Tuesday, January 12, 2010

अकर्मण्यता का शिकार एक बेहद बकवास अदालती दिन

ल का दिन बहुत बकवास और फालतू दिन था, कम से कम मेरे लिए। कुल छह मुकदमे थे। सारे के सारे अन्तिम बहस के लिए निश्चित थे। मैं ने सभी मुकदमों में तैयारी की। इस भरोसे कि मौका मिला तो सभी में अंतिम बहस कर डालूंगा। कम से कम कुछ में तो निर्णय हो सकेगा। लेकिन सब कुछ मेरे अकेले के सोचने से थोड़े ही हो सकता है। एक मुकदमे में मेरे ही सेवार्थी (मुवक्किल) की माँ का देहान्त हो गया था। वह पेशी पर नहीं आ सकता था। सेवार्थी की अनुपस्थिति में मुकदमे में बहस करना कुछ अच्छा नहीं लगता। फिर भी केवल इसलिए कि मुकदमा किनारे लगे, मैं उस में बहस को तैयार था। पता नहीं क्यों उस मुकदमे में जज खुद बहस सुनने को तैयार नहीं। सामने वाला वकील भी एक बजे तक अदालत में नहीं आया। मौका देख कर अदालत ने तारीख बदल दी। इस मुकदमे में मेरे पक्ष की बहस लगभग सुनी जा चुकी है,  वह भी चार बार में पूरी विस्तारित रुप में। अदालत का खुद का मानना था कि अब उस में समय नहीं लगेगा और मैं एक ही दिन में उसे पूरी कर दूँ। निश्चित रूप से मुझे अवसर मिलता तो मैं एक घंटे से भी कम समय में बहस पूरी कर देता। पर क्या कहा जाए? इस मुकदमे  में मेरा सेवार्थी हाईकोर्ट से निर्देश ला चुका है कि दो माह में इस का निर्णय किया जाए। फिर भी किसी न किसी बहाने यह निर्णीत नहीं हो रहा है। निर्देश को लाए छह माह से भी अधिक समय हो चुका है। खैर निर्देश की लाज रखते हुए अदालत ने उस में चार दिन बाद की तिथि बहस हेतु नियत की है।

गला मुकदमा भी उसी अदालत में है और दस वर्ष से चल रहा है। पिछले चार बरस से तो वह अन्तिम बहस में चल रहा है। कोई उसे सुनना ही नहीं चाहता है। बात मामूली है लेकिन न जाने क्यो अदालत उसे भारी समझती है। इस मामले में मेरा सेवार्थी हर पेशी पर आता है और अदालत पर सुनवाई के लिए दबाव बनाता है, वह अदालत को अनेक बार यह कह चुका है कि मुकदमे का निर्णय कर दिया जाए। चाहे उस के विरुद्ध ही क्यों न हो। लेकिन आज यह सेवार्थी भी अदालत नहीं आया। यह कुछ राजनैतिक गतिविधियों में संलग्न रहता है। इन दिनों पंचायतों के चुनाव चल रहे हैं। हो सकता है उसी कारण न आया हो। मुझ से भी उस ने कोई संपर्क नहीं किया। अदालत ने उसे भी गैर हाजिर देख मुकदमे को नहीं सुना।  मैं ने उस में जल्दी की तिथि तय करने की बात कही तो अदालत ने कहा हम खुद जल्दी की तिथि देंगे। लेकिन तिथि तय हुई कोई बयालीस दिन की। लगता है अदालत के जज मूडी होते हैं वे वही करते हैं जो उन्हें करना होता है। इन दोनों मुकदमों में भी यही स्थिति है। इन में समय खपाना पड़ेगा। कम से कम आठ दस घंटों का तब जा कर उन में निर्णय हो सकेगा। अदालत में मुकदमों का अम्बार है। अदालतें ऐसे सर खपाऊ मुकदमों को क्यों सुने?  जब वह मुश्किल से मिनटों के श्रम से कुछ मुकदमों में निर्णय पारित कर सकती है। मनुष्य की हमेशा लालसा रहती है कि कम से कम काम करने पर अधिक से अधिक प्रतिफल और श्रेय मिले। अदालतों के जज इस लालसा से अछूते क्यों रहें?

चार अन्य मुकदमे एक ही न्यायार्थी द्वारा दायर किए हुए हैं जिन में जीवन बीमा निगम से राहत की मांग की गई थी। एक ही प्रकृति के मुकदमे होने और निर्णय के लिए आवश्यक बिंदु सभी मुकदमों में एक ही होने के कारण उन्हें समेकित कर दिया गया था। मै समझता था कि यह आसान काम है और जज इसे जरूर करेगा। लेकिन ये जज साहब भी लगता है काम करने के मूड में नहीं थे। शायद उन्हों ने यह खबर अपने स्टाफ को दे दी थी कि जितने मुकदमों में वकील चाहें पेशी दे दी जाए। अब आवेदक के वकील को पता है कि उस के ये चारों मुकदमे निरस्त होने की संभावना अत्य़धिक प्रबल है तो वह आसानी से बहस करने का मन नहीं बना पा रहा है। उस ने अदालत से समय चाहा और अदालत ने उसे दे दिया। जज साहब को यहाँ भी फिक्र नहीं है। उन के यहाँ छोटे-छोटे काम इतने हैं कि वे केवल फूँक मार दें तो उन से अपेक्षित काम से चार गुना दिखाई देने लगे।

दालतों की संख्या कम होने और हर अदालत में मुकदमों के अंबार ने और उच्च न्यायालय द्वारा  निश्चित किए गए क़ोटा सिस्टम ने उन्हें अकर्मण्य बना दिया है। वे अंबार में से आसान काम तलाशते हैं और अपने निर्धारित कोटे से दो-तीन गुना अधिक काम कर के अपनी परफोरमेंस को श्रेष्ठ बनाने में जुटे रहते हैं। इसे कहते हैं हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा आए। लेकिन ऐसा भी नहीं कि इस दौर में काम करने वाले जज नहीं हैं। एक मुकदमे के अंतिम बहस के स्तर पर पहुँचने के बाद एक पक्षकार का देहांत हो गया। सूचना मिलते ही प्रार्थी ने मृतक पक्षकार के विधिक प्रतिनिधियों को रिकार्ड पर लेने का आवेदन प्रस्तुत किया। सामान्य जज उस पर तुरंत आदेश पारित न कर के उस के लिए कोई आगे की तिथि तय कर देता। लेकिन अदालत के जज ने उसी समय आदेश पारित कर विधिक प्रतिनिधियों को नोटिस जारी करने का आदेश दिया और कहा कि तुरंत प्रोसेस प्रस्तुत करें जिस से अगली तिथि तक उन्हें नोटिस मिल जाएँ। अगले दिन ही मृतक के एक और विधिक प्रतिनिधि का पता लगा और उस के लिए आवेदन दिया गया तो जज ने तुरंत पत्रावली अदालत में मंगा कर उसे भी साथ ही नोटिस जारी करने का आदेश दे दिया। इस मुकदमे की पत्रावली भी अदालत की शायद सब से मोटी  पत्रावली है, लेकिन यह जज उसे शीघ्र सुनवाई कर निर्णय करना चाहता है। उस जज का सभी मुकदमों के प्रति यही व्यवहार है। ऐसे ही कुछ जजों ने शायद न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को बचा रखा है।
जों में जो अकर्मण्यता बढ़ रही है उस का मुख्य कारण अदालतों का पर्याप्त संख्या में न होना और लगभग सभी अदालतों के पास उन की वास्तविक क्षमता से चार-पांच गुना काम का सदैव लंबित रहना है जिस से वे अपने लिए आसान काम का चयन कर लेते हैं और मुश्किल मुकदमे निर्णय के लिए तरसते हुए गिनीज और लिम्का बुकों में रिकार्ड दर्ज कराने की ओर बढ़ते रहते हैं।
Post a Comment