Tuesday, March 23, 2010

वे सूरतें इलाही इस देश बसतियाँ हैं -महेन्द्र नेह

वे सूरतें इलाही किस देश बसतियाँ हैं,
अब जिनके देखने को आँखें तरसतियाँ हैं*

*यह मीर तकी 'मीर' का वह मशहूर शैर है जो अक्सर शहीद भगतसिंह और उन के साथियों के होठों पर रहा करता था। इस शैर में अवाम का खास सवाल छुपा है....

न अमर शहीदों भगतसिंह, राजगुरू और सुखदेव के 79वें बलिदान दिवस पर उन का स्मरण करते हुए उस सवाल के जवाब दे रहे हैं महेन्द्र नेह उसी जमीन पर लिखे गए शैरों की इस ग़ज़ल से.....

आप पढ़िए.....
वे सूरतें इलाही इस देश बसतियाँ हैं
  • महेन्द्र नेह


वे सूरतें इलाही इस देश बसतियाँ हैं
लाखों दिलों के अरमाँ बनके धड़कतियाँ हैं

जो रात-रात जगतीं, बेचैनियों में जीतीं
तारों सी दमकतीं जों, गुल सी महकतियाँ हैं

घनघोर अँधेरों का आतंक तोड़ने को
हाथो में ले मशालें, घर से निकलतियाँ हैं

इंसानियत के हक़ में, आज़ादियों की ख़ातिर
फाँसी के तख़्त पर भी, खुल के विंहसतियाँ हैं

जिनके लहू से रौशन, कुर्बानियों की राहें
इतिहास के रुखों को, वे ही पलटतियाँ हैं

आओ कि आ भी जाओ, फिर से उठायें परचम
हमसे करोड़ों आँखें, उम्मीद रखतियाँ हैं



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