Sunday, January 9, 2011

रोशनियाँ कैद नहीं होतीं


जब जनआकांक्षाओं को पूरा करने में 
असमर्थ होने लगती हैं, सत्ताएँ 

जब उन के वस्त्र
एक-एक कर उतरने लगते हैं,
जब होने लगता है उन्हें, अहसास 
कि उन के अंग, जिन्हें वे छिपाना चाहते हैं
अब छिपे नहीं रहेंगे 

तो सब से पहले 
वे टूट पड़ती हैं 
रोशनियों पर

कि रोशनियाँ ही तो हैं 
जो लोगों को दिखाती हैं, ये सब
कि कैद कर दी जाती हैं, रोशनियाँ
तब दीखता है, अंधेरा ही अंधेरा

तुम क्या महसूस नहीं करते
कि ऐसा ही अंधेरा है, आजकल 
वह आ रहा है, आसमान पर 
एक दिशा से
और गहराता जा रहा है 
दसों दिशाओं पर

पर नहीं जानते वे लोग 
जो रोशनियों को कैद करने में जुटे हैं
कि रोशनी को कैद कर दो 
तो वह ताप बढ़ाती है
और एक दिन फूट पड़ती है
एक विस्फोट के साथ
  • दिनेशराय द्विवेदी
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