जमाना है परेशान, वाकई परेशान!
जमाना है परेशान
वाकई परेशान!
आमादा भी है
उतर भी आता है
लड़ने पर
करता है प्रहार भी
हम पर
वह हो जाता है
और परेशान
देख कर अपने हाथ
लहूलुहान
और हमारे चेहरे की
नयी ताजी मुस्कान।
जमाना है परेशान।
वाकई परेशान!
क्या बतलाएँ दुनिया वालो! क्या-क्या देखा है हमने ...!
हे! पाठक,
एक जमाना था, जब लिखने और पढ़ने का रिवाज नहीं था। उस जमाने में लोग कथाएँ कण्ठस्थ कर लिया करते थे और सभाओं में सुनाया करते थे। एक पुराणिक कथा-ज्ञानी सूत जी महाराज नैमिषारण्य में रहा करते थे और उन से कथाएँ सुनने के लिए शौनक आदि ऋषि-मुनि वहाँ जाया करते थे। लेकिन जब से लिखना-पढ़ना शुरु हुआ तब से नैमिषारण्य जाने की आवश्यकता समाप्त हो गई और कुछ लोगों ने इन कथाओं की अनेक प्रतियाँ बना ली। जिस जिस के भी पल्ले यह कथा पुस्तकें पड़ी वही व्यास नामधारी हो कर गांव-गांव, नगर-नगर जा-जा कर यह कथाएँ पढने लगा। अब जब से इंटरनेट आ गया है तब से तो कथाओं को पढ़ने-सुनने की जरूरत ही नहीं रह गई है। अब तो कथाएँ इंटरनेट पर आ रही हैं और लोग उन्हें पढ़ रहे हैं। हम ने तो अपनी इस चुनाव व्यथा-कथा का शुभारंभ इंटरनेट से ही किया है। दो ही दिनों में इस की ख्याति गौड़ प्रदेश तक जा पहुँची। इस प्रदेश के शिव कुमार मिश्र नामक एक पाठक ने टिप्पणी लिखी है उसे आप के अवलोकनार्थ प्रस्तुत करते हैं ....
हे कथावाचक,
जनतंतर-मनतंतर की जन्म-जन्मान्तर, युग-युगांतर कथा हमें बहुत सोहायी। सो, हे कथावाचक श्रेष्ठ, हम आगे की कथा की प्रतीक्षा में बैठे हैं.। आशा ही नहीं, पूर्ण विश्वास है जनतंतर अनंत जनतंतर कथा अनंता। अतः हे वाचकश्रेष्ठ, आप पुनः आईये और आगे की कथा सुनाईये....:-)
हम यह जानने के लिए व्याकुल हैं कि वैक्टीरिया ने ज्यादा काट-काट मचाई या वायरस ने?हे! पाठक,
हे! पाठक,
हे! पाठक,हे, पाठक!
अगले दिन जब अखबार देखा तो पता लगा वाकई प्रान्त के भूतपूर्व और वर्तमान मुख्यमंतरी नगर में पधारे थे, एक वायरस पार्टी का तो दूसरा बैक्टीरिया पार्टी का। बैक्टीरिया पार्टी वाला कह रहा था कि वायरस पार्टी की सरकार में भ्रष्टाचार चरम पर था। उस को को फिजूलखर्ची बहुत सुहाती थी सरकार के स्तर पर भी और व्यक्तिगत स्तर पर भी। नतीजा हुआ कि भ्रष्टाचार चरम पर पहुँच गया। वायरस पार्टी के लोग ही अपनी सरकार पर पाँच हजार करोड़ का घोटाला करने के आरोप लगाते रहे। वायरस मुख्यमंतरी ने अपने चुनाव क्षेत्र के नगर में कंक्रीट की सड़कें बिछा कर विकास किया, जिस से हर गली में वायरस की कार को जाने में परेशानी न हो। लेकिन सड़कों के किनारे बनी नालियाँ सड़ती रहीं। वायरस मुख्यमंतरी प्रान्त भर में अपने बड़े-बड़े मुस्कुराते चित्रों के बच्चे को रोज एक गिलास दूध पिलाने की हिमायत करता रहा, लेकिन दारू की दुकानें इतनी खोल दीं कि पिताओं का पैसा दारू में चला गया, बच्चे का दूध कहाँ से आता? बैक्टीरिया पार्टी का ताजा मुख्य मंतरी पार्टी के प्रान्तीय अध्यक्ष को भी साथ लाया था जिस के चेहरे पर मात्र एक वोट से हार जाने की मायूसी पसरी थी। दोनों ने पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठक की। अभी तक वे क्षेत्र से पार्टी का उम्मीदवार तय नहीं कर पाए थे, इस लिए घोषणा नहीं कर सकते थे। वे कार्यकर्ताओं को परख रहे थे कि किस उम्मीदवार के साथ वे सब खड़े हो सकेंगे?
हे, पाठक!
आज कल इन पार्टी वालों को एक अजीब संकट है। पार्टी जिसे अपना उम्मीदवार बनाती है, वह कुछ को पसंद आता है, ज्यादातर को नहीं। कार्यकर्ता को जिस समय उम्मीदवार का प्रचार करना होता है, उसे उसी वक्त उम्मीदवारी का विरोध करने में श्रम करना होता है। धीरे-धीरे जब गुस्सा शांत होता है, तो वे पार्टी का झंडा तो अपने घर-द्वार पर लटका देते हैं पर मन में निमोलियाँ फूटती रहती हैं। दिखाने को उम्मीदवार के काफिले में भी चलते हैं, लेकिन मन ही मन सोच रहे होते हैं कि यह हार जाए तो संकट टले। अब की बार अपने गुरू का नंबर लगे। इस संकट से बचने को बैक्टीरिया पार्टी ने नई तरकीब अपनाई। उस ने पहले कार्यकर्ताओं को प्रचार में झोंक दिया, अब उम्मीदवार की तलाश जारी है।
हे, पाठक!
यूँ तो जब भी आप-हम मिलते हैं, तो कोई न कोई बात होती है। कुछ मैं कहता हूँ, कुछ आप टिपियाते हैं। पर इन दिनों मौसम का मिजाज कुछ अलग है। एक तो वह बदलाव के दौर में है, ऊपर से चुनाव आ टपके हैं। वैसे ही इस मौसम में डाक्टर-वैद्य बहुत व्यस्त होते हैं। सारे बैक्टीरियाओं और वायरसों के लिए मौसम अनुकूल जो होता है। होता तो इंन्सान के लिए भी अनुकूल ही है, पर वह जो खुराफातें फागुन-चैत में करता है, उस के परिणाम बहुत देर से सावन-भादों दिखाई देने लगते हैं और देश के जच्चाखानों में जगह कम पड़ने लगती है। लेकिन बैक्टीरियाओं, वायरसों और उन के वाहकों की खुराफातों के परिणाम जल्दी ही सामने आने लगते हैं। दूसरे-दूसरे वाहकों पर क्या गुजरती है? ये तो वे ही जानें। जाने उन के यहाँ डाक्टर-वैद्य होते या नहीं। शायद नहीं ही होते हैं। तभी तो कभी उन की भरमार हो जाती है और कभी बिलकुल गायब नजर आते हैं। इन भरमार के दिनों में वे इन्सान को भी अपना असर दिखाने लगते हैं। इस असर की शुरुआत होती है इन्सान के शरीर में हरारत के साथ।
हे, पाठक!
तब ताप महसूस होने लगता है। बीन्दणी सुबह-सुबहअपना हाथ आगे कर अपने बींद से कहती है- मुझे पता नहीं क्या हुआ है? जरा मेरा हाथ तो देखो जी। बींद सहज ही हाथ पकड़ने का अवसर देख, हाथ को पकड़ता है कुछ देर पकड़े रह कर कहता है, ठीक तो है। वह पूछती है, गरम नहीं लगा? जवाब मिलता है, नहीं तो। वह निराश हो जाती है। फिर बींद का हाथ अपने हाथ में पकड़ कर अपने माथे से छुआती है और कहती है, यहाँ देखो। अब न होते हुए भी बींद को कहना पड़ता है हाँ कुछ गरम तो लगता है। इस के बाद बींद गले के नीचे छाती के ऊपर अपना हाथ छुआ कर देखता है और घोर आश्चर्य कि बींदणी जरा भी प्रतिरोध नहीं करती और न यह सुनने को मिलता कि, अजी क्या कर रहे हो।
हे, पाठक!
ऐसा ही कुछ शाम को बींद के साथ होने लगता है। वह दफ्तर से लौटता है और ड्राइंगरूम के सोफे पर या दीवान पर या सीधे बेडरूम के बेड पर धराशाई हो जाता है। अब पैर जमीन पर हैं और शरीर सोफे या दीवान या बेड पर लंबायमान। जूते भी नहीं खोलता। उस की हालत वैसी दीख पड़ती है जैसी खेत में ओले पड़ने के बाद पकते गेहूँ की फसल की होती है। बींदणी देखती है, पानी का एक गिलास ले कर आती है और पूछती है, क्या हुआ जी? आते ही पड़ गए, जूते भी नहीं खोले? कुछ नहीं कुछ हरारत सी हो रही है। बिचारी बींदणी, वह बींद के माथे पर हाथ रख कर देखती है और कहती है, ठीक तो है, गरम तो नहीं लग रहा है, लगता है आज काम ज्यादा करना पड़ा है? थक गए होंगे? बींद कहता है वह तो रोज का काम है लेकिन आज कुछ बदन टूटा-टूटा लग रहा है। बींद पानी का गिलास ले लेता है और उसे उदरस्थ कर वापस बींदणी को पकड़ा देता है। वह खाली गिलास ले कर चल देती है। बींद को पता है वह चाय बनाने रसोई में घुस गई है। वह उठ कर जूते खोलने लगता है।
हे, पाठक!
ये दो सीन हैं, बिलकुल घरेलू आइटम। लेकिन इन दिनों इन्सानों के साथ साथ शहर को भी हरारत हो रही है। कल मैं अदालत के लिए निकला तो गर्ल्स कॉलेज के आगे अंटाघर चौराहे की ट्रेफिक बत्ती हरी थी। हमने निकलने को एक्सीलेटर पर दबाव बढ़ाया तो वह दगा दे गई पीली हो गई। उधर चौराहे पर पुलिसमैन बिलकुल चौकस दिखे। मुझे लगा कि मैं निकल गया और बत्ती लाल हो गई, तो मुझे बीच चौराहे पर ही टोक देगा। मेरा पैर एक्सीलेटर छोड़ कर अचानक ब्रेक पर चला गया। बगल में बैठे सहायक ने कहा निकल लो पीछे पुलिस की गाड़ियाँ आ रही हैं। पैर वापस एक्सीलेटर पर गया और चौराहा पार करते-करते, बत्ती लाल। मैं ने पिछवाड़ा दर्शन शीशे में देखा तो तेजी से बहुत सारी पुलिस गाड़ियाँ आ रही थीं। पहले तो लगा कि मेरा पीछा कर रही हैं। फिर लगा कि मेरी कार को टक्कर मार देंगी। फिर सड़क पर एक सिपाही दिखा जो मुझे कार बाएँ करने का इशारा कर रहा था। तभी सहायक बोला, मुख्यमन्तरी आ रहा है, सारे सिपाही एक दम लकदक हैं। मैंने कार बाएँ कर ली। पुलिस की जीपें एक-एक कर मुझे ओवरटेक कर गईं। हर जीप से निकले हाथ ने मुझे कार बाएँ रखने का इशारा किया। तब तक सर्किट हाउस आ गया और सब उस के मुहँ में घुस गईं। मुख्यमन्तरी के वाहन का कुछ पता नहीं था। सहायक ने बताया, यह मुख्यमंतरी को सर्किट हाउस तक लाने का रिहर्सल था।
चुनाव आ रहे हैं, पैरों तक आ चुके हैं। कुछ दिनों में घुटनों पर आ जाएंगे। फिर न जाने कहाँ कहाँ का सफर करते हुआ सिर पर भी आ लेंगे। सांसद चुने जाएँगे, फिर वे देश की सरकार चुनेंगे। अखबार, टीवी न्यूज चैनल चुनाव पूर्व अखाड़ों में हो रही उखाड़ पछाड़ की खबरों से भरपूर हो चुके हैं। इधर ब्लागरी में भी इस का असर देखने को मिलने लगा है। लेकिन पिछले दस सालों से चुनावों के प्रति एक उदासीन भाव जो मन में जमा है वह उखड़ता नहीं दिखाई पड़ रहा। हर बार मन की टंकी में बरसाती पानी के साथ आई मिट्टी की तरह कुछ उदासीनता जम जाती है। जमते जमते हालत यह हो गई है कि गरदन तक मिट्टी ही मिट्टी भरी है। पानी के लिए बस थोड़ी सा स्थान शेष है। वह कब भरेगा यह तो समय बताएगा?
हाड़ौती से दो लोक सभा सदस्य चुने जाने हैं। एक झालावाड़ से और दूसरा कोटा से। झालावाड़ क्षेत्र में बारां जिला भी शामिल है। वहाँ से पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के सुपुत्र भाजपा के उम्मीदवार हैं। इस क्षेत्र के लिए वे अब भी पराए हैं। उन्हें इसी लिए चुना गया था कि वे भाजपा की दिग्गज नेता और मुख्यमंत्री के पुत्र हैं और शायद क्षेत्र की तरक्की के कुछ काम आएँ। उन की तरक्की को जनता ने ऐसा परखा कि उन के क्षेत्र के आठ विधानसभा क्षेत्रों में से छह में कुछ माह पहले ही कांग्रेस के उम्मीदवारों को चुन कर भेजा। यदि मतदान का पैटर्न वही रहा तो भाजपा वहाँ हारी हुई है। उन के मुकाबले एक महिला उर्मिला जैन को काँग्रेस ने अपना उम्मीदवार बनाया है। ये अन्ता के विधायक प्रमोद भाया की धर्मपत्नी हैं और उन के सामाजिक कामों में उन के साथ कंधे से कंधा लगा कर चलती हैं। पहली बार राजनीति में उतर रही हैं। भाया जहाँ एक धनाड्य व्यापारी परिवार से आते हैं, उन्हों ने अपनी संपत्तियों में अपने बूते कई गुना इजाफा किया है और लगातार पिछले पन्द्रह वर्षों से सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। यही कारण है कि पिछली बार काँग्रेस से टिकट नहीं मिलने पर उन्हों ने निर्दलीय चुनाव लड़ा और अपना दम दिखाते हुए विधायक बने, बाद में उन्हें काँग्रेस ने स्वीकार कर लिया। इस बार काँग्रेस से चुनाव लड़ा और जीता। अपने प्रभाव के कारण बाराँ जिले की चारों विधानसभा सीटें काँग्रेस को दिलवाईं। इस क्षेत्र पर काँग्रेस अध्यक्षा कुछ कृपालु दीख पड़ती हैं। तभी तो बाराँ जिले के आदिवासी क्षेत्र में जब तब खुद सोनिया और राहुल आते-जाते हैं और कभी कभी अचानक भी। यदि यह सीट भाजपा से छीन ली जाती है तो भाजपा को तो हानि होगी ही। वसुंधरा का अहं भी कई गुना पराजित हो चुका होगा।
कोटा क्षेत्र में बूंदी जिला भी आता है। यहाँ से भाजपा ने अपना नया उम्मीदवार श्याम शर्मा को घोषित किया है। इन शर्मा जी की खसूसियत यह है कि ये उम्मीदवारी मिलने तक भाजपा के सदस्य नहीं थे और राज्य सरकार के निर्माण विभाग में अफसरी कर रहे थे। अपने विभाग में उन की कोई उपलब्धि हो न हो पर उन्हों ने अपनी इंजिनियरिंग का कमाल बाहर बहुत दिखाया। किसी तरह भारत विकास परिषद में स्थान बना कर भाजपा की प्रान्तीय सरकार के अनुग्रह से एक बस्ती के बीच (जिस का एक निवासी मैं भी हूँ) भूमि आवंटित करवा कर उस पर एक औषधालय खोला। बिना किसी अनुमति के उस औषधालय को एक पाँच मंजिला अस्पताल में परिवर्तित कर दिया। जब वहाँ औषधालय बन रहा था तो बस्ती के लोग आशंकित थे कि उन की आवासीय शांति अब भंग होने वाली है। इस लिए इस औषधालय को बनने से रोका जाए। एक भले काम को रोकने के अभियान को रोकने में मेरी भी भूमिका रही। लेकिन कुछ समय बाद ही जब वह एक बड़े अस्पताल में तब्दील होने लगा और उस का कचरा और प्रदूषण बस्ती को प्रभावित करने लगा तो उन से बस्ती के लोगों को लड़ना पड़ा। वह लड़ाई अभी भी जारी है। जिस का केवल एक ही असर है कि बस्ती के पार्क की भूमि अस्पताल को नजर होने से बच गई। अस्पताल में चैरिटी और सरकारी अनुदानों का पैसा और मुफ्त सरकारी भूमि लगी है लेकिन अस्पताल पूरी तरह से एक निजि व्यावसायिक अस्पताल की तरह चल रहा है।
रहा सवाल अपना, तो अपने राम इतना परिदृश्य देखने के बाद भी उदासीन ही हैं। राम जानते हैं, कोई जीते फर्क कुछ नहीं पड़ने का। इसी लिए भक्त तुलसीदास जी कह गए 'कोऊ नृप होऊ हमें का हानी'। अभी तक तो ऐसा ही चल रहा है। वे आएँगे तो भी जोड़ तोड़ से और ये आएँगे तो भी जोड़ तोड़ से। कल कोई कह रहा था कि दोनों की रस्सियाँ दिनों दिन टूट टूट के छोटी हुई जा रही हैं बस इधर उधर से टुकड़े जोड़ जोड़ के काम चला रहे हैं। आगे गली में रस्सियों के बहुत से छोटे छोटे टुकड़े आपस में मिल कर फुसफुसा रहे थे। इन पुरानी रस्सियों के साथ जुड़ जुड़ कर मजा नहीं आ रहा, ऐसा न करें कि सारे छोटे टुकड़े मिल कर उन से लंबे हो जाएँ। बीच में एक बंदा बोल रहा था कि एक बड़ी रस्सी तो होनी चाहिए। इन बातों से भी हमारी उदासी नहीं टूट रही है। हम तो रस्सी नहीं रेशा हैं। यह भी पता नहीं कि उस उधड़ती-टूटती रस्सी से निकले हैं या फिर सीधे कपास-जूट के खेत से आ रहे हैं। हाँ, इतना जरूर जानते हैं कि रस्सी बनती रेशे से है और बहुत सारे रेशे मिल कर एक साथ घूमने लगें तो नई रस्सी बन जाती है।
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सारी सर्दी हलके गर्म पानी का इस्तेमाल किया स्नान के लिए। होली पर रंगे पुते दोपहर बाद 3 बजे बाथरूम में घुसे तो सोचा पानी गर्म लें या नल का। बेटी बोली नल का ठीक है। हम ने स्नान कर लिया। कोई परेशानी न हुई। लेकिन दूसरे दिन ही नहाने के लिए पानी गरम लेने लगे। बस दो दिनों से नल के पानी से नहाने लगे हैं। परसों तक रात को वही दस साल पुरानी एक किलो रुई की रजाई औढ़ते रहे जिस की रुई कंबल की तरह चिपक चुकी है। कोई गर्मी नहीं लगी। परसों तक उसे ही ओढ़ते रहे। लेकिन कल अचानक गर्मी हो गई। रात को अचानक पार्क के पेड़ों के पत्ते खड़खड़ाने लगे तो पता चला कि आंधी चल रही है। कोई 15 मिनट तक पत्तों की आवाजें आती रहीं। चादर ओढ़ा पर वह भी नहीं सुहाया तो बिना ओढ़े ही सोते रहे, सुबह जा कर वह किसी तरह काम आया।
मौसम बदल रहा है। दिन में अदालत में थे कि तीन बजे करीब बादल निकलने लगे। साढ़े चार अदालत से चले कि रास्ते में बून्दें टपकाने लगे पर रास्ते में ही बूंदें बन्द हो गईं। शाम को साढ़े छह- सात के करीब हम ब्लाग पर पोस्ट पढ़ रहे थे कि अचानक बिजली चली गई। कम्प्यूटर, रोशनी, पंखा सब बंद बाहर से टप टपा टप की आवाजें आने लगीं फिर पानी की रफ्तार तेज हो गई कोई बीस मिनट पानी बरसता रहा जोरों से। फिर पानी बंद हुआ। कोई पाँच मिनट बाद बिजली आ गई। अभी हवा चल रही है। पार्क के पेड़ डोल रहे हैं। पत्ते थरथरा कर एक दूसरे से टकराकर ध्वनियाँ कर रहे हैं, यहां मेरे दफ्तर तक सुनाई दे रही हैं।
लेकिन यह कुसमय रात की आंधी और अब शाम की बरसात। शायद किसानों के लिए तो शंका और विपत्ति ले कर आई है। इस साल सर्दियों की अवधि छोटी रहने से पहले ही फसल तीन चौथाई दानों की हो रही है। तिस पर यह बरसात न जाने क्या कहर बरसाएगी। ओले न हों तो ठीक नहीं तो आधा भी गेहूँ घर न आ पाएगा। मैं सोच ही रहा हूँ कि विष्णु जी कितने चिंतित और उदास होंगे? फसल को जल्दी कटवाने की जुगत में होंगे? वादे का एक बोरी गेहूँ भी आज नहीं पहुँचा है। वे जरूर परेशान होंगे। मैं भी सोचते हुए उदास हो गया हूँ।
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काचरू ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश एक उदाहरण है। देश के सभी शिक्षण संस्थानों को इस आदेश को केवल औपचारिकता मात्र नहीं समझना चाहिए अपितु इस से सीखना चाहिए और इस का वास्तव में पालन करना चाहिए। उन्हों ने कहा कि मैं इस में रुचि नहीं रखता कि मेरे बेटे के अपराधी को क्या सजा मिलती है। मैं चाहता हूँ कि रेगिंग रुके और बच्चे इस का शिकार न बनें। सभी छात्रों के माता पिता को सुनिश्चित करना चाहिए कि उन की संताने रेगिंग में शामिल तो नहीं हैं। रेगिंग का उन्मूलन होना ही चाहिए।
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मेरे नगर कोटा में धुलेंडी की रात को घटी दो बहुत शर्मनाक घटनाएँ सामने आईं। दोनों बालिकाओं के साथ बलात्कार की घटनाएँ। नगर के कैथूनीपोल थाना क्षेत्र के कोलीपाडा इलाके में बुधवार को एक अधेड ने सात वर्षीय बालिका के साथ बलात्कार किया। लेकिन पुलिस ने अभियुक्त को शांतिभंग के आरोप में गिरफ्तार किया जिस से गुरूवार को उसकी जमानत हो गई। अभियुक्त ने गुरूवार को पीडिता के परिजनों को धमकाया। इससे लोगों का आक्रोश फूट पडा और उन्होंने महिला संरक्षण समिति की अध्यक्ष संगीता माहेश्वरी के नेतृत्व में थाने में प्रदर्शन किया। बाद में पुलिस द्वारा बलात्कार मामला दर्ज करने पर ही लोग शांत हुए।
दूसरी घटना रेलवे कॉलोनी थाना क्षेत्र में हुई जिस में एक ठेकेदार ने उस के यहाँ नियोजित श्रमिक की नाबालिग पुत्री का अपहरण कर बलात्कार किया। अर्जुनपुरा के पास बारां रोड पर एक ठेकेदार ने सडक का पेटी ठेका ले रखा है। एक श्रमिक दम्पती अपनी नाबालिग पुत्री के साथ ठेकेदार के पास रहकर मजदूरी करते हैं। बुधवार रात ठेकेदार श्रमिक की नाबालिग पुत्री को बहला-फुसलाकर भगा ले गया। पुलिस को जब घटना की जानकारी मिली तो उन्होंने उसकी खोज शुरू की। इस बीच श्रमिक व उसके साथी ठेकेदार को तलाशते हुए बून्दी जिले के इन्द्रगढ के केशवपुरा गांव पहुंच गए। गांव में ठेकेदार के छिपे होने की जानकारी पर लोगों ने गांव को घेर लिया। ठेकेदार एक घर में किशोरी के साथ छिपा मिला जिसे लोगों ने पुलिस को सौंप दिया। किशोरी की शिकायत पर पुलिस ने धारा 303, 366 व 376 में मामला दर्ज कर लिया।
मेरे राजस्थान के जोधपुर नगर से एक खबर है कि वहाँ पिता के देहान्त पर उन की लड़कियों ने उन की पार्थिव देह का अंतिम संस्कार वैसे ही किया जिस तरह वे पुत्र हों। कल एक प्रान्तीय चैनल ने इस खबर को बहुत बार दिखाया। एक बहस भी चलाने का प्रयत्न किया जिस में एक पण्डित जी से बात चल रही थी कि क्या यह शास्त्र संगत है। पण्डित जी ने पहले कहा कि यह तो सही है और शास्त्रोक्त है। लेकिन जब उन से आगे सवाल पूछे गए तो उन्हों ने इस में शर्तें लादना शुरू कर दिया कि यदि भाई, पुत्र, पौत्र आदि न हों और कोई अन्य पुरुष विश्वसनीय न हो तो शास्त्रों को इस में कोई आपत्ति नहीं है। पण्डित जी ने अपने समर्थन में विपत्ति काल में कोई मर्यादा नहीं होती कह डाला। कुल मिला कर पण्डित जी बेटियों को यह अधिकार देने को राजी तो हैं लेकिन पुत्र और पौत्र की अनुपस्थिति में ही। शायद उन को अपने व्यवसाय पर खतरा नजर आने लगा हो।
लेकिन इस के बावजूद उन चारों बेटियों पर कोई असर नजर नहीं आया। उन में से एक का कहना था कि हमारे पिता ने हमें बेटे जैसा ही समझा, बेटों जैसा ही पढ़ाया लिखाया और पैरों पर खड़ा किया। हमने अपना कर्तव्य निभाया है। मुझे आशा है लोग इस से सीख ले कर अनुकरण करेंगे। बेटियों को बेटो से भिन्न नहीं समझेंगे। और बेटियाँ भी खुद को पिता के परिवार में पराया समझना बंद करने की प्रेरणा लेंगी। यह तो एक ऐसा परिवार था जहाँ पुत्र नहीं था। लेकिन पुत्र के होते हुए भी बेटियों को यह अधिकार समान रूप से मिलने में क्या बाधा है?
हालाँ कि इस तरह की घटना पहली बार नहीं हुई है इस से पहले भी राजस्थान में यह हुआ है। लोग इस घटना से सीख ले कर अनुकरण करेंगे तो यह परंपरा बन लेगी। यह सही रूप में महिला सशक्तिकरण है।
अग्नि धर्मा
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