Wednesday, January 26, 2011

जनशिक्षण और जनसंगठन के कामों में तेजी लानी होगी

ज से 61 वर्ष पूर्व दुनिया का सब से बड़ा लिखित संविधान अर्थात हमारे भारत का संविधान लागू हुआ। इसे भारत की संविधान सभा ने निर्मित किया। संविधान सभा का गठन ब्रिटिश सरकार के तीन मंत्रियों के प्रतिनिधि मंडल, केबीनेट मिशन  ने  किया था। इस मिशन का मुख्य कार्य भारत की राजसत्ता को भारतियों के हाथों हस्तांतरण करना था। इस ने ब्रिटिश भारत के प्रांतों के चुने हुए प्रतिनिधियों, रजवाड़ों के प्रतिनिधियों तथा भारत के प्रमुख राजनैतिक दलों से बातचीत की जिस के परिणाम स्वरूप यह संविधान सभा अस्तित्व में आयी। इस संविधान सभा में आरंभ में 389 सदस्य थे, जिन में 292 सदस्य प्रान्तों की विधानसभाओं के द्वारा चुने हुए थे, 93 सदस्य रजवाड़ों के प्रतिनिधि थे, 4 सदस्य कमिश्नर प्रान्तों के थे। बाद में 3 जून 1947 की माउण्टबेटन योजना के अन्तर्गत भारत का विभाजन हो जाने के फलस्वरूप पाकिस्तान के लिए अलग संविधान सभा गठित की गई और कुछ प्रान्तों के प्रतिनिधियों की सदस्यता समाप्त हो जाने के कारण अंततः इस की सदस्य संख्या 299 रह गई।

स संविधान का निर्माण  का आधार इस के प्रतिनिधियों ने इस आधार पर किया कि देश के सभी वे वर्ग जिन की आवाज उठाने वाले लोग मौजूद थे संतुष्ट किया जा सके। हालाँकि संविधान सभा में ऐसे लोग प्रभावी थे जिन की दूरदर्शिता पर यकीन किया जा सकता था, फिर भी सभी तत्कालीन दबाव समूहों को प्रसन्न रखने की दृष्टि ने इस दूरदृष्टि को बहुत कुछ धुंधला किया था। यह एक महत्वपूर्ण कारण था कि हमारा संविधान देश के विकास और भविष्य के लिए कोई स्पष्ट नीति और लक्ष्य रखने में असमर्थ रहा। यदि उस में स्पष्टता रखी जाती तो हो सकता था कि सब की संतुष्टि नहीं होती और एकजुट भारत के निर्माण में बाधा उत्पन्न होती। लेकिन यह संतुष्टि फौरी ही साबित हुई। हर कोई दबाव समूह अपने सपनों का भारत देखना चाहता था। और पहले चुनाव के पहले ही हर दबाव समूह ने अपनी ताकत को बढ़ाने के लिए काम करना आरंभ कर दिया। कालांतर में इन की गतिविधियों ने ही देश और संविधान को वर्तमान रूप की ओर आगे बढ़ाया। 
म जानते हैं कि जो भारत ब्रिटिश साम्राज्य ने हमें सौंपा वह आधा-अधूरा था। उस के दो टुकड़े कर दिए गये थे। जिन का आधार साम्प्रदायिक था। इसी ने भारत में सम्प्रदायवाद को इतना मजबूत किया कि उस विष-बेल के प्रतिफल आज तक स्वतंत्र भारत में पैदा हुई पीढ़ी भुगत रही है। नवजात आजाद भारत में सामंतवाद गहराई से मौजूद था। सभी सामंत अपने अपने हितों को सुरक्षित रखना चाहते थे। हालांकि सामंतवाद की नींव को खोखली करने वाला और उसे समाप्त करने की जिम्मेदारी वहन करने वाला पूंजीपति वर्ग भी कम मजबूत न था। उस ने आजादी के आंदोलन के दौरान ही प्रमुख राजनैतिक दल कांग्रेस में अपनी जड़ें गहरी कर ली थीं। एक तीसरा वर्ग था, जिस की आजादी के आंदोलन में प्रमुख भूमिका थी। यह भारत की विपन्न जनता थी, इस की एकजुटता ही वह शक्ति थी जिस के बल पर आजादी संभव हो सकती थी। यह भारत का विपन्न किसान था जो सामंतों की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था, सामंतों की सारी संपन्नता जिस के बल पर कायम थी,  यह कारखानों में काम करने वाला मजदूर था जिस के श्रम ने भारत के पूंजीपति को मुकाबला करने की शक्ति प्रदान की थी। ये दोनों विशाल वर्ग दबाव समूह तो थे ही लेकिन नेतृत्व में इन का हिस्सा बहुत छोटा था। 
किसान और मजदूर जनता की संख्या विशाल थी और जिस तरह का  संविधान निर्मित हुआ था उस की आवश्यक शर्त यह थी कि इस विशाल जनसंख्या से हर पाँचवें वर्ष सहमति प्राप्त कर के ही कोई सरकार इस देश में बनी रह सकती थी। पहले आम चुनाव ने कांग्रेस को विशाल बहुमत प्रदान किया। लेकिन जो लोग चुने जा कर संसद पहुँचे उन में से अधिकांश पहले दो वर्गों, सामंतों और पूंजीपतियों के प्रतिनिधि थे। पूंजीपतियों को पूंजीवाद की बेहतरी चाहिए थी तो सामंतों को अपने अधिकारों की सुरक्षा। लेकिन दोनों के हित टकराते थे। पूंजीपति उदीयमान शक्ति थे लेकिन उन की बेहतरी इस बात में थी कि देश में सामंती संबंध शीघ्रता से समाप्त हों। जमीनें और किसान सामंतों से आजाद हो जाएँ। किसान भी सामंतों से आजादी चाहते थे। लेकिन मजदूर वे ताकत थे जो पूंजीपतियों से बेहतर सेवा शर्तें चाहते थे और किसानों के ही पुत्र थे।  किसान और मजदूरों जल्दी संगठित और शिक्षित होना पूंजीपति वर्ग के लिए बहुत बड़ा खतरा था। क्यों कि ये ही थे जो पूंजीपति वर्ग के अनियंत्रित विकास के विरुद्ध था और अपने लिए बेहतर जिन्दगी की मांग करता था। आजादी के आंदोलन ने इसे असहयोग की ताकत को समझा दिया था। 
ही वह कारण था जिस ने पूंजीपति और सामंती वर्गों को एक दूसरे के सब से बड़े शत्रु होते हुए भी मित्रता के लिए बाध्य कर दिया, दोनों में भाईचारा उत्पन्न किया। अब दोनों की चाहत यही थी कि भारत की संसद में जो प्रतिनिधि पहुँचें वे उन के हित साधक हों लेकिन इतने होशियार, चंट चालाक भी हों कि किसानों, मजदूरों, खुदरा दुकानदारों आदि को एन-केन-प्रकरेण उल्लू बना कर हर पाँच वर्ष बाद चुन कर संसद में पहुँच जाएँ और उन के हितों की रक्षा करते रहें। आजादी के बाद का भारत का इतिहास इसी खेल की कहानी है। राजनैतिक दल इसी खेल का हिस्सा हैं। देश की नौकरशाही राजनैतिक दलों और प्रभुवर्गों के बीच संबंधों को बनाए रखने का काम करती है। यह खेल पर्दे के पीछे काले धन और भ्रष्टाचार के व्यापार के बिना चल नहीं सकता। इस व्यापार के दिन दुगना और रात चौगुना बढ़ने का कारण यही है। यह रुके तो कैसे? यही तो प्रभुवर्गों का प्राणरक्षक है।
क ओर दोनों प्रभुवर्गों का प्रतिनिधित्व करने वाले दल हैं जो जनता को उल्लू बनाते हैं और हर पाँच वर्ष बाद संसद में पहुँच जाते हैं। दूसरी ओर किसानों और मजदूरों का प्रतिनिधित्व करने वाले दल भी हैं, लेकिन वे कमजोर हैं और बंटे हुए हैं। प्रभुवर्ग भी यही चाहते हैं कि इस श्रमजीवी जनता का प्रतिनिधित्व करने वाली राजनीति कमजोर और बंटी हुई ही रहे। यही कारण है कि इन का प्रतिनिधित्व करने वाले दोनों बड़े दल और उन के सहायक दल जनता को बाँटने वाली राजनीति का अनुसरण करते हैं और जनता में विद्वेष फैलाने का कोई अवसर नहीं छोड़ते। चाहे वह सम्प्रदायवाद हो, जातियों पर बंटी हुई राजनीति, घोर अंध राष्ट्रवाद हो या कोई और तरीका। हमारी जनता की पुरानी मान्यताएँ इन का साथ देती हैं। इस के मुकाबिल श्रमजीवी जनता की राजनीति अत्यन्त कठिन और दुष्कर है। उसे इन सब चीजों से जूझना पड़ता है। जनता को लगातार शिक्षित और संगठित करना पड़ता है। श्रमजीवी जनता की राजनीति इसी काम में बहुत पिछड़ी हुई है। जनता के साथ संपर्क के साधनों और मीडिया पर दोनों प्रभुवर्गों का कब्जा उस के इस काम को और दुष्कर बनाता है। यदि श्रमजीवी जनता को मुक्त होना है तो उन के अगुआ लोगों को जनशिक्षण और जनसंगठन के कामों में तेजी लानी ही होगी। यही एक मार्ग है जिस से देश की श्रमजीवी जनता को जीवन की कठिनाइयों से मुक्ति प्राप्त हो सकती है और हम भारत को एक स्वस्थ जनता के जनतांत्रिक गणतंत्र बना सकते हैं।
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