समय-2009, समय-2010
- दिनेशराय द्विवेदी
तुमने ही मुझे नाम दिया
पलों, विपलों, निमिषों में
विदा करो मुझे ......
लो मैं आ रहा हूँ फिर
चित्रों पर दोहरा क्लिक कर पूरे आकार में देखें
क्या बतलाएँ दुनिया वालो! क्या-क्या देखा है हमने ...!
हड़ताल का अर्थ कम से कम वकीलों के लिए छुट्टियाँ नहीं हो सकता। हड़ताल में हम भले ही अदालतों में नहीं जा रहे हों लेकिन अपने मुवक्किलों का इतना तो ध्यान रखना ही होता है कि उन के किसी मुकदमे में उन के किसी हित की हानि न हो। रोज अदालत जाना जरूरी है। रोज के मुकदमों में अदालत ने क्या कार्यवाही की है , या केवल तारीख बदल दी है इस का पता लगाना जरूरी है। वही सुबह समय से अदालत तक जाना और वही शाम पाँच बजे वापस लौटने का क्रम जारी है। शाम को दफ्तर में वही समय से बैठना फाइलों को तारीखें बदल कर उन की सही जगह रखना। वही मुवक्किलों का आना, उन की समस्याएँ सुलझाना आदि सब कुछ जारी है। इस बीच किसी को तत्काल किसी उपाय की जरूरत हुई तो उसे उस की व्यवस्था भी कर के दी और उस के हितों की सुरक्षा भी की। जब हम पूर्णकालिक रूप से इस प्रोफेशन में व्यस्त हों तो यह कैसे कहा जा सकता था कि हम छुट्टियों पर हैं।
वास्तव में वकीलों की हड़ताल को हड़ताल की संज्ञा देना ही गलत है। इसे अधिक से अधिक अदालतों का बहिष्कार कहा जा सकता है। बस फर्क पड़ा है तो यह कि वकीलों की कमाई इस बीच लगभग शून्य या उस से कम ही रही है। वकील अपने वकालत के खर्च भी पूरी तरह नहीं निकल पा रहे हैं। वकीलों का मानना है कि वे प्रोफेशन के हिसाब से कम से कम साल भर पिछड़ गए हैं। ऐसे में उन से कोई कहे कि वे छुट्टियाँ मना रहे हैं, तो उन पर क्या गुजरती होगी ये तो वही बता सकता है जिेसे यह सब सुनता पड़ा हो। हो सकता है कुछ गुस्सा भी आता हो। लेकिन यह प्रोफेशन ही ऐसा है, उसे भी वकील मुस्कुराकर या उसे विनोद में बदल कर विषय को ही गुम कर देता है । अब आंदोलन अंतिम दौर में है। सरकार से बात जारी है। हो सकता है नए साल के पहले सप्ताह में कोई हल निकल आए। 
शिवराम जी की कुछ कविताएँ आप ने पढ़ीं। उन के काव्य संग्रह "माटी मुळकेगी एक दिन" से एक और कविता पढ़िए....
अकाल
सूख जाती हैं नदियाँ
जज साहब स्वयं भी अपने चैम्बर में होने के कारण अदालत की मर्यादा से बाहर थे। उन के मुख से अचानक निकला "भैंचो, भरतपुर में बोलते तो ऐसे ही हैं।"
पिछले साल के दिसम्बर में भी गालियों पर बहुत कुछ कहा गया था। मैं ने नारी ब्लाग पर एक टिप्पणी छोड़ी थी ......दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...
किसी भी मुद्दे पर बात उठाने का सब से फूहड़ तरीका यह है कि बात उठाने का विषय आप चुनें और लोगों को अपना विषय पेलने का अवसर मिल जाए। गाली चर्चा का भी यही हुआ। बात गाली पर से शुरू हुई और गुम भी हो गई। शेष रहा स्त्री-पुरुष असामनता का विषय।
वैसे गालियों की उत्पत्ति का प्रमुख कारण यह विभेद ही है।
सुजाता said...
वैसे गालियों की उत्पत्ति का प्रमुख कारण यह विभेद ही है।
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दिनेश जी जब आप मान ही रहे हैं कि स्त्री पुरुष असमानता और गाली चर्चा में प्रमुख सम्बन्ध है फिर आपको यह बात उठाने का फूहड़ तरीका कैसे लग सकता है।
अथवा आप कहना चाहते हैं कि क्योंकि मैने मुद्दे को सही तरीके से उठाया इसलिए कोई cmpershad सरे आम गाली दे जाना जायज़ साबित हो जाता है।
माने आपको मेरी बात पसन्द नहीं आएगी तो क्योंकि आप पुरुष हैं तो आप भी ऐसी ही कोई भद्दी बात कहने के हकदार हो जाएंगे।
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said:
देर से आने का लाभ,
चिट्ठों पर चर्चा के साथ
चर्चा पर टिप्पणी और,
उस पर चर्चा
वर्षांत में दो दो उपहार।
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...
लोग गालियाँ क्यों देते हैं ? और पुरुष अधिक क्यों? यह बहुत गंभीर और विस्तृत विषय है। सदियों से समाज में चली आ रही गालियों के कारणों पर शोध की आवश्यकता है। समाज में भिन्न भिन्न सामाजिक स्तर हैं। मुझे लगता है कि बात गंभीरता से शुरू ही नहीं हुई। हलके तौर पर शुरू हुई है। लेकिन उसे गंभीरता की ओर जाना चाहिए।
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...
लोगों को पता ही नहीं होता वे क्या बोल रहे हैं। शायद कभी कोई भाषा क्रांति ही इस से छुटकारा दिला पाए।
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...
बस अब यही शेष रह गया है कि यौनिक गालियाँ मजा लेने की चीज बन जाएं। जो चीज आप को मजा दे रही है वही कहीं किसी दूसरे को चोट तो नहीं पहुँचा रही है।
आज कल व्यस्तता के कारण स्वयं कुछ लिख पाने में असमर्थ रहा हूँ। लेकिन इस असमर्थता का लाभ यह हुआ है कि मैं शिवराम जी की कविताएँ आप के सामने प्रस्तुत कर पा रहा हूँ। उन के सद्य प्रकाशित तीन काव्य संग्रहों में से एक कुछ तो हाथ गहों से एक गीत आप के पठन के लिए बिना किसी भूमिका के प्रस्तुत है .....
मंजिलों को नापते हुए"माटी मुळकेगी एक दिन" से शिवराम की एक और कविता
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