Saturday, January 8, 2011

कहाँ से मिल गई हम को ये बिजलियों की सिफ़त

र्वीले अतीत की सब लोग बात करते हैं। लेकिन अपने अतीत के गौरव की बात करते समय हमें इस बात पर तनिक भी लज्जा नहीं आती कि वे भी हम ही थे, जिन्हों ने अपने गौरव को मिट्टी में मिला दिया। ऐसी कौन सी बात थी, जिस ने हमारे गौरव को इस अंजाम तक पहुँचाया? और क्या उस चीज से हम अब भी निजात पा सके हैं? इसी बात को शायर शकूर 'अनवर' किस तरह कहते हैं? आप खुद ही देखिए -


ग़ज़ल
कहाँ से मिल गई हम को ये बिजलियों की सिफ़त
  • शकूर 'अनवर'

उठे  तो     सारे  जमाने  पे     छा  गए  हम  लोग
गिरे तो   ज़ात की पस्ती में    आ  गए  हम  लोग


जो  एक     जिन्से-मुहब्बत    हमारी  अपनी  थी
उसी को     बेच के   दुनिया में   खा गए हम लोग


हमारे     आबा-ओ-अजमाद    ने   जो   छोड़े   थे 
वो नक़्श     सारे के सारे     मिटा गए    हम लोग


हम   अपने आप के    दुश्मन   बने हुए हैं    यहाँ
खुद   अपनी राह में    काँटे बिछा गए    हम लोग


कहाँ से मिल गई हम को ये बिजलियों की सिफ़त
जिधर से निकले   वहीं घर   जला गए   हम लोग


निकल के   बहरे-मुहब्बत से   आजकल 'अनवर'
हवस के      अंधे कुवें      में समा गए     हम लोग


शकूर 'अनवर' कोटा के अजीम शायरों में से एक हैं, आप उन का परिचय यहाँ जान सकते हैं।
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