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Tuesday 14 July 2009

चौड़ी पट्टी के बंदर से दूर. तीन दिन

शुक्रवार की शाम अदालत से घर लौटा। अतर्जाल पर कुछ ब्लाग और आई हुई मेल पढ़ी, टिप्पणियाँ कीं और जवाब दिए। आगे चौड़ी पट्टी बोल गई। बरसात के चार माह रात्रि भोजन त्याग देने से स्नान और भोजन किया। लौटा तो चौड़ी पट्टी से संयोजन टूटा ही मिला। भारत संचार निगम को शिकायत दर्ज कराई और संबंधित कनिष्ठ संचार अधिकारी को फोन किया। शनिवारको पता लगा हमारे संयोजन का बंदर (पोर्ट) खराब था। उसे बदल दिया गया और संयोजन हो गया। लेकिन वह खुले कैसे? जब तक बंदर को हमारा कूटशब्द याद ना हो।  अब बंदर को कूटशब्द याद कराने वाले अध्यापक जी का दो दिन का अवकाश था। संचार अधिकारी ने पूरा प्रयत्न किया अध्यापक जी से संपर्क बन जाए तो वे उस के घर के कंप्यूटर से ही यह काम कर दें। पर वे पक़ड़ में न आने थे सो न आए।  सोमवार शाम पाँच बजे बंदर ने कूट शब्द याद किया तो यातायात चालू हुआ। पचास से अधिक मेल थे। सब को देखा, कुछ जरूरी जवाब दिए, कुछ ब्लाग बांचे और टिपियाए। फिर वही स्नान और सूर्यास्त पूर्व भोजन।  दफ्तर वापस लौटे तो एक मित्र अपनी पारिवारिक समस्या के लिए कानूनी परामर्श के लिए प्रतीक्षा में थे। उन से निपटता कि एक मित्र का फोन आया कि उस का वाहन दुर्घटनाग्रस्त हो गया है। पत्नी को चोटें लगी हैं, अस्पताल में भर्ती है। अस्पताल दौड़े।  लौटते लौटते तारीख बदल गई। 
 
तीन दिन अंतर्जाल से दूर रहना हुआ। शनिवार को सुबह ही खबर मिली कि सुभाष का देहान्त हो गया है आज अस्थिचयन है। वहाँ से लौटे तो बारह बज चुके थे। शेष आधा दिन मन खराब रहा। फिर शाम को बेटी को आना था सिर्फ एक दिन के लिए।  उस ने अपनी मां को कुछ आदेश दिये थे। वह उनकी पूर्ति की तैयारी में लग गई। हम कानून पढ़ते रहे। रात को बेटी को लेकर आए तो घऱ का खालीपन भर गया। रविवार सुबह ही फिर एक दुर्घटना की खबर मिली एक मित्र के छोटे भाई की बेटी पत्रकारिता का स्नातकोत्तर कोर्स करने चैन्नई गई थी। पहले ही दिन ही होस्टल की चौथी मंजिल से गिर गई और मृत्यु हो गई। पिता और कुछ रिश्तेदार उस का शव हवाई मार्ग से जयपुर और फिर सड़क से कोटा लाए। मैं दिन भर प्रतीक्षा में दफ्तर की पत्रावलियाँ संभालता रहा। शाम अंतिम संस्कार में गई। समाज में कुछ कर गुजरने का जज्बा रखने वाली एक होनहार युवती का यूँ दुनिया से विदा हो जाना, बहुत अखरा। आज दिन भर अदालत की। ग्यारह दिनों के बाद कला ही बरसात वापस लौटी और खूब बरस कर मौसम सुहाना कर गई।  शाम कुछ बरसाती मौज-मस्ती का मन था। लेकिन शाम फिर दुर्घटना के समाचार और मित्र की पत्नी के घायल होने से दुःखद हो गई।

14 comments:

अंशुमाली रस्तोगी 14 July, 2009 5:54 AM  

यानी सबकुछ दुख और क्षोभ के इर्द-गिर्द घूमता रहा। हम भी आपके दुख में शामिल हैं।

Arvind Mishra 14 July, 2009 6:40 AM  

बहुत कुछ मेरे साथ भी ऐसा ही बीता दिनेश जी !

डॉ. मनोज मिश्र 14 July, 2009 7:19 AM  

समाज में कुछ कर गुजरने का जज्बा रखने वाली एक होनहार युवती का यूँ दुनिया से विदा हो जाना, बहुत अखरा...
वाकई यह पीडा दायक समाचार है.

Udan Tashtari 14 July, 2009 7:30 AM  

बड़ी दुखद खबरें हैं..कभी ऐसा हो जाता है.

संगीता पुरी 14 July, 2009 7:50 AM  

पढकर मन बहुत दुखी हुआ .. कभी कभी सारी समस्‍याएं एक साथ ही उपस्थित हो जाती हैं .. कहावत भी है , नवों ग्रह इकट्ठे ।

ताऊ रामपुरिया 14 July, 2009 7:51 AM  

चौडी पट्टी नामक सुंदरी बरसात मे कहीं घूमने चली गई होगी. इनके भरोसे तो मुश्किल होती है. हमारे अरविंदजी को भी छोडकर चली गई थी. आपकी ही तरह ३ दिन बाद जाकर ढूंढ कर लाये थे वो भी. अब मिल गई है तो लड्डू सड्डू तो खिलाईये.:)

रामराम.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 14 July, 2009 8:41 AM  

सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है।
जाने वालों की आत्मा को
भगवान शान्ति प्रदान करें।

P.N. Subramanian 14 July, 2009 9:21 AM  

लगता है दुनिया दुखों से भरी पड़ी है. अब दुर्घटना को सकारात्मक चिंतन से तो टाला नहीं जा सकता . चौडी पट्टी का हाल हर जगह बुरा ही है

काजल कुमार Kajal Kumar 14 July, 2009 12:43 PM  

चौड़ी पट्टी =ब्राडबैंड...समझने में समय लगा :-) आपका वापसी में स्वागत है.

बी एस पाबला 14 July, 2009 2:47 PM  

नानक दुखिया सब संसार

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey 14 July, 2009 3:59 PM  

जिन्दगी में भागमभाग है, उसमें यह ब्राडबैण्ड भी भाग जाता है!
क्या करें।

राज भाटिय़ा 14 July, 2009 8:55 PM  

जवान का जान बहुत दुख देता है, आज की आप की पोस्ट पढ कर मन दुखी हुआ, लेकिन जो रचा है उसे केसे बदले ?

अजित वडनेरकर 15 July, 2009 3:37 AM  

मोहन राकेश की कहानियां याद आ गईं। कुछ इसी किस्म का असर छोड़ती थीं।

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