Friday, February 20, 2009

ब्लागिरी में जरूरी व्यवधान

इधर मैं अपनी यात्रा के बारे में लिख रहा था।  इस बीच साले साहब के बेटे की शादी आ गई। 16 को ही कोटा से निकलना पड़ा।   इस बीच 16 और 17 के लिए आलेख सूचीबद्ध किए हुए थे।  महेन्द्र 'नेह' का गीत और पुरुषोत्तम 'यक़ीन' ग़ज़ल  पर अच्छी प्रतिक्रियाएँ पढ़ने को मिली हैं।  रौशन जी की टिप्पणी थी कि, 'इसे पढने के बाद यकीन जी की और ग़ज़लें पढने का मन होने लगा है।'  वाकई पुरुषोत्तम 'यक़ीन' बहुत समर्थ ग़ज़लकार हैं।  उन की पाँच काव्य पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  अगली बार जब भी उन की ग़ज़ल ले कर आऊंगा तो उन का पूरा परिचय, उन की पुस्तकों के बारे में जानकारी के साथ आलेख को सचित्र बनाने की कोशिश रहेगी।

मेरी ससुराल जयपुर जबलपुर राजमार्ग क्रमांक 12 पर राजस्थान के झालावाड़ जिले में स्थित अकलेरा कस्बे में है, यह मध्य प्रदेश सीमा से पहले अंतिम कस्बा है।  अब तक तो वहाँ पूछने पर पता लगता था कि वहाँ भी इंटरनेट का प्रयोग आरंभ हो चुका है।  लेकिन जब तलाशने की बारी आती थी तो पता लगता था कि कुछ व्यवसायी केवल रिजल्ट आदि देखने के लिए इंटरनेट का उपयोग करते हुए धनोपार्जन करते हैं।  इस बार वहाँ  एक साइबर कैफे खुला मिला।  इस में चार कम्प्यूटर लगे थे,  उनमें से भी एक दो हमेशा और कभी-कभी सभी खाली मिल जाते थे।  पूछने पर पता लगा कि अभी छह माह पहले ही आरंभ किया है। वह नैट उपयोग के लिए 20 रुपए प्रतिघंटा शुल्क लेता था।  मुझे यह महंगा लगा, मैं ने मालिक को कहा भी। तो उस ने बताया कि अभी तो हम खर्चा भी बमुश्किल निकाल पा रहे हैं।  धीरे धीरे लोग इस का उपयोग करने लगें तो सस्ता कर देंगे।

मैं ने वहीं मेल खोल कर देखी। कुछ पोस्टें पढ़ीं। टिप्पणी करना चाहा तो इन्स्क्रिप्ट हिन्दी टाइप करने की सुविधा नहीं थी।  रोमन से हिन्दी टाइप करने में मुझे अब परेशानी आने लगी है और समय बहुत लगता है।  इस लिए कोशिश की गई कि कम से कम एक कंप्यूटर पर हिन्दी टाइपिंग की व्यवस्था बना ली जाए। संचालक की मदद से वह काम हमने कर लिया। लेकिन विवाह ससुराल का था और मेरे अनेक स्नेही संबंधी वहाँ मौजूद थे।  मैं ने नैट का उपयोग करने के स्थान पर अपना दो दिनों का समय उन के सानिध्य में ही बिताने का प्रयत्न किया।  यह सुखद भी रहा। इस के कारण मैं अधिक से अधिक लोगों के संपर्क में रह सका और उन की वर्तमान की समझ को जान सका।

वैसे मैं 18 फरवरी की रात्रि को कोटा पहुँच गया था।  इसी दिन मुझे एक मित्र के बेटे के विवाह के समारोह में शामिल होना पड़ा।  कल 19 फरवरी को मेरी फुफेरी और भिलाई में पोस्टेड अवनींद्र की बहिन के बेटे के समारोह में भाग लेना था।  लेकिन व्यवसायिक कामों से शाम को फुरसत मिली भी तो टेलीफोन ने रात दस बजे तक व्यस्त रखा और विवाह में रात साढ़े दस बजे ही पहुँच सका।  तसल्ली यह रही कि तब तक बरात पहुँची ही थी और मैं अधिक देरी से नहीं था।

आज दिन में अदालती कामों को करने के बाद ही आज लिखने बैठ पाया हूँ।  सोचा तो था कि भिलाई से आगे का यात्रा विवरण जो बीच में अधूरा छूट रहा उसे ही पूरा किया जाए लेकिन कल का ही दिन बीच में हैं।  फिर से रवि-सोम दो दिन बाहर रहना पड़ेगा।   उस में फिर से व्यवधान आए इस से अच्छा है उसे अभीस्थगित ही रखा जाए।  आज के लिए इतना ही बहुत।  कल मिलते हैं एक नए आलेख के साथ। 

11 comments:

विष्णु बैरागी said...

प्रीतक्षा करने के सिवाय कोई और उपाय भी तो नहीं। सो, यही सही।
आप विवाहों में अपनी आवभगत कराइए।

बवाल said...

फ़ैज़ है रूए-चमन आपके आ जाने का
वरना ये भी कोई मौसम है ? बहार आने का
वेलकम सर! सही है, आजकल यदि हमें नैट की कोई भी परेशानी हो जावे तो बड़ा अखर जाता है। आप हमें और हम आपको ज़रूर मिस करते रहे।

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत बढिया जी . आखिर ससुराल और वो भी शादी मे? क्या कहने जी. आनन्द लिजिये और अब हम लोगो को भी सुना दिजिये.

रामराम.

Arvind Mishra said...

खूबसूरत कार्ड पर राजस्थानी कला शैली चार चाँद लगा रही है !

Udan Tashtari said...

जरुरी कार्य हैं, करते रहिये..यहाँ तो इन्तजार की आदत सी हो गई है..तू नहीं और सही..और नहीं और और सही...इन्तजार ओ लगा ही रहता है. :)

अटेंड करिये सर फुल मूड में.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

भारत मेँ शादियोँ का मौसम आया हुआ लगता है खूब आनँद लीजिये परिवार के सँग और हो सके तो तस्वीरेँ भी लगाइयेगा -
हम भी देख लेँगे, झालावाड, कोटा तथा अन्य स्थलोँ को !
- लावण्या

अभिषेक ओझा said...

बिना इन्टरनेट एक दिन भी काम नहीं चल पाता ! हम जैसे पुराने ख्याल वाले तो अभी भी तो अभी भी कभी-कभार ८-१० दिन निकाल देते हैं. :-)

विनय said...

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राज भाटिय़ा said...

दिनेश जी ससुराल मे शादी है जरा वजन का ख्याल रखे, वर्ना घटाना मुश्किल होता है,
लेकिन जिम्मेदारिया तो जरुर निभानी पडती है, हम सब इन्तजार मै है,
धन्यवाद

Shastri said...

दिनेश जी, अब यात्रा-विवरण का इंतजार है!!

केफे में संगण का उपयोग करें तो मशीन को छोडने के पहले "टूल्स" में जाकर "केष" और अन्य चीजों को खाली करना न भूलें. कहीं ऐसा न हो कि कल कोई और आपके चिट्ठे पर पोस्ट करता मिले

सस्नेह -- शास्त्री

Sanjeet Tripathi said...

प्रतीक्षा का अता-पता तो दिए नई हो हजूर ;)

ये इंटरनेट वाली बात भली कही आपने, हम इसके ऐसे आदी होते जा रहे हैं या कहें कि हो गए हैं कि पूछिए मत। किसी कस्बे में पहुंचने पर अगर इंटरनेट सर्फिंग की या ई मेल चेक करने की तलब हो जाए तो फिर साथ वाले टेंशनिया जाते हैं।

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