Wednesday, April 21, 2010

"जो चाहो मुझ पर जुल्म करो" एक नज़्म पाकिस्तान से

शिवराम के संपादन में प्रकाशित हो रही  "सामाजिक यथार्थवादी पत्रिका अभिव्यक्ति" का 36वाँ अंक प्रेस से आ गया है। इस का वितरण आरंभ कर दिया है। प्रकाशक की पाँच सुरक्षित पाँच प्रतियाँ मुझे मिलीं। अभी पूरी तरह इस अंक को देख नहीं पाया हूँ। पर इस में पाकिस्तानी कवि जावेद अहमद जान की एक नज़्म मुझे पसंद आई जो लाहौर के दैनिक जंग में 11 अप्रेल 1989 को प्रकाशित हुई थी। नज़्म आप के लिए पुनर्प्रस्तुत कर रहा हूँ ----

मैं बागी हूँ
  • जावेद अहमद जान

मैं बागी हूँ, मैं बागी हूँ
जो चाहो मुझ पर जुल्म करो।

इस दौर के रस्म रिवाजों से 
इन तख्तों से इन ताजों से
 जो जुल्म की कोख से जनमे हैं
इन्सानी खून से पलते हैं
ये नफरत की बुनियादें हैं
और खूनी खेत की खादें हैं

मैं बागी हूँ, मैं बागी हूँ
जो चाहो मुझ पर जुल्म करो।

मेरे हाथ में हक का झण्डा है
मेरे सर पे जुल्म का फन्दा है
मैं मरने से कब डरता हूँ
मैं मौत की खातिर जिन्दा हूँ
मेरे खून का सूरज चमकेगा
तो बच्चा बच्चा बोलेगा
मैं बागी हूँ, मैं बागी हूँ
जो चाहो मुझ पर जुल्म करो।
 फ्रेंच कारटूनिस्ट, चित्रकार, मूर्तिकार डौमियर ऑनर (1808-79).की एक कृति

14 comments:

राज भाटिय़ा said...

मैं बागी हूँ, मैं बागी हूँ
जो चाहो मुझ पर जुल्म करो।
बहुत सुंदर गजल पढ कर ऎसा लगा जेसे हम कोई देश भगती का गीत गा रहे हो, जल्द ही भारत मै भी ऎसे गीतो की जरुरत पडेगी....
आप का ओर "जावेद अहमद जान साहब"" का धन्यवाद

Udan Tashtari said...

जावेद अहमद जान साहब की नज़्म पसंद आई, आभार पढ़वाने का.

फ़िरदौस ख़ान said...

मैं बागी हूँ, मैं बागी हूँ
जो चाहो मुझ पर जुल्म करो।

इस वक़्त हमारी यही हालत है...
शायद हर सच लिखने वाले की होती है...

Suman said...

nice

Arvind Mishra said...

एक सशक्त विद्रोही -रचना !

डॉ. मनोज मिश्र said...

बहुत सुंदर.

विष्णु बैरागी said...

मैं मरने से कब डरता हूँ
मैं मौत की खातिर जिन्दा हूँ

जिन्‍दगी का मोल ऐसे लोग ही जानते हैं।

आपने आज का सवेरा बहुत शानदार करा दिया यह नज्‍म पढवा कर।

धन्‍यवाद।

Meenu Khare said...

एक अच्छी रचना पढवाने के लिए धन्यवाद.

रवि कुमार, रावतभाटा said...

वाकई यह तेवर...
यह ज़िंदादिली...

अपने आप में टटोलता हूं...

रवि कुमार, रावतभाटा said...

वाकई यह तेवर...
और यह ज़िंदादिली...

अपने आप में टटोलता हूं...

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत सुन्दर रचना ।

हिमांशु । Himanshu said...

खूबसूरत कविता ! प्रस्तुति का आभार ।

जितेन्द़ भगत said...

आक्रोश की सचेत अभि‍व्‍यक्‍ति‍।

संदीप said...

नज़्म भी अच्‍छी लगी और डॉमियर की पेंटिंग भी। इस पेंटिंग का शीर्षक संभवत: 'अपराइजिंग' है...