Sunday, January 10, 2010

राजनीति और कूटनीति के सबक सीखती जनता

सुबह ग्यारह बजे कोर्ट परिसर के टाइपिस्टों की यूनियन के चुनाव थे। मुझे चुनाव में सहयोग करने के लिए ग्यारह बजे तक क्षार बाग पहुँच जाना था। लेकिन कई दिनों से टेलीफोन में हमिंग आ रही थी। दो दिनों से शाम से ही वह इतनी बढ़ जाती थी कि बात करना मुश्किल हो जाता था।  इसी लाइन पर ब्रॉडबैंड के पैरेलल एक टेलीफोन और था। जिस का उपयोग करने पर ब्रॉडबैंड का बाजा बज जाता था जो आसानी से बंद नहीं होता था। कल रात ही मैं ने शिकायत दर्ज करवा दी थी। सुबह साढ़े दस बजे जब क्षारबाग जाने के लिए निकलने वाला था तो टेलीफोन विभाग वालों का फोन आ गया। मैं ने यूनियन से अनुमति ली कि यदि मैं देरी से आऊँ तो चलेगा? उन्हों ने अनुमति दे दी। मैं ने दस वर्ष पहले मकान में बिछाई गई छिपी हुई लाइन का मोह छोड़ अपनी टेलीफोन लाइन टेलीफोन तक सीधी खुली प्रकार की लगवा दी और दोनों फोन उपकरण ब्रॉडबैंड के फिल्टर के बाद लगवा दिए।  दोनों उपकरण काम करने लगे। टेलीफोन को चैक किया तो हमिंग नहीं थी। मैं क्षार बाग चल दिया।

हाँ मत डालने का काम आरंभ हो चुका था। तीन बजे तक मत डालने का समय था। इस बीच आमोद-प्रमोद चलता रहा। पकौड़ियाँ बनवा कर खाई गईं। कुल 65 मतदाता थे। ढाई बजे तक सब ने मत डाल दिए। तो मतों की गिनती को तीन बजे तक रोकने का कोई अर्थ नहीं था। हमने मत गिने। तो जगदीश भाई केवल पंद्रह मतों से जीत गए। वे कम से कम पैंतालीस मतों से विजयी होने का विश्वास लिए हुए थे। वे कई वर्षों से अध्यक्ष चले आ रहे हैं। पर परिणाम ने बता दिया था कि परिवर्तन की बयार चल निकली है। 25 और 40 मतों का ध्रुवीकरण अच्छा नहीं था। किसी बात पर मतभेद यूनियन को सर्वसम्मत रीति से चलाने में बाधक हो सकता था। सभी मतदाताओं में राय बनने लगी कि 25 मत प्राप्त करने का भी कोई तो महत्व होना चाहिए। कार्यकारिणी में एक पद वरिष्ठ उपाध्यक्ष का और सृजित किया गया जिस पर सभी 65 मतदाताओं ने स्वीकृति की मुहर लगा दी। मैं चकित था कि अब राजनीति के साथ साधारण लोग भी कूटनीति को समझने लगे हैं।
स घटना ने समझाया कि कैसे किसी संस्था को चलाया जाना चाहिए। इस तरह अल्पमत वाले 25 लोग भी संतुष्ट हो गए थे। जिस से यूनियन के मामलों में सर्वसम्मति बनाने में आसानी होगी। क्षार बाग  किशोर सागर सरोवर की निचली ओर है। इस विशाल बाग के एक कोने में कोटा के पूर्व महाराजाओं की अंतिम शरणस्थली है जहाँ उन की स्मृति में कलात्मक छतरियाँ बनी हैं। यहीं कलादीर्घा और संग्रहालय हैं। इसी में  एक कृत्रिम झील  बनी है जो सदैव पानी से भरी रहती है। हम लोगों का मुकाम इसी झील के इस किनारे पर बने एक मंदिर परिसर में था जो बाग का ही एक भाग है। झील में पैडल बोटस्  थीं, बाग में घूमने वाले लोग उस का आनंद ले रहे थे। झील में 15 बत्तखें तैर रही थीं। कि किनारे पर एक कुत्ता आ खड़ा हुआ बत्तखों को देखने लगा। उसकी नजरों में शायद खोट देख कर सारी बत्तखें किनारे के नजदीक आ कर चिल्लाने लगीं। कुत्ता कुछ ही देर में वहाँ से हट गया। बत्तखें फिर से स्वच्छन्द तैरने लगीं। सभी इन दृश्यों का आनंद ले रहे थे कि भोजन तैयार हो गया। मैं ने भी सब के साथ भोजन किया और घर लौट आया।

र लौट कर फोन को जाँचा तो वहाँ फिर हमिंग थी और इतनी गहरी कि कुछ भी सुन पाना कठिन था।  साढ़े चार बजे थे। मैं ने टेलीफोन विभाग में संपर्क किया तो पता लगा अभी सहायक अभियंता बैठे हैं। कहने लगे फोन उपकरण बदलना पड़ेगा। यदि संभव हो तो आप आ कर बदल जाएँ। कल रविवार का अवकाश है। मैं पास ही टेलीफोन के दफ्तर गया और कुछ ही समय में बदल कर नया उपकरण ले आया। उसे लाइन पर लगाते ही हमिंग एकदम गायब हो गई। उपकरण को देखा तो  प्रसन्नता हुई कि यह मुक्तहस्त भी  है। अब मैं काम करते हुए भी बिना हाथ को या अपनी गर्दन को कोई तकलीफ दिए टेलीफोन का प्रयोग कर सकता हूँ। शाम को कुछ मुवक्किलों के साथ कुछ वकालती काम निपटा कर रात नौ बजे दूध लेने गया तो ठंडक कल से अधिक महसूस हुई। वापसी पर महसूस किया कि कोहरा जमने लगा है। स्वाभाविक निष्कर्ष निकाला कि शायद कल लगातार तीसरी सुबह फिर  अच्छा कोहरा देखने को मिलेगा। सुखद बात यह है कि कोहरा दिन के पूर्वार्ध में छट जाता है और शेष पूर्वार्ध में धूप खिली रहती है। जिस में बैठना, लेटना, खेलना और काम करना सुखद लगता है। आज की योजना ऐसी ही है। कल दोपहर के भोजन के बाद छत पर सुहानी धूप में शीत का आनंद लेते हुए काम किया जाए, और कुछ आराम भी।

चित्र  1- किशोर सागर सरोवर में बोटिंग, 2- क्षार बाग की छतरियाँ

15 comments:

Arvind Mishra said...

आजकी रोजनामचा में कूटनीति को विश्लेषित किया गया सोदाहरण -आगे पढता रहूँगा ...

बी एस पाबला said...

दोपहर के भोजन के बाद छत पर सुहानी धूप में शीत का आनंद

अच्छी कूटनीति है :-)

बी एस पाबला

डॉ. मनोज मिश्र said...

सुहानी धूप में शीत का आनंद लेते हुए काम किया जाए, और कुछ आराम भी..
यह बढिया रहेगा.,आनंद दायक.

खुशदीप सहगल said...

द्विवेदी सर,
कूटनीति का अच्छा सबक दिया...मेरा मानना है कि हमारे देश में भी कम से कम एक बार हर फील्ड के अच्छे, ईमानदार और साख वाले लोगों को लेकर राष्ट्रीय सरकार (बिना किसी पार्टी लाइन वाली) का प्रयोग ज़रूर करके देखा जाना चाहिए...

जय हिंद...

ali said...

आपने टेलीफोन वालों से एक दिन में दो बार काम निकाल लिया हमारे लिए ये खबर बहुत बड़ी है !

बाकि रहा यूनियन की सर्वसम्मति का मामला , ठीक ही किया उन्होंने !

निर्मला कपिला said...

आपका रोज़नामचा रोचक लगा शुभकामनायें

अनूप शुक्ल said...

दिन में दो बार हमिंग ठीक करवा ली। क्या जलवा है।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

रोचक वृतान्त पढ़ना सुखद लगा। जय हो।

ravikumarswarnkar said...

कूटनीति का पाठ अच्छा रहा...

राज भाटिय़ा said...

आप ने छत की धुप फ़िर से याद दिला दी, बहुत सुंदर
बहुत सुंदर लगा आप का यह लेख

काजल कुमार Kajal Kumar said...

उम्मीद करनी चाहिये कि फोन अब ठीक रहेगा

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

सुन्दर। 65 वोटर, उनमें भी खींचतान और सर्वसम्मति का प्रयास।
यूनियन में भी मैनेजमेण्ट तकनीकों का प्रयोग जरूरी होता है!

rashmi ravija said...

बड़े रोचक अंदाज़ में बयाँ किया है....छत पर धूप का जिक्र सुनते ही,लगता है...कितना कुछ मिस करवा देती है...ये महानगर की ज़िन्दगी...ब्लॉग जगत के सहारे ही कुछ अनुभवों के आनंद से हम भी रु-बरु हो जाते हैं

anitakumar said...

फ़ोन ठीक हो गया, बधाई।

विष्णु बैरागी said...

'अब राजनीति के साथ साधारण लोग भी कूटनीति को समझने लगे हैं।' यह बात सारे नेताओं को बराबर समझ नहीं आ रही है।

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