छोड़ कर, प्रिय समारोह, बाहर जाना
चाहता तो यह था कि रोज आप को कोटा नगर निगम चुनाव के दौरान राजनैतिक दलों, प्रत्याशियों और जनता के रंग-रूप का अवलोकन कराता। मैं 76 दिनों की हड़ताल के दौरान न तो कहीं बाहर गया और न ही कमाई की। अपने दफ्तर के कामों से होने वाली कमाई से तो आज के जमाने में सब्जी बना लें वही बहुत है। ऐसे में पत्नी श्री शोभा का यह दबाव तो था ही कि कोटा से बहुत जरूरी काम निपटा लिए जाएँ। लेकिन इतना आसान नहीं होता। एक तो अदालतों में मुकदमों के अंबार के कारण पहले ही वकीलों के लिए एक लंबी मंदी का दौर आरंभ हो चुका है। मंदी के दौर में व्यवसायी की मानसिकता कैसी होती है यह तो मोहन राकेश की कहानी 'मंदी'
इस बीच कोटा में चुनाव अपने पूरे रंग में दिखाई पड़ने लगेगा। आज ही शाम मुहल्ले से नारे लगाते जलूस निकला, किस प्रत्याशी का था यह पता नहीं लगा। हाँ शोर से यह जरूर पता लगा की रंग खिलना आरंभ हो चुका है। शाम को घर पहुँचते ही निमंत्रण मिला, वह भी ऐसा कि जिस में उपस्थित होना मेरी बहुत बड़ी आकांक्षा थी। मैं उन से बहुत नाराज था कि वे कोटा के अनेक साहित्यकारों की किताबें प्रकाशित करा चुके हैं, लेकिन अपनी नहीं करा रहे हैं। उन की किताबें आनी चाहिए। लेकिन किस्मत देखिए कि शिवराम के नाटक का हाड़ौती रूपांतरण तीन माह पहले प्रकाशित हुआ और उस का विमोचन हुआ तो मैं कोटा में नहीं था। फिर उन के नाटकों की दो किताबों का लोकार्पण हुआ तो मैं हाजिर था। जिस की रिपोर्ट आप पढ़ चुके हैं। अब 15 नवम्बर को उन के की कविताओँ की तीन किताबों "माटी मुळकेगी एक दिन", "कुछ तो हाथ गहो" और "खुद साधो पतवार" का एक साथ लोकार्पण है और मैं फिर यहाँ नहीं हूँ। हालाँ कि लोकार्पण के निमंत्रण में मैं एक स्वागताभिलाषी अवश्य हूँ। यह समारोह भी शामिल होने लायक अद्वितीय होगा। जो साथी इस में सम्मिलित हो सकते हों वे अवश्य ही इस में सम्मिलित हों।






10 comments:
काश, हम वहाँ होते...अब आपकी रिपोर्ट से संतोष करेंगे.
द्विवेदी सर,
पाबला जी तो होंगे ही होंगे, ऊपर से आपकी भी सरपरस्ती मिलेगी...सोने पर सुहागा...अब हमारे जैसा कौन कमबख्त इस मौके को छोड़ना चाहेगा....
जय हिंद...
क्यों कि जो खर्चे हो रहे हैं उन्हें तो कम किया जाना संभव नहीँ और जो कम किए जा सकते हैं वे पहले ही किए जा चुके हैं। दिनेश जी यह हम सब की कहानी है, रहे हम कही भी, बाकी चलिये आप पाबला जी से पहल्वे मिले फ़िर दिल्ली भी पहुचे आप को यात्रा की शुभकामान्ये देते है, आप की यात्रा शुभ हो, ओर वाप्सि मै सुंदर सुंदर चित्र ओर सुंदर यादे हम से बांटे.
फ़िर से शुभ यात्रा की कामना करता हुं, बिटिया को हमारा प्यार देवे
धन्यवाद
"इधर पता लगा कि इन्हीं दिनों बी.एस. पाबला जी भिलाई वाले दिल्ली पहुँच रहे हैं। "
ये कितने पाबला हैं जी :) एक भिलाई वाले, एक मुम्बई वाले [शारुख खान के पडो़सी] और अब ये दिल्ली वाले :-)
बहुत सुन्दर लग रही है पोस्ट। ब्लॉगिंग के अर्थ सार्थक करती!
शिवराम जी को बधाई
संकलन का इंतज़ार रहेगा
आप नहीं है...
चलिए कोई बात नहीं...
हम पहुंच रहे हैं...
रपट का इंतजार है।
...और हाँ "मंदी" को याद दिलाने का शुक्रिया। बहुत पहले पढ़ी थी!
इंतजार है रपट का....
शिवराम जी को बधाई ! काश मैं भी वहां होता .
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