नहीं करती। मैं ने गैस ऐजेंसी नहीं बदली। इसलिए कि फिर कुछ माह बाद न बदलना पड़े। पर गैस कैसे मिले? उस का जुगाड़ जरूरी था। मैं गैस एजेंसी के मालिक से सीधा कह सकता था, वह मेरा पड़ौसी भी था।  लेकिन मैं ने सोचा वह बनिया आदमी है, जैसे ही मैं उसे जुगाड़ की कहूँगा वह मेरे बारे में यह सोचने लगेगा कि इस आदमी से कभी लाभ उठाया जा सकता है या नहीं। गैस एजेंसी वाला ऐसा सोचे भी मुझे बिलकुल पसंद नहीं इसलिए सीधे गैस एजेंसी में काम करने वाले एक क्लर्क को कहा। एजेंसी स्टाफ मेरा मान करता है। यदा-कदा कानूनी बातें पूछते रहते हैं, मैं अपनी आदत के मुताबिक तुरंत बता देता हूँ। वे खुश हो जाते हैं। उस ने कहा - पिछला गैस सिलेंडर लेने के इक्कीस दिन बाद कभी भी गैस ले सकते हैं। बस एक दिन पहले बता दें, दूसरे दिन सिलेंडर ले जाएँ। मैं उस दिन सिलेंडर बदलाने ही गया था। मैं ने शोभा से पूछा कि तुम चल रही हो? तो वह आशा के विपरीत तुरंत तैयार हो गई। मैं ने पूछा तो बताया कि सब्जीमंडी हो कर आएंगे। 

सब्जी मंडी में ...
... और इधर अचार हैं तैयार
कुछ दिन पहले शोभा ने बताया था कि अब कैरी (कच्चे आम) का अचार खत्म होने को है, तो मैं ने वैसे ही कहा था -अब जाती फरवरी में कैरी आने लगेगी। तब तक हल्दी, नीबू, मिर्च, आँवला, धनिया इतनी चीजें हैं, किसी का भी अचार बना लो। मैं ने सोचा,  ..... तो अचार की तैयारी है! गैस सिलेंडर बदलवा कर सब्जीमंडी पहुँचे। वहाँ एक स्थान देख कर एक शो-रूम के सामने कार पार्क की तो शो-रूम का गार्ड कार को हटाने को कहने लगा। मैं ने उस से कुछ हुज्जत की तो अंदर से मालिक ने आ कर कहा -खड़ी रहने दो। शोभा तब तक सब्जीमंडी के अंदर थी, पीछे से मैं पहुँचा। खरीददारी शुरू हुई। नीबू, धनिया, आँवला, हल्दी, इमली, हरी मिर्च और खडा नमक (मोटे डलों वाला) खरीदा। दूसरे दिन सुबह हिदायत मिली की अदालत से आते वक्त सरसों का तेल लेते आना। 
जी मैं हल्दी का अचार
और मैं, पहचानिए,  मैं आँवले से बना हूँ
 शाम को घर लौटा तो धनिया साफ कर के पीस लिया गया था। अब उस का अचार बनना शेष था। आँवले का अचार बन चुका था। कुछ की तैयारी कर ली थी। आज शाम जब अदालत से वापस घर पहुँचा तो अचार-निर्माण का आखिरी चरण चल रहा था। मैं इधर-उधर का काम करता रहा, आखिर अचार निर्माण समाप्त होने के बाद ही भोजन बनना था।
अब आप ही पहचान लीजिए, मैं धनिया ही हूँ, या फिर हरी मिर्च?
आप मुझे तो आप खूब जानते हैं, नीबू जो हूँ, जहाँ चाहा निचोड़ लिया
फिर जब भोजन करने बैठे तो शोभा गिनाने लगी छह-सात अचार हो गए हैं। मैं ने पूछा -कैसे? तो गिनाने लगी ... हल्दी, आँवला, धनिया तीन तो ये हो गए। एक नीबू का मीठा अचार, एक नीबू हरी मिर्च का अचार और एक हरी मिर्च का अचार, तीन ये हो गए। छह तो हो गए न? अब मैं ने आँवले को कद्दू कस कर के सुखा रखा है, यह वैसे ही खाने के काम में आएगा चाहेंगे तो इस पर सैंधा नमक लगा लेंगे, तो सातवीं चीज सूखा आँवला हो गया। अभी एक-दो दिन में लाल मिर्च आ जाएँगी। तब एक अचार वह हो जाएगा। ..... लो टेस्ट करो! यह कह कर उस ने एक-एक चम्मच हल्दी, धनिया और आँवले के अचार रख दिए। नीबू और हरी मिर्च तो अभी गलने बाकी हैं। मैं उन्हें टेस्ट करने के चक्कर में एक चपाती अधिक खा गया। इस के बाद भी मैं की-बोर्ड बजा रहा हूँ, य़ह भी एक कमाल की बात है। मैं देख रहा हूँ ... श्रीमती शोभाराय द्विवेदी बहुत खुश हैं। 

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