Wednesday 30 September 2009
Monday 28 September 2009
कल को खु़र्शीद भी निकलेगा, सहर भी होगी
- पुरुषोत्तम 'यक़ीन'
Saturday 26 September 2009
बुरे फँसे, वकील साहब!
Thursday 24 September 2009
फुरसत पर डाका
हड़ताल तो कोटा के वकील छह साल से करते आए हैं, महीने के आखिरी शनिवार को। चाहते हैं, कोटा में हाईकोर्ट की बैंच खुल जाए। छह साल से एक हड़ताल चल रही है। किसी के कान पर जूँ तक नहीं रेंगती। वह स्वैच्छिक अवकाश जैसी चीज बन गई है। लेकिन हड़ताल बदस्तूर जारी है। कभी तो बिल्ली के भाग से छींका टूटेगा। कभी तो हाईकोर्ट और उस की एक बैंच की कमर फाइलों के बोझ से दोहरी होने लगेगी। कभी तो सरकार सोचेगी ही कि और भी बैंचें बनाई जाएँ। वैसे भी बीस बीस जजों को दो जगह बिठाने से क्या फायदा? इस की जगह दस दस जजों को चार जगह बिठा दिया जाए तो जनता को तो सुविधा होगी ही। यह सीधे-सीधे डेमोक्रेसी के डीसेंट्रलाइजेशन का मामला बनता है। पर अभी हड़तालियों का ध्यान अपनी मांग के इस लोजीकल प्रेजेंटेशन की तरफ नहीं गया है।Monday 21 September 2009
कुछ संवाद 'गटक चूरमा' नाटक से .....
- अपने वो वकील साहब हैं न?
- कौन?
- अरे ! वो ही, जो 'तीसरा खंबा' पे कानूनी बात बतावत हैं, और 'अनवरत' पर भी न जाने क्या क्या लिक्खे हैं।
- हाँ, हाँ वही न, जो सिर से गंजे हो कर भी 'शब्दों का सफर' में सरदार बने बैठे हैं?
- हाँ, वो ही।
- वो दो दिन से कुच्छ भी ना लिख रहे, अनवरत खाली पड्यो है।
- क्या? दो दिन में लिखने को कुच्छ ई ना मिल्यो उन को? आज तो बड़्डे-बड्डे मौके थे जी। एक तो पाबला जी को जनम दिन थो, दूजो करीना कपूर को, तीजो ईद को। कच्छु नाहीं तो मुबारक बाद ही लिक्ख मारते!
-एक दिन तो निकल गयो, शिबराम जी की नाटकाँ की किताबाँ का लोकार्पण में।
-आज दफ्तर में काम करने बैठ गए जी, फेर साम को कोई से मिलने-जुलने निकल गए जी। अब खा पी के लोकार्पण हुई किताब बाँच रहे हैं।
- कौन सी किताब बाँच रिये हैं जी?
- वो, ही जी, का कहत हैं उसे ..... "गटक चूरमा"।
- अब ये गटक चूरमा का होवे जी?
- य्हाँ तो किताब और नाटक को नाम है जी। पर जे एक चूरन होवे, जो मुहँ में फाँके तो खुद बे खुद पानी आवे और गले से निच्चे उतर जावे।
- वो तो ठीक, पर ई किताब में का लिक्खो होगो?
- चल्ल वा वकील साब से ही पूच्छ लेवें।
- चल!
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- वकील साब! गटक चूरमा पढ़ो हो। कच्छु हमें ही सुना देब, दो-च्चार लाइन।
- तो सुनो.....
भोपा और भोपी, वे ही जो राजस्थान में फड़ बांच सुनावें। रामचंदर के गांव बड़ौद पहुंच गए हैं। जबरन रामचंदर के बेटी जमाई भी बन लिए। अब रामचंदर ले जा रहा है उन्हें अपने घर। रास्ते में कुत्ता भोंकता है।
रामचंदर- तो ..... तो....... (कहते हुए पत्थर मार कर कुत्ते को भगाता है और कहता है) मेहमान हैं, नालायक कोटा से आए हैं ... (फिर भोपा-भोपी से मुखातिब हो कर) कुत्ते हैं, नया आदमी देखते हैं तो भोंकते हैं। कुत्ते तो कोटा में भी भोंकते होंगे।
भोपी- ना, हमारे यहाँ तो काटते हैं, फफेड़ देते हैं, पेट में चौदह इंजेक्शन लगें। नहीं तो कुत्ते के साथ ही जै श्री राम!
भोपा- नही, ये तो झूठ बोलती है। हमारे यहाँ तो कुत्ते दुम हिलाते हैं और पैर चाटते हैं।
भोपी- चाटते हैं, पर बड़े लोगों के। छोटे लोगों को देख कर तो ऐसे झपटते हैं जैसे पुलिस।
भोपा- ऐ भोपी, तू पालतू कुत्तों की बात कर रही है और यहाँ बात चल रही है गली मोहल्ले के कुत्तों की। समझती नहीं है क्या।
रामचंदर- सच कहते हो भाई। उन कुत्तों की तो किस्मत ही निराली है, जो कोठी-बंगलों में रहते हैं। किसन बता रहा था कि बड़े ठाट हैं भाई उन के। हम से तो वे कुत्ते ही बढ़िया।
भोपा- बढ़िया? पाँचों अंगुली घी में...।
भोपी- अरे! मेरे राजा, पाँचों नहीं दसों अंगुलियाँ घी में। साहब और मेम साहब अपने हाथों मालिस करें, नहलावें-धुलावें, बाथरूम, टॉयलट करावें...।
भोपी- (रामचंदर से) मतलब टट्टी पेशाब करावें।
Saturday 19 September 2009
अपना मुख जन-गण की ओर -शिवराम
आज शिवराम के नाटकों की दो पुस्तकों 'गटक चूरमा' (मूल्य 35 रुपए) और 'पुनर्नव' (मूल्य 50 रुपए) का लोकार्पण है। इन में सम्मिलित सभी नाटक खेले जा चुके हैं और उन का नाटकीय आवश्यकताओं के अनुसार पुनर्लेखन भी हुआ है। सभी नाटक किसी भी नाटक रूप में खेलने के लिए आदर्श हैं। मैं चाहता था कि इस अवसर पर इन नाटकों के बारे में कुछ लिखूँ। जब मैं उन्हें इस हेतु फिर से पढ़ने बैठा तो लगा कि उन पर कुछ लिखने से बेहतर होगा कि 'गटक चूरमा' की भूमिका में लिखा गया शिवराम का आलेख यहाँ प्रस्तुत करना अधिक प्रासंगिक होगा। उसे ही बिना किसी टिप्पणी के यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ......
- शिवराम, 4-पी-46, तलवंडी, कोटा (राजस्थान)
- बोधि प्रकाशन, ऐंचारा बिल्डिंग, सांगासेतु रोड़, सांगानेर, जयपुर (राजस्थान)
Friday 18 September 2009
शिवराम की दो और नाट्य पुस्तकें पुनर्नव और गटक चूरमा
शिवराम की छह पुस्तकें पहले आ चुकी हैं। जिन में जनता पागल हो गई है, घुसपैठिए, दुलारी की माँ, एक गाँव की कहानी, राधेया की कहानी नाटकों की पुस्तकें हैं तथा सूली ऊपर सेज सेज पर विवेचनात्मक पुस्तक है। पिछले ही महीने उन के नाटक जनता पागल हो गई है के हाड़ौती अनुवाद जनता बावळी होगी का लोकार्पण हुआ है। जनता पागल हो गई है उन का वह नाटक है जिस ने उन्हें न केवल हिन्दी प्रदेशों में अपितु संपूर्ण भारत और विदेशों तक में पहुँचाया। इस नाटक को लगभग सभी भारतीय भाषाओं में खेला जा चुका है। राज की बात यह कि इस बन्दे ने भी उस नाटक में एक खासमखास भूमिका अनेक बार अदा की है।Thursday 17 September 2009
अश्यी काँई ख्हे दी ब्हापड़ा नें
स्वादिष्ट भोजन बना कर मित्रों को खिलाने और साथ खाने का आनंद
श्राद्ध पक्ष में ब्राह्मण को भोजन कराने का नियम है। लेकिन उस से अधिक महत्व इस बात का है कि उस के उपरांत आप को परिजनों और मित्रों के साथ भोजन करना चाहिए। इस से हम अपने पूर्वजों के मूल्यों व परंपराओं को दोहराते हुए उन का का स्मरण करते है। श्राद्ध के कर्मकांड को एक तरफ रख दें, जिसे वैसे भी अब लोग विस्मृत करते जा रहे है, तो मुझे यह बहुत पसंद है। मामा जी अमावस के दिन नाना जी का श्राद्ध करते थे। दिन में ब्राह्मण को भोजन करा दिया और सांयकाल परिजन और मित्र एकत्र होते थे तो उस में ब्राह्मणों की अपेक्षा बनिए और जैन अधिक हुआ करते थे। मुझे उन का इस तरह नाना जी को स्मरण करना बहुत अच्छा लगता था। नाना जी को या उन के चित्र को मैं ने कभी नहीं देखा, लेकिन मैं उन्हें इन्हीं आयोजनों की चर्चा के माध्यम से जान सका। लेकिन मेरे मस्तिष्क में उन का चित्र बहुत स्पष्ट है। Wednesday 16 September 2009
भूख लगे तो गाना गाsssss..आ.sssss.......
मीडिया संकट का बड़ा साथी है। वह संकट पैदा करता है, वह संकट नष्ट करता है। उसे दुकान चलानी है। गड्ढा खोदो और फिर उसे भरो। तमाशा देखें उन को विज्ञापन दिखा कर पैसा वसूल करो। कुछ न हो तो पुराने पेड़ की खोह में आग लगा दो। जब तक पेड़ जल न जाए। ढोल पीट पीट कर लाइव दिखाते रहो। लोगों को बिजी कर दो और बिजनेस करो। रोटी कमाओ। Monday 14 September 2009
हिन्दी इनस्क्रिप्ट टाइपिंग सीखें, हिन्दी में काम की गति और शुद्धता बढ़ाएँ और अधिक काम करें
हिन्दी हमारी मातृभाषा है। वह हमारे लिए सर्वाधिक संप्रेषणीय है और संज्ञेय भी। हम अधिकांशतः उसी का उपयोग करते हैं। हमारी आवश्यकता की पूर्ति उस से न होने पर हम अन्य भाषाओं को सीखने की ओर आगे बढ़ते हैं। यदि हिन्दी हमारी तमाम आवश्यकताओं की पूर्ति करने लगे तो क्यों कर हम अन्य भाषाओं को सीखने की जहमत क्यों उठाएँगे। लेकिन हमें अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए दूसरी दूसरी भाषाओं को सीखना पड़ता है। जिस का सीधा सीधा अर्थ है कि हिन्दी को अभी मनुष्य की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विकसित होना है। यदि किसी दिन हिन्दी इतनी विकसित हो जाए कि वह मनुष्य की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करने लगे तो अधिकाधिक लोग हिन्दी सीखने लगेंगे और एक दिन वह हो सकता है जब कि वह मनुष्य जाति द्वारा सबसे अधिक उपयोग की जाने वाली भाषा बन जाए।
Sunday 13 September 2009
पुरुषोत्तम ‘यक़ीन’ की दो बाल कविताएँ
अनवरत के पुराने पाठक ‘यक़ीन’ साहब की उर्दू शायरी से परिचित हैं। उन्हों ने हिन्दी, ब्रज, अंग्रेजी में भी खूब हाथ आजमाया है और बच्चों के लिए भी कविताएँ लिखी हैं। एक का रसास्वादन आप पहले कर चुके हैं। यहाँ पेश हैं उन की दो बाल रचनाएँ..........
(1)
- पुरुषोत्तम ‘यक़ीन’
देर रात घर आते पापा
फिर भी मम्मी क्यूँ कहती हैं
ज़्यादा नहीं कमाते पापा
- पुरुषोत्तम ‘यक़ीन’
कहने लगा भोर का तारा
सूरज चला काम पर अपने
तुम निपटाओ काम तुम्हारा
उठो सवेरे ने ललकारा ...
डाल-डाल पर चिड़ियाँ गातीं
चीं चीं चूँ चूँ तुम्हें जगातीं
जागो बच्चो बिस्तर छोड़ो
भोर हुई भागा अँधियारा
उठो सवेरे ने ललकारा ...
श्रम से कभी न आँख चुराओ
पढ़ो लिखो ज्ञानी कहलाओ
मानवता से प्यार करो तुम
जग में चमके नाम तुम्हारा
उठो सवेरे ने ललकारा ...
कहना मेरा इतना मानो
मूल्य समय का तुम पहचानो
जीवन थोड़ा काम बहुत है
व्यर्थ न पल भी जाए तुम्हारा
उठो सवेरे ने ललकारा ...
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Friday 11 September 2009
भाया ! बैल बगाग्यो
खेती का ताम-झाम बसाया गया। बढ़िया नागौरी बैल खरीदे गए। खेत हाँकने का वक्त आ गया। कमल किशोर व्यास जी खुद ही खेत हाँकने चल दिए। दो दिन हँकाई की, तीसरे दिन हँकाई कर रहे थे कि एक बैल नीचे गिरा और तड़पने लगा। अब व्यास जी परेशान। अच्छे खासे बैल को न जाने क्या हुआ? बड़ी मुश्किल से महंगा बैल खरीदा था, इसे कुछ हो गया तो खेती का क्या होगा? दूर दूर तक जानवरों का अस्पताल नहीं ,बैल को कस्बे तक कैसे ले जाएँ? और डाक्टर को कहाँ ढूंढें और कैसे लाएँ? बैल को वहीं तड़पता छोड़ पास के खेत में भागे, जहाँ दूसरा किसान खेत हाँक रहा था। उसे हाल सुनाया तो वह अपने खेत की हँकाई छोड़ इन के साथ भागा आया। किसान ने बैल को देखा और उस की बीमारी का निदान कर दिया। भाया यो तो बैल 'बगाग्यो' । व्यास जी की डिक्शनरी में तो ये शब्द था ही नहीं। वे सोच में पड़ गए ये कौन सी बीमारी आ गई? बैल जाने बचेगा, जाने मर जाएगा? Thursday 10 September 2009
राजनैतिक स्वार्थों को साधने का घृणित अवसरवाद
मुझे पिछले दिनों दो बार जोधपुर यात्रा करनी पड़ी। दोनों यात्राओं का सिलसिला एक ही था। एक उद्योग में नियोजित श्रमिकों ने अपनी ट्रेड यूनियन बना कर पंजीकृत कराई थी। जब उद्योग के दो तिहाई से भी अधिक श्रमिक इस यूनियन के सदस्य हो गए और उन्हों ने कानून के द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं को लागू करने की मांग की तो उद्योग के मालिकों के माथे पर बल पड़ने आरंभ हो गए। उन्हों ने यूनियन का पंजीयन प्रमाणपत्र रद्द कर ने के लिए ट्रेड यूनियन पंजीयक के सामने एक आवेदन प्रस्तुत किया। इसी आवेदन में यूनियन का पक्ष रखने के लिए यह यात्रा हुई थी। उस का कानूनी पक्ष क्या था। यह यहाँ इस आलेख का विषय नहीं है। उसे फिर कभी 'तीसरा खंबा' पर प्रस्तुत किया जाएगा। पहली सुनवाई के दिन जोधपुर बंद था। मांग यह थी कि उदयपुर और बीकानेर के वकीलों की मांग पर राजस्थान हाईकोर्ट की बैंचे न खोली जाएँ और एक बार विभाजित हो चुके हाईकोर्ट को विभाजित न किया जाए। हाईकोर्ट की अधिक बैंचें स्थापित किए जाने का विषय भी विस्तृत है और यह आलेख उस के बारे में भी नहीं है। इन विषयों पर आलेख फिर कभी 'तीसरा खंबा' पर प्रस्तुत किए जाएँगे। Tuesday 8 September 2009
आत्म केंद्रीयता और स्वार्थ
शनिवार को अत्यावश्यक कार्य करते हुए रविवार के दो बज गए, सोए थे कि बेटे को स्टेशन छोड़ने जाने के लिए पाँच बजे ही उठना पडा़। अब ढाई घंटे की नींद भी कोई नींद है। सात बजे वापस लौटे तो नींद नहीं आई। नेट पर कुछ पढ़ते रहे। आठ बजे सुबह सोने गए तो दस बजे टेलीफोन ने जगा लिया। महेन्द्र नेह का फोन था। पाण्डे जी का एक्सीडेंट हो गया है हम पुलिस स्टेशन में हैं रिपोर्ट लिखा दी है, पुलिस वाले धाराएँ सही नहीं लगा रहे हैं, आप आ जाओ। जाना पड़ा। पुलिस स्टेशन पर उपस्थित अधिकारी परिचित था। मैं ने कहा 336 कैसे लगा रहे हैं भाई 338 लगाओ। रस्सा गले में फाँसी बन गया होता तो पाण्डे जी का कल्याण ही हो गया था। अधिकारी ने कहा 337 लगा दिया है। अब अन्वेषण में प्रकट हुआ तो 338 भी लगा देंगे। मैं बाहर आया तो वहाँ एक परिचित कहने लगा -राजीनामा करवा दो। मैं ने उस की ओर ध्यान नहीं दिया पुलिस अधिकारी ने रपट पर पाण्डे जी के हस्ताक्षर करवा कर उन्हें चोट परीक्षण के लिए अस्पताल भिजवा दिया। थाने के बाहर ही मोटर का वहाँ परिचित फिर मिला और कहने लगा ड्राइवर मेरा भाई है राजीनामा करवा दो, भाई और मालिक दोनों को ले आया हूँ। इन लोगों में से एक ने भी अब तक यह नहीं पूछा था कि दुर्घटना में घायल को कितनी चोट लगी है। मालिक के पास कार थी। लेकिन पाण्डे जी को पुलिसमेन उन की मोटर सायकिल पर ही बिठा कर अस्पताल ले गया। बस मालिक ने यह भी नहीं कहा कि मेरी कार में ले चलता हूँ। Saturday 5 September 2009
अध्यापक जी का न्याय, शिक्षक दिवस पर एक नमन !
पूरे पाँच मिनट का समय निकल जाने पर भी वह विद्यार्थी सामने न आया। अध्यापक जी ने समय पूरा होने की घोषणा की और मंच से उतर कर नीचे मैदान में आए और एक पंक्ति में से एक विद्यार्थी को उठाया और पकड़ कर मंच पर ले चले। मंच पर उसे विद्यार्थियों के सामने खड़ा कर दिया। फिर बोलने लगे -इस विद्यार्थी ने अपने पिता की जेब से कल पचास रुपए चुराए हैं। पहली सजा तो इसे मिल चुकी है कि अब सब लोग जान गए हैं कि यह विद्यार्थी कैसा है। लेकिन सजा इतनी ही नहीं है। इसे यहाँ पहले घंटे तक मुर्गा बने रहना पड़ेगा। हाँ, यदि यहाँ यह कान पकड़ कर स्वयं स्वीकार कर ले कि उसने रुपए चुराए थे और उन रुपयों का क्या किया? तो इसे मुर्गा नहीं बनना पड़ेगा। Thursday 3 September 2009
संतानें पिता के नाम से ही क्यों पहचानी जाती हैं?
माँ का तो सब को पता होता है कि उस ने संतान को जन्म दिया है। उस का प्रत्यक्ष प्रमाण भी होता है। लेकिन पिता का नहीं। क्यों कि उस की एक मात्र साक्ष्य केवल संतान की माता ही होती है। केवल और केवल वही बता सकती है कि उस की संतान का पिता कौन है? समाज में इस का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं होता कि पुत्र का पिता कौन है? समाज में यह स्थापित करने की आवश्यकता होती है कि संतान किस पिता की है। यही कारण है कि जब संतान पैदा होती है तो सब से पहले दाई (नर्स) यह बताती है कि फंला पिता के संतान हुई है। फिर थाली बजा कर या अन्य तरीकों से यह घोषणा की जाती है कि फलाँ व्यक्ति के संतान हुई है। संतान का पिता होने की घोषणा पर पिता किसी भी तरह से उस का जन्मोत्सव मनाता है। वह लोगों को मिठाई बाँटता है। अपने मित्रों औऱ परिजनों को बुला कर भोजन कराता है और उपहार बांटता है। इस तरह यह स्थापित होता है कि उसे संतान हुई है।
Tuesday 1 September 2009
ग़ज़लों का जादू, पुरुषोत्तम 'यक़ीन' की युग्मित ग़ज़ल
'यक़ीन' साहब को कल शाम ही आना था। वे आए भी। लेकिन मैं घर से बाहर था, मुलाकात नहीं हो सकी। आज सुबह उन से फोन पर बात हुई। जो कुछ उन ने बताया वह इतना सरल था कि मुझे भी विश्वास नहीं हुआ। उन की बात सुन मैं ने कुछ चित्र ढूंढ निकाले हैं, एक तो ऊपर ही है, जिसे आप देख चुके हैं। आप इन दोनों चेहरों को यक़ीन साहब की दो ग़ज़लें मान लें। अब जरा इन नीचे वाले चित्रों को भी देखिए.....
ठीक इसी तरह यक़ीन साहब की दोनों ग़ज़लें भी समानान्तर दशा में मिल कर एक नई ग़ज़ल बन जाती हैं। मजे की बात यह कि उन दोनों ग़ज़लों का आंनंद भिन्न था और इस 'युग्मित ग़जल' का आनंद बिलकुल भिन्न है। आप भी इस का आनंद लीजिए.....
तू इक राहत अफ़्ज़ा मौसम, नयनों का इक ख़्वाब हसीं तू
तू बादल तू सबा तू शबनम, तू आकाश है और ज़मीं तू
छल करते हैं अपना बन कर, वो अपने मतलब के संगी
मेरे साथी मेरे हमदम, उन अपनों सा ग़ैर नहीं तू
तेरे मुख पर तेज है सच का, दाग़ नहीं तेरे चहरे पर
तेरे आगे सूरज मद्धम, कैसे कह दूँ माहजबीं तू
दर्दे-जुदाई और तन्हाई, तू यह कैसे सह लेता है
क्यूँ न निकल जाता है ये दम, आह! कहीं मैं और कहीं तू
कोई नहीं है तुझ बिन मेरा, तेरे दिल की बात न जानूँ
कह तो दे इतना कम से कम, मेरे दिल में सिर्फ़ मकीं तू
खुल कर बात करें आपस में, कुछ दिल की कुछ जग की सुन लें
कुछ तो कम होंगे अपने ग़म, आ कर मेरे बैठ क़रीं तू
झूठी ख़ुशियों पर ख़ुश रहिए, कौन 'यक़ीन' करेगा सच पर
व्यर्थ 'यक़ीन' यहाँ है मातम, चुप ही रहना दोस्त हसीं तू
तू इक राहत अफ़्ज़ा मौसम, नयनों का इक ख़्वाब हसीं तू
तू बादल तू सबा तू शबनम, तू आकाश है और ज़मीं तू
छल करते हैं अपना बन कर, वो अपने मतलब के संगी
मेरे साथी मेरे हमदम, उन अपनों सा ग़ैर नहीं तू
तेरे मुख पर तेज है सच का, दाग़ नहीं तेरे चहरे पर
तेरे आगे सूरज मद्धम, कैसे कह दूँ माहजबीं तू
दर्दे-जुदाई और तन्हाई, तू यह कैसे सह लेता है
क्यूँ न निकल जाता है ये दम, आह! कहीं मैं और कहीं तू
कोई नहीं है तुझ बिन मेरा, तेरे दिल की बात न जानूँ
कह तो दे इतना कम से कम, मेरे दिल में सिर्फ़ मकीं तू
खुल कर बात करें आपस में, कुछ दिल की कुछ जग की सुन लें
कुछ तो कम होंगे अपने ग़म, आ कर मेरे बैठ क़रीं तू
झूठी ख़ुशियों पर ख़ुश रहिए, कौन 'यक़ीन' करेगा सच पर
व्यर्थ 'यक़ीन' यहाँ है मातम, चुप ही रहना दोस्त हसीं तू
यक़ीन साहब ने इसे 'युग्मित ग़ज़ल' नाम दिया है। मैं ने उन्हें कोई उर्दू शब्द तलाश करने को कहा है। आप चाहें तो आप भी इस कारस्तानी को कोई खूबसूरत सा नाम दे सकते हैं।
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