Monday, May 31, 2010

मनुष्य के श्रम से विलगाव के जैविक और सामाजिक परिणाम


ज सुबह अदालत में जब हम चाय के लिए  जा रहे थे तो वरिष्ट वकील महेश गुप्ता जी ने पीछे से आवाज लगाई। मैं मुड़ा तो देखता हूँ कि पंचानन गुरू मौजूद हैं। वे मुझे याद कर रहे थे। वे कोटा की पहली पीढ़ी के वामपंथियों में से एक हैं। अपने जमाने में उन्हों ने इस विचार को पल्लवित करने में महत्वपूर्ण भूमिका  अदा की। बाद में  अपने गांव के पास के कस्बे अटरू में जा कर वकालत करने लगे, साथ में पुश्तैनी किसानी थी ही। अब जीवन के नवें दशक में हैं। गुरू ने पूछा -कहाँ जा रहे थे? मैं ने कहा चाय पीने।  उन्हो ने पलट कर पूछा-कौन पिला रहा है? मैं ने कहा जो भी सीनियर होगा वही पिलाएगा। उन्हों ने फिर पूछा -हम भी चलते हैं, अब कौन पिलाएगा? उत्तर मैं ने नहीं महेश जी ने दिया - अब तो सब से सीनियर आप ही हैं, लेकिन जब छोटे कमाने लगें तो उन का हक बनता है। तो यूँ मेरा हक है। हम सब केंटीन की ओर चले।
चाय का आदेश देते हुए महेश जी ने कहा एक चाय फीकी आएगी। गुरू बोले -फीकी किस के लिए? मैं तो अब भी घोर मीठी पीता हूँ। महेश जी ने जवाब दिया यह मधुमेह का राजरोग मुझे लगा है। गुरू कहने लगे -मधुमेह तो तो सब रोगों की जननी है। अब कोई रोग आप को छोड़ेगा नहीं। महेश जी ने उत्तर दिया -आप सही कहते हैं। इस का कोई इलाज भी नहीं, एक इलाज है पैदल चलना। मैं ने कहा श्रम ने ही तो मनुष्य को जानवर से मनुष्य बनाया है, वह छूटेगा तो रोग तो पकड़ेगा ही। गुरू जी कहने लगे तुम भी डार्विन में विश्वास करते हो क्या? मैंने कहा करता तो नहीं, पर सबूतों का क्या करें? कमबख्त ने सबूत ही इतने दिए कि मानने के सिवा कोई चारा नहीं है। गुरू जी ने गीता का जिक्र कर दिया। कहने लगे -वहाँ भी कहा तो यही है, कि मनुष्य काजन्म तो 84 लाख योनियों के बाद होता है, सीधा-सीधा विकासवाद की ओर संकेत है। पर उन्हों ने सबूत नहीं दिए सो पंडितों ने अपनी रोटियाँ उस पर सेक लीं।फिर वे किस्सा सुनाने लगे -
Planet of the Apes'मेरे गांव में एक बूढ़ा पटवारी बिस्तर पर था जान नहीं निकलती थी। बेटे कहने लगे बहुत दुख पा रहे हैं जान नहीं निकल रही है। मैं गीता ले कर वहाँ पहुँचा कि तुम्हें गीता सुना दूँ। दो दिन में उसे गीता के दो अध्याय सुनाए। तीसरे दिन तीसरा अध्याय सुनाने गया तो पूछने लगा। गाँव में डिस्टीलरी की बिल्डिंग  का खंडहर खड़ा है, सैंकड़ो एकड़ उस की जमीन है, डिस्टीलरी की इस जमीन का क्या होगा? मैं ने उसे गीता का तीसरा अध्याय नहीं सुनाया। बेटों को कहा कि जब तक डिस्टीलरी की चिंता इन्हें सताती रहेगी ये कष्ट पाते रहेंगे। उस के बाद मैं उसे गीता सुनाने नहीं गया।? 
ब तक चाय समाप्त हो चुकी थी। सब उठ लिए। गुरू जी मेरे लिए काम सौंप गए। जब श्रम ने मनुष्य को जानवर से मनुष्य बनाया तो उस का श्रम से विलगाव क्या असर करेगा? जरा इस पर गौर करना। मैं ने कहा -निश्चित ही वह मनुष्य का विमानवीकरण करता है। यही तो इस युग का सब से बड़ा अंतर्विरोध है। मनुष्य का अंतर्विरोधों का हल करने का लंबा इतिहास है, वह इस अंतर्विरोध को भी अवश्य ही हल कर लेगा। मुंशी प्रेमचंद की कहानी 'कफन' तो आपने पढ़ी ही होगी। 
स के बाद गुरूजी चल दिए। मैं भी अपने काम में लग गया। मैं घर लौटने के बाद इस प्रश्न  से जूझता रहा कि  क्या मनुष्य इस अंतर्विरोध को हल कर पाएगा? 
प लोग इस बारे में क्या सोचते हैं? आप राय रखेंगे तो इस विषय पर सोच आगे बढ़ेगी। ब्लाग जगत में कुछ साथी गंभीर काम करते हैं, उन से गुजारिश भी है कि उन के ज्ञान में हो तो बताएँ कि, क्या ऐसी कोई शोध भी उपलब्ध हैं,  जो मनुष्य के श्रम से विलगाव के जैविक और सामाजिक परिणामों के बारे में कुछ निष्कर्ष प्रस्तुत करती हैं?

9 comments:

Arvind Mishra said...

ईसका आधिकारिक जवाब केवल समय दे सकते हैं-इन विषयों पर उनकी गति अच्छी है !

अशोक कुमार पाण्डेय said...

यह आपने एक बिल्कुल नया और मौलिक सवाल पेश किया है…इस पर सोचना होगा…निश्चित तौर पर

समय said...

मनुष्य द्वारा जीवन के पुनरुत्पादन और सुविधाओं हेतु आवश्यक उत्पादन करना उसकी नियति है। जाहिर है, उत्पादन होगा तो वह किसी ना किसी रूप में श्रम-प्रक्रियाओं से जुड़ा ही रहेगा। समस्या अभी के परिप्रेक्ष्य में है, और इसे इसी संदर्भ में बेहतर समझा भी जा सकता है। श्रम से विलगाव के जैविक परिणाम सामने ही हैं, और इसके सामाजिक परिणाम भी।

अभी सामाजिक आवश्यकताओं से निरपेक्ष व्यक्तिगतताएं, श्रमविहिन हो जाना ही अपना चरम लक्ष्य मानती है। इसीलिए यह श्रम से विलगाव की अवधारणा उत्पन्न होती है, परंतु यह वस्तुगत नहीं है। अधिकतर मनुष्य किसी ना किसी रूप में उत्पादन प्रक्रिया से जुड़े हो्ते हैं और किसी ना किसी प्रकार का श्रम कर रहे होते हैं। समाज के ऊपरी पायदान पर बौद्धिक श्रम की बढोतरी और शारीरिक श्रम की कमी होती जाती है। परंतु श्रम से विलगाव मनुष्य के हित में हो ही नहीं सकता।

इसी वज़ह से यह आसानी से देखा जा सकता है, शारीरिक श्रम से विलगित व्यक्ति विभिन्न रोगों का शिकार होते जाते हैं, मनुष्य जीवन के आनंद से भी विलग होते जाते हैं। जैसा कि आपने इशारा किया है। यही वास्तविक परिस्थितियां, वहां अपनी बारी में उन्हें सचेत करती हैं, और यह भी हम देख ही सकते है कि फिर वहां शारीरिक श्रम की वैकल्पिक विधियां खोजी जाती है, किसी ना किसी तरह से शरीर से श्रम करवाने की परिस्थितियां पैदा की जाती हैं। चूंकि यह श्रम व्यक्तिगत रूप से शरीर को स्वस्थ बनाए रखने के लिए, लगभग निरुद्देशीय सा होता है अतः इसमें नीरसता खत्म करने के लिए इसके साथ कई तरह की अवधारणाएं जोड़ी जाती हैं, ताकि इसे आंनंद से भारा जा सके तथा इसे एक सोद्देश्यता प्रदान की जा सके। यानि एक कृत्रिम जीवन शैली का समानान्तर विकास हो रहा है।

मनुष्यजाति का तकनीकि विकास उसके जीवन से भारी, नीरस, कठोर और सापेक्षतः गंदी श्रम-प्रक्रियाओं को खत्म करता है, इसमें उत्तरोत्तर प्रगति शनैः शनैः उत्पादन श्रम-प्रक्रियाओं को और हल्का और कम करेगी ही। जाहिरा तौर पर अभी की खास वर्गों की ही जागीर समझी जानी वाली तथाकथित श्रम-विहीनता और व्यापक होगी और जनसामान्य की ज़िंदगी मे प्रवेश करेंगी। सभी मनुष्यों के पास पर्याप्त समय और सुविधा होंगी कि वे अपनी श्रम की आवश्यकताओं को उनकी ही तरह सृजनात्मक कर सकें, खेलों के जरिए, विभिन्न कलाओं के जरिए, व्यक्तित्वविकास की प्रक्रिया से इन्हें जोड़ सकें, श्रम करने के लिए ही आनंद के साथ श्रम कर सकें। यानि यह कृत्रिम ना रहकर, सहज और स्वतस्फूर्त ढ़ंग से जीवन को और आनंददायक बनाएगी।

श्रम ने मनुष्य को पैदा किया है, जाहिर है मनुष्य श्रम से विलगित नहीं हो सकता। वह लाख कोशिशें कर ले, श्रम से विलगाव की परिस्थितियां उसे पुनः किसी ना किसी रूप में श्रम की ओर लौटा ही लाएंगी, और यह उसकी इच्छाओं से स्वतंत्र ही होगा।

इस पर अलग से शोध उपलब्ध हो, यह तो नहीं कहा जा सकता। परंतु मानवजाति के अनुभवों और ज्ञान के महान भंड़ार में निश्चित तौर पर इसके निष्कर्ष निकाले जाने लायक इशारे मौजूद हैं। आप अक्सर चेतनाओं में उथल-पुथल करने के अवसर निकालते रहते हैं, अच्छा लगता है।

शुक्रिया।

राज भाटिय़ा said...

मैं ने कहा श्रम ने ही तो मनुष्य को जानवर से मनुष्य बनाया है, वह छूटेगा तो रोग तो पकड़ेगा ही
आप की इस बात से सहमत है.
धन्यवाद

राम त्यागी said...

अच्छी चर्चा रही चाय पर
स्वेट मार्डेन की कुछ पुस्तक देख लें, शायद कुछ मिल जाए

L.Goswami said...

इस पर कुछ कहने का मन है ..लिखूंगी.

ali said...

(१) सैद्धांतिक रूप से 'समय' की विवेचना से हमारी सहमति मानिये यक़ीनन श्रम के विलगाव से इतर उसके आनंदमूलक रूपांतरण की संभावना अधिक है !

(२) जैविक और सामाजिक परिणाम ( बदलाव ) दीर्घकालिक होते है अतः इस प्रश्न के उत्तर हायपोथिटीकल ही हो सकते है मसलन श्रम विहीन मनुष्य की देह अंततः 'आभासी' रह जायेगी इस प्रक्रिया में पूंछ की तर्ज़ पर अंगों का क्रमिक विलोपन होगा ...संभव है सबसे अंत में उदर और कामांग विलोपित हों पर शुरुवात जरुर हाथ / पैरों से होगी ... नि:संदेह मष्तिस्क भी वर्चुअल हो जायेगा तब परिवार ,वैवाहिक सम्बन्ध ,जातियां और सारी सामाजिकता भी आभासी हो जायेंगी ... उन दिनों चाय का स्वाद ...मधुमेह ...और चाय के बिल्स / पूंजी भी ...... :)

सुनील दत्त said...

रोचक

विष्णु बैरागी said...

कुछ आधारभूत सत्‍य होते हैं जो सर्वकालिक होते हैं। किन्‍तु प्रत्‍येक काल खण्‍ड के अपने सच होते हें, यह भी एक आधार भूत सत्‍य है। दो आधार भूत सत्‍य जब इस प्रकार एक ही समय में आमने-सामने होते हैं तो ऐसे विषय जन्‍म लेते हैं।

मुझे लगता है, यह (और ऐसे) विषय प्रत्‍येक समय में उपस्थित रहते हैं और हमें लगता रहता है कि यह सब अचानक ही हमारे समय में, हमारे सामने आ गया है।