Friday, May 22, 2009

मिथ्याभिमान का टूटना : जनतन्तर कथा (32)

हे, पाठक!
इधर राजधानी में अब सरकार निर्माण का काम चल रहा है।  इस काम में बड़े बड़े दिग्गज जुटे हुए हैं।  पहले घोषणा हुई थी कि पैंसठ मंत्री बनेंगे।   लेकिन रात-रात में पंगा हो गया।  आज का दिन ही पंगेबाजी का था, आखिर कैसे न होता? कुछ लोग कह रहे थे मुहुर्त निकलवाने में गलती हो गई, कुछ लोग कहते थे कि ज्योतिषियों का अब कोई ईमान-धरम नहीं रहा, सब भविष्यवाणियाँ असफल हो गईं।  उन से मुहुरत निकलवा कर ही गलती की।  तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही थीं।  गठबंधन का एक दल रूठ गया था।  उसे पूरा हिस्सा चाहिए था, उसे मांगा जो मिल जाए तो दूसरा रूठ जाए।  सच में कितना कठिन होता है ये गठबंधन की सरकार बनाना। सोचते थे कि लाल फ्रॉक से पीछा छूटा। अब सरकार दबाव में नहीं रहेगी। स्वतंत्र  रह कर काम कर सकेगी।  लेकिन यह भ्रम ही साबित हुआ। तुलसी बाबा सही कह गए -पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं।  बाबा ने सोचा भी न होगा कि पराधीनता इस तरह की भी होगी।


हे, पाठक!
 राजधानी में गरमी बहुत थी।  दिन का भोजन कर सनत और सूत जी यात्री विश्रामगृह में ही विश्राम करने लगे।  बाहर का काम संध्या पर छोड़ दिया।  वैसे भी संध्या में नयी सरकार का हाल लेना था।  सनत पूछने लगा -गुरुवर! लाल बहनों का क्या होगा? दस दिन पहले बहुत कूद रही थीं कि सरकार में उन की अहम भूमिका होगी।  जनता ने निर्णय दिया तो उछल-कूद बंद हो गई।  सारी बहनें घर से बाहर ही नहीं निकल रही हैं। जरूर उन्हें घर की चिंता सता रही होगी।  उन की धुरविरोधी इधर मन्त्री बन रही है, साथ ही धमकी भी दे रही है कि तुम्हारी खंड सरकार अब गिरवाती हूँ।
सूत जी बोले -जनता ने बिलकुल सही निर्णय दिया, लाल फ्रॉकधारी बहनों को सही स्थान पर पहुँचा दिया।  इन को दो-तीन खंडों में सरकारें चला-चला बहुत मिथ्याभिमान हो चला था कि वे अब चुनावी तंतर से भारतवर्ष को बदल डालेंगी।  उन का मिथ्याभिमान टूटना जरूरी था।  वे जनता को साथ ले कर चली थीं।  जनता को भरोसा दिलाया था कि वे उन्हें संगठित करेंगी। संगठन की ताकत से धनिकों, परदेसियों की पूंजी और भूस्वामियों के जाल को तोड़ेंगी।  जहाँ जहाँ उन्हों ने जनता संगठित की वहाँ वहाँ वे फली फूलीं।  जनता ने खंड़ों का राजकाज भी उन्हें सोंपा।  लेकिन, प्रभुता पाई काहे मद नाहीं, राजकाज ने बहनों के चरित्र को बदलना शुरू कर दिया।  वे सोचने लगीं अब जनता को संगठित करने का दुष्कर काम कौन करे? जनता पेटी वाला मत देने ही लगी है। जैसे इन तीन खंडों में राजकाज मिला वैसे ही पूरे भारतवर्ष में भी मिलेगा।  वे लग लीं मतों को जुगाड़ में, जनता का संगठन बिसरा दिया। जनता उन्हें बिसराने लगी।

हे, पाठक!
सनत ने प्रश्न किया -पर गुरुवर! मुझे तो लगता है कि जनता ने उन्हें पाँच बरस के बीच पिछली सरकार गिराने का सबक सिखाया है। सब लोग यही कह रहे हैं।  पर आप बिलकुल दूसरी बात कह रहे हैं?
सूत जी आगे बोले - सनत! यह बहुत पेचीदा बात है।  बैक्टीरिया दल सर्वधर्म समभाव की बात करता है उसे ही धर्म निरपेक्षता कहता है। यदि वह किसी एक धर्म के प्रति अनुराग दिखाने लगे तो लोग उसे पसंद करेंगे? नहीं न? जनता बहुत विभागों में बंटी है, इस लिए ऐसा कभी नहीं होता कि सारी जनता एक साथ किसी को पसंद कर ले।  अब तुम इधर ही देख लो वायरस दल को चौथाई जनता से अधिक का मत कभी नहीं मिला।  उस का कारण है कि उस ने स्वरूप ही ऐसा बनाया है जिसे चौथाई जनता से अधिक लोग पसंद कर ही नहीं सकते।  यह दल अब कुछ कुछ इसे समझने भी लगा है।  वह स्वयं का रूप बदलने का प्रयत्न भी करता है।  लेकिन जैसे ही वह ऐसा करता है लेकिन बहुत सी जनता उस का साथ छोड़ने लगती है।  यह दल उस से घबरा जाता है और पुराने रूप में लौट आता है।  अब  चौथाई या उस से कम जनता का समर्थन उस की नियति बन गई है।
तो क्या वायरस दल इस से अधिक कभी आगे नहीं बढ़ पाएगा? सनत ने फिर प्रश्न किया।
सूत जी बोले -इस प्रश्न का उत्तर तुम्हें फिर कभी दूंगा।  अब कुछ विश्राम कर लो। दुपहरी ढलते ढलते तुम्हें राजभवन जाना होगा।  नयी सरकार का नयापन नहीं देखोगे?
सनत को सूत जी का सुझाव मानना पड़ा। लेकिन वह पूछ बैठा -ऐसा लगता है आप राजभवन नहीं जाएंगे?
-मेरा बिलकुल मन नहीं है। तुम जाओ मैं उस समय कुछ नगर भ्रमण करना चाहता हूँ। यह कह कर सूत जी विश्राम करने लगे।

बोलो! हरे नमः, गोविन्द, माधव, हरे मुरारी .....

 

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