Tuesday, April 14, 2009

तेरह दिन की सरकार : जनतन्तर-कथा (11)

हे, पाठक! 
नौ वीं महापंचायत पाँच साल के बजाय केवल सोलह महीने चली।  कोई एक पार्टी नहीं थी जो महा पंचायत में बहुमत में होती और नेता चुन कर उसे टिकाऊ रख पाती।  दसवीं महापंचायत बुलानी पड़ी।  पाँचवीं महापंचायत में देस से गरीबी हटाने की बात थी। उस का मजाक बना तो भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन चला। इस के बाद महंगाई का भी उल्लेख हुआ। इन सब मुद्दों से परेशानी सिर्फ बनियों को थी।  सब उन की लूट के पीछे पड़े थे।  लेकिन उस ने भी परदेसियों से कुछ तो सीखा ही था।  उस ने जवान नेता को उकसाया, मंदिर का ताला खुलवा दो। मंदिर वालों के वोट मिलेंगे, मस्जिद वाले तो तुम्हारे साथ हैं ही।  जवान नेता ने मंदिर का ताला खुलवाया।  बस क्या था? वायरस पार्टी को बैठे बिठाए रोजगार मिल गया।  उस ने कमंडल हाथ में ले हवन यज्ञ शुरू कर दिए।  उधर बिहारी लल्ला ने हवन में बाधा डाल कर उसे और भड़का दिया।  देश में फिर से धरम को लेकर लोगों के बीच वैमनस्य फैलने लगा।  लोग एक दूसरे के खून के प्यासे होने लगे।


हे, पाठक!
जब दसवीं महापंचायत के लिये वोट पड़ने की नौबत आई तो एक ओर तो  कमंडल थे दूसरी और मण्डल था।  लोग दोनों के इर्द गिर्द खड़े हो गए। आम जनता के मुद्दे, रोजगार, विकास, गरीबी गौण हो गए।  यही तो बनिए चाहते थे।  चुनाव हुआ लेकिन बीच में ही शंहशाह को बीच मैदान में एक छुपे पैदल ने मार गिराया।  लेकिन पब्लिक शो समाप्त नहीं होता।  वह सिर्फ रुकता है और फिर चल पड़ता है।  जवान शहंशाह नहीं रहा था।  लोग बेगम को ले कर चल पड़े।  बेगम, जिस को अभी देस की बोली सीखनी बाकी थी।  तो नतीजे में फिर वही हालत सामने आई।  कोई भी पार्टी सरकार बनाने की हालत में नहीं।  हाँ नेता की हत्या की सहानुभूति ने बैक्टीरिया पार्टी की संख्या कुछ बढ़ा दी थी। जैसे तैसे भाव-बोली के सहारे बैक्टीरिया पार्टी सरकार बनाने में समर्थ हो गई।  एक वि्द्वान बुजुर्ग को नेता चुना गया। उस ने जैसे तैसे देस चलाना शुरू कर दिया।  उधर मंदिर खंड में कमंडल पार्टी का सिक्का जम चुका था।  देस की सरकार को कमजोर जान उस का जोश बढ़ गया।  उस ने भी सरकार पर धावा बोलने के लिए सारा जोर मंदिर-मस्जिद पर लगा दिया।  नतीजा यह हुआ कि लोगों ने मस्जिद गिरा दी।  मंदिर पर पहरा लग गया जो आज तक जारी है।  वायरस पार्टी को  मंदिर निर्माण की एक ऐसी मणि मिल गई जो सदा चमकती है, जब चाहो उसे मुहँ से निकालो और पत्थर पर रख कर रोशनी कर लो, जब चाहो उसे मुहँ में रख लो।

हे, पाठक!

बहुत सारी बाधाएँ आईं। फिर भी बाजार पर पड़े पर्दे हटाए गए।  कुछ कुछ रोशनी आने लगी। कुछ बाहर जाने लगी।  लेकिन बड़े बड़े दिग्गज साथ छोड़ गए, दलाल गली में सरकारी साहूकारों का उपयोग कर के घोटाला कर के लोग हर्षित हुए, हवाला के जरिए धन लाने की बात भी उजागर हुई।  नहीं नहीं करते करते भी दसवीं महापंचायत पूरे पाँच बरस चल गई। ग्यारहवीं महापंचायत का वक्त आ गया।  साफ साफ तीन खेमे दिखाई देने लगे।  बैक्टीरिया और वायरस पार्टी के खेमे तो थे ही एक तीसरा खेमा लाल फ्रॉक वाली बहनों का भी था, कुछ लोग रीझ कर उधर भी इकट्ठे हो रहे थे।   इस महापंचायत में कोई इतने खेत न जीत सका कि सरकार बना ले।  मणि के प्रभाव से वायरस पार्टी ने पहले से हैसियत तो बढ़ा ली थी पर फिर भी महा पंचायत में एक तिहाई से कम रह गई, बैक्टीरिया पार्टी तो उस से भी पीछे रह गई।  लाल फ्रॉक गठजोड़  सब से पीछे था, पर महत्व रखने लगा था।  सब से बड़ी होने के कारण वायरस पार्टी के नेता को सरकार बनाने को बुलाया तो उस ने सरकार बना ली।  लेकिन तेरह दिन में ही लग गया कि बहुमत न बन पाएगा।  खुदै ही इस्तीफा दे पीछे हट गए।

आज फिर वक्त हो चला, ग्यारहवीं महापंचायत में क्या क्या हुआ?अगली बैठक में...
बोलो! हरे नमः, गोविन्द, माधव, हरे मुरारी .....
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