Saturday, January 22, 2011

अंधे आत्महत्या नहीं करते

अंधे आत्महत्या नहीं करते

  • दिनेशराय द्विवेदी

जिधर देखते हैं,
अंधकार दिखाई पड़ता है,
नहीं सूझता रास्ता,
टटोलते हैं आस-पास
वहाँ कुछ भी नहीं है, जो संकेत भी दे सके मार्ग का

तब क्या करेगा कोई?
खड़ा रहेगा, वहीं का वहीं,
या चल पड़ेगा किधर भी।
चाहे गिरे खाई में या टकरा जाए किसी दीवार से
या बैठ जाए वहीं और इंतजार करे 
किसी रोशनी कि किरन का,
या लमलेट हो वहीं सो ले।

लेकिन एक आदमी है 
जो ऐसे में भी रोशनी की किरन तलाश रहा है।
उस की दो आँखें 
अंधेरे में देखने का अभ्यास करने में मशगूल हैं
वह जानता है कि सारे अंधे आत्महत्या नहीं करते
जीवन जीते हैं, वे

आप जानते हैं? इस आदमी को
नहीं न? 
मैं भी नहीं जानता, कौन है यह आदमी?

पर जानता हूँ 
यही वह शख्स है 
जो काफिले को ले जाएगा, उस पार
जहाँ, रोशनी है।

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